अक्टूबर 2007

                           

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  शिरीष के फूल 

          हजारी प्रसाद द्विवेदी

 

जहां बैठ के यह लेख लिख रहा हूँ उसके आगे, पीछे दायें, बायें शिरीष के अनेक पेड़ हैं। जेठ की जलती धूप में, जबकि धरित्री निर्धूम अग्निकुण्ड बनी हुई थी, शिरीष नीचे से ऊपर तक फूलों से लद गया था। कम फूल इस प्रकार की गर्मी में फूल सकने की हिम्मत करते हैं। कर्णिकार और आरग्वध (अमलतास) की बात मैं भूल रहा हूँ। वे भी आस-पास बहुत हैं। लेकिन शिरीष के साथ आरग्वध की तुलना नहीं की जा सकती। वह पन्द्रह-बीस  दिन के लिए फूलता है, बसन्त ऋतु के पलाश की भॉति। कबीरदास को इस तरह पन्द्रह दिन के लिए लहक उठना पसन्द नहीं था। यह भी क्या कि दस दिन फूले और फिर खंखड़ - के खंखड़- ' दिन दस फूला फूलि के, खंखड़ भया पलास' ! ऐसे दुमदारों से तो लंडूरे भले। फूल है शिरीष । बसन्त के आगमन के साथ लहक उठता है, आषाढ़ तक तो निश्चित रूप से मस्त बना रहता है। मन रम गया तो भरे भादों में भी निर्धात फूलता रहता है जब ऊमस से प्राण उबलता रहता है और लू से ह्रदय सूखता रहता है, एकमात्र शिरीष कालजयी अवधूत की भॉति जीवन की अजेयता का मन्त्र प्रचार करता रहता है। यद्यपि कवियों की भाँति हर फूल -पत्ते को देखकर मुग्ध होने लायक हदय विधाता ने नहीं दिया है, पर नितान्त ठूंठ भी नहीं हूँ। शिरीष के पुष्प मेरे मानस में थोड़ा हिल्लोल जरूर पैदा करते हैं।

शिरीष के वृक्ष बड़े और छायादार होते हैं। पुराने भारत का रईस जिन मंगल-जनक वृक्षों को अपनी वृक्ष- वाटिका की चहारदीवारी के पास लगाया करता था, उनमें एक शिरीष भी है (वृहत्संहिता 553)। अशोक आरिष्ट, पुन्नाग और शिरीष के छायादार और वनमसृण हरीतिमा से परिवेष्टित वृक्ष- वाटिका के सघन छायादार वृक्षों की छाया में ही झूला (प्रेंखा दोला ) लगाया जाना चाहिए। यद्यपि पुराने कवि बकुल के पेड़ पर ऐसी दोलाओं को लगा देखना चाहते थे, पर शिरीष भी क्या बुरा है। डाल इसकी अपेक्षाकृत कमजोर जरूर होती है, पर उसमें झूलने वालियों का वजन भी तो बहुत ज्यादा नहीं होता। कवियों की यही तो बुरी आदत है कि वजन का एकदम ख्याल नहीं करते। मैं तुन्दिल नर-पतियों की बात नहीं कह रहा हं, वे चाहे तो लोहे का पेड़ बनवा लें।

शिरीष का फूल संस्कृत में बहुत कोमल माना गया है। मेरा अनुमान है कि कालिदास ने यह बात शुरू-शुरू में प्रचार की होगी। उनका कुछ इस पुष्प पर पक्षपात था। (मेरा भी है)। कह गए हैं, शिरीष पुष्प केवल भौरों के पदों का कोमल दबाव सहन कर सकता है, पक्षियों का बिल्कुल नहीं - 'पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीष पुष्पंन पुन: पतत्रिणाम्'। अब मै। इतने बड़े कवि की बात का विरोध कैसे करूं। सिर्फ विरोध करने की हिम्मत नहीं होती तो भी कुछ कम बुरा नहीं था, यहॉ तो इच्छा भी नहीं है। खैर, मैं दूसरी बात कह रहा था। शिरीष के फूलों की कोमलता देखकर परवर्ती कवियों ने समझा कि उसका सब-कुछ कोमल है। यह भूल है। इसके फल इतने मजबूत होते हैं कि नए फूलों के निकल आने पर भी स्थान नहीं छोड़ते। जब तक नए फल- पत्तें मिलकर धकियाकर उन्हें बाहर नहीं कर देते तब तक वे डटे रहते हैं। बसन्त के आगमन के समय जब सारी वनस्थली पुष्प - पत्र से मर्मरित होती रहती है, शिरीष के पुराने फल बुरी तरह खड़खड़ाते रहते हैं। मुझे इनको देखकर उन नेताओं की बात याद आती है, जो किसी प्रकार जमाने का रूख नहीं पहचानते ओर जब तक नई पौध के लोग उन्हें धक्का मारकर निकाल नहीं देते तब तक जमे रहते हैं।

मैं सोचता हूं कि पुराने की यह अधिकार -लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधन हो जाती ? जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत् के अतिपरिचित और अतिप्रमाणिक सत्य हैं। तुलसीदास ने अफसोस के साथ इनकी सच्चाई पर मुहर लगाई थी- ' धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा जो बरा सो बुताना'! मैं शिरीष के फलों को देखकर कहता हूं कि क्यों नहीं फलते ही समझ लेते  कि झड़न निश्चितत है! सुनता कौन है ? महाकाल देवता सपासप कोडे चला रहे हैं, जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं, जिनमें प्राण कणी थोड़ी भी ऊर्ध्वमुखी है, वे टिक जाते हैं। दुरंत प्राणधारा ओर सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरन्तर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहां बने हैं वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की ऑख बचा जाएंगे। भोले हैं वे। हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुंह किये रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे।

एक-एक बार मुझे मालूम होता है कि यह शिरीष एक अद्रूत अवधूत है। दु:ख हो या सुख,वह हार नहीं मानता। न ऊधो का लेना, न माधो का देना। जब धरती और आसमान जलते रहते हैं, तब भी यह हजरत न जाने कहॉ से अपना रस खींचते रहते हैं। मौज में आठों याम मस्त रहते हैं। एक वनस्पति शास्त्री ने मुझे बताया है कि यह उस श्रेणी का पेड़ है, जो वायुमण्डल से अपना रस खींचता है। जरूर खींचता होगा। नहीं तो भयंकर लू के समय इतने कोमल तंतुजाल और ऐसे सुकुमार केसर को कैसे उगा सकता था। अवधूतों के मुंह से ही संसार की सबसे सरस रचनाएं निकली है। कबीर बहुत -कुछ इस शिरीष के समान ही थे। मस्त और बेपरवाह, पर सरल और मादक। कालिदास भी जरूर अनासक्त योगी रहे होंगे। शिरीष के फूल फक्कड़ाना मस्ती से ही उपज सकते हैं और मेधदूत का काव्य उसी प्रकार के अनासक्त, अनाविल उन्मुक्त ह्रदय में उमड़ सकता है। जो कवि अनासक्त नहीं रह सका,जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किये-कराये का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया,वह भी क्या कवि है? कहते हैं कि कर्णाट -राज की प्रियाविज्विका देवी ने गर्वपूर्वक कहा था कि एक कवि ब्रह्मा थे,दूसरे वाल्मीक ओर तीसरे व्यास। एक ने वेदों को दिया, दूसरे ने रामायण को, तीसरे ने महाभारत को। इनके अतिरिक्त और कोई यदि कवि होने का दावा करे तो मैं कर्णाट - राज की प्यारी रानी उनके सिर पर अपना बॉया चरण रखती हूं- 'तेषां मूध्निं ददामि वामचरणं कर्णाट - राजप्रिया'! मैं जानता हूं कि इस उपालम्भ से दूनिया का कोई कवि हारा नहीं है, पर इसका मतलब यह नहीं कि कोई लजाये नहीं तो उसे डॉटा भी न जाय। मैं कहता हूं कि कवि बनना है मेरे दोस्तो, तो फक्कड़ बनो। शिरीष की मस्ती की ओर देखा। लेकिन अनुभव ने मुझे बताया है कि कोई किसी की सुनता नहीं। मरने दो !

कालिदास वजन ठीक रख सकते थे ; क्योंकि वे अनासक्त योगी की स्थिर - प्रज्ञता और विदग्ध- प्रेमी का ह्रदय पा चुके थे। कवि होने से क्या होता है ? मैं भी छंद बना लेता हूं, तुक जोड़ लेता हूं और कालिदास भी छंद बना लेते थे- तुक भी जोड़ ही सकते होंगे इसलिए हम दोनों एक श्रेणी के नहीं हो जाते। पुराने सह्रदय ने किसी ऐसे ही दावेदार को फटकारते हुए कहा था- ' वयमपि कवय: कवय: कववस्ते कालिदासाद्य:' मैं तो मुग्ध ओर विस्मय - विमूढ़होकर कालिदास के एक-एक श्लोक को देखकर हैरान हो जाता हूं। अब इस शिरीष के फूल का ही एक उदाहरण लीजिए। शकुन्तला कालिदास के ह्रदय से निकली थी। विधाता की ओर से कोई कार्पण्य नहीं था, कवि की ओर से भी नहीं; राजा दुष्यन्त भी अच्छे - भले प्रेमी थे। उन्होंने शकुन्तला का चित्र बनाया था; लेकिन रह-रहकर उनका मन खीझ उठता था। ऊहूं, कहीं- न कहीं कुछ छूट गया है। बड़ी देर के बाद उन्हें समझमें आया कि शकुन्तला के कानों में वे उस शिरीष पुष्प को देना भूल गए हैं, जिसके केसर गण्डस्थल पर लटके हुए थे, और रह गया है शरच्चन्द्र की किरणों के समान कोमल और शुभ्र मृणाल का हार।

  कृतं न कर्णार्पितबन्धनं सखे

शिरीषमागण्डविलम्विकेसरम्।

न वा शरच्चन्द्रमरीचिकोमलं

मृणालसूत्रं रचितं स्तनान्तरे॥

 

कालिदास ने यह श्लोक न लिख दिया होता तो मैं समझता कि वे भी बस कवियों की भॉति कवि थे, सौन्दर्य पर मुग्ध, दु:ख से अभिभूत , सुख से गदगद! पर कालिदास सौन्दर्य के ब्राह्म आवरण को भेदकर उसके भीतर तक पहुंच सकते थे, दु:ख हो कि सुख, वे अपना भावरस उस अनासक्त कृषीवल की भॉति खींच लेते थे जो निर्दलित ईक्षदुण्ड से रस निकाल लेता है। कालिदास महान् थे, क्योंकि वे अनासक्त रह सके थे। कुछ इसी श्रेणी की अनासक्ति आधुनिक हिन्दी कवि सुमित्रानन्दन पंत में है। कविवर रवीन्द्रनाथ में यह अनासक्ति थी। एक जगह उन्होंने लिखा है -7 '' राजोद्यान का सिंहद्वार कितना ही अभ्रभेदी क्यों न हा, उसकी शिल्पकला कितनी ही सुन्दर क्यों न हो, वह यह नहीं कहता कि हममें आकर ही सारा रास्ता समाप्त हो गया। असल गन्तव्य स्थान उसे अतिक्रम करने के बाद ही है। यही बताना उसकार् कत्तव्य है।'' फूल हो या पेड़, वह अपने- आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई ऍगुली है। वह इशारा है।

शिरीष तरू सचमुच पक्के अवधूत की भॉति मेरे मन में ऐसी तरंगें जमा देता है जो ऊपर की ओर उठती रहती हैं। इस चिलकतील धूप में इतना सरस वह कैसे बना रहता है? क्यो ये बाह्म परिवर्तन- धू, वर्षा, ऑधी- लू अपने- आप में सत्य नहीं है? हमारे देश के ऊपर से जो यह मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट, खून- खच्चर का बवंडर बह गया है, उसके भीतर भी क्या स्थिर रहा जा सकता है? शिरीष रह सका है। अपने देश का एक बूढ़ा रह सका था। क्यों? मेरा मन पूछता है कि ऐसा क्यों सम्भव हुआ ? क्योंकि शिरीष वायुमण्डल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर है। गॉधी भी वायुमण्डल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर हो सका था। मैं जब- जब शिरीष की ओर देखता हूं, तब- तब हूक उठती है - हाय, वह अवधूत आज कहां है!

  प्रतिक्रिया    *    t  u

 

 

 

 महाराजपुर से ग्वारीघाट (जबलपुर)

अमॄत लाल वेगड  

 

क्या यह वही सहस्त्रधारा है ?

सामने तट से जाते समय इसे दीवाली छुट्टी में देखा था। सचमुच सहस्त्रधारा थी। नर्मदा की अजस्त्र जलधाराओं का सैलाब उमड़ रहा था। दूर -दूर तक फैले अनगिनंत प्रपात नदी के वेग को चौबाला कर रहे थे। हहराती, उफनाती, बलखाती धारा के पास जाने में बड़ा भय लगा था।

और आज?

बहुत खोजने पर एक सूक्ष्म धारा मिली। नर्मदा का सूखा चट्टानी पाट गर्म कड़ाह की तरह खौल रहा था। जहॉ हमने भरी -पूरी नर्मदा को देखा था, वहॉ इस गरमी में उसकी सॉस भर चल रही थी। सभी कुछ निर्जीव, सुनसान, नेत्रहीन और मूक

और हो भी क्या सकता था? शताब्दी का भयंकर सूखा पड़ा था। कुएं - तालाब, नदी-नाले प्राय: सूख चले थे। गांव खाली हो रहे थे। पूरा उत्तर भारत भूतपूर्व जल संकट का सामना कर रहा था। ऐसे में नर्मदा भी सूखकर कॉटा रह जाए, तो क्या आश्चर्य ?

27 मई, 1980 को महाराजपुर (मंडला) से चले। पहला दिन था ओर सुबह से ही धूप चटख  हो चली थी, इसलिए अधिक नहीं चले। मानादेही में रूक गए। वहॉ से सहस्त्रधारा देखने गए। यह अंदाज तो था कि धारा सिमट कर रह गई हे लेकिन इस तरह उजड़ गई होगी, यह कल्पना नहीं थी।

सहस्त्रधारा का एक वह राजराजश्वर रूप देखा था -- पानी छलकता, चौकड़ी भरता, घन- धमण्ड घोषणा करता, और यह दलित द्राक्षा- सा रूप देखा निर्जला, नीरव,मूक और चट्टानों का ढॉचा मात्र! उतार- चढ़ाव किसके जीवन में नहीं आते ?

पानी के न रहने से एक फायदा था- नदी का पाट खुली किताब की तरह सामने था। वेगवती धाराओं ने चट्टानों को कैसा काटा व तराशा था, इसे हम अच्छी तरह देख सकते थे। तारों की शोभा हम तभी देख सकते हैं, जब चॉद न हो। पेड़ के गठन को तभी समझ सकते हैं, जब पतझड़ हो। आज हमें यही मौका मिला था। पानी चट्टानों को तराशा तो था ही, आश्चर्य यह देखकर हुआ कि उनमें बड़े - बड़े सूराख कर दिये थे बिल्कुल गोल । फिर उनको नीचे ही नीचे मिला दिया था। हम लोग एक सूराख से उतरे, दूसरे से बाहर निकले। नदी ने मानो पत्थर के कान बींधे थे। यहीं भॅवर होती है। कोई इसमें फ़ंस जाए, तो जिंदा बाहर नहीं निकल सकता। आज समझ में आया कि अच्छे से अच्छा तैराक भी अनजान पानी में क्यों नहीं उतरता।

दूसरे दिन पौ फटते ही चल दिये। दोपहर की दहकती गरमी में बुजबुजिया पहुंचे। इस सूखे में भी यह गॉव हरा-भरा था। यहॉ वन -विभाग की नर्सरी है। तरह- तरह के पौधे उगाये जाते हैं- खासकर सागौन के। दूर दूसरी तरह के पौधे थे। मै।ने एक मजदूर से पूछा,'' वे काहे के पौधे हैं ?''

''लिपिस्टिक के !''

''लिपिस्टिक के ? मैंने आश्चर्य से पूछा । उसने फिर वही जवाब दिया तो मैंने पास जाकर देखा। वे यूकिलिप्टिस के पौधे थे!

यहॉ नर्मदा में कुछ अधिक पानी था। प्रपात भी थे। पास ही वन- विभाग के कमरे का बरामदा मिल गया, तो वहीं टिक गए। कमरे में एक कंपाउण्डर रहता था। मंडला से आए उसे पन्द्रह दिन ही हुए थे। बेहद गरमी थी, रात को बाहर सोये। मैं ओर यादवेन्द्र नीचे जमीन पर, कंपाउण्डर चारपाई पर।

रात को कोई डेढ़ बजे बूँदाबॉदी हुई तो मैं बरामदे में आ गया, फिर यादवेन्द्र और अंत में कंपाउण्डर। हम जमीन पर सोये। कंपाउण्डर चारपाई पर । दरवाजे में पल्ले नहीं थे।

कोई आधा घण्टा हुआ होगा कि कंपाउण्डर जोर से चिल्न्लाया, ''सॉप! सॉप!'' हम लोग भी हड़बड़ा कर उठ बैठे। मेरे पास टॉर्च थी, तुरन्त जलायी। वह कहने लगा, ''सॉप था। मेरी बॉह पर था। मुझे ठण्डा-  ठण्डा लगा तो हड़बड़ा कर उठ बैठा।''

वह बुरी तरह से डर गया था। अटक-अटक कर बोल रहा था। डर हम भी गए थे। टॉर्च और लालटेन की सहायता से कोने-कोने की तलाशी ली, लेकिन सॉप कहीं नहीं था। मैंने कहा, '' तुम्हें भ्रम हुआ है। सॉप कहीं नहीं है। फिर तुम तो चारपाई पर लेटे थे, सॉप उस पर कैसे चढ़ेगा?''

''सॉप ही था। मैंने उसे अपनी ऑखों से देखा।''

हमें विश्वास नहीं हुआ। लेकिन कोई दस मिनट के बाद देखा, दरवाजे में से सॉप आ रहा है।

उसकी बात सच थी। एक लकड़ी की सहायता से मैंने उसे बाहर किया। एक पत्थर पर पानी था, देर तक पीता रहा, प्यासा था। फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।

कंपाउण्डर बोला, 'मारो।' मैंने कहा, 'तुम्हीं मारो।' उसने कहा, ''मेरा शरीर तो क्या आत्मा कॉप उठी है। मुझसे यह नहीं होगा।''

''यादवेन्द्र तुम ही मारो।''

''गुरूजी, आज तक सॉप नहीं मारा। मुझसे भी यह नहीं होगा।''

मैंने कहा, ''आप जैसे रथी- महारथी इसे नहीं मार सकते, तो भला मेरी क्या बिसात!''

आगे एक शाल वृक्ष के नीचे जाकर वह रूका, फिर धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगा। थोड़ी देर में काफी ऊपर पहुंच गया। सॉप को पेड़ पर चढ़ते पहली बार देखा। कंपाउण्डर की बात पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं रहा।

दूसरी ओर एक दूसरा सॉप, जो उससे मोटा था, दूसरे पेड़ पर चढ़ रहा था। हम शायद नागलोक में आ गए थे। रात का घना अंधेरा, सन्नाटे का आलम ओर पेड़ों पर चढ़ते सॉप। बड़ा भय लगा।

इतने में कंपाउन्डर एक छोकरने को ले आया। उसी समय पहला सॉप पेड़ पर से उतर रहा था। जमीन पर आते ही छोकरे ने दो डंडे जमाये तो सॉप का काम तमाम हो गया। दूसरा सॉप पेड़ में गायब हो गया, हाथ नहीं आया।

ऐसे में नींद कहॉ से आती। बाकी रात जागकर काटी। कंपाउण्डर कहने लगा, ''कल ही मंडला जाकर इस्तीफा दे दूंगा। बीस साल की नौकरी जाये भाड़ में।'' हम भी सोच रहे थे, कब सवेरा हो ओर यहॉ से कूच करें।

सवेरा होते ही चल दिय। हवा एकदम बंद थी। पूरा भूखण्ड जल रहा था। पेड़ धूप से कुम्हला गए थे। भरी दोपहर को घाघा पहुंचे। गॉव न जाकर नदी- किनारे एक पेड़ के नीचे रूके। अब जोरों से लू चलने लगी थी। किसी तरह खाना पकाया, खाकर वहीं लेटे। ज्यों-ज्यों पेड़ की छाया सरकती, त्यों- त्यों हम सरकते। ऑधी उठती तो सारी देह धूल से अट जाती। पर हवा का हिनहिनाना ओर पेड़ों का रॅभाना सुनने में मन रम गया, तो लू के थपेड़े खाते वहीं पड़े रहे।

शाम तक हमारे ऊपर धूल की चार-छ: पर्ते जम गई। मैं मानो मोहें- जो दड़ो होऊ और यादवेन्द्र हड़प्पा हो, ऐसा हाल हुआ। फर्क यही था कि उन प्राचीन नगरों को दूसरों ने खोद निकाला था, जबकि हम स्वयं उठ खड़े हुए और चलते बने। घाघा में रहने की व्यवस्था हो गई, तो घूमने निकले। पास ही दूसरा गॉव है घाघी । वहॉ नर्मदा -तट गए। नदी की धारा उस तट पर थी, इसलिए सूखे रेतीले पाट को पार कर सामने तट गए। वहॉ जाकर चकित रह गए। वहॉ कोई धारा ही नहीं थी।

ऑखों को विश्वास न हुआ। लेकिन पानी नहीं था, तो नहीं था। नर्मदा की धारा टूट गई थी।

पिछले साल भी गर्मी में चले थे। लेकिन ऐसा कहीं नहीं देखा था। दाहिनी ओर पतली धारा थी, दूर बायीं ओर भी थी, लेकिन बीच में अचानक गायब हो गई थी।

नर्मदा की गागर एकदम खाली थी।

पिछली यात्राओं में हमने नर्मदा का वनवास देखा था, इस बार की यात्रा में उसका अज्ञातवास देखा।

हम चाहते तो दस कदम चलकर उस तट पर पहुंच जाते। लेकिन नहीं गए। नर्मदा ऊपर नहीं है तो क्या हुआ, रेत के नीचे जरूर बह रही है। इसलिए हमने उसे हाजिर -नाजिर माना और वहीं से लौट आए।

अगला पड़ाव बुदेहरा। नर्मदा की धारा यहॉ भी टूट गई थी।

बुदेहरा से झुरकी। झुरकी के पटेल बड़े विनोदप्रिय थे। हम लोगों का स्वागत करते हुए किसी से कहा, '' आप लोगों के लिए वही प्रागैतिहासिक शरबत ले आओ।''

शरबत आया, बड़ा ही स्वादिष्ट था। कहने लगा, '' यह आंवला, पुदीना आदि से बना है, इसलिए उसे प्रागैतिहासिक शरबत कहता हूं।''

मैंने देखा, इस विनोदप्रिय आदमी को भी विषाद की काली छाया ने ग्रस लिया था। पास ही बरगी में नर्मदा पर एक विशाल बॉध बन रहा है। उनका यह गॉव और आस-पास के कई गॉव उस बॉध में डूब में आ जायेंगे। तब वे कहॉ जायेंगे, क्या करेंगे, यहीं चिंता उन्हें सता रही थी। दरअसल बेघर होने की यह चिंता उनकी ही नहीं, सारे इलाके की थी।

पद्मीघाट में एक अच्छा आश्रम है, रात वहॉ रहे। भोर होते ही चल दिये। पेड़ ऐसे काले दीख रहे थे, मानो झुलसे हुए हों। शाम को बखारी पहुँचे । गॉव के पटेल के यहॉ रहने को तो मिल गया, लेकिनर पानी मॉगा, तो उसने रस्सी - बालटी थमा दी ओर कुऑ बता दिया। पानी लेने गए तो रस्सीर मुश्किल से बीच कुएं तक पहुंची । पानी पाताल को चला गया था। पास की झोपड़ी का ग्रामीण हमारी परेशानी समझ गया। अपनी रस्सी ले आया, दोनों को जोड़ा, तब पानी निकला। गॉव के इसी एक कुएं में पानी था, बाकी सब सूख चुके थे।

यहॉ से छिंदवाहा। नर्मदा के संग- संग चले। रोटो पहुंच कर एक वन-रखक की झोपड़ी में डेरा डाला। वह यहॉ के पेड़ कटवा रहा था। यह दलाका बॉध में डूब जाये, इसके पहले पेड़ों को कटवा लेना जरूरी था।

सुबह नदी में से चले। दिन बेहद गरम था टौर हवा ने अपने पंख समेट लिए थे। दोपहर को एक जगह बहुत- से मजदूर स्त्री -पुरूष एक पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे। पास ही राहत कार्य में सड़क बन रही थी। इसी में लगे थे। कुछ सो रहे थे, कुछ गा रहे थे। उनका अंधेड़ उम्र का मुखिया मौज में आकर नाच रहा था। इनके गीतों ने मन मोह लिया तो गोपीटोला में इन्ही में से एक के घर रात रह गए। रात को वे और भी गी सुनायेंगे और नाचेंगे।

यादवेन्द्र भोजन बनाने की तैयारी करने लगा, तो हमारे मजदूर यजमान ने मना कर दिया- भोजन आपका हमारे यहॉ होगा।

यह आदमी, जिसे हमने चार रूपये रोज पर जेठ की तपती दुपहरिया में हाड़तोड़ मेहनत करते देखा था, कहता है कि भोजन आप हमारे यहॉ करेंगे।

भाई मजदूर! मैं जरूर तुम्हारी रोटी खाऊंगा। महाभारत के नेवले की तरह इससे शायद मेरा शरीर सोने का हो जाये!

देर रात तक लोकगीत व लोकनृत्य का आनन्द लेते रहे। सुबह बीजासेन के लिए चल दिये। रात को यहॉ भी नृत्य देखने को मिले। दिन भर कड़ी मेहनत करने के बाद और रूखा खाने के बाद भी ये लोग जीवन का रस लेना जानते है।

दूसरे दिन खुश्क पहाड़ियों से हाते हुए पायली पहुंचे। पायली में जिनके यहॉ ठहरे थे, वे विधुर थे। मैंने पूछा, '' आपने दोबारा शादी क्यों नहीं की ?'' उन्होंने कहा, '' मेरे बच्चे छोटे थे। मैंने सोचा, दोबारा शादी करूंगा तो ये बच्चे मॉ से ता गए, बाप से भी जायेंगे। इसलिए नहीं की। अब तो बच्चे बड़े हो गए हैं। बड़े बेटे की बहू भी आ गई है।''

शाम को नर्मदा-तट गए। पच्चीस बरस पहले भी यहॉ आया था। तब यहॉ कैसा घना जंगली था। विशाल वृक्षों से लिपटी सुदीर्ध लताएं मुझे आज भी याद थीं। पर अब कुछ भी नहीं बचा था। इनसान की कुल्हाड़ी ने सर्वनाश कर डाला था।

बड़े सवेरे बरगी कॉलोनी के लिए चल दिये। मेरी चाल अपने आप तेज हो गई। उन दिनों मेंरा बड़ा लड़का चि शरद वहॉ रहता था। चंड़ सूर्य के प्रचंड ताप में उसके द्वार पर खड़े होकर कहा, 'भिक्षां देहि !'

यहॉ नर्मदा पर एक विशाल बॉध बन रहा है। शाम को उसे देखने गए। हजारों मजदूरों और सैकड़ों यंत्रों से यह स्थान जीवन्त हो उठा है। बॉध की दीवार बहुत-कुछ हो चुकी थीं एक सीढ़ी से अन्दर उतरे तो मैं चकित रह गया। बॉध की ठोस नजर- आती दीवार में, इस छोर से उस छोर तक, बिजली की रोशनी से जगमगाती सुरंग थी। देख-रेख के लिए बड़े बॉध में ऐसी सुरंग रहती है, यही तभी जाना।

जब यह बॉध बन जाएगा, तो यहॉ का नक्शा ही बदल  जायेगा। यहॉ एक विशाल झील बनेगी। मैं सोचने लगा, इस झील का नाम क्या होना चाहिए।

याद आया,कभी यहॉ एक स्त्री रहती थी। एक दिन उसने सुना, राम आ रहे हैं। स्वागत के लिए उसके पास बेर के सिवा ओर था ही क्या ? राम आए तो चख -चख कर मीठे बेर देती रही। प्रेम में विहल शबरी को इस बात का ध्यान ही न रहा कि वह राम को जूठे बेर खिला रही है। सोचा, इसी प्रदेश की उस सरला आदिवासी नारी की याद में इस झील का नाम शबरी झील रखा जाये, तो क्या ही अच्छा हो।

शबरी के बेर, सुदामा के चावल, विदुर की भाजी। क्या इनका कोई मोल हो सकता है ? महत्व इस बात का नहीं है कि हम क्या दे रहे हैं, महत्व इस बात का है हम जो दे रहे हैं उनमें अपना ह्रदय उडेल रहे हैं या नहीं।

यहॉ से पारा-पास ही है, पर गॉव की गलियॉ भा गई, तो रात यहीं रह गए। भिनसारे चल दिये। आगे टेमर -संगम पड़ा। टेमर किस ठस्से के साथ नर्मदा से मिल रही थी। इस सूखे में भी उसमें पानी था। संगम में दूर तक स्नान करते रहे। तभी आकाश में बादल घिर आये। बूंदाबांदी होने लगी। मैं बहुत खुश हुआ। सोचा, आज त्रिवेणी - स्नान हुआ। दो धारासयें पहले से थी, तीसरी ऊपर से आ मिली।

जब से बरगी कॉलोनी से चले हैं, तब से एक नया दृश्य बराबर देखने को मिल रहा है। बारूद से चट्टाने तोड़ी जा रही हैं, बड़ी- बड़ी नहरें खोदी जा रही हैं। बॉध के बन जाने पर ये नहरें खुशहाली की सौगात लायेंगी। सारा इलाका धन्य -धान्य से लहलहा उठेगा।

लेकिन परकम्मावासियों का क्या होगा ? नदी के दोनों ओर जब इन नहरों का जाल दूर-दूर तक फैल जायेगा और उनमें नर्मदा जल प्रवाहित होगा, तब परकम्मावासी भारी धर्म संकट में पड़ जायेंगे। इन नहरों को लॉघा जाये या नहीं ? नहरों को लॉघना नर्मदा लॉघने जैसा होगा।

नहीं लॉघने पर इतना बड़ा चक्कर लगाना पडेग़ा कि  वह नर्मदा परिक्रमा ही नहीं रहेगी। तब क्या किया जाये

sमेरा विचार है जब नर्मदा का स्वरूप बदलेगा, जब नर्मदा - परिक्रमा के नियमों का स्वरूप भी बदलेगा। नहर, नदी की दूसरी पीढ़ी हुई। छोटी नहरें, तीसरी पीढ़ी। परकम्मावासी का दायित्व नदी के प्रति है, उसकी दूसरी- तीसरी पीढ़ी। परकम्मावासी का दायित्व नदी के प्रति है, उसकी दूसरी- तीसरी पीढ़ी के प्रति नहीं। इसलिए इन नहरों को लॉघने में कोई दोष नहीं 

रात खमरिया में रहे। यहॉ से सड़क मिल गई। दोपहर को ग्वारीघाट (जबलपुर) आ गए। इस बार की यात्रा पूरी हुई। यात्रा पका शुभारम्भ इसी ग्वारीघाट से हुआ था। उस तट से गए थे, इस तट से लौटे थे। लौटते समय सामने तट के गाँवों को देखते ही पूर्व-स्मृति के तार झनझना उठते । जिनके यहॉ ठहरे थे, उनकी याद आ जाती। खबर भिजवा देते, तो मिलने आ जाते। पाठा के 6ािक्षक, सहजपुरी के संन्यासी, छेवलिया का तुलाराम कोटवार, सभी बड़े प्रेम से आए थे। तुलाराम तो स्त्री- बच्चों को लेकर आया था। सभी हमारे लिए सीधा लाये थे।

तो उस तट के पाछा, सहजपुरी, छेवलिया, बरहइयाखेड़ा और इस तट के घाघी, झुरकी, बखरी, रोटो पायली- तुम्हें जुहार! अब तो तुम थोड़े ही दिनों के मेहमान हो न ? नर्मदा के लुभावने किनारो, तुम्हें भी अलविदा! ओर सौन्दर्य -सरिता नर्मदा! तुम्हें भी अलविदा, क्योंकि यहॉ तुम भी तो उस वि6ााल झील में उसी तरह खो जाओगी, जिस तरह दूध के बरतन में पड़ती धरोष्ण दूध की धार खो जाती है। 

 

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हमें जीने दो : बचाओ नकली दवाओं से           प्रणय कुमार गर्ग

 

   विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) ने वर्ष 2006 की अपनी रिपोर्ट में नकली दवाओं के अन्धाधुन्ध चलन और बेचान का खुलासा करते हुए बता दिया था कि 30 हज़ार करोड रुपये सालाना की बिक्री वाले इस उद्योग में 10 हज़ार करोड रुपये की नकली दवाइयां खुले आम बेची जा रही हैं. अफसोस कि इस आंखें खोल डालने वाली रिपोर्ट पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया. 

जहां तक भारत का सवाल है, सरकारी उदासीनता, दवा गुणवत्ता नियंत्रण प्राधिकरण के अभाव और ताकतवर माफियाओं के चलते इस समस्या का समाधान न तो सरल है और न सम्भव. हज़ारों की तादाद में दम तोडते मरीज़ों की खामोशी को कोई इक्का-दुक्का आवाज़ ही तोड पाती है. अपने पुत्र की मौत से आहत पुणे निवासी परीजन ने मुम्बई हाइकोर्ट में अगस्त 07 में नकली दवाओं के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की है. जस्टिस जे. एन. पटेल और जस्टिस अमजद सैयद की खण्डपीठ ने महाराष्ट्र फूड एण्ड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन को यह निर्देश दिया कि वह सभी सरकारी अस्पतालों से दवाओं के नमूने लेकर उनकी जांच करे और छह सप्ताह में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे. खण्डपीठ ने नकली दवाओं की बिक्री पर अंकुश लगाने में नाकामयाब रही सरकार को लताडा और उसके खोखले इंतज़ामों पर गहरा असंतोष व्यक्त किया. साथ ही पिछले वर्ष यानि 2006 में मारे गए 13 छापों को अपर्याप्त मानते हुए सरकारी कार्यवाही को बढाने के सख्त निर्देश भी दिए. अगर वाकई ऐसा हो पाया तो खाद्य अपमिश्रण (रोकथाम) अधिनियम 1955 एवम संशोधन 2005, गैर कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम 1967 एवम संशोधन 2004 के कई मामले सामने आ सकते हैं.

यहीं यह भी गौर तलब है कि जुलाई 2007 में नकली वोवेरॉन, कालपोल, कोरेक्स, बेनाड्रिल आदि का राष्ट्रीय स्तर पर गैरकानूनी कारोबार करने वाले एक जाल को मेरठ, मुजफ्फरनगर, गाज़ियाबाद, दिल्ली आदि में दबोचा गया था. इन छापों में आपत्तिजनक व्यापारिक साठगांठ और करोडों के अवैध लेन-देन का भाण्डाफोड भीहुआ था. यह भी पाया गया था कि इस जाल द्वारा डृग्स एण्ड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940, सीपीए 1986, सेल ऑफ गुड्स एक्ट, 1930, अनुचित व्यापार अनुबन्ध, वित्तीय अधिनियम 2005 आदि के प्रावधानों का भी सरे आम उल्लंघन हुआ है. यह तो टिप ऑफ द आइसबर्ग था.

दवा उद्योग भी नकली दवाओं के इस फलते फूलते कारोबार से बेहद चिंतित है. उसने सरकार से अनुरोध किया है कि वह लगभग दस हज़ार नमूनों की प्रयोगशाला जांच कराये. मगर, सरकार तो अपनी चाल से चलती है. इसे कछुआ चाल भी कहा जाता है. सरकार ने इस अनुरोध को कोई खास तवज्जोह नहीं दी है. दवा उद्योग ने तो अपने तरफ से नकल प्रूफ और टेम्पर प्रूफ पैकिंग की योजना भी बनाई है. लेकिन जो लोग अपने लाभ के लिए दवा के नाम पर जहर बेचने को तैयार बैठे हैं, उन पर तो इन प्रयासों से कोई असर पडेगा नहीं. भोली-भाली जनता को उनसे तो तभी मुक्ति मिल पाएगी जब सरकार अपनी कुम्भकर्णी नींद से जाग कर उनके विरुद्ध कोई सख्त कार्यवाही करने का मन बनाएगी.

तब तक तो आप हम को राम भरोसे ही रहना है!

[प्रणय एक सुपरिचित कंज्यूमर एक्टिविस्ट और विधि-शोधार्थी हैं. आजीविका के लिए वे विगत 30 सालों से दवा प्रतिनिधि हैं.] 

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