सितंबर2007

             

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व्यंग्य  

 

इंटरव्यू श्री कृष्ण से

-डॉ सुमन मेहरोत्र

  

एक महिला भाषण दे रही थी। 'कृष्ण ने बांसुरी बजा बजाकर हमें बहुत लुभा लिया। हम अपने पति और बच्चों को छोड़कर उनकी बांसुरी की तान पर नाचते रहे। अब वे हमें नहीं नचा सकते A

मैं अपनी डायरी और पेन लिए कृष्ण कन्हैया के महल के सामने खड़ा था। क्या आलीशान महल है। मैं देखता ही रह गया। सुदामा बेचारे इसमें कैसे घुसे होंगे। मैंने दरबान से कष्णजी से भेंट करने की अपनी अभिलाषा व्यक्ति की। उसने अपनी मूंछो पर तावे दिया और बोला भगवान अभी विश्राम कर रहे हैं फिर आना। मैं भी अपनी जिद पर अड़ गया। मैंने कहा 'भइया जाओं और कह दो अखबार वाले आए है।' वह पूछने चला। मैं उसके पीछे-पीछे ही अंदर पहुंच गया। कन्हैया रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान थे। वाह क्या ठाट है। कहां गोकुल, मथुरा की संकरी गलियां। गलियों में नंगे पांव गईयों के पीछे पीछे श्री कृष्ण का दौड़ना। कहां यह भव्य सिंहासन। वंचर ढुलाते दास, दरवाजे पर पहरेदार। तकदीर पलटते देर थोड़ी लगती है। मैं उनके चरणों में प्रणाम करने नीचे ही बैठ गया।

'कौन हो तुम?' भगवान ने पूछा।'

'भगवान मैं एक पत्रकार हूं। आपका इंटरव्यू लेना चाहता हूं।'

'ओहो पत्रकार हो! पूछो भाई क्या पूछना चाहते हो। पत्रकारों से तो संभलकर रहना पड़ता है नहीं तो न जाने क्या न्यूज बना दें।'

'भगवान मेरा पहना प्रश्न है कि आज से हजारों वर्ष पूर्व आपने यह होली का त्योहार प्रारंभ किया था। आपका इस त्योहार को मनाने के पीछे क्या उप्ेश्य था।'

'अरे तुमने वह गाना नहीं सुना।' मैंने चौकन्नी आंखों से उनकी ओर देखा ओर सिर हिला दिया।

'खेलेंगे कूदेंगे नाचेंगे गाएंगे और क्या'

नहीं मुरली वाले आप बड़े भारी दार्शनिक हैं। आपके बराबर दर्शनशास्त्र का पंडित कोई नहीं हुआ अभी तक। केवल इतना सा कारण नहीं हो सकता।'

'तुम ठीक सोचते हो वत्स! यह सद्भावना का त्योहार है। आज के दिन कोई छोटा-बड़ा, ।ंचा-नीचा, जाति विजाति नहीं होता। देखो न भाभी देवर के गले लग जाती है। जीजा साली को बाहों में भर लेता है। इस त्योहार की सद्भावना को लोगों ने समझा और इसका ग्लोबलाइजेशन हो रहा है। विदेशों में होली को कैसे खेला जाए यहां से रंग-गुलाल, पिचकारियां लेकर टीमें विदेश जा रही है। गोरी-गोरी छोकरियां लहंगा चोली पहने गोपियां बन रही हैं। चारो ओर प्रेम प्यार का साम्राज्य छा रहा है। यह होली का त्योहार ही है जो विश्व से आतंकवाद को समाप्त कर सकता है। धन तो व्यय होगा ही उसकी क्या चिंता करना।

मैंने उनके चरणों में अपना माथा टिका दिया धन्य हो नटवर धन्य हो। बहुत दूर का पासा फेंका है। मेरा अगला प्रश्न है कि क्या आपको अपने जमाने की होली में और आज की होली में कोई अंतर दिखाई देता है।'

वे गहरी सांस लेकर बोले- 'हां वत्स! आज वे गोपियां नहीं रहीं जो हमारे साथ रात रात भर रासलीला करती थीं, होली खेलती थीं। मैं उनके कपड़े चुरा लेता था। हांडियां फोड़ देता था, वे हंसती रहती थीं। आज गोपियां होली का बहिष्कार कर रही हैं। यह नारे की आवाजें नहीं सुन रहे हो।'

मैंने ध्यान दिया। सच में आवाजें आ रही थीं। 'हम होली नहीं खेलेंगे। कृष्ण माफी मांगें। उनकी यह छेड़खानी नहीं चलेगी, नहीं चलेगी।'

'देखों वे अपने भाषण में क्या-क्या बोल रही हैं। मैं तुम्हें कम्प्यूटर पर दिखाता हूं।'

मैंने देखा एक महिला हाथ उठाकर जोरदार शब्दों में भाषण दे रही थी।' कृष्ण ने बांसुरी बजा-बजाकर हमें बहुत लुभा लिया। हम अपने पति और बच्चों को छोड़कर उनकी बांसुरी की तान पर नाचते रहे। अब वे हमें नहीं नचा सकते हैं। हम आजकल की शिक्षित नारियां उनकी बातों में नहीं आएंगी। आज से होली का त्योहार बंद। उन्होंने हमारी कीमती साड़ियों पर रंग डालकर उनका सत्यानाश कर दिया है। वे डंाइक्लीनिंग के पैसे दें।'

मैंने देखा श्रीकृष्ण सिर झुकाए बैठै थे।' भगवान एक बड़ा व्यक्तिगत प्रश्न पूंछना चाहता हूं।, यह मेरा अंतिम प्रश्न है। आप बहुत दुखी हैं। मैं आपको ऐसे गोपियों के बहिष्कार में आंसू बहाते हुए नहीं देख सकता।'

मेरी आंखें भी छलछला आई थीं। श्रीकृष्ण ने अपना रूमाल निकालकर मुझे दिया। मैंने आसूं पौछे और डायरी का अगला पृष्ठ पलटा।

'हे प्रभु सूना है आपके अन्त:पुर में सोलह हजार रानियां थी। मैं तो एक पत्नी को नहीं संभाल पाता हूं आपने उन सबाके कैसे खुश रखा।'

'अरे यार तुम पत्रकार हो या अखबार बेचने वाले हॉकर। सुनो पास आकर सुनो बड़ी सीक्रेट बात है। मैंने अपने सोलह हजार क्लोन बनवा लिए थे। हर रानी यही समझती थी कि मैं सिर्फ उसी के पास हूं। और में राधा महल में अठखेलियां करता रहता हूं। आई बात समझ में। अब जाओं बरखुदार बहुत हो गया।'

'हां मुरली वाले आपकी सारी लीला समझ में आ गई।'

मैं वहां से चला आया। होली के पहले यह साक्षात्कार अखबार में छपवाना जो था।

-डॉ सुमन मेहरोत्रा

 

सुपरिचित लेखिका सुमन मेहरोत्रा हाल ही  में हमसे जुदा हो गईं

 उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि के साथ हम उनकी यह रम्य रचना प्रस्तुत कर रहे हैं

 

 

 

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  व्यंग्य

समधी समधन-रिश्ते ही रिश्ते-मिल तो लें  वीरेन्द्र जैन

   

समाजशास्त्री अर्थशास्त्री व राजनेताओं की जुबान यह कहते-कहते नहीं घिसती कि भारत एक कृषिप्रधान देश है, पर क्षमा करें मैं इससे सहमत नहीं हूं। दरअसल भारत एक रिश्ता प्रधान देश है। इस शस्य श्यामला भूमि पर रिश्तों की फसल लहलहाती है जिसे काटने के चक्कर में अपने अमर भाई के कहने पर अमिताभ तक किसान बन जाते हैं और शस्य श्यामलाहिल्स पर पत्नियां पति की सहायता के लिए नोट गिनने की मशीनें खरीदती हैं।

दीवारों दीवारों पर 'रिश्ते ही रिश्ते -मिल तो लैं' लिखा हुआ आपने किसी दूसरे देश की दीवारों पर नहीं देखा होगा। यह संदेश नये रिश्ते बनाने के लिए है जबकि हमारे यहां पुराने रिश्ते ही इतने हैं जो हमें विदेशियों की तुलना में अधिक उदार होने के गुण द्वारा गौरवान्वित होने का अवसर देते हैं । विदेशी तो मदर फादर ब्रदर सिस्टर अंकल आंटी तक ही सीमित हैं और ग्रान्ड फादर ग्रान्ड मदर भी मदर फादर के ही ऐसे एक्सटेंशन लगते हें जैसे सुपर रिन या न्यू लक्स हों। पर हमारे यहां के फूफा फूफी मौसा मौसी ताउ ताई ससुर बहू सास दामाद मामा भान्जा साली जीजा भाभी देवर ननद ननदोई साला सलहज नाती पोता और ना जाने कितने अनगिनित रिश्ते ही रिश्ते हैं, जिनमें से ज्यादातर के बारे में तो कहना ही पड़ता है कि मिल तो लें।

हमारे धर्मप्राण देश में जो रिश्ते होते हैं, वे दो तरह के होते हैं। एक रिश्ता तो धर्म का होता है व दूसरा अधर्म का होता है। जो रिश्ते सगे होते हैं वे अधर्म के होते हैं और जो रिश्ते मान्यता पर आधारित होते हैं वे धर्म के रिश्ते होते हैं जैसे धर्मपुत्र धर्मपिता आदि। बस इसमें धर्म पत्नी ही एकमात्र अपवाद होती है और सगी पत्नी को धर्म पत्नी कहा जाता है। हो सकता है कि यह नामकरण भी किसी ने बहुत सोच समझ कर किया हो।

वैसे तो हमारे यहां जो रिश्ते ही रिश्ते होते हैं उनमें माताएं ही कई होती हैं जैसे धरती माता, गंगामाता गौमाता, गीतामाता तुलसीमाता, भारतमाता और इनके साथ बन्दरमामा चन्दामामा होते हैं। जब मामा हैं तो मौसी भी होना चाहिये। और होना क्या चाहिये हैं भी- बिल्ली मौसी। यही हाल पिताओं का भी है । नगरपालिका के अध्यक्ष को नगरपिता कहा जाता है तो गांधी जी को राष्ट्रपिता कहा जाता है। पिताजी के साथ चाचा भी चाहिये जिसके लिए नेहरू चाचा मौजूद हैं। किसी जमाने में ताऊ की भूमिका चौधरी देवीलाल ने निबाही। बहिन मायावती से राखी बंधवाने वाले लालजी टंडन ने कंस देवकी जैसा भाई बहिन का रिश्ता निभाया ही था। पर भाई सारे के सारे बम्बई - न न क्षमा करें, मुम्बई शिफ्ट हो गये हैं और यूपी से भइया लोगों को भी बुला लिया है। उमाभारती कैमरे के सामने बुरा-भला कहने के बाद अटलबिहारी व अडवाणीजी को पिता समान बतलाती हैं। और कभी हत्या कराने का आरोप लगाने के बाद शिवराजसिंह चौहान को बड़ा भाई बतलाती हैं।

अब ये जो रिश्तों की फौज हमारे यहां है उसमें अगर नये आयाम और जुड़ रहे हों तो क्या आश्चर्य है! वसुंधरा राजे सिंधिया ने दस-बीस गुर्जरों का वध करवाने के बाद अपने 'समधी' को घर पर बुलाकर उनकी 'बेटी' के हाथ से रोटी खिलवायी हो तो आंदोलन को तो रिश्तों के कुण्ड में होम होना लाजिमी ही था। आखिर कोई अपनी बेटी के घर पर रोटी खाकर इतनी कीमत भी नहीं देगा!

जो राजनीति कर रहे हों वे करते रहें हम लोग तो रिश्तेदारी निभा रहे हैं। अब कोई हमारे ऊपर भाई-भतीजावाद का आरोप लगाता है तो हमें गर्व होता है। रिश्ते ही रिश्ते- मिल तो लें।

(साभार)

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रचनाकार संपर्क :

वीरेन्द्र जैन

21, शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास, भोपाल (म.प्र.)

 

 

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                           प्रबंध सम्पादक : अंजली सहाय सम्पादक : डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल