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हलचल

कथा आनन्द
हमारे यहां कुछ ऐसी रिवायत बन गई है कि साहित्य कला और विचार को एक बहुत
छोटे-से तबके तक सीमित कर दिया गया है. जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में
कार्यरत लोग अक्सर इनसे अपने आप को अलग ही रखते हैं. यह स्थिति अच्छी तो
नहीं है, मगर है. लेकिन, जयपुर में पिछले दिनों कुछ ऐसा हुआ कि अपनी इस
धारणा में संशोधन करने की ज़रूरत महसूस हुई. हम लोग बैंकों से यह उम्मीद
क़तई नहीं करते हैं कि वे साहित्य, कला आदि के प्रति कोई अनुराग प्रदर्शित
करेंगे. लेकिन, बैंक ऑफ बडोदा ने अपने शताब्दी वर्ष के अवसर पर, हिन्दी
माह में एक ऐसा आयोजन किया कि मन खुश हो गया. आयोजन का शीर्षक था ‘कथा
आनन्द’. कथा आनन्द में तीन सुपरिचित कहानीकारों मुंशी प्रेमचन्द,
फणीश्वर नाथ रेणु और वाज़िदा तबस्सुम की कहानियों को मंचित किया गया.
मंचित किया गया कहने की बजाय सही होगा यह कहना कि प्रस्तुत किया गया. इन
कथाकारों की क्रमश: ‘ईदगाह’, ‘न जाने किन्हीं वेश में’ और ‘उतरन’
कहानियों को इतनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया कि बार-बार पढी गई इन
कहानियों के अनेक नए अर्थ खुले. कहानियां तो खैर दम-दार थी हीं, सशक्त
अभिनय और कल्पनाशील प्रस्तुति ने चार चांद लगा दिए. इन कहानियों के
अतिरिक्त दुष्यंत कुमार की तीन गज़लों को भी प्रस्तुत किया गया. कथा
प्रस्तुतियां यद्यपि अलग-अलग निर्देशकों की थीं, पूरे कार्यक्रम की
परिकल्पना जाने माने रंगकर्मी अशोक राही और उनके पीपुल्स मीडिया थिएटर की
थी. बैंक ऑफ बडोदा ने यह कार्यक्रम प्रस्तुत कर साहित्य और कला प्रेमियों
की प्रशंसा तो अर्जित की ही है, उत्कृष्ट रचनाशीलता और सार्थक विचार को
एक बडे जन समूह तक पहुंचाने का शानदार प्रयास कर कॉर्पोरेट सेक्टर को एक
नई राह भी दिखाई है. इस पूरे आयोजन के लिए बैंक ऑफ बडोदा के राजभाषा
महाप्रबन्धक जाने माने कथाकार हरियश रॉय की जितनी सराहना की जाए, कम है.
यह आशा की जानी चाहिए कि बैंक ऑफ बडोदा तो इस सिलसिले को जारी रखेगा ही,
अन्य प्रतिष्ठान भी ऐसे आयोजन करेंगे.
हलचल

लघु पत्रिकाएं बौद्धिक विस्फोट का काम करती हैं: संजीव
9 सितम्बर 2007 को जयपुर में लघु पत्रिका दिवस समारोह आयोजित किया गया.
अध्यक्षता ‘कृति ओर’ के सम्पादक वरिष्ठ कवि विजेन्द्र ने की. ‘हंस’ के
कार्यकारी सम्पादक, वरिष्ठ कथाकार संजीव मुख्य अतिथि थे. इसी समारोह में
नव प्रकाशित पत्रिका ‘अक्सर’ के प्रवेशांक का लोकार्पण भी किया गया.
पत्रिका के प्रधान सम्पादक डॉ हेतु भारद्वाज ने अतिथियों का स्वागत करते
हुए लगु पत्रिका आन्दोलन का परिचय दिया.
’वैकल्पिक मीडिया के रूप में लघु पत्रिकाएं – एक सम्भावना’ विषय पर बोलते
हुए सुपरिचित आलोचक डॉ माधव हाडा ने कहा कि आज मीडिया एक वर्चस्व समाज बन
गया है और उसके केन्द्र में समृद्ध मध्य वर्ग और युवा है. गरीब, व्रऋद्ध
और अभावग्रस्त जन समुदाय मीडिया से लगभग गायब है. वर्चस्ववादी मीडिया के
दुष्प्रभावों को लेकर पश्चिम के लोग भी चिंतित हैं. इस परिदृश्य में
मीडिया से गयब होते जन समुदाय को केन्द्र में रखकर लगु पत्रिकाएं
वैकल्पिक मीडिया का काम कर सकती हैं. यह काम कठिन तो है, लेकिन ज़रूरी है.
मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए जाने-माने कवि और विचारक नन्द भारद्वाज
ने कहा कि लघु पत्रिका का प्रमुख काम बडे सामाजिक संघर्ष के आगे बढाना
है. बडे रचनाकारों ने लघु पत्रिकाएं निकालने का जोखिम उठाया है जिससे
बेहतरीन साहित्य पाठकों के सामने आ सका. लघु पत्रिका आन्दोलन के साथ ही
जनवादी आन्दोलन का भी उन्मेष हुआ. लघु पत्रिकाओं ने स्थानीयता को
योजनबद्ध तरीके से रेखांकित किया है. वे रचनाशीलता को सबसे ज़्यादा महत्व
देती हैं.
समारोह के मुख्य अतिथि संजीव ने कहा कि जॉर्ज़ पंचम के भारत आगमन पर
हिन्दी के सभी कारों ने उनकी प्रशंसा की थी लेकिन ‘मर्यादा’ जैसी लघु
पत्रिका ने संघर्ष का मार्ग अपनाते हुए जॉर्ज़ पंचम का विरोध किया था. लघु
पत्रिका बौद्धिक विस्फोट का काम करती है. उसका कार्य साहित्य के साथ ही
अन्यान्य विषयों को रेखांकित करना भी है. साहित्य में कुछ भी वर्जित नहीं
है. यदि रचनाकर्म वैचारिकी से अलग है तो उसका महत्व अधिक नहीं होगा.
कॉरपोरेट जगत की पत्रिकाओं और मीडिया से लडना लघु पत्रिकाओं के समक्ष एक
बडी चुनौती है. समय का तकाज़ा यह है कि सभी जन संगठन मिलकर असामाजिक
शक्तियों से लडे और लघु पत्रिकाओं को अपना हथियार बनाएं. हमारे लिए चिंता
का विषय यह भी है कि जन-संघर्ष में युवा वर्ग आगे नहीं आ रहा है. विकास
के नए आयामों के इस दौर में लघु पत्रिका का स्वरूप क्या हो, इस पर भी
विचार होना चाहिए.
आयोजन की अध्यक्षता करते हुए कवि विजेन्द्र ने कहा कि उन्हें लघु पत्रिका
शब्द पर आपत्ति है. इसका नाम जन पक्षधर पत्रिका होना चाइए. वैसे भी आज
रामायण और महाभारत के आकार की पत्रिकाएं निकल रही हैं, उन्हें लघु कैसे
कहा जा सकता है! जो लोग लघु पत्रिकाएं निकाल रहे हैं उन्हें यह तै करना
होगा कि उनका मुख्य कार्य जन पक्षधर मूल्यों की रक्षा करना है. यदि लघु
पत्रिका जन पक्षधर मूल्यों के प्रति समर्पित है तो ही वह समाज के बदलाव
में कुछ मदद कर सकती है, अत: यह निर्णय तो करना ही होगा कि हम किस ओर
हैं. यह देखना भी ज़रूरी है किलघु पत्रिकाओं के केन्द्र में जनपद भी हों,
केवल महानगर ही न हों.
सभी वक्ताओं ने ‘अक्सर’ के उज्ज्वल भविष्य की कामना की.
समारोह का संचालन ‘अक्सर’ के सम्पादक वरिष्ठ कवि गोविन्द माथुर ने किया.
विवरण : बनवारी लाल आर्य.
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आज भी नारी कठपुतली के समान
जाने माने साहित्यकार डॉ सोहन शर्मा ने कहा है कि आज भी स्त्रियां
पौराणिक कथा ‘सिंहासन बत्तीसी’ की प्रतीकात्मक कठपुतलियों के समान हैं.
जब तक महिलाओं को उत्पादन कर्म में सहभागी नहीं बनाया जाएगा, तब तक शोषण
मुक्त नारी की कल्पना साकार नहीं हो सकेगी. वे जयपुर प्रगतिशील लेखक संघ
की ओर से आयोजित डॉ विश्वम्भरनाथ उपाध्याय के नव प्रकाशित उपन्यास ‘अभिनव
सिंहासन बत्तीसी’ पर परिचर्चा में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे.
जयपुर दूरदर्शन केन्द्र के निदेशक नन्द भारद्वाज ने कहा कि उपन्यासकार ने
तथाकथित पूंजीवादी जनतंत्र में श्रमिक व नारी के शोषन को शिद्दत से महसूस
कराया है. नागपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की अध्यक्षा डॉ उषा
साजापुरकर ने कहा कि महिलाओं को स्वविवेक से निर्नय लेने होंगे.
कार्यक्रम का संचालन डॉ राघव प्रकाश ने किया.
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नए लेखकों के सामने गम्भीर चुनौती
जाने माने चिंतक प्रो. योगेश अटल ने कहा है कि आज हिन्दी के नए लेखकओं को
गम्भीर चुनौतियों का सामना करना पड रहा है. वे राजेन्द्र कुमार शर्मा की
नव प्रकाशित पुस्तक ‘अंतिम पडाव’ के लोकार्पण के अवसर पर शब्द संसार
जयपुर की ओर से आयोजित गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में सम्बोधित कर
रहे थे. उन्होंने कहा कि आज तेजी से बदलते समाज में गद्य और पद्य का फर्क़
मिटता जा रहा है. आयोजन के विशिष्ठ अतिथि नन्द भार्द्वाज ने कहा कि
कहानी सम्वाद का सबसे प्रभावशाली जरिया है. श्री कलानाथ शास्त्री ने कहा
कि साहित्य में वेदना और ललक परिलक्षित होती है. डॉ हेतु भारद्वाज का मत
था कि कहानी जीवन के यथार्थ को चित्रित कर तमाम विद्रूपताओं को उखाडती
है. समारोह की अध्यक्षता डॉ हरिराम आचार्य ने की.
संचालन नाथूलाल महावर ने किया.
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पाठक मंच गोष्ठी
राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर और हिन्दी विश्व भारती बीकानेर के
संयुक्त तत्वावधान में अकादमी की पाठक मंच योजना के अंतर्गत श्री हरदर्शन
सहगल की संस्मरणात्मक कृति ‘झूलता हुआ ग्यारह दिसम्बर’ पर एक गोष्ठी
आयोजित की गई. डॉ सुलक्षणा दत्ता ने इस पुस्तक पर ‘शब्दों की अधरझूल’
शीर्षक से अपना आलेख पढा. श्रीमती प्रीति कोचर, अशफाक़ कादरी, नदीम, रवि
पुरोहित, आदि ने अपनी प्रखर टिप्पणियों से गोष्ठी को सार्थक बनाया.
रचनाकार श्री सहगल ने कहा कि रचनाकार की तो यही आकांक्षा रहती है कि उसकी
कृति को पाठक मिलें.
गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ मदन केवलिया ने की और संचालन किया रामनरेश सोनी
ने.
विवरण : देव शर्मा
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