सितंबर 2007

  

                           

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        हिंदुस्तान के अतीत का विहंगावलोकन
 

     यह हिंदुस्तान क्या है, जो मुझ पर छाया हुआ है और मुझे बराबर अपनी तरफ बुला रहा है और अपने दिल की किसी अस्पष्ट, पर गहराई के साथ अनुभव की हुई इच्छा को हासिल करने के लिए काम करने का उत्साह दिला रहा है ? अगर हम उसके भौतिक और भौगोलिक पहलुओं को छोड़ दें तो आखिर यह हिदुस्ताान है क्या ? गुजरे हुए जमाने में इसके सामने क्या आदर्श थे ? कौन -सी ऐसी चीज थी जिससे इसे शक्ति प्राप्त होती थी ? किस तरह वह अपनी पुरानी शक्ति खो बैठा ? और क्या उसने यह शक्ति पूरी तौर पर खो दी है ? और सिवा इसके कि बहुत बड़ी संख्या में लोग यहां बसते हैं, क्या कोई ऐसी जीवित वस्तु है जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है ? आज की दुनिया में उसकी ठीक जगह क्या है ?

ज्यों-ज्यों मैंने इस बात का अनुभव किया कि हिंदुस्तान का और मुल्कों से अलग-थलग होकर रहना अनुचित है और असंभव भी, मेरा ध्यान इस प्रश्न के अंतर्राष्ट्रीय पहलू की ओर बराबर जाता रहा। आने-वाले जमाने की जो तस्वीर मेरे सामने बनती, वह ऐसी होती जिसमें हिंदुस्तान और दूसरे मुल्कों के बीच राजनीति, व्यवसाय और संस्कृति का गहरा मेल और संबंध होता। लेकिन आनेवाले जमाने की बात तो बाद में उठती थी, पहले तो हमारे सामने वर्तमान था, और इस वर्तमान के पीछे एक लंबा और उलझा हुआ अतीत था, जिसने वर्तमान की रूपरेखा बनाई थी। इसलिए, बातों को समझ पाने के उधेश्य से मैंने अतीत का सहारा लिया।

हिंदुस्तान मेरे खून में समाया हुआ था और उसमें बहुत-कुछ ऐसी बाते थीं जो स्वभाव से मुझे उकसाती थीं। यह सही है कि हमारे सामने बहुत- कुछ ऐसा था जिसे मिटा देना ही उचित था, लेकिन अगर हिंदुस्तान में कोई ऐसी वस्तु न होती कि जो बनाये रहने के योग्य और सजीव थी, और जिसकी सचमुच कीमत थी, तो यह निश्चय है कि हजारों साल तक वह अपनी संस्कृति और अस्तित्व की रक्षा न कर सकता था। यह वस्तु क्या थी ?

उत्तर -पश्छिमी हिंदुस्तान की सिंध- घाटी में, मोहन-जो-दड़ो के एक टीले पर मैं खड़ा हुआ। मेरे चारों ओर इस प्राचीन नगर के मकान थे और गलियां थीं। कहा जाता है कि यह शहर पांच हजार साल पहले मौजूद था और उस समय भी यहां एक पुरानी और विकसित सभ्यता मौजूद थी। प्रोफेसर चाइल्ड लिखते हैं -- ''सिंध -सभ्यता, एक विशेष वातावरण में, मनुष्य के जीवन का पूरा संगठन प्रकट करती है, और यह अनेकानेक वर्षो के प्रयत्नों का ही परिणाम हो सकती है। यह एक टिकाऊसभ्यता थी ; उस समय भी उस पर हिंदुस्तान की अपनी छाप पड़ चुकी थी और यह आज की हिंदुस्तानी संस्कृति का आधार है।'' यह एक बड़े अचरज की बात है कि किसी भी तहजीब का, इस तरह पांच या छ: हजार बरसों का अटूट सिलसिला बना रहे और वह भी इस रूप में नहीं कि वह स्थिर और गतिहीन हो, क्योंकि हिंदुस्तान बराबर बदलता और उन्नति करता रहा है। ईरानियों, मिस्त्रियों, यूनानियों, चीनियों, अरबों, मध्य-एशियाइयों और भूमध्य-सागर के लोगों से इसका गहरा संबंध रहा है। लेकिन बावजूद इस बात के कि इसने इन पर प्रभाव डाला और इनसे प्रीाावित हुई, इसकी सांस्कृतिक नींव इतनी दृढ़ थी कि वह कायम रह सकी। इस दृढ़ता का रहस्य क्या है ? यह आई कहां से ?

मैंने हिंदुस्तान का इतिहास पढ़ा और उसके विशाल प्राचीन साहित्य का एक अंश भी देखा। उस विचार-शक्ति का साफ-सुथरी भाषा का, और उस ऊंचे दिमाग का, जो इस साहित्य के पीछे था, मुझ पर बड़ा गहरा असर हुआ। चीन के और पच्छिमी व मध्य-एशिया के उन महान् यात्रियों के साथ, जो बहुत पुराने समय में यहां आये और जिन्होंने अपने यात्रा-वृत्तांत लिखे हैं, मैंने हिन्दुस्तान की सैर की। पूर्वी एशिया, अंगकोर, बोरोबुदुर और बहुत -सी जगहों में हिंदुस्तान ने जो कर दिखाया था, उस पर मैंने मनन किया; मैं हिमालय में भी घूमा, जिसका हमारी पुरानी कथाओं और उपाख्यानों से संबंध रहा है और जिन्होंने हमारे विचार और साहित्य पर इतना प्रीााव डाला है। पर्वतों से प्रम और कश्मीर से अपने संबंध ने मुझे विशेष रूप से पहाड़ों की तरफ खींचा, और वहां मैंने न केवल आज के जीवन और उसकी शक्ति और सौदर्य को देखा, बल्कि बीते हुए युगों की यादगारें भी देखीं। उन उन्मादिनी नदियों ने, जो इस पहाड़ी सिलसिले से निकलकर हिंदुस्तान के मैदानों में बहती हैं, मुझे अपनी तरफ खींचा और अपने इतिहास के अनगनित पहलुओं की याद दिलाई। सिंधु, जिससे हमारे देश का नाम हिंदुस्तान पड़ा, और जिसे पार करके हजारों बरसों से न जाने कितनी जातियां, फिरके, काफिले और फौजें आती रही है ; ब्रह्मपुत्र, जो इतिहास की धारा से तनिक अलग रही, लेकिन जो पुरानी कथाओं में जीवित है ओर पूर्वोत्तर के पहाड़ों की गहरी दरारों के बीच से रास्ता बनाकर हिंदुस्तान में आती है और फिर शांतिपूर्वक और मनोहारी प्रवाह के साथ पहाड़ों और जंगल भरे मैदानों से बहती है ; जमुना, जिसके नाम के साथ रास-नृत्य और क्रीड़ा की अनेक दंत कथाएं जड़ी हुई हैं, और गंगा, जिससे बढ़कर हिंदुस्तान की कोई दूसरी नदी नहीं ; जिसने हिन्दुस्तान के हृदय को मोह लिया है, और जो इतिहास के आरंभ से न जाने कितने करोड़ लोगोको अपने तट पर आकर्षित करती रही है। गंगा की, जिसके उद्गम से लेकर सागर में मिलने तक की, कहानी, पुराने जमाने से लेकर आजतक की हिंदुस्तान की संस्कृति की, साम्राज्यों के उठने ओर नाश होने की, विशाल और शानदार नगरों की, मनुष्य के साहस और साधना की, जीवन की पूर्णता की और साथ-ही साथ त्याग और वैराग्य की, अच्छे और बुरे दिनों की, विकास और हृास की, जीवन और मृत्यु की कहानी है।

मैंने अजंता,एलौरा, एलिफैंटा और अन्य जगहों के के स्मारकों, खंडहरों, पुरानी मूर्तियां और दीवारों पर बनी चित्रकारी को देखा, और आगरा और दिल्ली की, पुरानी इमारतें भी देखीं, जिनका एक-एक पत्थर हिंदुस्तान के बीते हुए युक की कहानी कहता है।अपने ही नगर, इलहाबाद में, या हरिद्वार के स्नानों में, या कुंभ मेले में मैं जाता, और देखता कि वहां लाखों आदमी गंगा में नहाने के लिए आते हैं, उसी तरह जिस तरह कि उनके पुरखे सारे हिंदुस्तान से हजारों बरस पहले से आते रहे हैं। चीनी यात्रियों के और औरों के, तेरह सौ साल पहले के, इन मेलों के वृत्तंतों की याद करता। उस समय भी ये मेले बड़े प्राचीन माने जाते थे और कब से इनका आरंभ हुआ, यह कहा नहीं जा सकता। मैं सोचता, यह भी कौनसा गहरा विश्वास है, जो हमारे देश के लोगों को अनगनित पीढ़ियों से इस प्रसिद्ध नदी की ओर खींचता रहा है ?

मेरी इन यात्राओं ने -- और इनके साथ वे सभी बातें थीं, जिन्हें मैंने पढ़ रखा था-- मुझे बीते हुए युगों की झांकी दिखाई। अबतक जो एक कोरी मानसिक जानकारी थी, उसमें हृदय का समर्थन मिला और क्रमश: हिन्दुस्तान का मेरा कल्पित चित्र वास्तविक लगने लगा, और मुझे अपने पुरखों की भूमि जीते-जागते लोगों से बसी हुई दिखाई पड़ी, ऐसे लोगों से बसी हुई, जो हॅसते भी थे और रोते भी, जो प्रेम करना जानते थे और दु:ख सहना भी ; और उनमें ऐसे लोग थे जो जीवन का अनुभव रखने वाले और उसे समझनेवाले थे, और उन्होंने अपनी बुद्वि के द्वारा एक ऐसा ढंाचा तैयार किया जिसने कि हिन्दुस्तान को एक सांस्कृतिक स्थायित्व प्रदान किया और वह हजारों साल तक बनी रही। इस बीते हुए काल की सैकड़ों जीती- जागती तस्वीरें मेरे मस्तिष्क में फिर रही थीं और जब मैं किसी खास जगह जता, जिससे कि उनका संबंध होता, तो वे मेरे सामने आ जातीं। बनारस के पास, सारनाथ में, मैं बुद्ध को अपना पहला उपदेश देते हुए प्राय: देख सका, और मुझे उनके कुछ वे शब्द, जो लिखे जा चुके हैं, ढाई हजार साल बाद एक दूर की प्रतिध्वनि की तरह सुनाई दिये। अशोक की लाटें, जिन पर लेख खुदे हुए हैं, अपनी शानदार भाषा में, एक ऐसे आदमी का हाल बताती हैं, कि जो यद्यापि वह बादशाह था, फिर भी किसी भी राजा या बादशाह से ऊंची हैसियत रखता था। फतहपुर-सीकरी में अकबर, अपनी सल्तनत की शान को भूलकर, सभी मजहबों के आलिमों से कुछ नई बात सीखने और मनुष्य की चिरंतन समस्या का हल पाने की गरज से बहस करने बैठता।

सिर्फ चीन ही ऐसा देश है कि जहां ऐसी अटूट परंपरा और सांस्कृतिक जीवन दिखाई देते हैं। फिर अतीत की यह विशाल तस्वीर धीरे-धीरे वर्तमान की बदनसीबी में बदल जाती है, जबकि हिन्दुस्तान अपने बीते दिनों के बड़प्पन के बावजूद एक गुलाम मुल्क है, और इंगलिस्तान का पुछल्ला बना हुआ है, और सारी दुनिया एक भयानग और नाशकारी लड़ाई के शिकंजे में है, और इंसान को हैवान बनाये हुए है। लेकिन पांच हजार वर्षो की इस कल्पना ने मुझे एक नई दृष्टि दी और वर्तमान को बोझ कुछ हल्का जान पड़ने लगा। अंग्रेजी- सरकार की एक सौ- अस्सी साल की हुकूमत हिंदुस्तान की लंबी कहानी की केवल एक दु:खदायी घटना -जैसी जान पड़ी।

  जवाहर लाल नेहरु

 

   

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                                                प्रबंध सम्पादक : अंजली सहाय सम्पादक : डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल