सुबह उठते ही
अखबार की हेड लाइन पर नजर गई कि चौंक पड़ा। प्रधानमंत्री जी ने देश की जनता को
सूचना का अधिकार का तोहफा दिया। भारत इस तरह का 55 वां देश है जहां सूचना का
अधिकार जनता जनार्दन को दिया गया है। मुझे लगा कि मानो गोपनीयता की दीवार ढह गई
हो और सूचनाएं बाढ़ के पानी की तरह नियम कायदे के बांध को रौंद रही है। खैर, जो
हो, वह तार तार हो। चुनांचे, बात भी वजन की है - अरे जो जनता के फायदे का काम हो,
उसमें परदा क्या ? अब कोई भी दस रूपल्ली में अपनी फाइल देख सकता है, पढ़ सकता है,
नोट कर सकता है। कुल जमा यह कि निहायत पारदर्शी व्यवस्था - आर पार, सब कुछ साफ
साफ। सूचना का अधिकार देकर देश ने बड़ा काम किया है। वैसे भी सूचनाएं बाहर आने के
लिए पहले से ही मचल रही थी। मचले भी क्यों न ; जिसके लिए वह लिखी जाती है, आखिकार
उसे वह तो जाने भी और पढ़ें भी।
सूचनाओं को अब सत्ता
के गलियारों से चौपालों तक भेजने का काम बेहद जोखिम भरा है। यह कब किसे, किस तरह
और किनकी मौजूदगी में वरण करेगी, इसके लिए प्रदेश सरकार अभी नियम कानून बनाने में
लगा हुआ है। हर सरकारी महकमा जन सूचना अधिकारियों की लम्बी फेहरिस्त जारी कर रहा
है। यह जन सूचना अधिकारी कैसे जन की मांगी गई सूचना को मुहैया करायेगे, इसके लिए
चिंतन चल रहा है। सूचना को कैसे ग्रहण किया जायेगा और उस पर किस तरह जनता अपना
पक्ष रखेगी अथवा वह उसे वैसे ही स्वीेकार करेगी, यह सारे विषय अभी भी अबूझ पहेली
की तरह है।
हमें वह सब जानने
का अधिकार है, जो व्यवस्था या तंत्र हमारी भलाई के लिए कर रहा है। पर हमारे
अधिकारों के साथ यदि यह मजाक हो कि चोर से कहो कि चोरी करे, और दरोगा से चोरों को
पकड़ने की ताकीद भी दो, नहीं ऐसा नही चलेगा। हम अभी भी इतने साक्षर नही हुए है कि
शासकीय पंजे की सूचना के मकड़जाल से बिना उलझे बच सकें। हम पानी पी पी कर सदैव
पारदर्शी तन्त्र की बात करते नही अघाते है, पर आपको यह नही लगता है कि आज के समय
में पारदर्शिता सिवाय नारे के अलावा कुछ और भी है ? पारदर्शी-स्वच्छ-प्रशासन
होर्डिंग के लिए चलेगा, पर इसे अंदर तक जोड़ने में खतरे है। अरे साफ साफ क्या
दिखेगा - महाभारत में भीष्म के सामने अर्जुन - यहीं न। कभी कभी कुछ बाते नारों के
लिहाज से सही होती है और उन्हें भीड़ में कहना बेहद मुनासिब होता है, पर जब उन्हें
अमली जामा पहनना हो, तो कलेजा मुंह पर आन पड़ता है।
कारपोरेट सेक्टर तो
सूचनाओं को टहलाने में बहुत आगे है। उनके आफिस में घुसिये तो सबसे पहले उनका विजन,
फिर उनका मिशन सब सुंदर सलोने अक्षरों में सजा मिलेगा। आप को बता कर चाशनी में
सान कर छुरा घोपेंगे। लोगबाग घुपवाते है। उनसे बहस की कोई गुंजाइश नही क्योकि
सूचनाएं आपको पहले से ही परोसी जा चुकी है। जो है, सो है। फिर कस्टमर कष्ट में नही
रहें तो खुशी में कब रहेगा।
सूचना का अधिकार उसी
तंत्र में सफल रहा है जहां साक्षरता का प्रभाव रहता है। हम इसी में खुश कि सरकार
से यह फाइल तो देखने में मिल गई। क्या नही किया इसे देखने के लिए, छुटके से बड़े
बाबू तक कितना बंद मक्खन खिलाकर चाय पिला डाली। कम से कम दस रूपये में फाइल देखने
को तो मिली। अब देखी गई फाइल में गंडा-ताबीज बांधे या मंतर-जंतर करें, किन्तु यह
चलेगी अपने ही हिसाब से। अभी देश में सूचना पाने की तमीज का विकास होना भी बेहद
जरूरी है। इस तंत्र में आम आदमी की बात व्यवस्थाधारी धैर्य के साथ सुन भर ले, तो
वह अपने आपको धन्य मानने लगता है, भले उसका काम हो या न हो। वह इसी में मस्त रहता
है। चार जगह कहता फिरेगा - साहेब बहुत नीक मनई कमसकम बात तो सुन लीन्ह, अब काम तो
ऊपर वाला चाही तबहि होईहैं, वरना ना होई - इसी आदमी को हम सूचना का अधिकार दे रहे
है।
आम जनता को सूचना
के अधिकार देने से एक क्षेत्र ऐसा भी उगेगा जो सूचनाओं की पहुंच के दलाल वर्ग का
होगा। वाराणसी के पण्डों की तरह घाट बंट जायेंगे। फिर ये अपना चौका, ये बड़के भैया
का। इससे दूरी बनी रहें इसलिए आम जनता को सरकारी तंत्र की सूचनाओं की प्राप्ति
हेतु विशेष प्रकार के प्रशिक्षण प्रकोष्ठ बनाने होंगे। सरकार का मजा इसी में कि
जनता जनार्दन सूचनाएं तो पा रही है। वह आंकड़ों के आधार पर घोषणा करेगी - हमने इतने
लोगों को सूचनाएं दी है। व्यवस्था में अब पारदर्शिता आ चुकी है और हमारा लक्ष्य -
भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्ति का है -। दरअसल सूचना के अधिकार देने का मकसद भी यहीं
है कि व्यवस्था में लोगों का भरोसा बनें और उन्हें शासन के कार्यों को जानने का
हक रहें। पर यहां, जो स्टेटमेंट में होता है, वह कार्यप्रणाली से कोसों दूर, जैसे
: सरकारी अस्पताल में आपरेशन की फीस जमा करने वाले के सर के ऊपर आयल पेंट से लिखा
मिलेगा कि निर्धारित धनराशि से जो कर्मचारी अधिक धन की मांग करें, उसकी सूचना
मुख्य चिक्त्सिा अधीक्षक से करें, तो क्या वहां पर इस स्पष्ट सूचना के बावजूद
अधिक धनराशि की मांग नही होती है ?
फील गुड की तरह सूचना
का अधिकार न बन सकें, इसलिए करनी और कथनी में अंतर की खाई को पाटना बेहद जरूरी
है। जनता की खुशहाली जरूरी है न कि उसकी खुशफहमी। सूचना के अधिकार के बावस्ता
तंत्र में ओपनीयता आयेगी और बरतानिया समय का कानून धीरे धीरे विदाई लेगा, ऐसा
विश्वास करना ही होगा। --------
'सूर्य सदन' सी-501सी,
इंदिरा नगर, लखनऊ,
0522-2345752, मो0 9450003746
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प्रतिक्रिया
*
एक नेता के धंधा बदलने से भिखारियों में मचा
हड़कंप
-
अविनाश वाचस्पति
देश भर के भिखारियों में एकाएक हड़कंप मच गया
है। वजह सिर्फ राजधानी दिल्ली में आजादी के साठ बरस होने से दो दिन पहले इस धंधे
में एक नेता का जंपियाना रहा है। भिखारियों ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रशन बना
लिया है।
गांधीगिरी को अपनाते हुए भिखारियों ने भीख
मांगना छोड़ दी है और अपनी सेविंग्स से ही गुजारा चला रहे हैं। अब दिल्ली के
दानवीर भिखारियों की तलाश में मारे मारे फिर रहे हैं। अपनी अपनी गाड़ियों में पूरे
परिवार के परिवार बैठ कर एक एक रुपये का चमकता सिक्का हाथ में ले, अपने सामने फैले
हाथ की तलाश में सर्च में जुटे हुए हैं पर अपनी कमाई का एक रुपया भीख देने में
सक्सेस नहीं हो पा रहे हैं।
सारे चौराहे, रेलवे स्टेशन, मंदिर, मार्केट,
पुल भिखारियों से खाली हैं। लगता है भिखारियों ने राजधानी को स्वतंत्रता दिवस के
मौके पर आजाद कर दिया है। दानदाताओं की हथेलियों की खुजली नहीं मिट रही है। कई
दानवीर तो एनसीआर से सटे शहरों में भीख दे देकर आ रहे हैं। वहां के भिखारियों की
आमदनी बढ़ने से मौज हो गई है।
ज्यादा हाईटैक दानवीर अपने कंप्यूटरों के सामने
जम गए हैं और इंटरनेट पर जीवंत भीख लेने वालों की सर्च में इंजन के इंजन खंगाले
डाल रहे हैं। पर गूगल, रफ्तार, याहू, एमएसएन, इंडियाटाइम्स इत्यादि के जरिए भी एक
अदद भिखारी को ढूंढ पाने में असफल रहे हैं। किसी भी सर्च इंजन के तलाशी अभियान
में जो भिखारी आ रहा है वो सिर्फ और सिर्फ नेता से भिखारी के धंधे में जबरन घुस
बैठे सूट बूट पहने दिल्ली के एमएलए मुकेश शर्मा पर जाकर बारंबार हैंग हो रहा
है।
इमेज में बेवसर्च करो तो हाथों में कटोरा थामे
मुकेश शर्मा, न्यूज में सर्च करो तो मुकेश शर्मा, जहां देखो, कहीं भी तलाशो
मुकेश शर्मा। नेता मुकेश शर्मा को जैसे भिखारी मुकेश शर्मा से ऑल रिप्लेस
कर दिया गया है। नतीजतन, हार्ड और साफ्टवेयर के धुरंधर भी सर्च इंजनों की इस अटकन
से बचने का न तो हार्ड और न ही साफ्ट विकल्प ढूंढ पा रहे हैं।
कवर स्टोरी में भी यही न्यूज, इंटरव्यू में भी
वही और कहीं भी किसी से भी कुछ भी जानना चाहो तो घूम फिर कर वही ढाक के तीन पात
याने एक नेता ने भिखारियों के धंधे में सेंध लगा दी। चैनलों से भी भूत नदारद हैं,
तांत्रिक गायब हैं, बलात्कार की खबरों की अहमियत खत्म हो चुकी है, अशोक मल्होत्रा
के कारनामे, अमिताभ बच्चन की जेल में डालने की चुनौती, हेमा से फिल्म में रोल
मांगने की लालू की करतूत और तो और नगर निगम सदन की बैठक में हंगामा तक की
शर्मनाक कांड को कोई तरजीह नहीं दी जा रही है। उमा खुराना की जमानत तक को कोई
तवज्जो नहीं दे रहा है।
मन में डरे हुए तो हिजड़े भी हैं कि कहीं इसने
आंखों में कजरा लगा के, अपने कमरानुमा कमर को मटका के, मूंछें मुंडवा के, गजरा सजा
के हमारी रोजी रोटी पर भी आंख गड़ा दीं तो । वे आनन फानन में इस संभावित हालात से
बचने के लिए रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं।
वैसे अभी तक इस भिखियाने की जो वजह पता चली है
वो बिजली के निजीकरण से पैदा हुई है। भिखारी के धंधे में उतरे इन कथित नेताश्री
का कहना है कि दिल्ली वालों को बिजली कंपनियों की लूट खसोट से निजात दिलाने के
लिए उन्हें यह कदम उठाना पड़ा है। जबकि मुख्यमंत्री को घेरने का यह इनका नया पैंतरा
है। सब जानते हैं कि न तो एकदम से सरकार बिजली के रेट बढ़ाएगी और अगर बढ़ाएगी भी तो
अकेले मकेश शर्मा की इस फैसले को लागू होने से रोकने की कोई बिसात नहीं है।
पर मेरे एक मित्र के अनुसार नेताओं का इस
प्रकार बौखलाना तो यह साबित कर रहा है कि जिन दिल्ली वालों को लूटने का एकमात्र
अधिकार उनका है, उसमें कोई और टांग हाथ क्यों अड़ा रहा है, इसलिए वे नौटंकी कर रहे
हैं। जबकि असलियत यह है कि दिल्ली वाले जानते हैं पर नेताओं की इस ड्रामेबाजी को
न तो भिखारी समझ पा रहे हैं और न हिजड़े। नतीजा वे टेंशन में आ गए हैं।
मीडिया में दे दाता के नाम तुझको क़े रीटेक चल
बज छप रहे हैं और इस सबका ब्रांड एम्बेसडर मुकेश शर्मा है। जो खुलकर निजी
कंपनियों की रिश्तेदारीती भाजपा से साबित करने पर जुटा हुआ है। मुकेश ने अपनी सैलरी
का चेक बीएसईएस के नाम काटकर मुख्यमंत्री को भिजवा दिया था परंतु सीएम के टके से
उत्तर और चेक वापस पाकर वे खींसे निपोर रहे हैं पर इस डर से खंबा नहीं नोच पा रहे
हैं कि कहीं खंबे में करंट न हो और उनके पंजे ही झुलस जाएं। पर फिर भी आज की सबसे
हॉट और सेलेबल स्टोरी नेता से भिखारी के पेशे में घुसकर ख्याति पा गए अब आप ही
बतलाएंगे मुकेश शर्मा है।