सितंबर 2007  

   

    

                           

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 कविता  

  कितना सच कहते हैं राजा ?

  रमेश थानवी

 

 

राजा ने कहा :             

''अवाम की हालत जरा देखिए       

अपने ही अज्ञान के कारण  

 

अन्याय झेलती है

अत्याचार सहती है।

सही तालीम गर मिल जाये

तो अवाम की हालत सुधर जाये।''

 

राजा का शुभ-चिंतन और सत्य-वदन

थोड़ा आगे चला था

वे बोले थे -

''अवाम की सही तालीम

स्कूलों में नहीं हो सकती

विश्वविद्यालय भी नाकारा हैं

ज्ञानी अध्यापक-आचार्य सारे

चाकर हैं कोरे

कोई विकल्प खोजना होगा।''

जिसने भी राजा की बात सुनी

वह बोला था

'राजा सच कहते हैं।'

''सच ही तो कहते हैं राजा

मगर सही तालीम करे कौन - ?''

 

किसी ने पूछा था

राजा का उत्तर था,

''कोई और कैसे कर सकता है राजा के सिवा।

राजा का काम ही अवाम की तरक्की है

और तरक्की तालीम के बिना कैसे हो सकती है ?

ईवन अदरवाइज एज्यूकेशन इज अ स्टेट सब्जेक्ट

दूसरा कोई कैसे करेगा ?''

तो जनाब

राजाजी उस्ताद बन गये थे।

तभी कोई बोला था

''मगर आप तो अकेले हैं महाराज।''

राजा ने कहा था

''तुम चुप रहो,

तुम अवामी हो, लीगी हो, संघी या सैनानी हो

तालीम का काम

कोई फिरकापरस्त लोग नहीं

सिर्फ तरक्की पसंद लोग ही कर सकते हैं,

एण्ड तरक्की अगेन इज अ स्टेट सब्जेक्ट यू नो।''

 

अवाम का नुमाइंदा चुप हो गया था।

मगर सवाल उसका राजा के कान लग गया था

राजा ने यूं भी अब तक

अवाम के सवालों से बहुत कुछ सीखा था

तो इस पर भी गौर कर तुरंत अमल किया था

सभी जिलों के छोटे राजे-महाराजाओं को बुलावा भिजवा दिया था।

सब दौड़े आये थे

राजाजी प्रमुदित हुए थे

मन ही मन गुनगुनाये थे

'एकोहं बहुस्यामि'

सच था यह देश का भी

एक में अनेक थे

अनेक में एक थे राजा।

 

राजा ने छोटे-बडे राजाओं को अपने चेलों के रूप में मूंड दिया था

और सबके कान में उस्ताद बनने का मंत्र फूंक दिया था।

सब राजे तब उस्ताद बन गये थे

प्रजातंत्र की तर्ज भी जरूरी थी तालीम में बकौल राजा के

तो सभी राजे राज के खजाने से

'इदारा ए तालीम ओ तरक्की'

खेलने में जुट गये थे

राजा की खुशी के वास्ते

अपने मुस्तैद सिपहसालारों

और अर्दलियों के साथ।

राजाओं ने तालीम का पाठ पढ़ा

और तालीम शुरू हो गई।

तालीम का नया तरीका था कि तालीम का जलसा करो।

जलसों से जनता में जान आती है

जत्था निकालों तो तालीम आगे बढ़ती है

और जनता अगर भाग ले सके उसमें

तो तालीम औं' तरक्की पसंद दीखती है।

तो देखत-देखते

जलसों और जत्थों का जलजला आया था

तालीम जलसाई तर्जुमा हर किसी को भाया था

लग रहा था कि हर जन तालीम-तालीम कर रहा है।

राजे-महाराजाओं ने चाहा भी यही था

 कि तालीम का जाप हो।

इस जाप के दरम्यान

एक चमत्कार हुआ था

कि जनता सारी

वही सब बोलना सीख गयी थी

जो राजे चाहते थे, महाराजे चाहते थे।

ठीक इसी समय को सही समय समझ

राजा ने एलान किया था

''जनता की तालीम पूरी हो गई है''

ऐसा एलान सुन

जलसों में जुटी जनता बोली थी

''हां हम सब पढ़-लिख गये हैं

तालीम हमारी पूरी हो गई है

धन्य हो महाराज

आपकी जय हो।''

 

अवाम की तालीम यूं पूरी हुई तो

जनता तो सारी दरियाये तालीम में डूब गयी थी

और राजे, महाराजे, लघुराजे सब

जश्न-ए-तालीम में शरीक हो गये थे।

राजा ने फिर कहा था

'तालीम तो राजा ही कर सकता है।'

कितना सच कहते हैं राजा ?

