अक्टूबर 2007

             

प्रकृति और साहित्य को समर्पित

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व्यंग्य  

 

  ट्यूशन पुराण

- रामेश्वर काम्बोजहिमांशु'

 

  जूते सिलने का काम मोची ही करेगा, धोबी नहीं। नाई ही हजामत बनाएगा, हलवाई नहीं। यही बात ट्यूशन के संबंध में भी है। घोड़ा-तांगा हाँकने वाला, बंदर-भालू नचाने वाला, लौकी और कद्दू बेचने वाला तो ट्यूशन पढ़ाने से रहा। इस कलयुगी निंदास्पद कार्य को अध्यापक ही संपन्न कर सकता है। यदि ऐसा न होता तो तंबाकू और शीरा बेचने वाले भी ट्यूशन ही पढ़ाया करते। लोग अध्यापक से न जाने क्यों जलते हैं? जो अपनी ही आग में जला जा रहा है उस बेचारे से क्या जलना? राम तो विष्णु के अवतार थे उन्हें भी गुरु के घर जाना पड़ा। यह कारण था कि अल्पकाल में ही उन्होंने सारी विद्याएँ प्राप्त कर लीं थीं। तुलसी बाबा ने भी इस बात की पुष्टि की है- "गुरु गृह गए पढ़न रघुराई। अल्पकाल विद्या सब पाई।" जब भगवान का यह हाल था तब आज के छात्र की क्या औकात।

भारत जैसे शास्त्र प्रधान देश में ट्यूशन-शास्त्र पर अभी तक एक भी ग्रंथ नहीं है। शास्त्रों की बखिया उधेड़ने वालों के लिए यह डूब मरने की बात है। इस प्रक्रिया के कुछ सोपान निश्चित किए जा सकते हैं।

विद्वत्ता से प्रभावित होकर ट्यूशन पढ़ने वाले छात्रों को उच्च श्रेणी में रखा जा सकता है इनका शास्त्रीय विवेचन करना व्यर्थ है। इनके अतिरिक्त ट्यूशन घेरने के लिए छात्रों पर फंदा डालना पड़ता है। इसके कई तरीके हैं- कक्षा में देर से आना, कक्षा में पहुँचकर माथा पकड़कर बैठ जाना। एकाध सवाल समझाकर सारे कठिन सवाल गृह-कार्य के रूप में देना। यदि छात्र कक्षा में कुछ पूछे तो - 'कक्षा के बाद पूछ लेना' कह देना। कक्षा के बाद पूछे तो 'घर आओ तब ही ढंग से बताया जा सकता है।' दूसरी विधि-छमाही परीक्षा में चार-पाँच को छोड़ बाकी छात्रों को फेल कर देना। फिर देखिए सुबह-शाम छात्रों की भीड़ गुरु-गृह में दृष्टिगोचर होने लगेगी।

इस प्रकार जब दूकान चल निकलती है तो दो शिफ्ट सुबह में वास्तविक पढ़ाई शुरू हो जाती है। गुरु जी पढ़ाते समय विभिन्न दैनिक एवं पारिवारिक कार्यों को भी संपन्न करते रहते हैं - एक पंथ दो काज। विनाशक जी छुटके की रुलाई रोकने के लिए सिंहासन छोड़कर कई बार घर के अंदर जाते हैं। इसी बीच बाथरूम में जाकर नहाना, नहाने के बाद अगरबत्ती जला कर पूजा करना और बीच-बीच में दिशा निर्देश भी करते जाते हैं - महेश तुम गुणनखंड के आठ प्रश्न अभी हल करो।' श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ संतन की सेवा' और सोहन तुम वृत्त के सभी प्रश्न कर जाओ। इस प्रकार कार्यरत रहने से ये गुरु-शिष्य विद्यालय में देर से पहुँच कर गौरव प्राप्त करते हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि छात्रों के हृदय से सेवा-भावना का लोप हो रहा है। इन गैर सरकारी 'कुटीर शिक्षा केंद्रों' का निरीक्षण करें तो उन्हें अपनी विचारधारा बदल देनी पड़ेगी। सुबह के समय एक छात्र डेरी से दूध ला रहा है। दूसरा गुरु-पुत्र को विद्यालय पहुँचा रहा है। तीसरा गुरु पत्नी की सेवा में जुटा हैं और सिल पर मसाला पीस रहा है, चौथा अंगीठी लगाने में सहायता कर रहा है। चक्की से गेहूँ पिसवा कर लाना, सब्ज़ी मंडी से सब्ज़ी लाना, धोबी के यहाँ मैले कपड़े भिजवाना, गुरु जी के लिए दूकान से बीड़ी-पान ख़रीद कर लाना इन सभी कार्यों को छात्र ही संपन्न करते हैं। इस प्रकार शिक्षा में श्रम अनायास ही जुड़ जाता है।

यदि सेवा भावना से गुरु प्रसन्न है तब भगवान भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। गुरु जी अगर नाराज़ है तो भगवान भी सहायता नहीं कर सकते। कबीर अनपढ़ भले ही रहे हों परंतु नासमझ नहीं थे। वे जानते थे कि शिष्य को व्यावहारिक होना चाहिए। इसलिए वे सबसे गुरु के चरण छूने की सलाह देते हैं। गुरु और भगवान की मिली भगत से वे अच्छी तरह परिचित थे। यही जानकर उन्होंने इशारा किया था- 'कह कबीर गुरु रुठते हरि नहिं होत सहाय।' ज्ञान ध्यान स्नान के लिए एकांत होना आवश्यक है। कक्षा की भीड़-भाड़ में ज्ञान-चर्चा करना व्यर्थ है। आज हमारी सरकार शिक्षा-नीति के परिवर्तन पर बहुत दे रही हैं। मेरी सलाह कोई माने तो 'हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा चढ़े।' सब विद्यालय बंद करा दिए जाएँ। भवन-निर्माण, फर्नीचर, वेतन सभी खर्च समाप्त। कुटीर शिक्षा-केंद्र चलाने के लिए धाकड़ अध्यापकों को प्रोत्साहित किया जाए।

ट्यूशन धौंकने वाले अध्यापक से लाभ ही लाभ है। अपने प्रिय छात्र के लिए अध्यापक को कम पापड़ नहीं बेलने पड़ते हैं। परीक्षा कक्ष में नकल की विशेष छूट देना, पेपर आउट करना, कॉपी में नंबर बढ़ाना या घर जाकर कॉपी में लिखवाना। लिखित परीक्षा में दस प्रतिशत नंबर लाने वाले छात्र को प्रयोगात्मक परीक्षा में नब्बे प्रतिशत अंक दिलवाना आदि बहुत-सी सेवाएँ सम्मिलित हो जाती हैं। बाहर से आने वाले परीक्षक को अपने घर से दूर रखना लेकिन किसी जाल में फँसे शिष्य के घर से जाकर द्राक्षासव के साथ मुर्ग-मुसल्लम का भोग कराना भी आवश्यक हो जाता है।

विद्यालय की दीवारें इनको काटने के लिए दौड़ती हैं। जिस प्रकार चोर को चाँदनी रात अच्छी नहीं लगती इसी प्रकार हरामखोरी न करने वाले शिक्षक इन्हें फूटी आँख नहीं सुहाते। अत: यह अजन्मा लोगों के अज्ञात-नामों के शिकायती पत्र लिखने का पुण्य भी लूटते रहते हैं। अपने मन बहलाव के लिए यह छात्रों के भविष्य को उजाड़ने वाले पुण्य पुरुषों का लीडर बनकर अपने हीनभाव ग्रस्त मन को सांत्वना देते हैं। इनकी 'राणा की पुतली फिरी नहीं चेतक तब मुड़ जाता था' वाली हालत रहती हैं। दूर से यदि प्राचार्य की परछाई भी दिखाई दे गईं तो ये चुपचाप कक्षा में पदार्पण कर जाते हैं। वैसे कक्षा में इनके रहने या न रहने से कोई अंतर नहीं आता है क्योंकि 'जैसे कंता घर रहें तैसे रहें बिदेस।'

यदि कोई सनकी अध्यापक इनके धंधे-पानी में बाधा बनता है तो ये करैत साँप बनकर उसे डसने का मौका ढूँढ़ते रहते हैं। मुँह का ज़ायका बदलने के लिए ये चुगली का भी सहारा लेते हैं लेकिन इनकी हालत भुस-भरे कटड़े से आगे नहीं बढ़ पाती है जिसको दूध निकालने के लिए भैंस के आगे रख दिया जाता है। भला हो शिक्षा बोर्ड वालों का यदि अर्ध-वार्षिक परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों को बोर्ड की परीक्षा से वंचित करने का नियम दिया जाए। इससे ट्यूशन के कुटीर उद्योग को प्रोत्साहन मिलेगा तथा धंधे की गिरती हुई प्रतिष्ठा को बल मिलेगा।

(साभार)

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     अथ श्वान पुराणम्   सीताराम गुप्ता

         हमारी कॉलोनी में कई संभ्रांत परिवार रहते हैं। उनमें से अध्किांश वेफ पास 'जैकी', 'रो8ाी' अथवा 'टाइगर' अवश्य होता है। वास्तव में जिन परिवारों में एक 'जैकी', 'रो8ाी' अथवा 'टाइगर' होता है वही संभ्रांत परिवारों की श्रेणी में आते हैं। संभ्रांतता का प्रतीक है 'जैकी' अर्थात् एक अदद वुफत्ता। ऐसे संभ्रांत परिवार या परिवार का कोई सदस्य या नौकर जब भी घर से बाहर वफदम रखता है अपने प्रिय 'जैकी' अथवा 'रो8ाी' को साथ ले जाना नहीं भूलता। जिस प्रकार गाड़ी चलाने वाले वेफ लिए मोटर ड्राइविंग लाइसेंस, कार्यालय में काम करने वाले वेफ लिए आइडेंटिटी कार्ड अथवा परीक्षा में बैठने वाले वेफ लिए रोल नंबर की 8ारूरत होती हैऋ एक संभ्रांत पुरुष अथवा महिला को अपनी सही पहचान बनाए रखने वेफ लिए 'रो8ाी' अथवा 'जैकी' को साथ रखना अनिवार्य है।

सुबह दूध् की लाइन में लगते समय 'जैकी' की 8ांजीर हाथ में हो अथवा 'रो8ाी' का साथ हो तो दूध् की ख़रीदारी का म8ाा ही और है। लोगों पर आपका और आपवेफ 'जैकी' या 'टाइगर' का इतना रौब पड़ता है कि आपको देखकर लोग काई की तरपफ पफट जाते हैं और आप लाइन में जहाँ चाहें आराम से खड़े हो सकते हैं। इसमें आप दोनों वेफ रौब वेफ साथ-साथ वुफत्ते वेफ भय का प्रभाव 8यादा काम करता है। दुकानदार भी प्राय: ऐसे संभ्रांत ग्राहकों को जल्दी निपटाने का प्रयास करते हैं क्योंकि दुकान वेफ सामने पहुँचकर ही इनवेफ श्वान महाशय को लघुशंका अथवा दीर्घशंका की हाजत होती है।

वैसे तो हमारे यहाँ लोग आपस में बहुत कम मिलते-जुलते हैं क्योंकि उफपर वाला नीचे वाले को नहीं जानता तथा दाएँ वाला बाएँ वाले को नहीं पहचानता लेकिन वो लोग जिनवेफ हाथों में अपने-अपने जैकियों की 8ांजीरें बँध्ी होती हैं घंटो सड़कों वेफ किनारे खड़े अपने-अपने जैकियों की वुफलीन नस्लों की विशेषताओं पर प्रकाश डालते रहते हैं। श्वानों की विभिन्न नस्लों और प्रजातियों वेफ साथ-साथ बदलते मौसम में इनकी देखभाल और उपयुक्त आहार पर भी विशद चर्चा इन सेमिनारों में की जाती है। देश वेफ नागरिकों को एक सूत्रा में बाँध्ने में सहायक है श्वान की ये विभिन्न प्रजातियाँ।

