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कवि होना क्या है? क्या वह एक संतापित
व्यक्ति है? एक पीडित आत्मा जो अपने ही भीतर एक घायल की तरह टहलती है? या
वह समय और समाज को दर्ज करने वाला गवाह और लेखाकार है? या अपने समय का
कोई हीरो है, कोई फरिश्ता जो अपने टूटे-नुचे पंखों के बावज़ूद अपने को
लोगों के स्वप्नों में प्रकट होते हुए देखने की उम्मीद करता रहता है? या
वह एक मामूली मनुष्य़ है, सौदा-सुलफ करता हुआ, घर-गृहस्थी चलाता, सिगरेट
पीता और सोता-जागता हुआ? क्या वह सिर्फ स्मृति में, सिर्फ कल्पना में
छलांग लगाता रहता है और उनके बीच भीषण रूप से मौज़ूद वर्तमान को धकेलता
जाता है? क्या वह पलायनवादी है या चीज़ों के बीचों-बीच खडा, अनुभवों के
रक्त में डूबा हुआ व्यक्ति है? क्या वह खाते-पीत इस समाज में शोकसन्देशों
का वाहक, बुरी खबरें फैलानेवाला संवाददाता है या चीज़ों में अचानक
प्रसन्नता और उजाला भरने वाला कोई अवतारी पुरुष? क़्या वह मानवीय
आवेगों-संवेगों का पीछा करने वाला जासूस है या राशन, दूध, दवा, किराये और
नौकरी के अपने ही बनाये जंजाल में एक मकडी की ही तरह किसी छिपी हुई जगह्
में किसी हाशिये पर जीवन बिता देता है? कवि की उस प्राचीन छवि का अब क्या
हाल है जिसमें उसे ‘परिभू: स्वयंभू’ बताया गया है? क्या वह एक शास्त्रीय
किस्म का ऋषितुल्य व्यक्तित्व है जिसे कविता का चोगा धारण किये हुए हमेशा
समाज के आगे-आगे चलने दिया जाता है या वह भीड में शामिल एक निरीह है, कोई
भी व्यवस्था जिसका शिकार कर सकती है? क़्या वह समाज में परिवर्तन लाने
वाली शक्ति है या उसकी तरफ एक संकेत भर है?
पता नहीं, पर मैं कवि की एक स्वप्निल,
चमकती हुई और अयथार्थ छवि और उसकी मामूली, लगभग लाचार, वास्तविक स्थिति
के बीच एक दुविधा में झूलता रहता हूं. कवि की स्थिति, उसकी जगह, उसकी
नियति मुझे चकित किये रहती है. किसी ने, शायद रॉबर्ट लॉवेल ने लिखा है कि
कविगण एक अनिवार्य, निरंतर बारिश में खडे रहते हैं और जब कभी किसी कवि को
बादलों से कडकती बिजली छू जाती है तो यह उसका सौभाग्य होता है और वह
सचमुच कवि हो जाता है,. यह बात काफी चमकदार है. बिजली की ही तरह. बशर्ते
कि बिजली छू जाने पर भी वह बचा रहे..............
दुनिया में कितनी महान कविता मौज़ूद
है, कितने बडे कवि हैं. नेरूदा, नाज़िम हिक़मत, लोर्का, यानिस रित्सोस,
ब्लादिमीर होलान, साइफर्त, बेर्टोल्ट ब्रेश्ट, ज़्बीग्नीयेव हेर्बेत,
एर्नेस्तो कार्देनल, रूज़ेविच, वास्को पोपा, चेस्लाव मिवोश, एमिखाई,
निराला, शमशेर, फैज़, मुक्तिबोध... और भी कितने ही, कई सौ महाकवि जिनकी
रचनाएं इस संसार को बार-बार सम्मान के साथ रहने और जीन योग्य बनाती जाती
हैं.
--मंगलेश डबराल
’एक बार आयोवा’ में
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