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कहीं तो होंगे
अभयारण्य
जब उलट-पलट गई हो सारी कायनात
हवा के
शोर
में डूबी घायल चिडियों की चहकार .
कौन जाने कितने
पेड़ बच रहे
होंगे
कितने-क परिन्दे रहे होंगे सलामत
कितनी झाड़ियां
प्रजातियां
कौन-कौन-सी शेष रह गई होंगी
इस अशान्त
बियाबान में !
सूक्ष्म जीव-जंतुओं की नियति को
यदि छोड़ भी दिया जाए उन्हीं के हाल
पर,
तब भी
अवेरन-संवारने
को
बहुत कुछ बच गए होंगे
संभावित जीवन के अवशेष
इस तूफान में।
इस सामने दीखते
घायल
बरगद की छाँव में
कितने शरणागतों को मिला होगा आसरा
जिसे पुरखों ने बडे
चाव से
उगाया था बस्ती के बीचों-बीच
ऐसे न जाने कितने और दरख्त
उखड़कर बह गए होंगे
समय के टूटते प्रवाह में !
परिन्दे नहीं जानते कि समय
कैसा बरताव करेगा उनके साथ
जब सारे हलके में कहर मचा होगा
वे उड़ते रहेंगे क्षितिज के आर-पार
जहां
हरे-भरे खेत होंगे -
लहलहाती फसलें होंगी
ढलानों पर दूर-दूर तक पसरी होगी
दूब
कहीं तो होंगे अभयारण्य
दुर्लभ पक्षियों के समूह
अचानक उड़ जाने का अनचाहा अहसास
इन रूखे- सूखे दरख्तों की देह में
!
’हरी दूब का सपना’ से साभार
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सतपुड़ा के जंगल
सतपुड़ा के घने जंगल ।
नींद में डूबे हुए-से
ऊंघते
अनमने जंगल।
झाड़
ऊंचे
और नीचे
चुप खड़े हैं
आंख मीचे,
घास चुप है,काश
चुप है
मूक
शाल पलाश
चुप है,
बन सके तो
धंसों
इनमें,
धंस
न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए -से
ऊंघते
अनमने जंगल।
सड़े पत्ते,
गले पत्तें,
हरे पत्ते,
जले पत्ते,
वन्य का पथ
ढंक
रहे -से,
पंक दल में पले पत्ते,
चलो इन पर चल सको तो,
दलो इनको दल सको तो,
ये घिनौने- घने जंगल,
नींद में डूबे हुए -से,
ऊंघते
अनमने जंगल।
अटपटी उलझी लताएं,
डालियों को खींच खाएं
पैरों को पकड़ें अचानक,
प्राण को कसलें,
कपाएं,
सांप-सी
काली लताएं,
बला की पाली लताएं
लताओं के बने जंगल,
नींद में डूबे हुए -से
ऊंघते
अनमने जंगल।
मकड़ियों के जाल मुंह पर
और सिल के बाल मुंह पर,
मच्छरों के
दंश
वाले
दाग काले-लाल मुंह पर,
वात झंझा वहन करते,
चलो इतना सहन करते,
कष्ट से ये सने जंगल,
नींद में डूबे हुए-से
ऊंघते
अनमने जंगल।
अजगरों से भरे जंगल
अगम,गति
से परे जंगल,
सात-सात-पहाड़ वाले,
शेर वाले बाघ वाले,
गरज और दहाड़ वाले,
कंप से कनकने जंगल,
नींद में डूबे हुए-से
ऊंघते
अनमने जंगल।
इन वनों के खूब भीतर
चार मुर्गे,चार
तीतर
पाल कर
निश्चिंत्त
बैठे,
झोंपड़ी पर फूस डाले
गोंड तगड़ें और काले
जबकि होली पास आती,
सरसराती घास गाती,
और महुए से लपकती,
मत्त करती बास आती,
गूँज उठते ढोल इनके,
गीत इनके ढोल इनके।
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए-से
ऊंते
अनमने जंगल।
जागते
अंगड़ाइयों में
खोह खड्डों खाइयों में
घास पागल,
काश
पागल,
लता पागल,
वात पागल,
डाल पागल,
पात पागल,
मत्त मुर्गे और तीतर,
इन वनों के खूब भीतर।
क्षितिज तक फैला हुआ-सा
मृत्यु तक मैला हुआ-सा,
क्षुब्ध काली लहर वाला,
मथित,
उत्थित जहरवाला,
मेरू वाला,शेष
वाला,
शंभु और सुरेश
वाला,
एक सागर जानते हो
?
उसे कैसा मानते हो
?
ठीक वैसे घने जंगल,
नींद में डूबे हुए-से
ऊंघते
अनमने जंगल।
धंसों
इनमें डर नहीं है
मौत का यह घर नहीं है,
उतरकर बहते अनेकों,
कल-कथा कहते अनेकों,
नदी निर्झर और नाले,
इन वनों ने गोद पाले,
लाख पंछी सौ हिरण-दल,
चांद
के कितने किरन दल,
झूमते वन-फूल फलियॉ,
खिल रहीं अज्ञात क
हरित दूर्वा,रक्त
किसलय,
पूत,
पावन,पूर्ण
रसमय,
सतपुड़ा के घने जंगल,
लताओं के बने जंगल ।
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पुरखों ने मान देवता पूजा है पेड़
को।
जीवन प्रदाता वेद सब कहते हैं पेड़
को॥
गीता में अपने
शिष्य
को अपनी ज़ुबान
से।
अपना ही रूप कृष्ण ने बताया है पेड़
को ॥
ऋषियों ने ध्यान- जप किया बस्ती को
छोड़ के।
दातार सच्चे ज्ञान का माना है पेड़
को ॥
धरती के गहने देख सब गहनों के
पारखी।
धरती का गहना एक बस कहते हैं पेड़
को ॥
देता है पेड़ फूल-फल छाया
ओ
बूटियॉ।
इस वजह दर्जा देव का दिया है पेड़
को॥
मिट जाये कही वजूद ना दरख्त
का
ए
अशोक।
पुरखों ने देके जान बचाया है पेड़
को ॥
ए-11,
विद्युत नगर,
गहलोत के बंगले के पास,
अजमेर रोड़,जयपुरिकिया *
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खामोश
विचार |
श्रीमती रेणु
वशिष्ठ |
विचार खामोश गति से दौड़ते हैं
मीलों
मील प्रति घंटा की रफ्तार से।
जहन में आई हर बात बदलती है
रफ्तार विचार की ।
कहीं कोई सरसराहट भी
सुनाई नहीं देती विचार की ।
किस तरह फिसलते रहते हैं
इस पार से उस पार
दूरी तय करते हैं बेअंदाज।
कभी हवा में उड़ते हैं
तो कभी मछली से तैरते हैं
कदम दर कदम चलते भी हैं
तो बालू-सा
स्पर्श
पा रेंगते हैं।
हर तरह के मार्ग तय करते हैं
बंजर,पथरीली
पहाड़ियॉ या कॅटीली झाड़ियॉ
सिकुड़कर,
सिमटकर,
फैलकर निकल ही जाते हैं
ऑखों को मिचमिचाकर
जुबां
की नाव पर बैठ बन जाते हैं बात
लेखनी की पतवार चला रच जाते हैं
किताब।
ए-679,
विधुत नगर,
अजमेर रोड़,जयपुर
E- Mail –
Renu Vashishtha @ Yahoo. co.in.
हुजूर,
मैं गीत बेचता हूं।बेचता
हूं ;
मैं स▲▲
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क़िसिम के गीत
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बेचता हूं।
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