जितने खूबसूरत या ख़तरनाक वुफत्ते उतने ही खूबसूरत या ख़तरनाक इनकी प्रजातियों और वुफत्तों वेफ नाम भी। वुफछ नस्लों वेफ नामों पर ग़ौर पफरमाइये : ग्रेट डेन, डैश हाउण्ड, बेसेंट हाउण्ड, डाल्मेशियन, अल्सेशियन, सेंट बर्नार्ड, लेब्राडोर रेटरिवर, डॉबरमैन, बुलमास्टिपफ, इंग्लिश कोकर स्पैनियल, जर्मन शेपर्ड, आयरिश वुल्पफ, प्रैंफच बुलडॉग, बॉक्सर, न्यू पफाउण्डलैंड, शिवावा, पिकनीस, बीगल्स, पिफटमी, स्पिट्8ा, चोचो, लासा एप्सो, चीहुआहुआ तथा और न जाने कितनी प्रजातियाँ और नस्लें। ग्रेटडेन या बुलडॉग नाम से भय लगता है। उफपर से 'टाइगर' नाम रखकर रही-सही कसर भी पूरी कर दी। पामेरियन नस्ल की ख़ूबसूरत मादा का नाम रो8ाी रख दिया जाए तो नस्ल वेफ साथ नाम में भी न8ााकत और नपफासत का अहसास होता है।

अब सिलेब्रिटीस और उनवेफ डॉग्स वेफ बारे में भी थोड़ी चर्चा हो जाए। पिछले दिनों पैरिस हिल्टन सबसे ख़राब सिलेब्रिटी वुफत्ता मालकिन चुनी गईं जबकि सबसे अच्छी सिलेब्रिटी वुफत्ता मालकिन का खिताब मिला ब्रिटिश सिंगर 8ाॉस स्टोन को। 8ार, जोरू और 8ामीन पर जंग छिड़ते तो देखा है पर पिछले दिनों ब्रिटनी स्पीअर और पेरिस हिल्टन वेफ बीच अपने-अपने वुफत्तों को लेकर जंग छिड़ गई। ब्रिटनी स्पीअर ने कहा कि उसवेफ 'बिट-बिट', 'लेसी-लू' और 'लकी' नामक तीन चीहुआहुआ वुफत्ते पेरिस हिल्टन वेफ टिंकरबैल से 8यादा क्यूट हैं। मुझे वुफत्तों वेफ बारे में इतनी अध्कि जानकारी होते हुए भी ये नहीं बता पाया कि टिंकरबैल वुफत्ते का नाम है या प्रजाति।

एक बार एक ख़ूबसूरत बला वेफ हाथ में एक पिल्ले की 8ांजीर देखकर मैंने वुफत्तों सम्बन्ध्ी अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने वेफ लिए कहा, ''आपका 'पामेरियन' तो बड़ा खूबसूरत है!'' अपनी ख़ूबसूरती की ग़ा8ा गिराते हुए नाक-भौं सिकोड़कर उसने कहा, ''पामेरियन! नो-नो, इट'8ा नोट पामेरियन बट अमेरिकन प्राइड'' और मोनिका लेविंस्की की तरह अकड़ती हुई चली गई पर मेरी सिट्टी-पिटटी गुम हो गई। मुझे पता चल गया कि वुफत्तों वेफ मामले में मैं कितना अनाड़ी और अल्पज्ञानी हूँ। 'अमेरिकन प्राइड' प्रजाति का नाम सुन कर मुझे अमेरिका वेफ प्राइड अमेरिकी राष्ट्रपति बुश वेफ वुफत्ते 'स्पाट' की याद आ गई। कितना 8ाहीन था 'स्पॉट'! व्हाइट हाउस की ओर से 8ाारी एक विज्ञप्ति में बताया गया कि 'स्पॉट' की असामयिक मृत्यु से पूरा बुश परिवार दुखी है। 'स्पॉट' बुश सीनियर वेफ कार्यकाल वेफ दौरान व्हाइट हाउस में पैदा हुआ था। वह इंग्लिश स्प्रिंगर स्पाइनल प्रजाति का वुफत्ता पंद्रह वर्ष का था। अब बुश वेफ पास वेफवल दो पालतू वुफत्ते रह गए हैं। उम्मीद है 'स्पॉट' की कमी को पूरा करने वेफ लिए कोई न वुफत्ता अवश्य ही व्हाइट हाउस में जन्म लेगा अन्यथा व्हाइट हाउस वेफ बाहर भी अच्छी प्रजाति वेफ वपफादार वुफत्तों की कमी नहीं।

