अक्टूबर 2007

    

          

प्रकृति और साहित्य को समर्पित

     
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  सम्पादकीय !       

 

          

 

   हार की जीत या जीत की हार?

 

पता नहीं अब लोगों को उस उम्दा कहानीकार सुदर्शन का नाम भी याद है या नहीं! अपने महान रचनाकारों के बारे में हमारी स्मृति कुछ अधिक ही क्षीण है. एक ज़माना था जब लगभग हर पाठ्यक्रम में सुदर्शन की कहानी ‘हार की जीत’ पढाई जाती थी. उस ज़माने के किसी भी पढे लिखे इंसान से आप ज़िक्र करें बाबा भारती का, और वह एकदम से पूरी कहानी सुना देगा. किसी गांव में बाबा भारती नाम का एक साधु रहता था, उसके पास एक शानदार घोडा था. एक डाकू ने उस घोडे को देखा तो उसमे मन में उस घोडे को पाने की इच्छा बलवती हो उठी. उसने बाबा जी से विनम्रता पूर्वक घोडा मांगा, लेकिन वह घोडा बाबा जी को जान से भी ज़्यादा प्यारा था. डाकू भी अपनी तमन्ना के आगे बेबस था. आखिर उसने एक दिन एक दीन-हीन का वेष बनाया और छल से बाबा जी से वह घोडा हथिया लिया. बाबा जी को घोडा छिन जाने से भी अधिक अफसोस इस बात का था डाकू के इस कृत्य से लोगों का विश्वास भलमनसाहत से उठ जाएगा. उन्होंने डाकू से प्रार्थना की कि घोडा भले ही वह रख ले लेकिन किसी से इस बात का ज़िक्र न करे कि घोडा उसने किस छल से प्राप्त किया है.

 

यह कहानी मुझे आज बरबस ही याद आ गई.

 

दिन में एक मित्र का ई मेल आया. ई मेल यह था कि वे विदेश गए हुए हैं, वहां उनके कमरे में चोरी हो गई है, उनके पास कुछ भी नहीं बचा है. बडी मुश्किल से, बहुत जल्दी में वे किसी सायबर कैफे से यह ई मेल कर रहे हैं. मैं उनकी बताई विधि से तीन हज़ार डॉलर उन्हें तुरंत भेज दूं. मेल पढकर मैं एकदम चिंता में पड गया और सोचने लगा कि कैसे उनकी मदद करूं. जिस देश का उन्होंने अपने मेल में ज़िक्र किया था, वहां वे कुछ समय पहले किसी शोध परियोजना के सिलसिले में गए थे, यह मुझे पता था. हो सकता है फिर चले गए हों. मैं भले आदमी के लिए बेहद चिंतित था. चिंता के ही बीच अनायास ही मुझसे उनके घर का फोन नम्बर डायल हो गया. सोचा, भाभीजी से भी बात कर लूं. उस मेल में यह ज़िक्र नहीं था कि उनकी पत्नी भी साथ हैं. मन में था कि भाभीजी तो एक उच्च पदस्थ अधिकारी हैं, उन्होने भी तो अपने पति के इस संकट के बारे में कुछ सोचा-किया ही होगा. लेकिन यह क्या! फोन उन मित्र ने ही उठाया और छूटते ही बोले, तो आपको भी मिल गया! अब अवाक रह जाने की बारी मेरी थी. जैसे पलक झपकते ही सब कुछ साफ हो गया. यह भी उसी तरह का एक ई मेल फ्रॉड है जिस तरह के फ्रॉड के बारे में काफी कुछ पढता रहा हूं. फिर उन मित्र ने ही बताया कि किस तरह कुछ दिन पहले उनके पास एक मेल आया था कि आपका ई मेल अकाउण्ट नवीनीकृत किया जा रहा है अत: अपना पासवर्ड भर दें.. और अब यह काण्ड. निश्चय ही किसी उस्ताद ने उनके ई मेल अकाउण्ट में दर्ज़ सारी सूचनाओं को खंगाला होगा, यह पता किया होगा कि वे कुछ दिन पहले उस देश गये थे, और उनकी  एड्रेस बुक में दर्ज़ पतों पर यह करुणा भरा मेल भेज दिया होगा. सौ दो सौ में से एक दो भी अगर द्रवित होकर ‘मदद’ कर दें तो उसके लिए तो बहुत है.

कहना अनावश्यक है कि किसी अज्ञात दुष्ट का यह व्यवहार सुदर्शन की कहानी की आशंका की तरह भलाई पर से विश्वास उठाने वाला कृत्य है. पर उस दुष्ट को इस बात से क्या लेना-देना? उसे तो अपने फायदे से मतलब रहा होगा. या यह भी हो सकता है कि उसने इस नज़रिए से सोचा ही न हो. वैसे, हम भी कब सोचते हैं! क्या हम अपने जीवन में जाने-अनजाने इस तरह की अनेक हरकतें नहीं करते हैं? क्या हम सब का दामन एकदम पाक-साफ ही है? अपने दैनन्दिन व्यवहार में हम सब इस तरह की छोटी-बडी हरकतें करते ही हैं. और अगर दैनन्दिन जीवन से बाहर निकल कर काम धन्धे की, व्यापार नौकरी वगैरह की बात करें तो कुछ अधिक ही हरकतें हम करते हैं. हम दूसरों से तो उम्मीद करते हैं कि वे एकदम ईमानदार रहेंगे, लेकिन अपने लिए बहुत सारी गलियां निकालने में हमें कोई संकोच नहीं होता. क्या करें, महंगाई इतनी है, धन्धे में तो यह करना ही पडता है, आदि.

 

लेकिन आजकल छल के रूप बहुत बदल गए हैं. कभी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने एक बहुत बढिया वाक्य लिखा था. रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के बहुत बडे लेखक हुए हैं. हिन्दी साहित्य का पहला महत्वपूर्ण इतिहास भी उन्होंने ही लिखा और उसके बिना आज भी लोगों का काम नहीं चलता है. तो इन्हीं राम चन्द्र शुक्ल ने अपने प्रसिद्ध निबन्ध ‘कविता क्या है’ में लिखा कि सभ्यता की वृद्धि के साथ-साथ ज्यों-ज्यों मनुष्यों के व्यापार बहुरूपी और जटिल होते गए त्यों-त्यों उनके मूल रूप बहुत कुछ आच्छन्न होते गए. भावों के आदिम और सीधे लक्ष्यों के अतिरिक्त और-और लक्ष्यों की स्थापना होती गई, वासनाजन्य मूल व्यापारों के सिवा बुद्धि द्वारा निश्चित्त व्यापारों का विधान बढता गया. हालांकि शुक्ल जी जिस सन्दर्भ में यह बात कह रहे हैं, वह थोडा अलग है, हम यहां उस सन्दर्भ को अलग रखते हुए इस कथन को देखें तो पाएंगे कि आज वाकई ऐसा हो रहा है. आज कोई डाकू किसी बाबा भारती से छल से उसका घोडा नहीं हथियाता, आज तो वह आपका ई मेल अकाउण्ट हैक करके, आपका पास वर्ड या क्रेडिट कार्ड विवरण जुटाकर आपका धन हथियाता है. तरीका बदल गया है. परिणति तो वही है. और अगर परिणति वही है, तो मूल चिंता भी वही होनी चाहिए जो कहानी में बाबा भारती की थी, कि अगर लोगों को पत चल गया कि तुमने इस तरह मेरा घोडा छीना है तो लोग गरीबों पर दया करना छोड देंगे.

 

आज जब ई मेल में ऐसा कोई सन्देश आता है तो सबसे पहले मेरा ध्यान इसी बात की पडताल करने की तरफ जाता है कि वह असल भी है या नहीं. मदद करने का भाव पीछे रह जाता है. और ई मेल की क्या बात करें. अगर मैं कहीं जा रहा हूं और कोई मुझसे लिफ्ट मांगता है तो मेरा एक मन लिफ्ट देने को कहता है तो दूसरा मन आगाह करता है कि कहीं यह मुझे लूटने, ब्लैक मेल करने की कोई चाल न हो, और मैं बगैर लिफ्ट दिए, हालांकि देना चाहता हूं, देने में कोई असुविधा भी नहीं होनी है, सीधे निकल जाता हूं. इस तरह किसी एक का किया छल कई अन्यों के लिए सहायता के निषेध का कारण बन जाता है. और इस तरह दुनिया अच्छी से बुरी होने लगती है.

 

सवाल यह है कि क्या इस सारे माहौल में हमारी कोई भूमिका हो सकती है? क्या छल करने वाले छल करते जाएंगे, लुटने वाले लुटते जाएंगे और लोग अपने दया-करुणा-सहायता के स्वाभाविक धर्म और स्वभाव से विचलित होते रहेंगे? क्या इस परिडृश्य को बदलने में हमारी कोई भूमिका हो ही नहीं सकती? क्या हमें दर्शक दीर्घा में ही बने रहना है,हम मंच पर कभी नहीं आएंगे? और न सही मंच पर, दर्शक दीर्घा से भी कभी कोई हस्तक्षेप हम नहीं करेंगे?

 

मुझे लगता है, कुछ तो होना ही चाहिए. लेकिन यह कुछ क्या हो, यह मैं आपसे जानना चाहूंगा.

अगर आप अपने विचार लिख कर भेज सकें तो मुझे बहुत खुशी होगी. हम इन्द्रधनुष के आगामी अंकों में आपके विचार प्रकाशित कर खुशी का अनुभव करेंगे.

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                                    --दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

 

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                                         प्रबंध सम्पादक   अंजली सहाय सम्पादक  डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल