नवम्बर2007

   

                      

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  पुस्तक समीक्षा  

  

स्वयंसम्पूर्ण कविता का स्वप्न

 

गिरिराज किराडू     

 

अस्तित्व की सार्थकता पर

कभी सोचती नहीं थी

रोज़ रात को धो देती थी

मेरी स्कूल की कमीज़

सोने से पहले.

सुबह जल्दी उठकर खाना बनाती थी

फिर नौकरी पर जाती थी

हमें जगा कर

सोचती नहीं थी

मानव की नियति के बारे में.

दोपहर को लौटकर

झाडू लगाते और शाम को

पिताजी की चाय बनाते

उसके मन में कभी नहीं उठे

अस्मिता के प्रश्न.

कब सोचती आखिर

जिजीविषा के बारे में -

उसे सब्ज़ी लानी होती थी

हिसाब करना होता था

बनिये का

और छह घण्टे की नींद

एक बहू के सपने देखने को ही

काफी नहीं होती

      कब देखती आखिर

एक सन्तुलित समाज का सपना.

(अस्तित्व, पृ. 19) 

‘अस्तित्व की सार्थकता’, या ‘मानव की नियति’ पर कभी न सोचने वाली कविता, कविता जिसके मन में ‘कभी नहीं उठे’ अस्मिता के प्रश्न, जो इतनी व्यस्त हो कि आखिर कब सोच पाए ‘जिजीविषा के बारे में’., या कब देख पाए ‘एक संतुलित समाज का सपना’, क्या ऐसी कविता भी, मां की तरह संजीव जी के लिए स्वयंसम्पूर्ण है?/होती? अपने में स्वयंसम्पूर्ण यह मां न तो अस्तित्व की सार्थकता या मानव-नियति जैसे आत्मप्रतिष्ठ (Abstract), वैयक्तिक प्रत्ययों के प्रति संवेदनशील (मननशील) है ना ही एक ‘संतुलित समाज का सपना’ जैसी सामूहिक, प्रातिनिधिक कल्पना से प्रतिश्रुत है.

इतना ही नहीं, वह ‘गुरुओं के पास’ भी नहीं जाती.

यह कविता बुद्धि, विचार एवं कल्पना की निर्मितियों – जैसे दर्शन (जिसका क्षेत्र अस्तित्व की सार्थकता/मानव नियति  आदि है) या विचारधारात्मक यूटोपिया (‘एक संतुलित समाज का सपना’) के बरक्स दैनंदिन कर्म को रखती है : यह सब न करते हुए भी मां स्वयंसम्पूर्ण है, जब तक कि वह रोज़ रात को धो दे स्कूल की कमीज़ या नौकरी जाए या दोपहर लौटकर झाडू लगाए या दूध सब्ज़ी का हिसाब करे या बहू के सपने देखे. जब तक वह अपने दैनंदिन कर्म (बल्कि इसे ‘कर्तव्य’ क्यूं न कहें) में तल्लीन है, उससे निर्द्वन्द्व एकात्म है वह स्वयंसम्पूर्ण है.

मैंने सोचा यदि कविता भी अस्तित्व की सार्थकता या मानव-नियति आदि से उलझने, या संतुलित समाज का सपना देखने जैसे काम न करती तो मां की तरह उसकी दैनंदिन कर्मशीलता में क्या-क्या होता? क्या कविता की (भी) ऐसी कोई कर्मभूमि है जिससे तादात्म होने पर उसे इन स्व-बाह्य सम्पूर्णतर, कर्मों की अपेक्षा या हिंसा का विषय नहीं होना पडेगा? 

यदि इस प्रश्न का उत्तर संजीव जी की कविताओं में ढूंढें तो हमें बहुत सहजता से मिलेगा कि उनकी कविता न सिर्फ’अस्तित्व की सार्थकता’ के यत्न को अपना विषय बनाती है बल्कि स्वयं उस सार्थकता का एक उद्धम भी है. इसी तरह मानव-नियति को उसकी वैयक्तिक व सामूहिक दशाओं व सम्भावनाओं में उपलब्ध करने का साक्ष्य भी उनकी कई कविताओं में मिलेगा. और एक संतुलित समाज का यूटोपिया (स्वप्न) भी उनकी कविताओं में बहुविध सन्दर्भित है. 

उनकी कविता – मां की तरह स्वयं सम्पूर्ण नहीं है, नहीं है तो न हो किंतु क्या वे ऐसी कविता लिखना चाहते रहे? इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने से पूर्व हम संक्षेप में इस परिप्रेक्ष्य (Context) की ओर देखें. 

‘अस्तित्व’ शीर्षक यह कविता बेहद सुचिंतित ढंग से हिन्दी लेखन के पर्यावरण को यानि काव्य-नायक के एक सार्वजनिक पर्यावरण को उसके एक निजी पर्यावरण – मां के साथ मिला देती है. मां जो नहीं कर पाती है -अस्तित्व की सार्थकता/मानव नियति पर विचार- वह हिन्दी लेखन के एक ध्रुव का लगभग प्रमुख अभिव्यंजक है जबकि ‘एक संतुलित समाज का सपना’ हिन्दी  लेखन/पर्यावरण के एक दूसरे ध्रुव का प्रभु-संकेतक. 

यदि मां की तरह कविता – इन दोनों अपेक्षाओं के प्रति असंवेदी हो, यदि वह वागीश शुक्ल के शब्दों में दोनों तरह के ‘दहेज’ देने से इंकार कर दे तो? 

यहां यह स्पष्ट करना उचित ही होगा कि इन पंक्तियों के लेखक के लिए कविता से स्पष्ट प्रतिबद्धता या वैचारिकता की अपेक्षा उतनी ही संघातक है जितनी उससे मानव नियति के विषय में किसी दर्शन या अध्यात्म की अपेक्षा. जिन्हेंहमने दो ध्रुव कहा उन्हें तनिक सामान्यीकरण से प्रतिबद्धता और अतिक्राम्यता के ध्रुव कहा जा सकता है. पिछले पचासेक वर्षों में शायद ही ऐसा कोई कवि हो जो इनमें से किसी भी ध्रुव को उसके चरम तक ले गया हो.

(इस लगभग सर्वज्ञात तथ्य को एक सुपरिचित पर्यवेक्षण की तर्ह सबसे पहले श्री मदन सोनी ने अपने एक निबन्ध में लिखा है जो उनकी पुस्तक उत्प्रेक्षा में संकलित है) 

यहां से हम पुन: उस प्रश्न की तरफ जा सकते हैं कि क्या ये मां की तरह स्वयंसम्पूर्ण कविता लिखना चाह रहे थे? इस प्रशन और इसके सम्भावित सकारात्मक उत्तर के सम्भावना इसलिए भी अधिक है कि संजीव पिछले चालीस-पचास बरसों में इन ध्रुवों के बीच, बिना इनसे पूर्नत: संक्रमित/पूर्णत: इम्यून हुए विचरण करने वाले बेहद थोडे-से दो-तीन कवियों में हैं और ऐसा ही कोई कवि स्वयंसम्पूर्ण कविता, सम्पूर्णनिरपेक्ष-सम्पूर्णसापेक्ष कविता करने की आकांक्षा का अधिकारी होगा. 

उनके काव्य का सम्भवत: सबसे आकर्षक और सबसे अभिव्यंजक चिह्न उसमें किसी समावेशी स्वयंसम्पूर्ण रूप या तत्व का अभाव है. उनकी लगभग प्रत्येक कविता पिछली कविता से भिन्न किसी दिशा/रूप में गतिशील है. वे उन कवियों में हैं जिनका कोई ‘अपना मुहावरा’ इसलिए नहीं है कि वे निरंतर मुहावरे की प्रत्यावर्तनीयता और उसके आपात-स्थगन में ही कविता लिखते हैं. संग्रह की एक कविता अपने लिए शोक-गीत में वे इन दोनों ध्रुवों दोनों प्लेटफॉर्म्स की अपेक्षाओं/प्रवृत्तियों का बेहद दो टूक बयान करते हैं : 

जब बर्दाश्त भी न हो

ज़िक्र तक

मौत का

और सुना भी न जाए

प्यार का अफसाना 

जब लगने लगे अश्लील

आकांक्षा, उपलब्धियों की

बात तक करना

और शर्मनाक हो जाए

कविता में रोते रहना

जब जानना हो अनिवार्य नियम

और जिज्ञासा

निषिद्ध कुकर्म (पृ. 71)

 

यह एक ऐसी द्विध्रुवीय पर्यावरणता है जिसमें मृत्यु और प्रेम का अफसाना लिखना आपराधिक है और मुक्ति एक गैर-आनुभविक प्रतीति भर. उनकी कविता सदैव एक तीसरी सम्भावना की कविता है और उस कविता की भी जो मां की तरह सवयंसम्पूर्णहो. समाप्त करन से पूर्व इसी कविता अस्तित्व के अब तक जानबूझकर अविचारित हिस्से को दुबारा पढें:

उसका नाम

केवल प्रमाण-पत्रों में दर्ज़ है

और यही है

उसके नाम की सार्थकता

            (उससे पूछो)

वह ज़िन्दा रखे है

     तमाम उन सालों को

     जिन्हें पूछने वाले का

     नाम

     कई लोग जानते हैं.

वह इससे खुश है.

     जाती नहीं है कभी

     गुरुओं के पास

     सम्पूर्णता  की तलाश में.

     मेरी मां

     स्वयंसम्पूर्ण है.

 

(अस्तित्व, पृ. 20) 

काव्य-नायक यहां मां का प्रतिनिधि है, वह सवाल पूछता है, वे सवाल जो मां स्वयं नहीं पूछती, जिनके बारे में सोचती तक नहीं किंतु जिन सवालों को जिन्दा रखे हैं वो. पूछता काव्य-नायक है, वह प्रतिनिधि है. यदि कविता स्वयंसम्पूर्ण हो तो उसका प्रतिनिधि कौन होगा? अपनी स्वयं-पर्याप्त कर्मशीलता में कविता जिन प्रश्नों को जीवित रखती है, उन्हें पूछेगा कौन? और कहां?

मां का नाम केवल प्रमाण-पत्रों में दर्ज़ है, जैसे कि खुद कवि का नाम उस प्रमाण-पत्र में दर्ज़ है जिसे उसकी कविता की किताब माना जाता है किंतु मां इससे खुश है कि इन सवालों को पूछने वाले का नम कई लोग जानते हैं? अपनी नामहीनता में, अपनी नामहीनता की कीमत पर कविता अपने प्रतिनिधि की नामवरी में खुश है? प्रतिनिधित्व व नाह-हरण के इस दिलचस्प सम्बन्ध को एक प्रश्न की ही शक्ल में छोडते हुए समापन के लिए एक ऐसी कविता पढें जो हमारी सारी अटकलों के कुछ करीब हो : 

धूप का तिरछा

            कटा 

            टुकडा

     अचानक तना

     धागे-सा.

 

     उलझ कर लडखडाया मैं.

 

(लडखडाया मैं. पृ. 14)  

[हिन्दी के सुपरिचित कवि, कथाकार और आलोचक-विचारक श्री गिरिराज किराडू लक्षमणगढ(जिला सीकर, राजस्थान) स्थित मोदी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एण्ड साइंस में प्राध्यापक हैं.] 

आधार कृति

मिले बस इतना ही

 (काव्य संग्रह)

(स्व.) संजीव मिश्र

सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर

प्रथम संस्करण, 2007

मूल्य 125.00 .............                            

 

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एंटीगनी (ग्रीक नाटक)

- डॉ दुष्यन्त  

जिस सूचना क्रांति या कहें सूचना विस्फोट के युग में हम जी रहे हैं वहाँ थियेटर की भूमिका बहस का मुद्दा हो सकती है पर जब तक जीवनधारा प्रवाहित है, कलाओं की अहमियत में इजाफा ही होना है और थियेटर भकतई इसका अपवाद नहीं है। रंगकर्मी जेड़ी अश्वथामा के शब्द याद आतें हैं जब वो कहते हैं कि ''थियेटर सिनेमा और टीवी से अलग विधा है। आज जब हम टीवी और सिनेमा के युग में जी रहे हैं तो थियेटर की भूमिका और जरूरत टीवी और सिनेमा से अनेक समानताओं के बावजूद एक अलग और महत्वपूर्ण स्तर पर कायम है।'' यूनान को दुनिया में थियेटर के जनक देशों में एक माना जाता है और सोफोक्लीज (496-406 ईपू)  ग्रीक थियेटर का दूसरा महान नाटककार था, उसके सौ नाटकों में से संप्रति सात ही मौजूद है - अजैक्स, एंटीगनी, इडिपस दी रेक्स, फिलोसटेटिस, एलेक्ट्रा, वीमन एट ट्राचिस, इडिपस एट कोलोनस। उसके अधिकांश नाटक मनुष्य और उसकी नियति के संघर्ष को प्रस्तुत करते हैं। कितना खूबसूरत और दिलफरेब विरोधाभास है कि उसके पात्र पराजय में विजयी होते हैं, विजय में पराजित होते है, पर उसकी समस्त संघर्ष प्रक्रिया सोद्देश्य है हर पात्र जीवनस्थितियोको परिवर्तित करने को उद्यत है। एन्टीगनी उसी यूरोप की धरती से निकल कर आया नाटक है जहां थियेटर, पुन: जेड़ी क़े शब्दों में कहूं तो  'लोगों की रोजमर्रा की जिन्दगी का हिस्सा है, वहां के लोगों की आदत में शुमार है, उनकी एक हसीन शाम का जरूरी हिस्सा है।'

