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कहानी

सुनहरी चिड़िया
सूरेखा पाणंदीकर
नामदेव एक गरीब मजदूर था। वह गॉव
के जमींदार राजाराम पाटिल के खेतों में मजदूरी करता था। कभी -कभी वह जमींदार के घर
का काम भी कर देता था। वह खेत में बनी एक झोपड़ी में रहता था। सुबह सूरज निकले से
पहले उठ जाता,
नहा-धोकर पूजा करता फिर पेड़- पौधो
को पानी देता। उसके बाद चिड़िया को दाना डालता और तब खेतों पर काम करने चला जाता।
नामदेव बड़ा मेहनती और ईमानदार था।
जमींदार उसके काम की पूरी मजदूरी नहीं देता था पर इसके लिए वह मालिक से कभी
शिकायत
नहीं करता। नामदेव की झोपड़ी के पास बहुत चिड़िया आती उनमें एक सुनहरी चिड़िया भी थी।
वह सबको दाना-पानी देता।
एक दिन नामदेव को सूखी रोटी खाते
देख दूसरी चिड़ियों ने सुनहरी चिड़िया से कहा
''
तुम सबकी सहायता करती हो,
इस गरीब की सहायता क्यों
नहीं करती ?''
''
हॉ तुम ठीक कह रही हो। मैं इसकी
सहायता अवश्य
करूंगी।
कल सवेरे जब हम दाना चुगेंगे तो तो हर दाने के बदले मैं एक-एम मोहर छोड़ती जाऊंगी।
मोहरों से वह खाना खरीद सकेगा। अच्छे कपड़े बना लेगा। घर बना लेगा । ठीक है न ?''
सुनहरी चिड़िया ने पूछा।
''हॉ,हॉ
ठीक है,''
सब चिड़ियों ने खुश
होकर कहा। चिड़ियों की बातें पास खड़े पाटिल ने सुन लीं। वह उसी समय पहुंचा
था। वह नामदेव को बुलाने आया था। चिड़ियॉ यह बात नहीं जानती थीं।
पाटिल नामदेव के पास गया और बोला,
''कितना काम करते हो। थक गए
हो,
अब तुम आराम कर लो। आज रात तुम
यहाँ अपनी झोपड़ी में मत सोना। आज रात तुम हमारी हवेली में सोना। हम काम से बाहर जा
रहे हैं। तुम हमारे घरवालों की चौकीदारी करना। हम कल शाम तक आ जाएंगे।''
रात को नामदेव हवेली पर सोया।
पाटिल घर से खाना खाकर नामदेव की झोपड़ी में आकर सो गया। सवेरे पाटिल ने घड़े में से
बाजरे के दाने निकाले।
''अरे,
यह तो बस आधी मुट्ठी हैं। घर
से दोने ले आता तो अच्छा था। ''
पाटिल पछता रहा था। उसने उतने ही दाने
ऑगन में बिखेरे दिए और झोपड़ी में छिप गया।
एक-एक कर के बहुत सारी चिड़ियॉ आई।
जैसे चिड़ियॉ एक दाना चुगतीं,
वैसे ही सुनहरी चिड़िया एक मोहर रख
देती। जब दाने खत्म हो गए तो चिड़ियॉ उड़ गई। पाटिल बाहर आया तो ऑगन मोहरों से चमक
रहा था। उसने जल्दी- जल्दी मोहरें थैले में भरीं ओर चल दिया। उसे अब भी घर से दाने
ना लाने का अफसोस हो रहा था।
जाड़े के दिन थे। कड़ाके की सरदी पड़
रही थी। रोज की तरह चिड़ियॉ आई पर ऑगन में दाना नहीं था। वे फुदकती हुई झोपड़ी के
अंदर गई। पर यह क्या?
नामदेव तो सरदी से कॉप रहा था। उसे
शायद बुखार था। चिड़ियॉ दुखी मन से पेड़ पर गई और सुनहरी चिड़िया से बोलीं,
'' नामदेव को तुमने कैसी
मोहरें दी थीं ?
''क्यों
क्या बात है?''
सुनहरी चिड़िया ने पूछा।
नामदेव को बुखार है। उसे कॅपकॅपी
चढ़ी है। उसके पास ना खाने को रोटी है ना पहनने को कपड़े और ना ही बिछाने को बिछौना।
चिड़ियों ने बताया।
''
ये क्या कह रही हो तुम?
