अक्टूबर 2007

                           

प्रकृति और साहित्य को समर्पित

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    वन और वन का स्वभाव     विद्यानिवास मिश्र      
  

 

वनों में घूमने के अवसर मुझे बचपन से मिलने लगे तब गांवों के आसपास बाग भी घने होते थे, एकाध बागों के नाम ही 'अधियारी बाग' हुआ करते थे दिन में भी वहां अंधकार रहता था ग़ांव से दो कोस का जंगल शुरू होता था ज़ंगल में अधिकतर साल (साखू) और सागौन के बड़े ऊंचे -ऊंचे पेड़ थे उनके नीचे अनेक प्रकार की वनस्पतियों से ज़मीन ढंकी रहती थी उनके बीच राह बनाना बड़ा कठिन थाद पैर उनमें धंस -धंस जाते थे बीच-बीच में ऊंची बिमौटियां रहतीं ज़ंगल से बिमौटी की माटी शिव का पार्थिकव बनाने के लिए मंगायी जाती ज़ंगल में से पलास के पत्तें मंगाये जाते उनका उपयोग उत्सवों के भोजों में होता जंगल था तो गायों- भैंसों की संख्या अपार थी ग़ाय-भैसें सुबह जातीं,6ााम को लौट आती जंगली घास और वनस्पति खाने से उनका दूध बड़ा स्वादिष्ट होता ज़ंगल में लकड़हारे सूखी लकड़ियां, सूखे गोबर की पिंडियां बटोरकर लाते गांवों में ईधन की कोई समस्या न होती पर हम बच्चों के लिए वन भय का स्थान बना दिया गया था वन में बाघ रहते हैं, अजगर रहते हैं, खा जाते हैं, वन में भूखे भेड़िये रहते हैं, लकड़बग्घे (हुंडार) रहते है ज़ंगल में बिना अभिभावक के जाना वर्जित था ऌसलिए जंगल बड़ा मोहक था ज़ब किसी बूढ़े के साथं जंगल में जाना होता भी था तो उस जंगल में बैलगाड़ी की लीक थी, उसी लीक के साथ-साथ जाना होता क़ानों में जाने कितने स्वर आते मधुमक्खियों के, चिड़ियों के, जानवरों के और दूर से चरनेवाले पशुओं के, सिरताज पशुओं की घंटियों के और सबसे अधिक सन्नाटे के ऌस स्वर संचार से अजीब सिहरन होती थी ऌसके बाद आसपास की वनज्ञस्पतियों के फूलों की अनेक प्रकार की सुरभि का जेसे सम्मोहन प्रणों पर छा जाता था बचपन से ही मुझे पेड़ों की अलग- अलग पहचान करायी गयी यह सब मेरे भीतर संस्कार बन गया है

बाद में रीवा में कई वर्ष रहा, विंध्य के वनों में रहने के अनेक अवसर मिले और भिन्न -भिन्न ऋतुओं में भिन्न -भिन्न केंद्र बनते देखे- फूलों की महक के, मधुमक्खियों की गुनगुनाहट के क़भी सागौन पर बहार आती, वर्षा में माखनी रंग के फलों के लम्बे-लम्बे गुच्छे विहंसने लगते और घनघोर वर्षा को चुनौती देते हुए हंसते रहते क़भी छितवन पर बहार आती और छितवन के फूलनों की मदमाती गंध, सारे जंगल को शरद की शांति में उंमथित कर देती थी क़ीाी आम, कभी महुआ, कभी तमाल,कभी पलास, कभी सिरिस, कीाी अमलतास ओर इसी तरह की अनेक प्रजातियों की अलग-अलग ऋतुएं थीं पूरा ऋतुचक्र जंगल में इसीलिए एक प्रजाति के बाहर से ही भरा रहता था

एक बार रास्ते में घने जंगल में गाड़ी बिगड़ गयी ड़्राइवर ने बहुत कोशिश की, पर बनने को न आये वसंत की चढ़ती दुपहरी कुछ तपने लगी थी प्यास निवारने का कोई साधन नहीं क़रौंदों के झाड़ बहार पर थे, उनके फूल चूम चूमकर हमने प्यास बुझायी एक बार चचाई झरने के नीचे तक दुस्साहस करके काई-भरी चट्टान पर जैसे-तैसे रूपहले धुएं के अंधकार में भीतर के पत्थरों पर उछलते हुए लौटता था पास में जंगली जामुन छोटे-छोटे फलों के गुच्छों से लदे थे हम लोगों ने जीभ लोढ़ा हो जाने की परवाह न करके खूब जामुन खाये

सीधी जिले के सरई (साखू) के जंगलों के भीतर घूमते हुए मुझे प्रकृति का ऐसा स्निग्ध रूप दिखायी पड़ा है कि मुझे वन ही पृथ्वी पर अभय का स्थान लगा है ऌन जंगलों में देखा, कांटों के बीच किसी पेड़ पर झूला डालकर बच्चे सुला दिये जाते हैं मातायें जगल के फल- फूल बीनने निकल जाती है बच्चा अकेले किलकता रहता है ज़ंगली पशु आते हैं, किलकारी का आनंद लेते हुए निकल जाते हैं स्त्रियों को कोई डर नहीं परिश्रम का सौंदर्य उनके चेहरे को उद्भासित करता है वन अपने आप शोभा प्रदान करता है

बाद में अमेरिका में कैलीफ़ोर्निया और ओलम्पिया प्रायद्धीप (वाशिंग्टन राज्य)  में 'बिगसर' और वर्षावन (रेन फॉरेस्ट) में घूमा वर्षावन में धूप साल -भर में कुछ घंटे निकलती है वर्षा रिम-झिम पूरे साल होती रहती है, इसीलिए सुनहरी- हरी कोई की पर्त की पर्त तनों पर, डालों पर, जमीन पर पड़ी रहती है बस पगडंडी निरंतर गरम की जाती रहती है, इसलिए कोई से बची रहती है सुनहरी- हरी आभा से मंडित नुकीली पत्तियोंवाले पेड़ लगता था पिकासों के चित्र से निकले हैं, एकदम स्वप्नलोक से आये हैं और कोई शब्द नहीं बस, कभी-कभी लम्बे एल्क जाति के मृग कोई का आस्वादन करने ऊपर से आ जाते हैं नहीं तो अद्भुत और एकदम अपरूप शंति बिगसर के जंगल में पर्यटकों का आना-जाना अधिक है, इसलिए वहां मौज -मस्ती ही अधिक थी, वनश्री की ओर ध्यान कम अपने देश में देवदारू और चीड़ के वनों में, पूर्वोत्तर भारत के बांस और बेंत के वनों के भीतर यात्रा की है तरह- तरह की मिट्टी ललह, काली, भूरी ओर उसको बांधे हुए अनगिनत पेड़ क़ितना कसकर अपनी मिट्टी ये पेड़ पहाड़ों पर पकड़े रहते हैं, यह पेड़ कटने पर ही पता चलता है ज़ब ज़रा -सी बारि6ा से मिट्टी खिसकनी शुरू हो जाती है ओर नदियां उथली होती जाती हैं, पहाड़ बांझ होते जाते हैं ऌन हिमालयी वनराजियों के उजड़ने का प्रभाव औषधियों की पैदावार पर पड़ रहा है, जलवायु पर पड़ रहा है, पर यह व्यथा -कथा कहने की नहीं पैसा सब लीलता जा रहा है, और नया सौंदर्यविधान बड़े पैमाने पर पैदा करता जा रहा है, जो प्रशासन के नाम से जाना जाता है और अब गांव तक की चमड़ी उससे मंडित होकर अपनी सहज स्निग्धता न्योछावर करने के लिए आतुर है

इन वनों की बात सोचता हूं तो मुझे लगता है कि इस दश का जला स्वभाव ही वन्य रहा है वन ने इस देश का विधान बनाया है वन ने ही इस दे6ा की राजनीति पर तप का अंकुश लगाया है और वन ने ही निराश्रितों को एक ओर पनाह दी है, दूसरी ओर जो सबके आश्रय हैं, उन्हें पनाह दी है वन का स्वभाव है सहज होना, विशवासी होना, कालिदास का शब्द उधार ले, सुगंध होना, एक-दूसरे की गंध पहचानने और पहचानकर उससे भरने का मन बनना हमने वन काटे, वन शायद देर- सबेर उग जायें, पर हमने जिस सहज स्वभाव का विना6ा किया वह स्वभाव कहां से फिर मिलेगा ?

शकुंतला के साथ यही हुआ वह सज-धजकर गयी, दुष्यंत ने उसे नहीं पहचाना शकुतला ने जब उसे झिड़क दिया और बाद में अंगूठी मिली तो दुष्यंत को ग्लानि हुई और उसकी भोगवृति अनुताप में शुद्ध हुई उसे पुन: तपोवन में,सहज रूप में शकुंतला मिली ओर अनुताप का फल मिला सर्वदमन भरत के रूप में, जो अपने बाप को पहचानने को तैयार नहीं है

याद आता है, देश के स्वतंत्र होने पर एक समझदार राजनेता ने कहा था कि हिंदी तो वन शकुंतला है उसे सजाकर राजदरबार के योग्य हम नायेंगे उनके जैसे मतिमानों ने अपनी ओर से पूरी कोशिश की कि हिंदी अंग्रेजी की हू-बू-हू नकल बन जाये; पर तब भी चेरी की चेरी रही, अंग्रेजी मूल भाषा के रूप में बनी रही ग़ांधीजी गये, उनके साथ गयी सादगी ओर राजनीति की पारदशिरता भी राजनीति हो गयी तामझाम चली गयी वन की छवि जिसमें बतास गंध से पागल घूमती थी कस्तूरी मृग की तरह, आ गयी ठंड़ें घर की कृत्रिम सिहरन क़मरे में सातेक आदमी आ जायें तो एक - दूसरे की सांस एक-दूसरे के लिए दूभर जो जाये वन की छाया का भरोसा रहता था तो मनुष्य -मनुष्य के बीच प्रकृति का अंतराल या ठीक-ठाक कहं तरल सेतु बहता रहता था वह अंतराल, वह अवकाश छिन गया है, इतनी सारी ऐश की चीजें उनकी जगह पर आ गयी हैं पर इनमें किसी में भी अपना स्पंदन नहीं है प्रक़ृति को मरोड़कर - निचोड़कर ये सुविधाएं बनी हैं ये सामने रहती हैं तो मनुष्य इन्हीं का हो जाता है क़ोई पास आता है तो सुविधाओं वाला आदमी अपनी सुविधाएं आगंतुक को दिखाता है, जैसे आदमी सुविधा हो गया हो

वन के स्वभाव में है कि वन का आदमी सुविधाओं की बात नहीं करता, वह अपनी बात करता है, उससे भी ज्यादा दूसरे की बात सुनना चाहता है, भर मन सुनना चाहता है वन का स्वभाव ही है सुनना संस्कृत में सेवा के लिए शब्द है शुश्रूषा, जिसका अर्थ है- सुनने की इच्छा सूनने का मन हो तभी सेवाभाव आता है भवभूति ने वन के सुख की बात करते हुए कहा, यहां फल-फूल पर हम जीते हैं; पर आप शहरी लोगों की तरह पराधीन नहीं हैं

  (साभार)

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  महादेवी पहाड़ों का बसंत मनाती थीं

 

       निर्मल वर्मा

कितनी बार भुवाली से होता हुआ रामगढ़ से गुज़रा हूं सेबों के पेड़ों पर सफेद फूलों की छटा दूर से ही दिखायी दे जाती है लगता है, हवा में बहुत-सी सुगंधें एक साथ आ मिली हैं देवदार,चीड़,बांस और बुरांश के पेड़ों को समुद्र से सात हजार फीट की ऊंचाई पर एक साथ लहराते हुए देखना अपने आप में एक दुर्लभ अनुभव है यहां टूरिस्टों का कोई जमघट नहीं आधुनिक हिल- स्टेशनों के शोर -शराबे से दूर, जबकि नैनीताल और मुक्ते6वर जैसे नगर तीन-चार घंटों में ही पहुंचे जा सकते हैं पेड़ों के नीचे सांय-सांय सन्नाटे को सुनते हुए अनायास किसी सुदरू अतीत का स्मरण हो आता है, जब हजारों वर्ष पूर्व यहां किन्नर, किरात,नाग, गंधर्व आदि जातियां निवास करती थी देवजातियों का प्राचीन आवास स्थल

क्या इसी पावन अतीत के सम्मोहन ने महादेवी वर्मा को उत्तरांचल के इस नीरव, शांत कोटर में रहने के लिए लालायित किया था? या इसलिए कि उन्होंने सुन रखा था कि इस आरण्यक प्रदेश का प्राचीन नाम 'देवी स्थान ' है- महादेवी 'देवी स्थान ' में नहीं रहेंगी तो कहां रहेंगी ?

रामगढ़ का यह छोटा -सा पहाड़ी कस्बा उन दिनों तो और भी अधिक उजाड़, निर्जन और एकाकी रहा होगा, जब वर्षो पहले, सन् 1977 में, हिंदी की प्रख्यात कवयित्री ने इलाहाबाद की हलचल से दूर, अपनी एकाकी सृजन- सा घर बनवाया था यहां वे हर वर्ष गर्मियों में- जिन्हें वे 'पहाड़ों का बसंत' कहती थीं- अध्ययन -मनन के लिए आती थी साथ में उनका पशु परिवार भी आता था - खरगश, कुत्ते, तरह-तरह के पक्षी, जिन्हें वे इलाहाबद में अपने साथ पालती- पोसती थी

रामगढ़ का वह घर, जो एक छोटी -सी कुटिया से शुरू हुआ था, धीरे-धीरे एक तपोवनी आश्रम में बदलता गया हिंदी के अनेक कवि ओर साहित्यकार- इलाचंद्र जोशी, सुमित्रानंदन पंत, धर्मवीर भारती, समय-समय पर वहां आकर रूकते थे वे कहते हैं, स्वयं महादेवीजी ने अपनी कविता - संग्रह' दीपशिखा' की रचना इसी भवन में रहकर की थी

महादेवीजी की मृत्यु के बाद जैसा- अक्सर हमारे देश में स्मृति स्थलों के साथ होता है यह भवन जर्जर, उपेक्षित अवस्था में पड़ा रहा सौभाग्य से बटरोही ने कुछ संवेदनशील कुमाऊंनी प्राध्यापकों और लेखकों ने नैनीताल के जिलाधिकारियों के सहयोग से इस भवन को 'महादेवी साहित्य संग्रहालय' में विकसित करने का बीड़ा उठायासंग्रहालय के उद्घाटन के अवसर पर - जो सन् 1996 में हुआ था- मुझे अशोक वाजपेयी के साथ पहली बार वहां जाने का संयोग मिला रामगढ़ के जिन सेब-बगीचों को मैं सिफ बस की खिड़की से यलालायित आंखें से देखता था, वहां पहली बार कभी महादेवीजी के निमित ठहरने का मौका मिलेगा, यह कभी स्वप्नमें भी नहीं सोचा था

एक संकरी-सी चढ़ाई उस संग्रहालय तक जाती है, जहां कभी महादेवजी धीरे-धीरे चलते हुए अपने घर जाती थींतब क्या वे अनुमान लगा सकती थीं कि वर्षो बाद उनके पाठकों -प्रशंसकों की लंबी कतार उनके पद चिह्वों पर चलते हुए एक ऐसी ऊंचाई पर पहुंचेगी, जहां वे तो कहीं पहाड़ों के पीछे लुप्त हो जायेंगी, किंतु अपने पीछे आनेवालों के लिए, अपने कतिपय स्मृति - अवशेष छोड़ जायेंगी क़ुछ किताबें, जो अलमारी के भीतर एक-दूसरे से सटी, धूल में सनी दिखायी दे जाती हैं चौके में चूल्हा, उन दिनों के कुछ पुराने बरतन, लकड़ी का पटरा- वहीं सादी स्वच्छ सात्त्वि- सी घरेलू चीजें, जिनसें उनकी छोटी -सी गृहस्थी चलती थी उनके अध्ययन- कक्ष में एक आसन ओर डेस्क दिखायी दिये, जहां वह अधिकांश समय, एकांत की घड़ियों में, लिखने, पढ़ने, सोचने में गुजारती थी वहीं शायद चित्र भी बनाती थीं शायद यही कारण था कि भवन में उनके बनाये जो चित्र सुरक्षित हैं, वे अधिकांश लैंडस्केप हैं, सूर्यास्त की कोमल रोशनी, पहाड़ों पर झरता आलोक, पेड़ों के झुरमुट से खेलती हुई धूप, हवा, छाया

वही धूप है, वहीं पहाड़ी बादल, वहीं जंगल की वनैली, सरसराती हवा, सिर्फ वे आंखें नहीं है, जो कभी डेस्क से उठाकर खिड़की के पार उन्हें टोका करती थीं

कुछ स्थानों को देखते ही अनायास मन में कोई बहुत पुरानी स्मृति कौंध जाती है महादेवीजी के डेस्क ओर आसन को देखकर मुझे वाराणसी के घाट पर बसा एक अन्य आश्रम याद आ गया बहुत वर्षो से उसे देखने की उत्कट साध थी, जहां आनंदमयी मां वर्ष के कुछ महीने रहा करती थीं मेरी बडी बहन आनंदमयी मां की अर्पित अराधिका थीं ओर बचपन में उन्हीं के साथ में उन्हें देखने-सुनने जाया करता था अाज मुझे कुछ और नहीं, उनके सुंदर, सात्त्वि चेहरे पर खेलती मुस्कराहट याद रह गयी है बिल्कुल वैसी ही जैसी मैंने पहली बार ओर आखिरी बार महादेवीजी के चेहरे पर देखी थीं

यह भी क्या दैवी संयोग था कि महादेवीजी के अध्ययन-कक्ष में जाकर ही मुझे आनंदमयी मां का वाराणसी वाला साधना -कक्ष याद आता रहा, वह भी खिड़की के पास बैठा करती थीं, जिसके पार धूप में चमकता गंगा का असीम, निस्पंद विस्तार दिखायी देता था दोनों स्थानों के बीच एक दुर्लभ, अलौकिक साम्य था- हिमालय की पावन धवन अटलता और गंगा की सतत प्रवाहमयता अौर तब महादेवीजी की चौकी के पास बैठा हुआ मैं सोचने लगा कि दोनों के बीच भौगोलिक दूरी के बावजूद कितना गहन सान्निध्य था महादेवी शब्द की पवित्रता में सृष्टि को साकार करती थीं, आनंदमयी मां सृष्टि की पवित्रता में ईश्वर से साक्षात करती थीं ख़िड़की से ये दृश्य भले ही अलग-अलग दिखायी देते हों, कवि ओर साधक में कोई अलगाव नहीं था, दोनो ही द्रष्टा थे

यह भी विचत्र संयोग ही रहा होगा कि महादेवी ने अपने लिए जो निवास-स्थान चुना था, उससे लगभग तीन किलोमीटर दूर सबसे ऊंची पहाड़ी पर, कभी कवींद्र रवींद्र रहा करते थे वे सन् 1903 में अपनी बीमार बेटी के स्वास्थ्य लाभ के लिए यहां आये थे उन्होंने अपनी कुटी का नाम 'गीतांजली' रखा था, जिसकी कुछ कविताएं उन्होंने यहां रखी थी अाज उनके घर के नाम पर सिर्फ पत्थरों के ढूह दिखायी देते हैं क़ितना  अजीब है, जिस कृति के नाम पर रवींद्रनाथ को विश्वख्याति मिली, उसी के नाम का आवास- स्थल आज खंडहरों में दिखायी देता है

 (साभार)

 

 

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                                           प्रबंध सम्पादक अंजली सहाय सम्पादक डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल