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डा0
चन्द्र कुमार वरठे
इधर सितम्बर शुरू हुआ नहीं कि इधर
सुगबुगाहट शुरू हो जाती है हिन्दी की,
हिन्दी को सॅजाने-सॅवारने,
उसको
'नागरी'
रूप देने,
उसको श्रेष्ठ,
प्रौढ़ सुघड़,
सुन्दर और सलोनी साबित करने
की होड़-सी मच जाती है हर जगह,
जिला,
तहसील,
ब्लॉक?,
शहर,
ग्राम और मोहल्ले से लकर हर
नगर,
हर डगर,
हिन्दी ही हिन्दी आती है
नज़र
सितम्बर का शुरू होना,
हिन्दी के लिए बसन्त के आने
की ख़बर है,
कोयल की तान है,
गुलों पे बहार है,
बहारों का गान है,
हिन्दी में कहे तो समझना और
बोलना आसान है,
सितम्बर में सर्वत्र एक ही मंत्र,
जो जन-तंत्र की रीढ़ है,
जपा जाता है,
जोर शेर से उद्घोष किया
जाता है,
हिन्दी में यूं करना हैख् हिन्दी
का त्यॅू करना है,
हिन्दी का
'मास'
(माँस नहीं) हिन्दी का
पख़वाड़ा,
हिन्दी का सप्ताह,
यहॉ तक कि हिन्दी का दिन
(दीन-नहीं) प्रहर,
घन्टा,
मिनट आदि- आदि-इत्यादि
ढाई क़मरों के कार्यालय से लेकर ढ़ाई
सौ क़मरों वाले सचिवालयों तक एक ही ख़बर,
हिन्दी को लेकर हिन्दी की
बैठकें आयोजित की जाती है,
प्रायोजित होती है,
नियोजित तरीकों से
बहुत कुछ होता है हिन्दी में चर्चा
होती है,
परिचर्चा होती है,-
और हिन्दी पर किया जाने
वाला खर्चा होता है अौर वह ीाी सब कुछ हिन्दी में
बहुत कुछ होता है हिन्दी में
'हिन्दी'
पर वाद होते हैं,
विवाद होते हैं,
संवाद होते हैं,
प्रतिवाद होते हैं,
व्याख्यान होते हैं,
आख्यान होते हैं,
अवार्ड होते हैं,
रिवार्ड होते हैं और उखाड़
होती है,
पछाड़ होती है,
हिन्दी में सब कुछ होता
है हिन्दी में सम्मेलनों का आयोजन-प्रयोजन होता है- सब कुछ होता है हिन्दी में यह
सब कुछ देखकर हिन्दी गद्गद् होती है सद्गत् होती है।
इस बार मैंने भी सोचा,
सोचने के लिए बैठा,
बैठकर सोचा,
और सोचा इसलिए उभा (खड़ा)
हुआ यह कहने के लिए कि मैंने भी कुछ सोचा है
यह कहने के लिए कि हिन्दी के बारे
में मेरे जैसा अहिन्दी भाषी भी कुछ सोच सकता है यह सोचकर
'उभा'
हुआ ही था कि एक हिन्दी
वाला बोला - ''
बेठ ज्या- बेठ कर भी सोच्या जा
सकता हय।''
इसी बात को जब
'भौत
सारे'
लोगों ने एक साथ कहा तब
'में'
फेर से बेठ ग्या
'बैठकर'
सोचना या सोचकर
'बैठना'
इसका हिन्दी पर क्या असर पड़
सकता है,मैं
नहीं जानता,
लेकिन
'बैठकर
भी सोच्या जा सकता है,
यह बात जब कुछ लोगों ने कहीं,
तभी मेरी भी समझ में आ गई-
क्योंकि जब तक हमारे देश के 'कुछ
लोग', 'कुछ
कहते नहीं',
तब तक बहुत-सी बातें जनता की समझ
में नहीं आती
सत्य ही कहा है,
कुछ लोगों ने कि सोचने के
लिए उभा होना ज़रूरी नहीं,
बैठकर ही सोच्या जा सकता है
- तभी 'मैं'
बेठ ग्या अऊर सोचने लग्ग्या
कभी-कभी मैं भी सोचता हूँ और क्या
धॉसू सोचता हूॅ यह मैं आपको इसलिये बता रहा हूॅ- कि आप भी सोचिये मेरे साथ बेठकर
क्यों कि '
बेठकर'
बहुत कुछ से लेकर
'
सब कुछ'
किया जा सकता है
हॉ तो भईये ! अपुन बोल रहा था
हिन्दी के बारे में! सितम्बर में बैठकें ही बैठकें होती है ज़िधर देखो उधर,
'बैठके'
ही बैठके'
!
वैसे हिन्दी के बारे में क्या
सोचना चाहिये यह भी खोज का विषय हो सकता है- और क्या यह इतना ज़रूरी है
?
है भी या नहीं,
इसकी भी जॉच पड़ताल की जानी
चाहिये।
खैर,
अपुन को क्या,
अपुन तो ठैरा निप्पट
अ-हिन्दी -वाला आदमी भला अपुन क्या सोच सकता है हिन्दी में,
हिन्दी में,
हिन्दी के बारे में वो तो
वो क्या बोलते हय ठेका,
तो हिन्दी वालों ने ले रखा है
हिन्दी की ऐसी तैसी करने का
सितम्बर का आना क़िस क़दर सुहाना और
रोमांचक होता है,
सर्वत्र ज्ञान गंगा की लहरे नर्तन
करने लगती है साहित्यकारों,
कवियों,
रचनाकारों,
भाषणबाजों,
विद्धानों और आयोजकों की
फ़सल लहलहाती हुई उग आती है,
हर तरफ हरियाली ही हरियाली
नज़र आने लगती है
'तू
मुझे बुला -
मैं-तुझे बुलाता हूॅ।
तू मेरी कर-
मैं तेरी करता हूॅ ।'
क़ा न टूटने वाला सिसिला आरंभ हो जाता है हिन्दी और सितम्बर का
बड़ा ही चोली दामन का साथ और रिश्ता होता है वैसे, मैं
आपको एक बात बताना चाहता हूँ प्रतिवर्ष जयंति या पुण्यतिथि वगैरा,-
जो आती है वह किसी को श्रद्धांजलि देने या किसी का पुण्य-स्मरण
करने के लिए
मगर हिन्दी! वह तो जिन्दा है आम-
आदमी की आवाज बनकर
फिर,
उसे क्यों, हर वर्ष केवल सितम्बर में
ही स्मरण किया जाता है
आप भी सोचिये !!
प्रतिक्रिया
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हमें जीने दो, याचिकाओं के भरोसे
प्रणय
कुमार गर्ग
कोर्ट कचहरियों
और कागज़ी कार्यवाही की कवायद में पिसते सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स पर थोपी जा
रही जेनेरिक दवा नीति के खिलाफ भारी रोष व्याप्त है. 23 दिसम्बर 2006 के उस आदेश को
जिसके द्वारा सरकारी अस्पतालों में आवश्यक दवा सूची 2005 के अनुरूप केवल जेनेरिक
दवाइयां लिखने की बाध्यता आयद की गई है, 18 अगस्त 2007 को राजस्थान हाई कोर्ट में
दायर एक जन हित याचिका के द्वारा चुनौती दी गई है. वरिष्ठ न्यायाधीश राजेश बालिया
और न्यायाधीश महेश चन्द्र शर्मा की खण्डपीठ ने इस क्रम में केन्द्र सरकार, राज्य
सरकार और जिलाधीश को तलब किया है.
इस याचिका में याचिका कर्ता राजेश
कुमार माथुर की ओर से उनके अधिवक्ता अशोक छंगाणी ने जेनेरिक दवाओं के खिलाफ उनकी
सीमित उपलब्धता, संशययुक्त गुणवत्ता, नई दवाओं के समकक्ष जेनेरिक दवाओं की
अनुपलब्धता आदि के चलते मज़बूरन महंगे इलाज के लिए धकेले जाने के तर्क प्रस्तुत किए
हैं. जब इस आवश्यक दवा सूची की 480 दवाओं में से सिर्फ 300 से भी कम ही सहकारी
भण्डारों पर उपलब्ध है तो शेष दवाओं के लिए मरीज़ कहां जाए? यह भी गौर तलब है कि 5
अप्रेल के 11 नमूनों की प्रयोगशाला जांच में 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाएं गुणवत्ता की
कसौटी पर खरी नहीं उतरी, और 30 प्रतिशत की जांच लम्बित थी. ऐसे में आधे-अधूरे उपचार
के परिणाम की कल्पना ही डराती है. यह और कि इस जेनेरिक दवा अभियान के कारण सरकारी
कर्मचारियों और पेंशनर्स को नई दवाओं से वंचित रहना पडता है. ऐसा इसलिए कि कोई भी
नई दवा 4 से 15 वर्ष तक जेनेरिक श्रेणी में शुमार नहीं की जा सकती है. ज़ाहिर है कि
इस प्रावधान के चलते अनेक अधिक कारगर, अधिक सुरक्षित दवाएं जैसे हड्डी रोग के लिए
CELADRIN, संक्रमण के लिए
CEFDITOREN, DUONEM, डायबिटीज़ के लिए
MIGNAR, ब्लडप्रेशर के लिए
APROVEL आदि ब्राण्डेड दवाएं चिकित्सक
सरकारी अस्पतालों में नहीं लिख सकते.
यहीं यह भी उल्लेख ज़रूरी है कि
पेंशनर्स एसोसिएशन ने केवल दवाओं के मामले में जेनेरिक बन्धन पर आपत्ति की है.
एसोसिएशन ने कहा है कि टूथ पेस्ट, साबुन, तेल वगैरह पर बिना ब्राण्ड वाले ही बेचे
जाने चाहिये, या ग्रामोद्योग उत्पाद बेचे जाने चाहिये.
एक अन्य याचिका तस्वीर का दूसरा पहलू
भी प्रस्तुत करती है. 17 मई 07 को राजस्थान हाई कोर्ट में पेश जनहित याचिका के क्रम
में जेनेरिक दवा लिखे जाने के लिए पाबन्द करने के बाबत नोटिस जारी किए गए हैं. इस
याचिका में उचित मूल्य पर दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के मुद्दे को खास तौर
पर उठाया गया है.
उधर मद्रास हाई कोर्ट ने 7 अगस्त 2007
को भारत में पेटेण्ट (अमेण्डमेण्ट) एक्ट, 2005 के तहत एक स्विस कम्पनी नोवार्टिस
के खिलाफ ऐतिहासिक फैसला सुना कर कैंसर पीडितों को भारी राहत दी है. कम्पनी ने
पेटेण्ट एक्ट की धारा 3 (द) की वैधता के खिलाफ याचिका दायर कर अपनी कैंसर इलाज में
प्रयुक्त महंगी दवा GLIVEC के
लिए पेटेण्ट हासिल करने का आवेदन किया था जिसे न्यायाधीश आर बालासुब्रमणियम और
न्यायाधीश प्रभाश्रीदेवन की खण्डपीठ ने अस्वीकार कर दिया. इसके दूरगामी परिणाम यह
होंगे कि उक्त दवा अब अनेक भारतीय दवा निर्माता अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध करा
सकेंगे.
--बी-11, अग्रवाल कॉलोनी,
रातानाडा, जोधपुर.
प्रतिक्रिया
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अब भगवान भी
विदेशी
अगर आस्था और भक्ति से परे सिर्फ़ अर्थशास्त्र की बात
करें तो जन्माष्टमी के मौके पर उत्तर और पूर्वोत्तर भारत में करोड़ों का कारोबार
होता है. कई कुटीर और घरेलू उद्योग इन मूर्तियों के कारोबार निर्भर है.
लेकिन अब चीन से बन कर आईं चीनी राखियां
के बाद अब जन्माष्टमी के अवसर पर चीन से आई कृष्ण की मूर्तियों की धूम
है.
रंग-बिरंगे कपड़ों में मोती-मनके और मोरपंख से सजे मटकी से
माखन चुराते कृष्ण की चीनी मूर्तियों से बाज़ार पटे हुए हैं. ये मूर्तियाँ रेजिन और
फाइबर से बनी हुई हैं.
इनकी ख़ासियत ये है कि इनकी चमक लंबे समय तक बनी रहती
है और गिरने से ये टूटती नहीं हैं जबकि तांबे या पत्थर की बनी भारतीय मूर्तियां
नाज़ुक होती हैं.”
पहले लोग चीनी मूर्तियों को उपहार में देते थे या बैठक में
सजाते थे लेकिन अब इनका प्रवेश पूजाघर में भी हो गया है.ये धर्म के ख़िलाफ़ तो नहीं
है लेकिन हमें अपनी परंपरा पर ध्यान देना चाहिए."
चीन ने पिछले कुछ सालों में अपने सस्ते सामान से पूरी दुनिया
के बाज़ार को जिस तरह से पाट दिया है ऐसे में घरेलू
बाज़ार को संरक्षण देने के लिये निश्चय ही कुछ क़दम उठाए जाने की ज़रूरत है.
--अंजली सहाय
प्रतिक्रिया
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