सितंबर 2007

 

प्रकृति और साहित्य को समर्पित

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 हम लोग

 


 

   बचपन     

 बाल गीत 

गिरधर राठी

 

एक

 

धूप गई तो बारिश आई

बारिश लाई पानी

पानी में जो बिल्ली भीगी

दौडी आई नानी

 

मम्मा आई ऐसे आई

जैसे आया पानी

चुलबुल शोर मचाती आई

पूरी करो कहानी

 

 

दो

हाथी सूंड हिलाता आया

हाथी राजा

बन्दर पूंछ हिलाता आया

बन्दर बाजा

 

तीन

घोडा दौडा

हाथी दौडा

दौडा बब्बर शेर

दौड लगाने बन्दर आय्रा

वहीं हो गया ढेर

 

 

चार

कम्पू भाई कम्पू भाई

घर में कितने दाने

कितने चूज़े मुर्गी मुर्गे

आएं दावत खाने

 

पांच

नन्हे मुन्ने टुन्नू छुन्नू

कपडे फेंके नाच रहे हैं

बूंदों में ऐसा क्या लिक्खा

जोर-जोर से बांच रहे हैं

 

अब ककडी भुट्टा आएंगे

दिन दिन मेंढक टर्राएंगे

डबरे के पानी पर उड उड

मच्छर भी गाना गाएंगे

 

नई नई हरियाली होगी

धरती फूली फूली होगी

अपने घर अपने आंगन में

रिमझिम रिमझिम बारिश होगी.

 

(जनसत्ता से साभार)

 

 

 

 

 

 

 

 कहानी

 

 

  दोस्ती का छल्ला

 - कुसुमलता सिंह

 

एक थे राजा टीकम । वे बहुत वीर और विद्वान थ। उनके राज्य में हर चीज मिलती थी। सभी उन्हें प्यार करते थे। यह बात पड़ोसी देश के राजा को अच्छी नहीं लगती थी। वह चाहता था कि राजा टीकम को किसी तरह कैद कर ले।

राजा टीकम को शिकार का बहुत शौक था। इसके लिए वे घने जंगलों में जाते। पड़ोसी देश के जहासूसों ने राजा को उसी समय पकड़ने की सोची। एक दिन राजा जंगल में शिकार को गए। एग जगह उन्हें एक साधु बैठा नजर आया। राजा ने उसे प्रणाम किया। साधु ने कहा, ''जंगल में एक सोने की सींग वाला सुनहरा हिरन आया है।'' राजा बोले, ''अरे! सोने की सींग वाला सुनहरा हिरन।'' साधु ने फिर कहा, ''हॉ ! वह दक्षिण दिशा के घने जंगल में है। पर वह अद्भुत हिन बस एक घंटे वहॉ रहेगा, फिर छिप जाएगा।''

साधु के मुंह से सुनहरे हिरन की बात सुनकर राजा ने सच मान लिया। वे उसे पकड़ने के लिए तुरंत चल दिए। सैनिक और मंत्री भी साथ चले, पर राजा का घोड़ा बहुत तेज गति वाला था। राजा सबाके पीछे छोड़कर आगे निकल गए।

एकाएक हवा में विचित्र गंध फैली। धुएॅ के बादल उठने लगे। धुएॅ में बेहोशी का असर था। राजा टीकम बेहोश होकर गिर गए। पड़ोसी देश के जासूसों की चाल सफल हो गई। उन्होंने राजा को सुनहरे हिरन का लालच देकर कैद कर लिया। वह साधु भी दुश्मन का जासूस था।

राजा को एक अंधेरी कोठरी में बंद कर दिया गया। दूसरे दिन राजा जेल की कोठरी में उदास बैठे थे। तभी झरोखे में एक चिड़िया आ बैठी। उसकी चोंच में छोटा सा पत्थर था। चिड़िया ने पत्थर राजा के सामने रख दिया। पत्थर बहुत चमकीला था। राजा ने पत्थर का उठाया। वे उसे देख ही रहे थे कि एकाएक पत्थर राजा के हाथ से छूटा और उनकी पैर की बेड़ी पर गिरा। बेड़ी तुरंत टूट गई।

राजा टीकम जेल से बाहर आ गए। वह चिड़िया जेल की कोठरी के बाहर बैठी चहचहा रही थी। उन्होंने कहा, '' चिड़िया मैं तुम्हारा उपकार कभी नहीं भूल सकूॅगा। तुमने मुझे आजाद किया। क्या तुम मेरे साथ मेरी राजधानी चलोगी ? '' चिड़िया बोली, ''चूॅ-चूॅ, हॉ! हॉ!''

राजा अपनी राजधानी लौट आए। राज्य में खुशी की लहर दौड़ गई। लौटने के दूसरे दिन राजा टीकम ने विशेष दरबार किया। सबने देखा राजा के पास एक चिड़िया बैठी है। उन्होंने सबको बताया कि किस तरह इस नन्हीं चिड़िया ने उनकी जान बचाई। फिर बोले, '' अब मै। इसे कहीं नहीं जाने दूॅगा। हमेशा अपने पास रखूॅगा।'' चिड़िया उनके आसपास मंडराती रहती। मंत्री को चिड़िया का राजा के आसपास खुले घूमना अच्छा नहीं लगता। वह एक दिन सोने का पिंजरा बनवा लाए। चिड़िया को उस पिंजरे में बंद कर दिया।

पिंजरा हर समय राजा के पास रहता। पर राजा देख रहे थे चिड़िया अब चुप रहती । एक दिन राजा पिंजरे में बंद चिड़िया को देख रहे थे। उन्होंने धीरे से कहा, ''पहले तो चिड़िया खूब चहचहाया करती थी। अब ना जाने क्या हो गया इसे ? एकदम चुप रहती है।''

अगले दिन राजा आराम कर रहे थे। तभी उन्होंने चहचहाने की आवाज सुनी। देखा एक नई चिड़िया पिंजरे के ऊपर बैठी चूं-चूं कर रही है। थोड़ी देर बाद पिंजरे में बंद चिड़िया भी बोलने लगी। राजा दोनों को देखते रहे। वह सोच रहे थे- पिंजरे वाली चिड़िया कितने दिनों से चुप थी। आज दूसरी चिड़िया आई तो बोलने लगी। आखिर क्यों ?

तभी उन्होंने देखा पिंजरे में बंद चिड़िया के आंसू गिर रहे हैं। राजा के होठों से निकल पड़ा- क्या चिड़िया भी रो सकती है ? एकाएक बंदी चिड़िया बोली, ' हॉ! चिड़िया भी रोती है। पिंजरे की कैद में रहकर ऑसू ही बहाए जा सकते हैं। अपनी सखी को देखकर मुझे रोना आ गया।''

''चिड़िया तुम्हें क्या दु:ख है। देखो तुम इतने शानदार महल में सोने के पिंजरे में रहती हो,'' राजा बोले।

''राजा हम आजाद पंछी हैं। खुले आकाश में उड़ने से ही हमें सुख मिलता है। जरा अपनी सोचो। तुम जेल मे रहकर कितने दु:खी थे। मैंने तुम्हें आजादी दी। पर बदले में तुमने मुझे ही कैद कर लिया । यह कैसा न्याय?'' रोते हुए चिड़िया बोली।

यह सुन राजा गहरे सोच में डूब गए। उन्हें लगा चिड़िया ठीक कह रही है। कैद के दिन याद आते ही उनका मन उदास हो गया। वह चिड़िया का दु:ख समझ गए। अपनी गलती पर पछतावा होने लगा। राजा ने कुछ सोचा फिर बढ़कर पिंजरे का दरवाजा खेल दिया। कहा, ''चिड़िया मुझे क्षमा करना। मैंने तो अपनी ओर से तुम्हारे उपकार बदला चुकाया था, पर उससे तुम्हें दु:ख पहुॅचा।''

चिड़िया पिंजरे से बाहर आ गई। तभी राजा को जैसे कुछ याद आया। बोले, ''क्या तुम कल आ सकती हो ?''

''हॉ! आऊॅगी लेकिन क्यों ?'' चिड़िया ने पूछा। कल बताउॅगा।' कहकर टीकम मुस्कुरा दिए।

अगले दिन भोर में चिड़िया राजा के कमरे में आई। उसने देखा सोने का पिंजरा वहाँ नहीं था। वह झरोखे में बैठकर चहचहाने लगी। राजा ने बुलाया तो उतरकर उनके हाथ पर आ बैठी। राजा ने एक छोआ सा छल्ला उसकी गरदन में पहना दिया। उस पर हीरे मोती जड़े थे। कहा, ''छल्ला इसलिए पहनाया है कि तुम्हें दूर से पहचान सकूॅ। यह हमारी दोस्ती का छल्ला है।''

चिड़िया उड़ गई। अगली सुबह मुंह अंधरे राजा को अपने पंलग के पास चहचहाने की आवाज सुनाई दी। गीत इतना सुरीला था कि राजा खुशी से झूम उठे। राजा ने दखा वहीं चिड़िया गा रही थी। उसके गले में पड़े छल्ले के हीरे मोती चमक रहे थे। चिड़या ने अपना गीत पूरा किया और वहाँ से फुर्र से उड़ गई। उसे उड़ता देख राजा टीकम हौले से हॅस दिए।

 

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                             प्रबंध सम्पादक : अंजली सहाय सम्पादक : डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल