पाकिस्तान में बहती दोस्ती की सरस्वती
प्रेमचन्द गांधी
बहावलपुर स्टेट गजट
1904
के अनुसार यह नगर
2400
बरस पुराना है। यहां से उत्तर-पश्चिम
में कभी सरस्वती बजती थी। पाकिस्तान में सरस्वती को हाकडा के नाम से जानते हैं।
लगभग सौ वर्ग मील में फैली लाल ठीकरियों वाली टेकरियां एक शानदार अतीत के दफन होने
का सबूत है। एक अनुमान के मुताबिक एक समय सरस्वती इतनी बड़ी नदी थी कि उसमें जहाज या
बड़ी नावें चला करती थीं। टेकरियों में दफन शहर एक बड़ा व्यापारिक महत्व का नगर था।
और यह मीनार शायद जहाजों को रास्ता दिखाने वाला लाइट हाउस। पत्तन को बंदरगाह के
अर्थ में लें तो यह साफ भी हो जाता है।
सुनीता चतुर्वेदी ने कहा कि वेदों में
सरस्वती के एक छोर पर सोने जैसी और दूसरे किनारे पर चांदी जैसी रेत का वर्णन है।
पत्तन मुनारा क्षेत्र की रजत रेत को देखकर यह धारणा और पुख्ता हो जाती है। साहित्य
इसी तरह इतिहास को हमारे लिए खोलता है। सोनार किल्ला वाले जैसलमेर में सुनहरी रेत
और यहां पन्तन मुवारा क्षेत्र में चांदी जैसी! लेकिन किम्वदंतियां इतिहास पर धूल
भी डाल देती हैं। जैसे मीनार के ठीक बगल में रहने वाले एक बाब ने बताया कि यह इमारत
सिकन्दरे आजम के जमाने की है। जबकि इसकी निर्माण कला और तकनीक ऐसे दावों को मिथ्या
सिद्ध करती है।
कहते हैं कि इस इमारत की कई मंजिलें
थीं। वे सब कैसे गिरीं पता नहीं,
लेकिन बहावलपुर स्टेट गजट के
अनुसार इसकी एक मंजिल को सन
1740 में बादुर खां हालानी ने
और दूसरी मंजिल को फैजल खां हालानी ने गिराया। यह ध्वसं दीनगढ़ रियासत की किले बन्दी
के लिए ईटें जुटाने के लिए किया गया था। आज जैसलमेर सीमा पर जो किशनगढ़ है उसी का
पुराना नाम दीनगढ़ है। यहां का किला अठाहरवीं सदी के पूर्वार्द्ध में जैसलमेर को
महज 74000
रूपयों में बेच दिया गया था। इस संबंध
में जैसलमेर के कथाकार ओम प्रकाश भाटिया ने अपने शोधपरक उपन्यास दीवान सालमसिंह में
लिखा है,
इस बीच सूचना मिली कि दीनगढ का अमीर
फजल अली खां रेत के टीलों और मुश्किल जीवन से परेशान होकर दुर्ग छोड़ना चाहता है।
सालमसिंह ने संदेश भिजवाया कि अगर वह बेचना चाहता है तो जैसलमेर उसे खरीद लेगा। फजल
अली खां ने दीवान को दीनगढ़ बुलाया। बातचीत हुई और सौदा चौहत्तर हजार रूपयों में पट
गया। जिसमें पचास हजार किले के और चौबीस हजार अन्य सामान के दिए गए। फजल अली खां
किले का कब्जा सालमसिंह को सौंपकर सिंध चला गया। दीनगढ़ तनोट के पास था। उसका नाम
बदलकर किशनगढ रखा गया।
कर्नल मिनचिन,
(ब्रिटिश सरकार के सिंचाई
महकमे में बडे इंजीनियर थे,
जिनके नाम से मिनचिनाबाद बसा
हुआ है ओर यह गंगानगर के ठीक उत्तर-पश्चिम में है। ) ने
1870
में इस मीनार की बगल वाली टेकरियों की
खुदाई कराई थी,
लेकिन कुछ भी हासिल नहीं हो सका।
खुदाई के दौरान मजदूरों को भयानक बदबूदार कोई लिसलिसा पदार्थ मिला,
जिस पर बडे आकार की अजीबोगरीब
रंग वाली मक्खियों का छाता जमा हुआ था। भंयकर दुर्गन्ध और मक्खियों के जहरीले डंकों
से कई मजदूर तुरन्त ही मारे गये और इसके बाद कभी कोई खुदाई नहीं हुई।
बहरहाल,
इस मीनार की हालत इस कदर खराब
है कि यह भी पता नहीं चलता कि इसकी ऊपरी मंजिलों पर जोन का रास्ता क्या था। संभव है
ऐसे अवशेष भी समय के साथ ध्वस्त हो गए हों। कुछ पुराविद इसे बौद्ध मठ मानते हैं।
ऊपरी मंजिल के एक कोने में बुद्ध की मूर्तियों का एक पैनल इसका सबूत है। यह पैनल उस
स्तम्भ के अवशेष पर अंकित है जो दूसरी मंजिल का आधार है। वैसे इस मीनार को प्राथमिक
तौर पर बौद्ध मठ ही माना जाता रहा है। नवाब बहावलपुर ने ब्रिटिश काल में एक बार नये
साल के ग्रीटिंग कार्ड पर इस मीनार की तस्वीर छापी थी। यहां आस-पास ऐसी ही चार और
मीनारें हैं और ये सब मिलकर एक बौद्ध विहार की संरचना प्रस्तुत करते हैं। इस मीनार
के चारों ओर की टेकरियों में खोखर,
भण्डार,
दरवाजा और बिन्दोर टेकरियां
प्रमुख हैं। इनमें बिन्दोर मीनार से तीन मी पश्चिम में है,
जबकि खोखर,
भण्डार और दरवाजा पांच मील
पूरब की ओर हैं। अनुमान लगाया जाता है कि अपनी चरम विकसित अवस्था में पत्तन मुनारा
शहर कोई सौ वर्ग मील में बसा था। भण्डार को खाद्यान भण्डार,
दरवाजा को मुख्य प्रवेश द्वारा
और बिन्दोर को केन्द्रीय कारागार माना जाता है। खोखर के बारे में कोई अनुमान नहीं
है कि इसका वास्तविक अर्थ क्या है या रहा होगा
?
किसी भी मुस्लिम शासक ने पत्तन
मुनलारा का अपने किसी भी दस्तावेज में कहीं कोई उल्लेख नहीं किया। यही माना जा सकता
है कि मुगलों के आगमन से बहुत पहले ही पत्तन मुनारा नष्ट हो गया होगा। कर्नल जेम्स
टाड ने जैसलमेर के इतिहास में पत्तन के राजकुमार और राजकुमारियों की चर्चा की है,
लेकिन पत्तन के भुगोल के बारे
में कुछ नहीं कहा। सम्भव है यह वही पत्तन हो। दसवीं सदी में पत्तन को पुन: बसाया
गया था और 11वीं
ईस्वी सदी तक यह सूमरा वंश की राजधानी रही।
रहीम यार खां रेल्वे स्टेशन से पांच
मील पूरब में सरस्वती के पुराने प्रवाह क्षेत्र में पूर्वी किनारे पर स्थित पत्तन
मुनारा,
हडप्पा-मोहन्जोदडो सभ्यता का ही अवशेष
है। आज के पाकिस्तान में कुछ लोग जानते हैं कि इस उन्नत सभ्यता की पहली खोज
राजस्थान में कालीबंगा में
1914 में इटली के एलपी
तैस्सितोरी ने की थी। सिंध में मोहन्जोदड़ो की खुदाई तो
1922
में हुई थी।एलपीतैस्सितोरी ने
कालीबंगा सहित लगभग सौ जगह खुदाई कराई थी,
जिसमें कोई एक हजार पुरा
वस्तुएं जमा की थीं। उन्होंने ही सबसे पहले कालीबंगा और यहां की पुरा सम्पदा को
प्रागैतिहासिक घोषित किया था। यह राखालदास बनर्जी और अलेक्जण्डर कनिंघम से बहुत
पहले की बात है यानी इन लोगों द्वारा हडप्पा के काल निर्धारण से पहले की।
उपलब्ध ऐतिहासिक,
पुरातात्विक और वैज्ञानिक
प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता है कि कालीबंगा भूकम्प से नष्ट हुआ भारतीय इतिहास
का पहला शहर है। साइंस एज (अक्टूबर,
1984, नेहरू सेन्टर,
मुम्बई ) में डाबीबीलाल ने
कालीबंगा के भूकम्प को अर्लीएस्ट डेटेबल अर्थक्केक इन इण्डिया कहा है। भूकम्प के
कारण धरती में पड़ी दरारों से सरस्वती का पानी नीचे भूमिगत जलधाराओं में जाकर लुप्त
हो गया। कालान्तर में मौसमी बदलावों से अकाल - सूखा पड़ने लगा और भूगर्भीय
परिवर्तनों के कारण अरावली पर्वतमाला ऊपर उठने लगी,
जिससे सरस्वती की सहायक नदियों
के रास्ते बदल गये और सरस्वती के बहाव क्षेत्र में टीले आकर जमने लगे। और धीरे-धीरे
रेगिस्तान बढ़ने लगा। इसी रेगिस्तान में कालीबंगा,
पत्तन मुनारा जैसे नगर
2500-1500
ईपू में नष्ट होकर जमीदोज हो गये।
अब यहां पाकिस्तानी पुरातत्व विभाग का
एक बोर्ड इस इमारत और आसपास के समूचे क्षेत्र को संरक्षित घोषित करता है। इरशाद
अमीन ने बताया कि गरीबी की मार झेल रहे,
इतिहास से अनभिज्ञ लोग किसी
खजाने की तलाश में यहां जब-तब खुदाई कर सबूतों को नष्ट करने में सक्रिय रहते हैं।
हमें ऐसी कारगजारियों के बहुत से दस्तावेज यहां दिखाई दिये। इस पुरा वेभव के अतीत
और भविष्य पर चिंता-चर्चा करते हुए हम वापस गेस्ट हाउलौटे।
शाम जिन्ना हॉल में कार्यक्रम खासी
देरी के बाद शुरू हुआ। इस देरी का कोई खास कारण नहीं था। बस यूं ही। और लोग थे कि
तीन घण्टे की देरी भी आराम से बर्दाश्त कर रहे थे। कार्यक्रम दो सत्रों में होना
थ्पहला विचार सत्र था। इसकी अध्यक्षता सिरायकी भाषा के विद्वान सिराजुधीन सांवल ने
की। इनकी बनाई सिराय की भाषा की डक्शनरी आक्सफोर्ड से छप रही है। भारत में बहुत से
लोगों को पता नहीं होगा कि दक्षिणी पंजाब ही नही बल्कि पश्चिमी पंजाब और सिंध के
बड़े इलाके की मादरी जबान सिराय की है। यहां वरिष्ठ पत्रकार रिफअत शेख ने पत्तन
मुनारा पर अपना गंभीर पर्चा पढ़ा। शायरा और शोधार्थी सबा वहीद ने चोलिस्तान यानी
रोही की औरतों के हालात पर पत्र-वाचन किया। उनके पत्र में रोही की औरतों के पहनावे,
रस्मों-रिवाज और खासकर उनकी
जधोजहद भरी जिन्दगी के बारे में जो तथ्यात्मक बातें थीं,
उनसे पता चला कि कुदरत की मार
के साथ-साथ औरतों की हालात सरहद के आर-पार बराबर हैं।
मौके की नजाकत को देखते हुए मैंने
अपने वक्तव्य को बहुत छोटा किया और इस बात पर जोर दिया कि पत्तन पुनारा की खुदाई से
निकले वैज्ञानिक प्रमाण सिन्धु सभ्यता के अनेक रहस्यों से पर्दा उठा सकते हैं। धर्म
और राजनीति हमें भले ही दो मुल्कों में बांटते हैं,
सांस्कृतिक तौर पर हमारा
इतिहास एक है ओर भविष्य में हमारे संबंधों को इसी आधार पर मजबू किया जाना चाहिए।
जिस हाकडा या सरस्वती के किनारे यह नगर आबाद था,
वह हमारी साझा संस्कृति की
शानदार मिसाल रही है। इसका एक छोर राजस्थान में कालीबंगा है तो विस्तार में हडप्पा
और मोहन्जोदडो है। यहां की खुदाई से सिन्धु सभ्यता की अज्ञात लिपि से लेकर,
सभ्यता के नष्ट होने जैसे अनेक
रहस्यों पर से शायद परदा उठ सकता है।
विचारों के बाद सजी संगीत की महफिल।
इसमें चोलिस्तान और सिरायकी के प्रसिद्ध लोक कलाकारों ने प्रस्तुतियां दीं। सबसे
पहले रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे-धजे इकतारा लिए किशनलाल भील ने बोल-बोल वे गीत
सुनाकर झुमा दिया। इसके बाद प्रसिद्ध गायक फकीरा भगत के बेटे मोहन भगत ने कंवर भगत
की वह प्रसिद्ध लोरी सुनाई,
जिसके बारे में कहा जाता है कि
इसे सुनकर एक दुखियारी मां का इकलौता मृत लड़का भी जीवित हो उठा था। हम लोगों की
उपस्थिति देखकर मोहन भगत ने अपने ही अंदाज में एक राजस्थानी गीत भी सुना
'
खड़ी नीम कै नीचै मैं तो एकली
'
युवा गायक इखलाक ने बाब गुलाम फरीद की
काफियां गाई। इसके बाद सिरायकी के प्रसिद्ध गायक बंधु जमीन परवाना और नसीर मस्ताना
ने लोक-गीतों की जो झड़ी लगाई तो सब झू उठे। कार्यक्रम की अंतिक प्रस्तुति के तौर पर
नजा खनम ने दो सिरायकी लोक-गीत सुनाए,
जिनकी धुन मुझे हमारे
'नींबूडा'
और
'तारां
रचूनड़ी'
जैसी लगी।
रहीमयार खां में बड़ी तादाद हिन्दुओं
की है कहते हैं कि पूरे चोलिस्तान में कोई दस लाख हिन्दू रहते हैं। किशनलाल भील और
मोहन भगत की गायकी सुनकर लगा कि सरहद भले ही मुल्कों का बंटवारा कर देती हो,
संगीत का,
संस्कृति का बंटवारा नहीं कर
सकती। यहां के हिन्दू कलाकरों को भी लोग सर आंखों पर रखते हैं।
अगले दिन हम चले पड़े चोलिस्तान की
मशहूर भोंग मस्जिद देखने के लिए। यह कोई प्राचीन मस्जिद नहीं है,
बल्कि आजादी के बाद की तामीर
है। लेकिन इसका वास्तुशिल्प ओर कलात्मक रूप आंखों को मोह लेता है। लगभग पच्चीस
सालों में बनी यह मस्जिद यहां के नवाब ने बनवाई थी। इसके कोने-कोने में वास्तुशिल्प
की उत्कृष्टता,
भव्यता और नफासत दिखाई देती है। सोने,
चांदी,
हीरे-पन्ने का ऐसा बारीक और
आश्चर्यजनक काम है कि देखने वाले की आंखे फटी की फटी रह जाएं।
नवाबी खानदान का आतिथ्य पाकर हम वापस
रहीमयार खां आए। यहां एक कॉलेज में चल रहे मैंगो शो में हमें भी बुलाया गया है। खुश
आमदीद और पुष्प वर्षा के बीच आमों की किस्में देखीं तो खयाल आया कि हम अब तक आम
खाने से मतलब रखते आए हैं,
किस्मों की तरफ कभी गौर ही
नहीं किया। लबे माशूक,
सुर्खा,
रतौल,
गालिब-पसन्द,
सेन्शेसन,
चौसा और न जाने कितनी किस्में।
एक छोटी -सी नशिस्त में बताया गया कि आम उत्पादन और निर्यात में भारत पहले नम्बर पर
है और पाकिस्तान छटे नम्बर पर ।
शाम हमें तीसेक किमी दूर खानपुर जाना
था। देरी का सिलसिला बदस्तूर जारी था। रवाना हुए तो कार्यक्रम का वक्त हो चुका था।
कोई दो घण्टे की देरी हम चल रहे थे। आगे-आगे सिक्यूरिटी और पीछे-पीछे हम। एक जगह
पुलिस वैन साइड में हुई और सैकड़ों लोगों की नारे लगाती ढोल बजाती भड़ हमारे सामने
थी। एक बार चौंकने के बाद यह जानकर तसल्ली हुई कि ये सब हमारे स्वागत के लिए आए
हैं। उतरते ही जहूर धरेजा नगर के वाशिन्दों ने गुलाब की मालाओं से लाद दिया और देर
तक पुष्प वर्षा होती रही। हमें एक अहाते में ले जाया गया। कुर्सियों पर बिठाकर
ठण्डे की बोतलें पेश की गई। ढोल-बाजे बज रहे थे और नौजवान झूमर नाच रहे थे। बिल्कुल
अपने घूमर से मिलता-जुलता नृत्य। सामूहिक आनन्द और उल्लास को अभिव्यक्त करता यह
नृत्य इतना सहज -सरल है कि नर्तकों के उठते कदमों और अंग-संचालन को देखकर मुझे लगा
जैसे मैं किसी अदिम जनजाति के नृत्य को अपने सरलतम रूप में देख रहा हूं। लोकनृत्य
का यही स्वरूप किसी भी समुदाय को उसके प्राचीनतम रूप में अभिव्यक्तकरता है। निश्चित
रूप से सिराय की समुदाय बहुत पुराना है,
जरूर सरस्वती और सिरायकी का भी
कोई संबंध होगा। इस बीच सुनीता खुद को धुन पर थिरकने से नहीं रोक पाई। सैकड़ों
ग्रामीणों के बीच ऐसा भव्य स्वागत देखकर आंखें भर आई।
वापस गाड़ी में सवार होकर हम पास ही अल
मंसूर गेस्ट हाउस पहुंचे। यहां के बड़े- से लॉन में हजारों लोग जमा थे। एक बार फिर
पुष्प वर्षा ओर अभिनन्दन। कैमरों के फ्लैश चमक रहे थे और टीवी कैमरों की आंखें इस
इलाके में पहले भारतीय डेलीगेशन का स्वागत दर्ज कर रही थीं। पहले हमें खाना खिलाया
गया ओर उसके बाद तीन सत्र। विचार सत्र,
मुशायरा और संगीत संध्या।
विचार सत्र में मेरे अलावा ईशमधु तलवार,
सुनीता चतुर्वेदी,
डॉ राजकुमार मलिक और गोविन्द
राकेश ने खानपुर की जनता का इस स्वागत के लिए आभार जताया। मुशायरे में ओमेन्द्र और
फारूख इंजीनियर ने समां बांधा। फारूख के शेर और ओमेन्द्र के दोहों -माहियों को
बार-बार सराहा गया।
ऐसे मौकों पर स्थानीय लेखन को करीबी
से देखने का मौका मिलता है। इसलिए हम लोगों ने अपने काव्य-पाठ के बाद सिराय की भाषा
के नए कवियों को बडे गौर से सुना। यहां युवा शायर अमानुल्ला अरशद ने
1857
के हवाले से हमारा स्वागत करते हुए
अपना कलाम पेश किया तो लगा एक बंटवारे हमसे हमारा घर- आंगन ही नहीं साझा इतिहास भी
छीन लिया। और दूसरी तरफ दादूराम बालाच उर्फ इशराक और जहांगीर मुख्लिस की शायरी
सुनकर महसूस हुआ कि प्रगतिशील जनवादी परम्परा कैसे अपनी राह खुद निकाल लेती है।
स्थानीय लोगों के दु:ख दर्द और अमीरों के शोषण को इन युवा रचनाकारों ने बड़ी शिधत से
अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किया है। दादू राम हिन्दू हैं,
लेकिन इशराक तखल्लुस से शायरी
करते हैं। तीसेक साल के दादूराम के एक रिश्तेदार जयपुर में मानसरोवर में कहीं रहते
हैं। उनके गीतों को वहां के बड़े-बड़े मशहूर गायकों ने आवाज दी है। अलबत्ता अलसंख्यक
होने का दर्द भी उन्हें कचोटता है। जहांगीर मुख्लिस भी बड़े पाये के कवि है। उनकी एक
किताब भी छपी है ओर उनके कलाम में भी शोषण के विरूद्ध प्रतिकार की हुंकार गूंजती
है।
मुशायरे के बाद सजी संगीत महफिल में
युवा सिराय की गायक सज्जाद बालाच,
अजमल साजिद और महबूब रफी ने
अपनी कलात्मक गायिकी से वहां मौजूद हजारों श्रोताओं को झूमने और नाचने पर मजबूर कर
दिया। उर्दू के व्याख्याता महबूब रफी ने हमारी फरमाइश पर गलाम अली की चुपके-चुपके
और मेहदी हसन की जिन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं सुनाकर मस्त कर दिया। देर
रात तीन बजे हम रहीमयार खां के लिए रहवाना हुए। जहांगीर मुख्ल्सि हमारे साथ हो लिए।
वे अब कल हमारे साथ चलेंगे।
हमें लंच करना उच शरीफ में,
लेकिन रात हुई देरी के कारण
हमने गेस्ट हाउस में आम और गरमा का हल्का लंच लिया। गरमा हमारे खरबूजे जैसा फल होता
है लेकिन स्वाद में मीठापन गन्ने की रंगत लिए होता है। भरपेट फलाहार के बाद हम
बहावलपुर के लिए रवाना हुए।
रास्ता खनपुर वाला ही था लेकिन हाइवे
पर। ताजगढ़ आया तो जहांगीर ने बताया यहां आज भी हिन्दुओं की छोड़ी गई बहुत सी
हवेलियां मौजूद हैं। एक गली में कोई चार मंजिल की मौसम की मार खाई पुरानी हवेली
दिखी। ऐसी हवेलियों को छोड़कर आने वाले परिवारों के बारे में सोचने से ही रूह कांप
उठती है। एक बंटवारे ने पता नहीं हमवतनों से क्या-क्या छीना
?
यूं छीनने को तो यह उच शरीफ भी
मोहम्मद बिन कासिम ने सिन्ध के महान राजा दाहरसेन से छीना था। यह वह जगह है जहां
पांच नदियों रावी,
चिनाब,
झेलम,
सतलुज और व्यास का संगम होता
है। सिकन्दर ने जो अलेक्जेंड्रिया अर्थात सिकंदरिया नाम के तीन नगर बसाए थे या नाम
दिए थे उनमें से एक उच शरीफ भी है। यहां की आबादी लगभग तीस हजार है ओर यह पूरा
इलाका बेहद खूबसूरत और हरा-भरा है। यहां के हरे-भरे रास्ते को पार कर हम पहुंचे
जलालुधीन सुर्ख बुखरी की दरगाह पर। चौदहवीं सदी के मध्य यहां आने वाले बुखारी पहले
सैयद थे। उनकी ख्याति एक धर्मगुरू की रही है। इनकी दरहगाह से होकर हम पीछे
कब्रिस्तान में गए तो तीन शानदार मकबरे और थे। ईरानी वास्तुकला का नायाब नमूना।
विशाल और भव्य। ईंट,
गारे और लकड़ी से बनी इमारत पर खूबसूरत
नीली टाइल्स। सबसे बड़ा मकबरा बीवी जीवन्दी का है और इसके ठीक सामने उनके जीवन साथी
बहावल हलीम का। इनके शिष्य नूरिया का मकबरा भी यहीं है और कहते हैं कि नूरिया ने ही
ये दोनों मकबरे यहां सत्रहवीं सदी में बनवाए थे,
जिन पर
1794
ई में ये ईरानी टाइल्स लगाई गई।
1817
में आई बाढ़ ने तीनों मकबरों का एक बड़ा
हिस्सा लील लिया,
जिसे संरक्षित करने का काम चल रहा है।
उच शरीफ पर पहले सिंध के राजा दाहरसेन
के दादा चच का शासन था। कहते हैं कि इन्हीं के काल में शतरंज यानी चेस का आवष्किार
हुआ। उच का पुराना नाम देवगढ था और सन्
1244
में जब शेरशाह सैयद जलालुदीन,
कैची बुखारी,
यहां पहुंचा तो यहां का राजा
देवसिंह मारवाड भाग गया और उसकी बेटी सुन्दरपुरी ने इस्लाम ग्रहण कर लिया। जनवरी
सन् 325
में जब सिकन्दर के सेनापति पैथून ने
इस क्षेत्र को जीत कर अलेक्जेंड्रिया नाम दिया तो उच शरीफ सिंकदरिया हो गया। उर्दू
की मशहूर लेखिका कुर्रतुलएन हैदर यानी ऐनी आपा के दादा भी उच शरीफ के ही थे।
अलेक्जेंड्रिया नाम के तीन नगर सिकन्दर के वक्त बसाए गए थे,
जो मिश्र,
इराक और भारत में हैं।
बहावलपुर जैसे कोई ख्वाब में सुना हुआ
नाम। गंगानगर-बीकानेर से इतना नजदीक लेकिन हमारे लिए कोई तीस घंटे की दूरी पर।
हमारे अनूपगढ़ से यहां के बहावलनगर की रोशनियां दिखाई देती हैं। किसी जमाने में
मुल्तान और बाहवलपुर के रास्ते ही बीकानेर से राजस्थान का व्यापार चलता था। कोई दो
सौ साल पहले अव्बासी खानदान ने बहावलपुर रियासत की कमान संभाली। मेरे साथ जहांगीर
मुख्लिस बैठे थे। उन्होंने रास्ते में अहमदपुर से अपने परिवार यानी एक पुत्र,
दो पुत्रियों और पत्नी तथा
साले की बेटी को साथ लिया। बातचीत में उन्होंने बताया कि उनकी एक बेटी का नाम कोमल
और दूसरी का मूमल है। मैंने कहा कि मूमल तो राजस्थानी नाम है। उन्होंने बताया कि
सबसे लड-झगड़ कर जिदपूर्वक यह नाम रखा है। फिर मैंने उन्हें रात भेंट की गई सीड़ी में
से देखकर बताया कि राजस्थानी का प्रसिद्ध गीत मूमल कहां है,
क्योंकि सीड़ी पर हिन्दी में ही
विवरण छपा हुआ था। उनके आग्रह पर मैंने पूरे गीत की पंक्तियों का एक-एक कर भावार्थ
बताया।
हम देरी से चल रहे थे,
इसलिए सबसे पहले पहुंचे प्रेस
क्लब बहावलपुर। पांच घंटे से पत्रकार हमारा इंतजार कर रहे थे। स्वागत सत्कार के बाद
आपसी परिचय ओर फिर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। मैंने इस बात पर जोर दिया कि सरहद
हमें अलग जरूर करती है लेकिन हमारी चिंताएं एक हैं,
हमारे स्वप्न एक हैं।हमारे
गंगानगर-बीकानेर के लोग बहावलपुर के बारे में और बहावलपुर वाले वहां के बारे में
जानना चाहते हैं। ऐसा कोई सिलसिला बने कि सरहद के बावजूद दूरियां न रहें। ईशमधु
तलवार और सुनीता चतुर्वेदी ने पत्रकारिता और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में रिश्तों
में मिठास घोलने की बात कही।
रात के साढे दस बज चुके थे और शाम सात
बजे से एक और जगह सैंकड़ों लोग हमारा इंतजार कर रहे थे। बिना देरी किए हम पहुंचे
गुलजार सादिक यानी सादिक बाग। हमारे उतरते ही पुष्प वर्षा शुरू हो गई। पहली बार एक
बुर्कानशीन महिला हमारे इस्तकबाल के लिए आगे आई। इसी के साथ ढोल,नगाड़े
झांझर और तुरही के कर्णप्रिय संगीत के बीच रंग- बिरंगी पोशाकें पहने लड़कों ने झूमर
नाच शुरू किया। वे नाचते आगे बढ़ते जाते और हम उनके पीछे-पीछे।
बाग में चारों तरफ शादियों जैसी रोशनी
की गई थी और शदीद बारिश के बावजूद सैकड़ों स्त्री-पुरूष हमारी राह देख रहे थे। यह
पहला मौका था,
जब हमने किसी कार्यक्रम में एक साथ
इतनी औरतें देखीं। चोलिस्ताडवलपमेंट कौंसिल के बैनर तले यह इस्तकबालिया प्रोग्राम
डॉ फ़ारूख अहमद खान ने रखा था। मंच पर चरखा,
परींडा,
चौपाल सजी थी तो सामने दो
खाटें बिछी थीं। इन खाटों पर कलात्मक बुनाई सिलाई वाली गुदड़ियां थीं और पांवों में
वैसा ही कालीन। मंच पर लगे बैनर में कोट दिरावर के किले के साथ ऊंटों का एक काफिला,
एक झोपड़ी और घूंघट से झांकती
एक महिला का चेहरा था। यानी कुल जमा पूरा का पूरा राजस्थानी महौल। मंच पर एक तरफ
हमारे लिए कुर्सियां लगी थीं।
पेशे से सर्जन डाँ
ज़ावेद इकबाल और पत्रकारिता के प्राध्यापक प्रो राना शहजाद ने जुगलबंदी के अंदाज में
मंच संभाला। उन्होंने परिचय के साथ-साथ बातचीत,
सवाल-जवाब का भी खूबसूरत संमा
बांध दिया। मंच पर एक तरफ साजिन्दे अपने साज बाजों के साथ तैयार बैठे थे। कुछ
साथियों के परिचय के बीच शाजिया नाज ने बाब गुलाम फरीद की काफियां सुनाई। हमारे
निवेदन पर हसीना खनम से राजस्थानी गीत सुनवाए गए। उड़ उड़ रे म्हारा काळा रे कागला
क़द म्हारा पीव जी घर आवै ज़ोरदार आवाज और पक्की लयकारी में इस गीत को सुनना एक
अद्रुत अनुभव था। इसी दौरान बारिश तेज हो गई। सब लोग और निकट आ गए।
अगले
अंक में जारी
सियासत जो दिल तोड़ देती है उसे जोड़ना मुश्किल है
नासिरा
शर्मा
(डॉ यश गोयल से साक्षात्कार)

हिंदी साहित्य में विषमता का एक
नाम है -नासिरा शर्मा। सन् 1981
में 'आईना-ए-ईरान'
दिखाने वाली लेखिका, पिछले दिनो (सन्
1992 ) महिला लेखन की साहित्यिक वकालत और अगुवाई करने
गुलाबी नगरी (जयपुर) आयी हुई थीं। उनसे जो चर्चा हुई वह राष्ट्रीय सहारा ने अपने
8 फरवरी, 1992 के अंक में
प्रकाशित की।
नासिरा ने पिछले दशक से
हिन्दी-उर्दू साहित्य में महिला लेखिकाओं में अपनी अलग पहचान बनायी है।
जहां नासिरा ने ईरानी क्रांति,
इतिहास, साहित्य,
संस्कृति, राजनीति,
तथा जन-जीवन के लोमहर्षक संघर्ष गाथा को भारत तक पहुंचाने का
नाम कमाया है, वहीं भारतीय साहित्य में कई चर्चित
उपन्यास और कहानी संग्रह भी दिये हैं सन् 1980-81 में जब
ईरान-इराक सुलग रहे थे, इतिहास करवटे ले रहा था उस दौरान
नासिरा ने ईरान का चप्पा-चप्पा छान मारा। वह साहित्यिक पत्रकारिता में उतर आयी थी।
इरान की सियासी उथल-पुथल और मुस्लिम समुदाय की आप-बीती पर तो नासिरा को सभी याद
करते है। क्या नासिरा ने भारत में अल्पसंख्यकों पर हो रहे बदलाव को भी जानने की
कोशिक की है ? क्या उन्होंने हिन्दी साहित्य में इस
अध्याय को कहीं जोड़ा है ? नासिरा ने गत दो वर्ष
हिन्दू-मुस्लिम टकराव की स्थिति में किस तरह बिताये हैं। इसी उद्धेश्य से मैंने
नासिरा से बात करने की पेशकश की। दो दिन व्यस्त कार्यक्रम के बाद उन्होंने समय दिया
चूंकि पिछले दिनों में वे महिला
लेखन
लेखिका की आजादी तथा साथी पुरूष
लेखकों से अनबन पर बहुत कुछ बोल चुकी थी तो मैंने पूछा-राष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान
की लेखिका लेखन में क्या स्थान है ?
वे संकोच से बोली - महादेवी वर्मा,
कृष्णा सोबती या मन्नू भंडारी की तरह उनके बाद राजस्थान से कोई
नया नाम हिन्दी साहित्य में तो निकल कर नही आया। राजस्थान में लेखिकाओं में उत्साह
जरूर नजर आता है, परन्तु वही काफी नहीं हैं। राजस्थान से
साहित्य मूल भाषा में आना चाहिए या फिर अनुवाद होकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचे।
प्रादेशिक भाषा में लिखा गया साहित्य बिना अनुवाद के दूसरे सीमावर्ती राज्यों तक भी
नहीं पहुंच पाता। राजस्थान में चूंकि सामाजिक माहौल पिछड़ा हुआ है इसलिए महिला को
अधिक समय निकालना पड़ेगा। मात्र लिखने से काम नहीं चलता। लिखना भर- औरतों के लिए
पर्याप्त नहीं । लिखने की अपनी पहचान होती है। उसके लिए निष्ठा चाहिये।
मैंने विषयांतर कर पूछा
'ईरानी क्रांति पर तो आपने
बहुत कुछ लिखा। पिछले दो तीन वर्षो में भारत में अल्पसंख्यकों और हिन्दुओं में
मनमुटाव बढ़ा है या बढ़ाया गया ? भारत में अल्पसंख्यकों की
ताजा स्थिति पर आपकी क्या टिप्पणी है ''सन्
1947
के भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद को
जो मुसलमान था वह शुरू के 20
वर्षो में बुरी हालत में रहा। एक पक्ष
में वह भावनात्मक स्तर पर बंटा। उसका एक खानदान इधर रहा,
दूसरा उधर चला गया।''
नासिरा का गला शायद रूंधा,
फिर भी वे संभल कर आगे बोलीं,
''मेरा देश बंटा था। यहां के
कुछ मुसलमान उधर चले गये। ये मुल्क हमारा है,
तभी हम रूके रहे।
'
इलीट (उच्च) वर्ग पाकिस्तान चला गया।
मध्य वर्ग खत्म होता गया बंटवारे के कारण। कारखानेदार,
अस्सी प्रतिशत फिरोजाबाद और
मुरादाबाद में ही रह गया। 20
साल तक बेदम रहा। अनपढ़,
गरीब मध्यम वर्ग पनपा,
शिक्षा फैली। अब कहीं जाकर नयी
नस्ल ने तीस-चालीस सालों में अपने अधिकार को,
सियासत की चाल को,
खुली आंखों से अपनी स्थिति का
अवलोकन किया ।''
कहीं ये सब
'फ्रस्टेशन'
की देन तो नहीं है ? नासिरा ने
नकारात्मक रूख से कहा, ''मैं कभी व्यक्तिगत परेशानी
में नहीं फंसी। मेरे वजूद में हमेशा समाज के लोग आये। मैंने दूसरों के गम ओढ़े।
गुस्सा कभी खुदा पर आता है तो कभी 'सोशल सिस्टम'
पर। कभी खुद पर। भगवान ने आदमी को पैदा किया और उसे रोटी का
मोहताज बनाया। किसी को खूब दिया। नासिरा के गम बहुत मिले-जुले हैं। साथ ही दुनिया
में तलाश है, तरह-तरह के इंसानों को जानने की। नासिरा
शर्मा के नाम को लेकर लोगों, विशेष रूप से मर्द लेखकों
ने जिज्ञासा प्रकट की है। नासिरा को बार-बार पत्र लिखे। बिना किसी हिचकिचाहट के
नासिरा बोल पड़ी '' मैं मुसलमान हूँ। पति हिन्दू। मोहब्बत
हिन्दी से, जबकि जुबान उर्दू है। पढ़ाई फारसी (परशियन)
में की है।''
नासिरा महिला लेखन से बहुत ज्यादा
संतुष्ट हैं, ऐसा
नहीं हैं वे कहती हैं- '' महिला लेखन में अपवाद से काम
नहीं चलेगा। लेखिकाओं को 'शिकवा-शिकायत'
के साहित्य से इतर साहित्य में गंभीरता से सिलसिला चलाना चाहिए।''
नासिरा पुरूष लेखन से महिला लेखन
को कम नहीं मानती,
इसलिए वे सोचती हैं - ''आदमी औरत का दिमाग अलग-अलग नहीं
होता। लेकिन दिल, भावनाएं अलग हैं। भावनाओं में बह जाना,
फिर रचना करना, इसका मूल्यांकन ही
सच्चे साहित्य की परीक्षा कर सकता है। '' वे इसी क्रम
में एक और टिप्पणी करने से नहीं चूकती, ''ऐसा नहीं है,
मर्द बहुत अच्दा लिख रहा हैं। ये तो मुकाबला है उसके साथ। वैसे
ये 'अण्डर करंट' है,
कह लो अण्डरस्टैडिंहै कि महिलाएं ज्यादा लिख रही है। वे ज्यादा
विकसित हुई है।''
बावजूद आपके कथन के मैंने पूछा,
''क्यों महिला अपने लेखन में अपनी जाति परिधि से नहीं निकल पायी?
यही सवाल हर जगह उठाया जाता रहा है।''
''महिला
लिखने के लिए तो उठी है। उसने कितना कुछ तो लिखा है। परिधि क्या होती है
? ''
नासिरा को प्रश्न चुभा और वे जरा
उत्तेजीत हुई, ''मुंशी
प्रेमचन्द के पात्र किसी राजनीति या क्रांति के पृष्ठभूमि से नहीउपजे थे। वे खेत
खलिहान के होते थे। इस मर्द लेखन ने कभी उन्हें कुछ नहीं कहा। असल में औरतों में
अभी अच्छी समीक्षक नहीं है। इसी की कमी नजर आती है। अपने लेखन को मूल्यांकन के लिए
औरत मर्दो का मुंह देखती रह जाती है। लेखिकाओं में अभी इतने
'गअ्स'
नहीं कि वे मर्द लेखक के लेखन
में से पात्र की सच्चाई का पर्दाफाश कर सके। हकीकत ये है कि मर्द औरत के लेखन में
अधिक रूचि लेता है,
रचना को सब तरफ से पढ़ता है। अर्थ
निकालने की चेष्टा करता है। जबकि हममहिला लेखिकाओं का लक्ष्य ब मर्द नहीं रहा हैं।
वह चाहे जितना बुरा माने औरत लीक से हट कर लिखने में प्रयासरत है।''
(राष्ट्रीय
सहारा: 8
फरवरी,1992)
--डॉ यश गोयल की पुस्तक 'इण्टरव्यू जर्नलिज़्म' से साभार.
पुस्तक समीक्षा इसी अंक में देखें.
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