वरिष्ठ रंगकर्मी रणवीर सिंह द्वारा सद्य: अनूदित सोफोक्लीज का नाटकएंटीगनी सोफोक्लीज और ग्रीक थियेटर के साथ मानवीय संघर्ष को चर्चा के केन्द्र में लाने का प्रयास है। एंटीगनी स्त्री पात्र है और वह जन अधिकारों के लिए लड़ने में अपना सर्वस्त्र बलिदान कर देती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, स्त्री विमर्श, वैयक्तिक अस्तित्व जैसे विचार बिन्दु एंटीगनी के माध्यम से रणवीर सिंह हमारे सामने रखते हैं क्योंकि जनता और सत्ता के बीच टकराहट और उसकी बुलंद आवाज का नाम है एंटीगनी। सत्ता को चुनौती और मनुष्य की जीजिविषा का जीवंत दस्तावेज बन जाता है एंटीगनी। ऐसी सशक्त कथा और शिल्प सोफोक्लीज की थियेटर और कला जगत को अनुपम देन है। कहना न होगा कि ऐसी कृति को हिन्दी पाठकों विशेषकर थियेटर जगत के बीच लाने का रणवीर सिंह का ये कदम इस दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि महान कृतियों को भाषाओं के दायरे में कैद नहीं रहने दिया जाना चाहिए। एक महत्वपूर्ण बात इस अनूदित नाटक की यह भी है  कि अनुवाद की भाषा हिन्दी ना होकर हिन्दुस्तानी यानी हिन्दी उर्दू मिश्रित है जो परिवेश को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करने में एक ताकत के रूप में सामने आई है। पुस्तक की भूमिका के रूप में ग्रीक थियेटर और नाटककारों पर लम्बी टिप्पणी ने पुस्तक को विद्यार्थियों के लिए अत्यन्त उपादेय बना दिया है।

उम्मीद करनी चाहिए कि एंटीगनी के माध्यम से सोफोक्लीज का ये कथन 'समझ नहीं आता कि समझदार भी समझ से काम नहीं लेते', समझदार लोगों तक पहुंच जाए। ये अनुवाद रणवीर सिंह को थियेटर एकेडमिशियन रूप में पुरजोर तरीके से स्थापित करता है, लिहाजा उनकी जिम्मेदारी बढ़नी तय है। उनके ऐसे कदम निश्चय ही गम्भीर और सार्थक थियेटर के लिए मील का पत्थर बनेगें।

समीक्षित कृति

एण्टीगनी (ग्रीक नाटक)

vuqokn & j.kohj flag]

पंचशील प्रकाशन, जयपुर,

अस्सी रुपये,

 पृ 52, 2007. 

43/17/5, स्वर्ण पथ, मानसरोवर, जयपुर

मोबाइल : 98290 83476

ई मेल :dr.dushyant@gmail.com

 

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पाठक के मर्म को भेदते व्यंग्य

 रमेश खत्री

''अगर मेरे पास हास्यबोध नहीं होता तो मैं कब का आत्महत्या कर लेता। ''

महात्मा गांधी (हरिजन  पत्रिका दिसम्बर, 12, 1928 )

 

व्यंग्य एक सामाजिक और जनतांत्रिक साहितियक रूप है। इसके माध्यम से उत्पीडित जनता की ओर से लेखक प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि सार्थक व्यंग्य सत्ता विरोधी प्रकृति से ही खूखपूरी उर्जा और सार्थकता प्राप्त करता है। बालमुकुन्द गुप्त से लेकर हरिशंकर परसाई तक प्राय: सारा का सारा हिन्दी व्यंग लेखन इसका प्रमाण है। अपने समय की राजनीति से सीधे हस्तक्षेप के बिना उसकी धार कुंद होती है। राजनीति की सान पर चढ़कर जहां वह दुधारी हो जाता है तो वहीं उसकी चमक हीरे से टक्कर लेने लगती हैं। यह अकारण नहीं है कि सार्थक व्यंग्य प्राय: हमेशा ओर सब सब कहीं सत्ता के विरोध में सामान्य जनता का भाष्य बनकर ही सामने आता है। इसी क्रम में समीक्ष्य व्यंग्य संग्रह '' खादी का रूमाल'' को रखा जा सकता है। अनुराग वाजपेयी का सद्य प्रकाशित व्यंग्य संग्रह साक्षी प्रकाशन्य से प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में अनुराग वाजपेयी के कुल जमा 34 व्यंग्य संग्रहित हैं।

अनुराग को व्यंग्य के क्षेत्र में सिद्धता प्राप्त है. इससे पहले उनका एक व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है. लेकिन इसमें संग्रहित व्यंग्यों ने अनुराग के व्यंग्य को पैनापन प्रदान किया है।उसके तीर सीधे निशाने का संधान करते हैं, देखे - '' सत्ता की भूख इन रोटियों की प्राथमिक आवश्यकता है, जब भी किसी नेता को लगता है कि अब सत्ता से बाहर रहने से उसका स्वास्थ्य बिगड़ सकता है तो वह इन रोटियों को सेंकने लगता है। '' राजनीतिक रोटियां -11 )

दरअस्ल व्यंग्य के मूल तत्व अनुराग वाजपेयी के स्वभाव में विद्यमान है, सेंस ऑफ हयूमर इस लेखक में कूट-कूटकर भरा है। सीधी-साधी चीज़ न उल्टी नज़र आती है, ना ही टेढी बल्कि मूल रूप में नंगी - '' ढाई करोड़ लोग आधे पेट रहकर देश की इज्जत का सम्मान कर रहे हैं, सरकार की पूरी कोशिश है कि ये लोग गद्दारी न कर दें, अगर ये कहीं से भी जुगाड़ करके गेहू खरीदने लायक हो गये तो हमें फिर से अमेरिका के आगे हाथ फैलाने पड़ेगे. एक अरब लोगों के परमाणु शक्ति सम्पन्न देश की प्रतिष्ठा का सवाल है। देश पूरा प्रयास करेगा कि ये लोग आधे पेट ही रहे पर इज्जत को बट्टा न लगायें। ऐसी योजना भी बनाई जानी चाहिये जिससे तीन चार करोड़ लोग और आधे पेट रह सकें ताकि हम अपनी खाद्यान्न आत्मनिर्भरता और भी बढा सकें। जिस दिन सारा देख भूखा रहना सीख लेगा वह ऐतिहासिक दिन होगा और क्या तरीका हो सकता है पर नामुराद जनता जरा-सा भी त्याग करना नहीं करना चाहती।'' ( विकास के पथ पर -58)

अनुराग वाजपेयी को व्यंग्य के टोन में महारत हासिल है तभी तो इनके व्यंग्य न केवल गुदगुदाते है वरन् मन में टीस पैदा करते हैं, कचोटते हैं - '' शाम को मंत्री जी से वे लोग मिले जिन्हें गेहूँ की जरूरत थी। उनके पसीने की बदबू से बचने को काफी देर तक उन्होने सांस तक रोक ली। इस प्राणायाम से उनकी ऑखों में पानी आ गया, लगा वे द्रवित होकर रो रहे हैं।'' ( अन्न का श्राद्ध -17 ) इन व्यंग्यों की खूबी यही है कि समाज में जो भी किंचित घट रहा है उस विषय की सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक, राजनीतिक और धार्मिक विद्रूपता को जड़मूल से पकड़कर उन पर प्रहार करना- '' अखबार पढो, लोग अकाल और भूखमरी से परिवार सहित मर जाते हैं। वे  तो अपनी जान की कीमत पर खाद्य निगम के गोदामों को भरा देखते हैं। देश में पर्याप्त अन्न की सरकारी घोषणा के बावजूद लोग भूख से मरते हैं, देश के अतिथियों, इन अफसरों और नेताओं का पेट भरते हैं। ( नरमेधयज्ञ का महातम्य-44 ) इसी तरह की तीक्ष्णता अन्यत्र भी देखी जा सकती है, देखे - '' श्रवण कुमार कुछ थक गया था, एक भवन की सीढ़ियों पर बैठ गया। मॉ-बाप भी सुस्ताने लगे। उन्हें प्यास लगी थी। वह नल पर गया। पास ही विद्यार्थी कक्षा की कुर्सियों तोड़ रहे थे। जाने कहॉ से पुलिस आई और ताबड़तोड़ लाठियां बरसने लगीं। श्रवण कुमार छात्रों बचाते बचाते चार लाठियां खां गये और गिर पड़े।'' (शिक्षा के तीर्थ में श्रवण कुमार-67)