मैंने तो सोने की मोहरें दी
थीं। जरूर कोई गड़बड़ हैं इस बार मैं उसे पहनने के लिए सुंदर कपड़े और गरम बिछौना
दूँगी,''
सुनहरी चिड़िया ने कहा।
उस दिन नामदेव काम पर नहीं गया था।
इसलिए पाटिल पता लगाने झोपड़ी की तरफ आ रहा था। उसने फिर से चिड़ियों की सारी बातें
सुन लीं। पाटिल नामदेव
के पास गया और बोला,
''अरे तुम्हें इतना तेज
बुखार है। बताया क्यों नहीं ?
चलो हवेली पर चलकर आराम करो। वैद्य
जी आकर दवा दे जाएंगें,''
कहकर पाटिल नामदेव को अपने साथ ले
गया।
दूसरे दिन सवेरे पाटिल को पेड़ों के
बीच सुंदर कपड़े व रजाई- गद्दा रखा मिला। पाटिल बड़ा
खुश
हुआ। वह सब सामान
उठाकर अपनी हवेली में ले गया।
इस बात को दो दिन बीत गए। एक दिन
सुबह-सुबह नामदेव ऑगन में आया। वह अभी भी खॉस रहा था। उसने चिड़ियों को दाना डाला।
उसने वही पुराने व फटे कपड़े पहने हुए थे। यह देखकर सुनहरी चिड़िया वह दूसरी चिड़ियॉ
हैरान रह गई।
''जरूर
कोई नादेव की चीजें चुरा रहा है। पता लगाना होगा,
''सुनहरी चिड़िया ने कहा।
उसी समय चिड़ियों ने पाटिल को आते
देखा। सुनहरी चिड़िया ने पाटिल के पहने कपड़ों से पहचान लिया।
''
अरे यही चोर है,''
वह मन ही मन बोली।
वह कुछ सोचकर जोर से बोली,
''सुनों सखियों,
नामदेव बीमार है। उसे पैसों
की जरूरत है। मैं बहुत सारा धन दो थैलों में भरकर आम के पेड़ पर रख दूँगी। तुम नादेव
को यह बात बता देना।''
पाटिल की ऑखें चमक उठीं । नामदेव
को फिर उसने हवेली भेज दिया। सुबह होते ही पाटिल आम के पेड़ के पास जा पहुॅचा। आम के
तने के ऊपर एक डाली पर दो थैले लटक रहे थे। थैले देखकर उसके मुॅह में पानी भर आया।
वह जल्दी से पेड़ पर चढ़ा ओर थैलों तक पहुॅच गया। थैला उतारने के लिए हाथ बढ़ाया तो
दूसरा हाथ भी थैले से चिपक गया दोनों थैले डाल से चिपके थे। पाटिल हाथ छुडाने के
लिए छटपटाने लगा।
''बचाओं,बचाओं,''
वह चिल्लाया । इतनी सुबह उसे
बचाने वाला कोई नहीं था। पेड़ से लटके-लटके वह थक गया। उसकी गर्दन ऐंठ गई।
चिल्लाते-चिल्लाते उसका गला सूख गया। तभी सुनहरी चिड़िया ने उससे पूछा,
'' क्यों पाटिल! धन दौलत पाई
?
और चहिए क्या!''
नहीं अब कुछ नहीं चाहिए ! बस मुझे
बचाओं,
मुझे छुड़ाओं।''
''
तुम्हें छुड़ाना मेंरे बस में नहीं ।
मैंने जो चीजें नामदेव को दी थीं,
तुमने सब हड़प ली। अब नामदेव ही
तुम्हें बचा सकता है।''
''कृपा
करके नामदेव को बुलाओं। मैं उसकी सारी चीजें लौटा
दूंगा।''
पाटिल ने विनती की।
''वायदा
करो कि मोहरें कपडे सब लौटा दोगे, ''दूसरी
चिड़ियों ने कहा।
''हॉ,हॉ,
मैं वायदा करता
हूं मुझे जल्दी
से छुड़ाओं,''
पाटिल बोला।
चिड़ियॉ नामदेव को बुला लाई । पाटिल
ने नामदेव से माफी माँगी और उसकी मोहरें व कपड़े सब लौटा दिए।
नामदेव आज भी उसी तरह उठकर
पूजा-पाठ करता है। चिड़ियों को दाना डालता है। पर अब उसके घर का ऑगन कहीं बड़ा है।
वहॉ पहले से बहुत ज्यादा चिड़ियॉ आकर दाना चुगती है।
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