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एक अन्तहीन
यात्रा का नाम है
सूखी नदी का
स्नेह -मार्ग
और इसी
यात्रा में निहित है
राग और विराग
का समस्त भेद।
महकती है
युगातीत सम्बन्धों की सुगन्ध
इसी यात्रा
में करना है हमें
अपने-अपने
विश्वासों के साथ
अतृप्त
कामनाओं की पीड़ा से साक्षात्कार।
आत्म-साक्षात्कार नहीं हो पाता
पुस्तकों के
पृष्ठ चाटन से
नहीं मिलती
शास्त्रों और ग्रन्थों में
संवेदना से
उत्पन्न ज्ञान की दिव्य झलक
शब्द असमर्थ
हो जाते हैं
और भाषायें
सभी मौन -मूल
जब बिल्ली के
जबड़ों में फंसा शशक शावक
आपके
प्रयत्नों से जीवित बच जाता है
और ऑखें
टिमटिमाने लगता है
शीतल जल के
छींटे पड़ते ही जीवनदान पा।
वही आत्म
साक्षत्कार का ज्ञान
झलकता है
सूखी नदी के ऑगन में
निष्काम,
निष्पाप, निश्छल बन कर
हमारी
सुकृतियों का अटल विश्वास।
हमारे विलाप
की निरर्थकता
और हमारी
मर्मान्तक चीखों का अनौचित्य
सिद्ध करने
में असफल होते रहे हैं
तथाकथित
सभ्यता के ज्ञान संवाहक
सूखी नदी के
सुकृतियों के ही पुण्य फलस्वरूप।
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मै गीत बेचता हूं
भवानी प्रसाद
मिश्र
जी हाँ हुजूर,
मैं गीत बेचता हूं।
मैं तरह-तरह
के
गीत बेचता
हूं ;
मैं सभी
क़िसिम के गीत
बेचता हूं।
जी,
माल देखिये दाम बताऊगा,
बेकाम नहीं
है, काम बताऊगा;
कुछ गीत लिखे
हैं मस्ती में मैंने ;
कुछ गीत लिखे
हैं पस्ती में मैंने;
यह गीत,
सख्त सरदर्द भुलायेगा;
यह गीत पिया
को पास बुलायेगा।
जी,पहले
कुछ दिन शर्म लगी मुझको
पर पीछे-पीछे
अक्ल जगी मुझको;
जी,
लोगों ने तो बेच दिये ईमान।
जी,
आप न हों सुनकर ज्यादा हैरान।
मैं सोच-समझ
कर आखिर
अपने गीत बेचता हूं;
जी हाँ,
हुजूर,
मैं
गीत बेचता हूं।
यह गीत सुबह
का है,
जाकर देखें,
यह गीत ग़जब
का है,
ढाकर देखें;
यह गीत ज़रा
सूने में लिक्खा था,
यह गीत वहां
पूने में लिक्खा था।
यह गीत पहाड़ी
पर चढ़ जाता है,
यह गीत बढ़ाये
से बढ़ जाता है,
यह गीत भूख
और प्यास भगाता है;
जी,
यह मसान में भूत जगाता है;
यह गीत
भुवाली की है हवा हुजूर।
मैं
सीधे-सीधे और अटपटे,
गीत बेचता हूँ;
जी हाँ,
हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ।
जी,
और गीत भी हैं, दिखलाता हूं ;
जी,
सुनना चाहें आप तो गाता हूं ;
जी,
छन्द और बे-छन्द पसन्द करें -
जी,
अमर गीत और वे जो तुरत मरें।
ना,
बुरा मानने की इसमें क्या बात,
मैं
पास रखे हूं कलम और दावात
इनमें से भये
नहीं, लिख दूं
?
इन दिनों कि
दुहरा है कवि-धन्धा,
हैं दोनों
चीजें व्यस्त, कमल,
कन्धा।
कुछ
घंटे लिखने के, कुछ फेरी के
जी,
दाम नहीं लूंगा इस देरी के ।
मैं नये
-पुराने सभी तरह के
गीत बेचता हूँ;
जी हाँ,
हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ।
जी,
गीत जनम का लिखूं, मरन का लिखूं
;
जी,
गीत जीत का लिखूं शरन का लिखूं ;
यह गीत रेशमी
है, यह खादी का,
यह गीत पित्त
का है, यह बादी का।
कुछ और
डिजायन भी हैं, ये
इल्मी-
यह लीजे चलती
चीज नयी, फिल्मी।
यह सो-सो कर
मर जाने का गीत,
यह है दुकान
से घर जाने का गीत,
जी नहीं,
दिल्लगी की इसमें क्या बात ?
मैं लिख्ता
ही तो रहता हूं दिन-रात।
तो तरह-तरह
के बन जाते हैं गीत।
जी,
रूठ-रूठ कर मन जाते हैं गीत।
जी,
बहुत ढेर लग गया हटाता हूं,
गाहक की
मर्जी - अच्छा, जाता
हूं।
मैं बिल्कुल
अन्तिम और दिखाता हूं -
या भीतर जाकर
पूछ आइये, आप।
है गीत बेचना
वैसे बिलकुल पाप ;
क्या करूं
मगर लाचार हारकर
गीत बेचता हूँ;
जी हाँ,
हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ।
'
क्रिया
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प्रतिक्रिया *
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