अनुराग के पास व्यंग्य के सभी पर्याय मसलन उपहास, ठट्टा, कटाक्ष, व्यंग्योंक्ति, विडम्बना, मजाक, खिल्ली, तंज, हास्य, फब्ती मुख्य बुनियादी हथियार है जो पार्श्व में सुरक्षित है और मौका पाकर सही निशाने पर वार करते हैं, देखे - '' यात्रियों का सामान इधर-उधर बिखरा दिया गया था। चिल्ल पा मची थी। आरक्षित डिब्बा होने के बावजूद हम लोगों को उठाकर बैठा दिया गया था ओर खिड़कियों पर दूध की टंकियां लटका दी गई थीं। स्टेशन न होने के बावजूद चैन पुलिंग की सुविधा की बदौलत गाड़ी खड़ी थी। ऊपर की बर्थ के मुसाफिर ने कंबल से सिर निकालकर कहा - क्या हुआ, गाड़ी यूपी मे एन्टर कर गई क्या ? उनके कहते ही गैलरी में खड़े दो मुसाफिर उचक कर उपर चढ़ गये और उन्हें भी बैठा दिया गया। उन्हें बताया गया सुबह हो गई है और रिजर्वेशन खत्म हो गया है। '' ( प्रश्न प्रदेश बनाम उत्तरप्रदेश -85)

व्यंग्य के क्षेत्र में कम ही रचनाकार हैं जिन्होंने अपने मुहावरे ओर जबान की खोज की हो, ज्यादातर तो समकालिन लहजे और असर में सृजनकर्म करते हैं लेकिन अनुराग के पास दुर्भाग्य (सौभाग्य ) से ऐसे लक्षण परिलक्षित नहीं होते। वे एकांतिक साधक हैं और उन्हें अपने रचनाकर्म पर ज्यादा विश्वास है, वैसे भी वस्तुत: व्यंग्य अधिक कठिन डगर है। सस्ती लोकप्रियता पानी की होड़ में इस विधा में यूं तो  कई डंड पेल रहे हैं पर अनुराग के पास सामाजिक परम्परा, शिष्टाचार और आहार विहार जैसे घटित  होते मूल्यों को आज के ई-युग में ढूंढकर बताना ओर पाठक को झकझोरकर चेतना संपृक्त करना महती जिम्मेदारी है। जिसे वे अपने व्यंग्यों में बखूंबी निभाते दिखते हैं- ''डाक्टरनी इन्टरमीडिएट फेल थीं ओर उनके पिता ने एक मारूति कार ओर काफी नकदी के सहारे डॉक्टर साहब को अर्पित कर दिया था। इनके घर आते ही दो साल के भीतर वे अपने इस अलग घर में आ गई थीं पर इसका कोई गलत अर्थ नहीं है अभी उनके मन में अपने रिटायर्ड सास-ससुर के प्रति बड़ा आदर भाव था। '' ( सोना उगलनेवाला पेन -116)  अनुराग के व्यंग्यों का हर वाक्य अनुभव की भट्टी में तपकर निकला जाना पड़ता है तो उनके निशाने पर अफसर, राजनेता, सामाजिक विद्रपता, धर्म गुरूओं का पाखंड स्वमेव आ जाता है- '' शहरों में और भी तरह के देवता हैं। वे कोई भभूत नहीं देते, कोई आहुति नहीं करवाते। उनके बड़े-बड़े बंगले हैं, विदेशी हथियार सौदागर उनके भक्त हैं, राजनीतिज्ञ उनके चरणों में लौटते हैं। उन पर मुकदमें चलते हैं, वे सरकार बनाते, बिगाड़ते हैं। उनका एक पैर विमान में और दूसरा विदेश में रहता है। उनकी कृपा हो जाए तो विधायक मंत्री बन जाए। वे मुख्यमंत्री बनाने का यज्ञ करवाते हैं। ऊचे देवता हैं, नीचे नहीं देखते।'' नये लोक देवता-83 )

दरअस्ल व्यंग्य ऐसा क्षेत्र है जहां किसी भी संस्था की आचार संहिता नहीं होती किसी भी धूप की किरण, हवा कि झोंके, पानी की बूंद और चिराग की रौशनी सा कुछ भी नहीं होता रास्ता दिखाने को, व्यंग्यकार को अपनी राह स्वयं बनानी होती है और इसमें सिद्धता प्राप्त की है अनुराग वाजपेयी ने क्योंकि इनका हर एक व्यंग्य मन मस्तिष्क को रोमांचित करता है, इक्कीसवीं सदी की विडम्बनाओं से टकराता है। इसीलिए इनके व्यंग्य इक्कीसवीं सदी के व्यंग्य है - '' ये बच्चे इतने देश भक्त थे कि उन्होंने जीवित रहकर इस ग़रीब देश की खस्ताहाल अर्थ व्यवस्था को बिगाड़ना उचित नहीं समझा, उन्होंने न देश का दूध पिया और दवा ली, बीमार पड़े तो अस्पताल में डाक्टरों तक को कष्ट नहीं दिया।'' ( स्वर्ग में समाज कल्याण के दूत -119 )

समीक्ष्य संग्रह के व्यंग्यों में अनुराग अपने विचारों को अलापते नहीं, सिर्फ दृष्टिकोण के रूप से उसका इस्तेमाल करते हैं, यहीं संतुलन उनके कलापक्ष को धुमिल नहीं होने देता, किन्तु उनके कलापक्ष की भी सीमाएं हैं पर वे दूसरे तरह की है - '' मेरा सिर उसके हाथ में था, मैंने सहमति के अंदाज़ में गर्दन हिलाई तो उस्तरा लग गया और खून बहने लगा। नाई बोला- यहां एक तो गड़बड़ है, भईयाजी, तुममे, हम ठीक कर रहे हैं तुम हिल डुल रहे हो। सुद बइठो। मुझे लगा वह अर्थ व्यवस्था के लिए कह रहा है कि ठीक करने लगो तो हलचल होने लगती है। सख्ती करो तो खून निकलने लगता है।'' (अर्थव्यवस्था मेरे मोहल्ले के संदर्भ में -53 )

आम धारणा है कि व्यंग्य में विचार नहीं होता। जबकि सच तो यह है कि बिना विचार के व्यंग्य में गहराई पैदा नहीं हो सकती। व्यंग्य की पहली शर्त आक्रोश नहीं चिता है और चिंता ही विचार का प्रारब्ध होता है। इसतरह की चितंताऐं अनुराग के व्यंग्यों में यत्र तत्र सवत्र है, देखें - '' हजारों बोरे एक के ऊपर एक एक लदे थे, उन्होंने एक बोरे की गाठ खोली, उसमें से पार्टी अधिवेशन का कच्चा चिट्ठा निकला। अचानक दूसरे बोरे उछलने, खदबदाने लगे, उनमें से विचित्र आवाजे आने लगीं। किसी में समझौते के मसौदे थे तो किसी में विधायकों सांसदों की जीवनियां, किसी में प्रेस कान्फ्रेन्सों में दिये बयान भरे थे, तो किसी में पार्टी को मिले चंदे की रसीदें। एक बोरे तो एक वर्ष में जनता से किये बादे ही भरे थे, दूसरे में विपक्षी पार्टी की निंदा के मसौदे। ( पार्टी की सफाई - 24-25 )

सृजनात्मक साहित्य होते हुए भी व्यंग्य इस अर्थ में भिन्न होता है कि वस्तु जगत यथार्थ के विश्लेंषण के लिए वह भाषा, उलटकाल्पनिक स्थितियों एवं पात्रों को वस्तुजगत से टकराकर उसके यथार्थ के अंतरग को सामने ला देता है। इस तरह से व्यंग्य पाठकों को वस्तुजगत के यथार्थ को देखने का एक नया दृष्टिकोण देता है - '' वे दोनों कच्ची सड़क पर चले जहां टैंकर खड़ा था और उसमें पानी ही पानी भरा था। देवराज गद्गद् हो गये और बोले नारद यहां कुछ हो रहा है, यहॉ कुछ हो रहा है, यहॉ लोगों को पानी की समस्या नहीं होगी, तभी कोई डेढ़ दो हज़ार लोग बालटियां लेकर इकट्ठे हो गये और उन्होंने टेंकर लूट लिया। वे कह रहे थे- पन्द्रह दिन बाद पानी आया ओर वह भी हेली पैड़ सींचने के लिए।'' सीनी ऑख का पानी -73 )

बाज दफे साहित्य की दुनिया में व्यंग्यकार वह व्यक्ति है जिसे जीते जी भरसक लतियाया जाये, जिसकी उपेक्षा की जाये ओर उसके मरने पर साहित्य उदास हो जाये किन्तु अनुराग वाजपेयी का अनुभव क्षेत्र विस्तृत है। ''इन्द्रप्रस्त के दरबार में जब सुदामा पहुंचे तो पीए ने गेट पर ही रोक दिया। सुदामा ने बताया कि वे कृष्ण के बाल सखा है ओर मिलने आए हैं। पीए उन्हें वहीं बैठने को कहा और अंदर जाकर बताया मजाराज एक छोटा सा चपटी नाक वाला पहाड़ी न जाने चीन का है या तिब्बत का आपको अपना क्लासफैलो बताता है। न सिर पर टोजी है न साथ में चमचे, अपना नाम सुदामा बताता है। कृष्ण ने पीए से कहा - ठीक है उसे बिठा लो और कहो कि हम उनका नाम सुनते ही विव्हल हो गए हैं। हम जरा आधा घंटा विश्राम करके आते हैं पीए ने ऐसा ही किया। एक बंटे बाद कृष्ण जी बाहर आए, बाल बिखरे सूजी ऑखें दोनों हाथ गिद्ध के डेनों की तरह फैलाकर सुदामा को अंक में भर लिया। किसी भी उत्तर पूर्वी राजा के लिये यह पहला मौका था सो सुदामा कृत-कृत्य हो गये।

तभी वहां अर्जुन आए। अर्जुन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उनके साथ चालीस चमचे, पन्द्रह कारें, चार उद्योगपति , दस सांसद थे। कृष्ण ने अर्जुन को सुदामा से नहीं मिलवाया। सुदामा वैसे ही यह लवाजमा देखकर धरती में गड़ गए थे। '' ( कृष्ण सुदामा की नई कथा - 94-95 )

अग़र हरिशंकर परसाई और शरद जोशी को अलग रख दिया जाये तो हिन्दी साहित्य में व्यंग्य दोयम दर्जे की विधा मानी गई है, जबकि पाठक से प्रत्यक्ष संवाद तो व्यंग्यकार ही करता है। व्यंग्य लिखनेवालों के साथ बड़ी दिक्कत विचारधारा कों लेकर उत्पन्न होती है पर ऐसा परसाई के यहॉ नहीं मिलता और न ही अनुराग वाजपेयी के व्यंग्यों में क्योंकि वाजपेयी की पकड़ समय की नब्ज पर है तथा वह उसके अंकन में जल्दबाजी नहीं करते अपितु व्यंग्य को धार देने के लिए कलम को सान पर चढ़ाते हैं और यह प्रक्रिया पाठक के मर्म को भेदती है। बहुत दिनों बाद व्यंग्य की दुनिया में एक ऊं‍ची आवाज़ की आहट महसूस होती है। व्रूंग्य के नाम पर '' कागद कारे'' करनवाले लतीपेबाजों को तथा उनकी वाह! वाह! करने वालों को '' खादी का रूमाल''  अवश्य पढ़ना चाहिये।

53/17, प्रताप नगर 

                जयपुर

मो 9414373188

समीक्षित कृति
' खादी का रूमाल''

 अनुराग वाजपेयी  (व्यंग्य संग्रह )

साक्षी प्रकाशन , जयपुर.

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