वे लोग जिनवेफ यहाँ 'जैकी' या 'रो8ाी' नामक प्राणी मौजूद होता है बड़े प्रगतिशील विचारों वेफ होते हैं। प्रेम-व्रेम वेफ मामले में अपने बच्चों की चॉयस में दख़लंदा8ाी नहीं करते लेकिन क्या मजाल कि उनका 'जैकी' किसी देसी वुफतिया की तरपफ ऑंख उठाकर भी देख ले, उनकी 'रो8ाी' किसी लोकल वुफत्ते वेफ साथ मुँह काला करवेफ घर में घुस आए। ख़ुद सारी सर्दियों खों-खों करते पिफरेंगे, लालइमली वेफ मटमैले मपफलर से टपकती नाक को रगड़-रगड़ कर बंदर-सी लाल कर लेंगे लेकिन डॉक्टर वेफ पास जाने का नाम नहीं लेंगे पर क्या मजाल कि अपने 'जैकी' या 'रो8ाी' को हिचकी भी आ जाए। छींक आना तो दूर की बात है। जरा सी सर्दी हुई नहीं कि जैकी का शाम वेफ बाद घर से बाहर निकलना बंद। 'जैकी' या 'रो8ाी' को सीने से लगाए सारी रात र8ााई में गु8ाार देंगे। जैकी या रो8ाी चाहे जितना भी वुफनमुनाएँ उनकी पकड़ ढ़ीली नहीं होती। प्रफॉयड महोदय वेफ अनुसार विपरीत लिंग वेफ मानव और श्वान वेफ बीच यह पकड़ अपेक्षाकृत अध्कि दृढ़ होती है। वैफसा अद्भुत प्रेम है मानव का श्वान वेफ प्रति। काश! गलियों में घूमने वाले असंख्य आवारा वुफत्तों वेफ नसीब में भये सब होता।

आजकल जिस प्रकार 8ाुकाम, बुख़ार, पेटदर्द आदि का इलाज करने वाले डॉक्टरों की अपेक्षा कार्डियोलॉजिस्ट ;जिनकी पफीस सुनकर दिल दहल जाता हैद्ध अथवा ईएनटी विशेषज्ञों ;जो नाक, कान व गले की शल्य चिकित्सा करने की अपेक्षा मरी8ा का नाक, कान व गला काटने में 8यादा सि(हस्त हैंद्ध की बाढ़ आई हुई है उसी प्रकार सामान्य पशुचिकित्सकों की अपेक्षा श्वान विशेषज्ञ बहुतायत में मिलते हैं। स्त्राीरोग विशेषज्ञों ने जहाँ सुरक्षित गर्भपात वेफन्द्र खोलकर इस क्षेत्रा में व्रफांति ला दी है वहीं उत्साही महिला श्वान-चिकित्सकों से अपेक्षा की जाती है कि वे श्वान प्रसूतिवेफन्द्रों वेफ साथ-साथ श्वान गर्भपात वेफन्द्रों की भी स्थापना करें जहाँ देसी वुफत्तों की 8ाोर-जबरदस्ती का शिकार उच्च नस्ल की 'रो8ाी' अथवा 'स्वीटी' को अनचाहे गर्भ से छुटकारा दिलाया जा सवेफ तथा जन्म से पूर्व लिंग निर्धरण वेफ लिए आवश्यकतानुसार भ्रूण परीक्षण भी किया जा सवेफ।

पश्चिमी देशों की महिलाओं विशेष रूप से पिफल्मी अभिनेत्रिायों का श्वानप्रेम किसी से छिपा नहीं है। एक खूबसूरत श्वान-प्रेमी महिला का अपने पति से मात्रा इसलिए तलाक हो गया कि वो संभ्रांत महिला सुहागरात वाले दिन भी अपने पति की अपेक्षा अपने वुफत्तों वेफ साथ ही आराम पफरमाने की 8ािद पर अड़ी रही। वो शायद वुफत्तों वेफ स्वभाव वेफ साथ-साथ गधें वेफ स्वभाव से भी अवश्य ही बख़ूबी वाविफपफ रही होगी अन्यथा ऐसी 8ािद कभी न करती लेकिन गध्े जैसे निरीह प्राणी की इतनी उपेक्षा भी ठीक नहीं।

श्वान-चर्चा चली है और गधें का भी 8ािव्रफ आ गया है तो अपने एक श्वानप्रेमी मित्रा वेफ जीवन की एक घटना का वर्णन अवश्य करूँगा। एक दिन जब सुबह-सुबह मित्रा मेहर सिंह अपने प्रिय बुलडॉग वेफ साथ रिज पर घूम रहे थे तो उनवेफ पुराने साथी जौहर सिंह मिल गए। जौहर सिंह छूटते ही बोले, ''अरे सुबह-सुबह इस गध्े वेफ साथ कहाँ जा रहे हो?'' मेहर सिंह ने कहा कि ये क्या कह रहे हो? ये गध नहीं वुफत्ता है। इस पर जौहर सिंह ने कहा, ''अबे चुप! तुझसे कौन कमबख्त बात कर रहा है?'' वुफत्ते की ओर इशारा करते हुए उसने कहा कि मैं तो इससे पूछ रहा था।

मेरे एक मित्रा मुझ जैसे निरीह प्राणी से तो विशु( हिंदी मेें वार्तालाप करते हैं लेकिन अपनी 'सिल्की' से सारी गुफ्र.तगू अंग्रेजी मेें ही करते हैं। प्योर अमेरिकन इंग्लिश में। जब भी मुझसे मिलने आते हैं 'सिल्कीको साथ लेकर ही आते हैं और आते ही आदेश देते हैं कि 'सिल्की' वेफ आराम करने वेफ लिए चारपाई पर एक मुलायम सी चादर बिछा दो। 'सिल्की' वेफ लिए अपेक्षित व्यवस्था होते ही 'सिल्की' को संबोध्ति करेगे, ''सिल्की गेट इन टू दि बेड एंड रिलैक्स।'' और सिल्की एक आज्ञाकारी बच्चे की भाँति चुपचाप ऑंखें बंद करवेफ सोने का उपव्रफम करने लगती है। एक बार में इन मित्रा को एक कार्यव्रफम वेफ लिए आमंत्रिात करने गया। मैंने कहा कि आप चारों सादर आमंत्रिात हैं। इतना सुनते ही मित्रा आपे से बाहर हो गए और ग़ुस्से में पूछा, ''एंड व्हाट अबाउट सिल्की?'' मैंने किसी तरह बात संभाली। ये महाशय ख़ुद तो साइकिल पर ही आते-जाते हैं लेकिन 'सिल्की' को घुमाने वेफ लिए भाभी जी कार में ले जाती हैं। दरअसल कार ली ही 'सिल्की' वेफ लिए है।

वुफत्तों, मोटरगाड़ियों तथा पार्कों का भी गहरा आपसी रिश्ता है। शाम वेफ समय पार्कों में नवविवाहिताएँ जहाँ अपने पतियों वेफ हाथों में हाथ डाले घूमती न8ार आती हैं वहीं अनेक विवाहाकांक्षिणी नवयौवनाएँ अपने-अपने जैकियों की 8ाजीरें थामे इस कमी को दूर करने का प्रयास करती न8ार आती हैं। वुफछ अध्कि भावुक विफस्म वेफ युवक अपनी 'रो8ाी', 'स्वीटी' या 'लकी' को गोदी में उठाकर ही मोटरगाड़ी से बाहर निकलते हैं और जब तक पार्वफ की मखमली घास की नर्म-मुलायम चादर तक न पहुँच जाएँ उसे गोदी से उतरने ही नहीं देते।

जिन संभ्रात लोगों वेफ पास कारें नहीं भी होती हैं वे अपने-अपने श्वानों को स्वूफटर पर ही सुबह या शाम की सैर कराने ले जाते हैं ठीक उसी प्रकार जैसे बंदर का तमाशा दिखाने वाले अपने एक जोड़ी बंदरों को साइकिल वेफ वैफरियर पर बिठाकर अपने कर्मक्षेत्रा तक ले जाते हैं लेकिन कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली। एक श्वान स्वामी की तुलना एक कलंदर से कभी नहीं की जा सकती।

सीताराम गुप्ता

एड़ी-106-सी, पीतमपुरा,

 

  

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                           प्रबंध सम्पादक : अंजली सहाय सम्पादक : डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल