सितंबर 2007

   

                      

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  पुस्तक समीक्षा  

   

 इंटरव्यू पर जरूरी पुस्तक

 --अनुराग वाजपेयी

पत्रकारिता में साक्षात्कार यानि इंटरव्यू का सर्वाधिक महत्व होता है। सफल साक्षात्कार वह माना जाता है जो अनजाने तथ्यों और घटनाओं को सामने ले आए। आजकल इंटरव्यू भी प्रायोजित होने लगे हैं। प्रख्यात पत्रकार और लेख डॉ यश गोयल तीन पीढ़ियों के साथ जीवंत सम्पर्क किस तरह स्थापित हो सकता है इसके उदाहरण हैं। यह पुस्तक भी उनके इसी कौशल का प्रमाण है। इस पुस्तक में डॉ यश गोयल ने लेने की कला पर भी विस्तार से प्रकाश डाला है। साक्षात्कार विधा के उद्भव और विकास को विस्तृत ब्योरे के साथ ही इंटरव्यू के लिए पर्याप्त तैयारी के बारे में भी अच्छी जानकारी दी गई है। साक्षात्कार कर्त्ता को जिसका साक्षात्कार लेना है उसके बारे में क्या, कितनी और कैसी जानकारी होनी चाहिए यह इस पुस्तक में उदाहरणों के साथ बताया गया है। आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का युग है और इंटरव्यू प्रायोजित होने लगे हैं, खासतौर पर फैशन और फिल्म सेलिब्रेटिज के इंटरव्यू तो उनकी और से खुद ही तैयार कर भेज दिए जाते हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया के लिए इंटरव्यू कैसे लिया जाए ताकि उसकी प्रासंगिकता और विश्वसनीयता बनी रह सके यह तकनीक भी पुस्तक में सविस्तार बताई गई है।

पुस्तक में जिन विभूतियों इंटरव्यू शामिल है उनमें विष्णु प्रभाकर, कलेश्वर, अज्ञेय, डॉ क़े. एस. ज़यरामन, अनिल अग्रवाल, नौशाद, अदनान सामी, पिनाज मसानी, अनिल कपूर, सुष्मिता सेन, शबाना आजमी, फाल एस.ग़िरोटा जैसे नाम है। इंटरव्यू के साथ फोटो और ढेरों प्रकाशित साक्षात्कारों की कतरने(हिन्दी-अंग्रेजी) पुस्तक में शामिल की गई है। डॉ ग़ोयल ने इस श्रम साध्य कार्य में इंटरव्यू के किसी भी पहलू के अछूता नहीं छोड़ा है।

अब तक इंटरव्यू पर जो पुस्तकें आई हैं उनमें या तो एक साक्षात्का र्त्ता द्वारा विभिन्न लोगों के लिए इंटरव्यू हैं या एक व्यक्ति के विविध पहलुओ पर अलग-अलग साक्षात्कार हैं लेकिन यह पुस्तक इस सबसे विशिष्ट है जिसमें एक पत्रकार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों के लोगों, खासतौर पर खबरों में बने रहने वाले लोगों के इंटरव्यू हैं। नए पत्रकारों और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए तो यह पुस्तक इंटरव्यू कैसे लिया जाना चाहिए इसकी नीति निर्देशक बन सकती है। विभिन्न विश्वविद्यालयों में वर्षो से पुरानी किताबों की तोता रटंत कर रहे जुगाडू प्रोफेसरों के सामने डॉ यश गोयल ने इस पुस्तक के रूप में आईना रख दिया है उन्हें इसे अवश्यक पाठयक्रम में शामिल करना चाहिए ताकि छात्र ये जानें कि एक पंक्ति में भी साक्षात्कार कैसे लिया जा सकता है। और सबसे बड़ी बात तथ्यों के ढेर में से समाचार कैसे निकाला जा सकता है। इस पुस्तक में साहित्य, पत्रकारिता, पर्यावरण, इतिहास, संगीत, गायन, कला, फिल्म, फैशन, रंगमंच, टीवी, खेल और फोटोग्राफी के दिग्गजों के साथ ही राजनीति, चिकित्सा और पर्यटन क्षेत्र के प्रमुख लोगों के इंटरव्यू हैं। नोबल पुरस्कार विजेता जेरोस्ला सीफर्ट के साक्षात्कार में उनकी यह उक्ति ' अगर आम आदमी चुप है तो वह निपुण चाल है, अगर लेखक चुप है तो वह झूठ बोल रहा है' पुस्तक ही नहीं समकालीन संदर्भो में सबसे सामयिक उक्ति है। पुस्तक में लेखक ने हर साक्षात्कार से पहले उसकी तैयारी और पृष्ठभूमि का जो रोचक विवरण दिया है उससे यह किताब संग्रणीय बन गई है और इंटरव्यू के सिद्धांतों को समझने में मददगार भी। हिन्दी में इंटरव्यू पर अपनी तरह की यह पहली पुस्तक है। इससे पत्रकारिता की प्रमुख विधा साक्षात्कार को समझने में निश्चय ही आसानी होगी।

समीक्षित पुस्तक-

 इंटरव्यू जर्नलिज्म, लेखक - डॉ यश गोयल, प्रकाशक-पंचशील प्रकाशन जयपुर, जयपुर, मूल्य- 500. संस्करण- 2007

 

 इसी पुस्तक से एक साक्षात्कार पढें और बहुत कुछ स्तम्भ में                                 


 

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''दलित जीवन की कारूणिक कथा : दशक्रिया                              

-रमेश खत्री

विगत दिनों दलित जीवन को चित्रित करता अच्छा साहित्य प्रकाशित हुआ, जिसमें अनेक जीवन से जुउी समस्याओं रूढ़ियों और कुठांओं का वृहद चित्रण पढ़ने को मिला। इसी क्रम में मराठी के सुपरिचित साहित्यकार बाब भॉड विरचित उपन्यास 'दशक्रिया' का मराठी में प्रकाशन हुआ, इसका हिन्दी अनुवाद निशिकान्त ठकार ने किया। बाब भॉड के इससे पहले मराठी में कई उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। जिनमें प्रमुख है ''काजोल'', जरंगा, धर्मा, पाठन्हतीची गोष्ठ।

समीक्ष्य उपन्यास दशक्रिया का नायक किशोरवय का 'भानुदास है, किशोर मन: स्थिति को केन्द्र में रखकर लेखक ने उपन्यास का ताना बना बुना है। गोदावरी के किनारे बसा गांव पैठण जो कभी साड़ियों के लिए मशहूर हुआ करता था, इस उपन्यास की कथाभूमि है। उपन्यासकार ने भानुदास के माध्यम से दलित समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता, जाति व्यवस्था, निर्धनता और इनसे घिरे दलितों की विद्रपताओं का कारूणिक चित्र उकेरा है

दरअस्ल; ''दशक्रिया'' का ताना बाना शब के अंतिक संस्कार से अपनी जीविका अर्जित करने वाले दलित समुदाय का आनारिक और कारूणिक कथा है। इस उपन्यास का नाय 'भानुदास' अपने स्कूल से गीता लगाकर गोदावरी के ठण्डे पानमें खड़े होकर अस्थी को राख (अश्मा) को गोदावरी में गिरने से पहले अपने झोरिया से छानता है और उसमें से निकले रूपये, पैसे और अन्य सामग्री को पाकर प्रसन्न होता है। उपन्यास का नायक 'भानुदास' किशोरावस्था में ही एक-एक कर कईं अनुभवों से दो चार होता जाता है।  उसे कमाई का अनुभव समझ आने से पहले ही हो जाता है, लहुजीनगर के बड़े बच्चे इस काम में उसके गुरू हैं। वह उनके साथ 'दशक्रिया' घाट पर जाने लगता है, उनक'झोरिया' लेकर दशक्रिया करने के लिए आने वाले लोगों के पीछे भटकने लगा और समय के साथ-साथ काम के पाठ को पढ़ने लगा। जब कोई काम नहीं होता तो इन्हीं बच्चों के साथ खेलकर समय गुजारता और फिर कुछ ही दिनोमें वह साहुकार से अपने लिए झोरिया  (छलनी) किराये पर ले आता है और जब वह अपने हाथ में अपनी पहली कमाई देखता है तो उसकी ऑंखे खुशी से फैल जाती है - ''साठ पैसे की कमाई उसने माँ के हाथ में रख दी।''

 

कई मार्मिक दृश्य इस उपन्यास में पाठक को मिमलेंगे 'भानुदस' की मन:दशा को उपन्यासकार ने कई-कई कोणों से उकेरा है- 'जिस साहुकार से वह झोरिया किराये पर लेता था उसकी को अपनी कमाई खरीदी हुई नई झोरियां दिखाते हुए कहता है - ' साहुकार! मैं आज छलनी (झोरिया) का मालिक बन गया हूं, भानुदास आज तनकर खड़ा था। कुछ समय पहले का डर, लाचारी, दबाव सब छू मन्तर हो गये थे। एक वर्ग से दूसरे वर्ग में प्रवेश करने का चित्रण इससे अच्दा ओर क्या हो सकता है। ''

कथा नायक भानुदास की तीन बहनें है- हेमा, मन्दाकिनी और रेखा। एक बड़ा भाई निवृतिनाथ जो नोंवी कक्षा में पढ़ने के साथ सिलाई का काम भी सीख रहा है, पिता विठ्ठल कपड़े की मील में काम करता था,एक एक्सीडेंट में अपना एक पैर गंवाने के बाद अब खाली निठल्ला बैठा रहता है, मॉ नगर निगम में सफाई कर्मी हैं, बस इतना सा परिवार है भानुदास का और उसका किशोर मन इस पूरे उपन्यास के कथानक में पसरा पड़ा है।

वास्तव में किसी समस्या को उठाना उतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि उसे सही परिप्रेक्ष्य में और सही दिशा में विन्यस्त करना होता है। 'दशक्रिया' में शव के अंतिम संस्कार से जीविका चलाने वाले समूह का जिस जीवन्नता से चित्रण किया गया है, वह काबिले तारीफ है- ''हर एक के मन में यही सुप्त कामना हुआ करती थी कि इस हफ्ते ज्यादा से ज्यादा लोग मर जाऐं (इसी उपन्यास से उपन्यास में व्यापक कथा फलक को अपनाकर दशक्रिया के विभिन्न सूत्रों के मन का -मन का चुनकर एक धागे में पिरोते हुए एक सम्पूर्ण माला को गूथकर उपन्यास के रूप में हमारे सम्मूख प्रस्तुत किया गया है। इसके विभिन्पात्र अपनी सार्थक भूमिका निभाते हुए दिखाई देते हैं, जिनमें प्रमुख है- केशव, नारायण, तुकाराम, शान्ता, भानुदास और पन्नेसाहुकार। इन सबका धर्म छिपा है दो बित्ते वाले पेर में, अपने पेट का गड्ढ़ा भरने के लिए सबने मोक्ष की दुकाने खेल रखी है। देखें -'' क्या रखा है इस पवित्र विधि में  पैठ को बाजार बना दिया और कुछ नहीं, हरएक ने अपनी दुकान सजा रखी है। तुम लोगों से तो धन्धे वाली औरतें अच्छी है, जिनसे कमाई होती है उनसे ईमान तो बरतती है। तुम लोग तो बात को घुमा फिराकर धोखा देते हों सबको कठपुतलियों की तरह नचाते हो।  अादमी मर गया सब खत्म हो गया मुट्ठीभर राख लेकर यहाँ आने के कष्ठ किस काम के ? और तुम लोगों ने यह दशक्रिया- वनाक्रिया बना रखी हैं। (पृ2

 

पूरे उपन्यास के कथा फलक में पसरा भानुदस का कथा चरित्र हमें बांधता है, दशक्रिया के पश्चात अश्मा (अस्थियों ) से छनकर झोरिया में इकट्ठे हुए सिक्कों के ढेर की ओर देखकर वह पानी के अन्दर ही उछल पड़ता हैसोचता है कि इतने पैसों का क्या करेंगे, सिक्कों के ढेर के बीच उसका ध्यान सोने की बाली की ओर चला जाता है, बाली को हाथ में लेकर वह निहारने लगता है  तभी उसकी पीठ पर जोरदार प्रहार होता है - ''भड़वे तेरे बाप की जागीर है क्या ? सुबह-सुबह इधर क्यों चला आया रे नामा ने सारे पैसे और बाली अपने कुर्ते की जेब में डाल ली।

दरअस्ल, अंतिक संस्कार की इस क्रिया दशक्रिया का पूरा व्यापार एक समुदाय के विभिन्न वर्गो में बंटा हुआ है, सबका अपना-अपना हिस्सा बंधा है- '' दिन भर की कमाई को कितने छेद लगते जाएंगे यहाँ सबकी अपनी-अपनी खंडनी नियत है वह देनी ही पड़ती

'दशक्रिया' को पढ़ते हुए हम पाते है - ''किशोर वय के भानुदास को पूरे उपन्यास के कथा फलक में मृत व्यक्ति और उसकी अश्मा (अस्थियाँ) एक तरह का आल्हाद प्रदान करती है, क्योंकि उनसे उसे कुछ न कुछ प्राप्त ही होतहै और वह बार-बार आनंद का अनुभव करता है किन्तु जब उसकी ममेरी बहन की अस्थियाँ उसके मामा लेकर दशक्रिया घाट पर आते हैं तो वह हक्का -बक्का ठगान्सा खड़ा रह जाता है। दूसरे की मौत में आनन्द की खोज करने वालभानुदास की दशा अब ऑंधी में पड़े सूखे पत्ते जैसी हो गयी थी।

लेखक ने दर्शक और भोक्ता के बीच के अंतर को बड़ी ही बारीकी से उकेरा है। वहीं दूसरी ओर दलित समाज में शिक्षा के प्रति आई जागरूकता का खाका भी खिंचा हैं, देखें- ''ये निगोड़ा पढ़े इसलिए अपनी जान को खपाकर रोज़ सुबह सड़कों पर अपने को बिछाती रही और ये धन्ना सेठ किसी अमीर के लौंडे की तरह पाठशाला की छुट्टी मारता है। (पृ164)

''माटी मिले जल गई तेरी छलनी। पहले पढ़ाई कर ले। पढ़ने लिखने के बाद चाहे तो छलनी का कारखाना खड़ा कर, उस माटी मिले साहूकार की नाक के नीचे।' (इसी उपन्यास से )

फूको कहते हैं- '' नालेज इज पावर'' ज्ञान किसी की बपौती नहीं है। उन्नति के रास्ते यहीं से खुलते हैं, जिसने भी इस मन्त्र को समझ लिया उसकी नय्या पार  समझ लो. तटस्थ और यथार्थवादी शैली में प्रामाणिक दर्शनों से भरपूर दशक्रिया दलित समाज का आईना बनकर हमारे सामने प्रस्तुत होता है, हम इसमें अपने अक्स देखते हुए खोते चले जाते हैं। और शनै: शनै: इसके पात्रों से हमारा अक्स धुलता जाता है, एक तरह से इसके पात्रोका साधारणीकरण होता जाता है, और यही इस उपन्यास की विशेषता भी है, जो हमें बॉधे रखती है।

 

समीक्षित पुस्तक

- दश क्रिया - बाबा भांड (अनुवाद -निशिकान्त ठकार प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन, 1 बी, नेताजी सुभाष मार्ग दरियागंज, नई दिल्ली 

 

5317 प्रताप नगर,

सांगानेर,जयपुर

मो0 9414373188       

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