                                     

                                      'अनौपचारिका' से साभार

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     सूखी नदी   कैलाश मनहर

   

एक अन्तहीन यात्रा का नाम है

सूखी नदी का स्नेह -मार्ग

और इसी यात्रा में निहित है

राग और विराग का समस्त भेद।

 

महकती है युगातीत सम्बन्धों की सुगन्ध

इसी यात्रा में करना है हमें

अपने-अपने विश्वासों के साथ

अतृप्त कामनाओं की पीड़ा से साक्षात्कार।

 

आत्म-साक्षात्कार नहीं हो पाता

पुस्तकों के पृष्ठ चाटन से

 

नहीं मिलती शास्त्रों और ग्रन्थों में

संवेदना से उत्पन्न ज्ञान की दिव्य झलक

शब्द असमर्थ हो जाते हैं

और भाषायें सभी मौन -मूल

जब बिल्ली के जबड़ों में फंसा शशक शावक

आपके प्रयत्नों से जीवित बच जाता है

और ऑखें टिमटिमाने लगता है

शीतल जल के छींटे पड़ते ही जीवनदान पा।

 

वही आत्म साक्षत्कार का ज्ञान

झलकता है सूखी नदी के ऑगन में

निष्काम, निष्पाप, निश्छल बन कर

हमारी सुकृतियों का अटल विश्वास।

 

हमारे विलाप की निरर्थकता

और हमारी मर्मान्तक चीखों का अनौचित्य

सिद्ध करने में असफल होते रहे हैं

तथाकथित सभ्यता के ज्ञान संवाहक

सूखी नदी के सुकृतियों के ही पुण्य फलस्वरूप।

 

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 मै गीत बेचता हूं         भवानी प्रसा मिश्र   

 

जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूं।

मैं तरह-तरह के

गीत बेचता हूं ;

मैं सभी क़िसिम के गीत

बेचता हूं।

 

जी, माल देखिये दाम बताऊगा,

बेकाम नहीं है, काम बताऊगा;

कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने ;

कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने;

यह गीत, सख्त सरदर्द भुलायेगा;

यह गीत पिया को पास बुलायेगा।

जी,पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको

पर पीछे-पीछे अक्ल जगी मुझको;

जी, लोगों ने तो बेच दिये ईमान।

जी, आप न हों सुनकर ज्यादा हैरान।

मैं सोच-समझ कर आखिर

अपने गीत बेचता हूं;

जी हाँ, हुजूर, मैं गीत बेचता हूं।

 

यह गीत सुबह का है, जाकर देखें,

यह गीत ग़जब का है, ढाकर देखें;

यह गीत ज़रा सूने में लिक्खा था,

यह गीत वहां पूने में लिक्खा था।

यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है,

यह गीत बढ़ाये से बढ़ जाता है,

यह गीत भूख और प्यास भगाता है;

जी, यह मसान में भूत जगाता है;

यह गीत भुवाली की है हवा हुजूर।

मैं सीधे-सीधे और अटपटे,

गीत बेचता हूँ;

जी हाँ, हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ।

जी, और गीत भी हैं, दिखलाता हूं ;

जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूं ;

जी, छन्द और बे-छन्द पसन्द करें -

जी, अमर गीत और वे जो तुरत मरें।

ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात,

मैं पास रखे हूं कलम और दावात

इनमें से भये नहीं, लिख दूं ?

इन दिनों कि दुहरा है कवि-धन्धा,

हैं दोनों चीजें व्यस्त, कमल, कन्धा।

 कुछ घंटे लिखने के, कुछ फेरी के

जी, दाम नहीं लूंगा इस देरी के ।

मैं नये -पुराने सभी तरह के

 

गीत बेचता हूँ;

जी हाँ, हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ।

 

जी, गीत जनम का लिखूं, मरन का लिखूं ;

जी, गीत जीत का लिखूं शरन का लिखूं ;

यह गीत रेशमी है, यह खादी का,

यह गीत पित्त का है, यह बादी का।

कुछ और डिजायन भी हैं, ये इल्मी-

यह लीजे चलती चीज नयी, फिल्मी।

यह सो-सो कर मर जाने का गीत,

यह है दुकान से घर जाने का गीत,

जी नहीं, दिल्लगी की इसमें क्या बात ?

मैं लिख्ता ही तो रहता हूं दिन-रात।

तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत।

जी, रूठ-रूठ कर मन जाते हैं गीत।

जी, बहुत ढेर लग गया हटाता हूं,

गाहक की मर्जी - अच्छा, जाता हूं।

मैं बिल्कुल अन्तिम और दिखाता हूं -

या भीतर जाकर पूछ आइये, आप।

है गीत बेचना वैसे बिलकुल पाप ;

क्या करूं मगर लाचार हारकर

 

गीत बेचता हूँ;

जी हाँ, हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ।

 

'

 

 

 

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                             प्रबंध सम्पादक : अंजली सहाय सम्पादक : डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल