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Sunday,
October 7, 2007
http://shuruwat.blogspot.com/2007/10/blog-post_07.html
जय हो जयपुर की

रविवार शाम जयपुर में साहित्यिक वेबपत्रिका इंद्रधनुष इंडिया का
पहला बर्थडे मनाया गया। मेरे पास ईमेल से एक चिट़ठी आई थी तो मैं अपने साथी और
मुंबई से आए ब्लॉगर मित्र आशीष महर्षि को साथ लेकर वहां पहुंच गया। खुशी थी कि
जयपुर में कम से कम बेव जनर्लिज्म उसके सगे संबंधियों पर सीरियसली काम तो हो रहा
है। वैसे मुझे लगता है कि ऐसा पहली बार हुआ होगा कि किसी ने वेबसाइट का जन्मदिन भी
इस धूमधाम से सलिब्रेट किया हो।
कार्यक्रम के आयोजक प्रगतिशील लेखक संघ को इस
आयोजन के लिए साधुवाद देना चाहिए जिन्होंने इस नई वैचारिक क्रांति के लिए भी फुरसत
निकाली। कार्यक्रम को भले ही वेब जनर्लिज्म गोष्ठी का नाम दिया गया हो,
लेकिन
इसमें हॉल की सारी कुर्सिया भरी हुई थीं। लोग कार्यक्रम में जिसके भी बुलावे पर आए
हों,
लेकिन तय है कि आयोजकों के हौसले निश्चित रूप से बढे होंगे। वर्ना आजकल
परिचर्चा जैसे कार्यक्रमों में गिनती के लोग होते हैं। एक और चीज पर मुझे खुशी हुई
कि यहां ब्लॉगर्स की भी चर्चा हुई। बार बार टीवी पत्रकारों और चैनलों को गरियाने
वाले हिंदी के बुदि़धजीवियों ने ब्लॉगर्स और एक टीवी पत्रकार रवीशकुमार के ब्लॉग
की चर्चा करके उनकी टीवी पत्रकारों की तारीफ की। कहा,
भले ही ये लोग टीवी पर कितना
भी बुरा बुरा दिखाएं,
लेकिन ब्लॉगिंग के जरिए अपनी बात तो खुल कर कह रहे हैं।

हालांकि समय पर आफिस पहुंचने की भागदौड में मैं आखिरी दो
महत्वपूर्ण वक्ता भास्कर समूह की मैग्जीन आह जिंदगी के प्रबंध संपादक यशवंत
व्यास और जयपुर दूरदर्शन केन्द्र के निदेशक नंद भारद्वाज को नहीं सुन पाया और न ही
इस पत्रिका की प्रबंध संपादक अंजली सहाय को धन्यवाद दे पाया।
जब तक मैंने सुना
तब तक डेली न्यूज के परिशिष्ठ प्रभारी रामकुमार सिंह ने अपने अनुभवों के जरिए
बताया कि कितने तेजी से युग बदला दस साल पहले जहां अखबारों के दफ़तर में
कम्प्यूटर के ठीक ऊपर बडा सा हिदायत का बोर्ड लगा होता था कि बिना अनुमति हाथ न
लगाएं। आज साफ कहा जाता है कि अगर कम्प्यूटर चलाना न आए तो अखबार के ऑफिस में आने
की भी न सोचें। इस पत्रिका के संपादक डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा कि वे चाहते
हैं कि उन्हें ऐसी ही साहित्यिक वेब पत्रिकाओं से अगर कॉम्पिटीशन करना पडे तो खुशी
होगी। अंजली सहाय ने इस मिशन को आगे बढाने में आई परेशानियों का भी जिक्र किया।
चलते चलते
दो बातें जो मुझे पूरे कार्यक्रम के दौरान परेशान करती रहीं
पहला जिन अगर गलती से किसी ने वहां दिखाई गई स्लाइड से इंद्रधनुष का स्पैलिंग
उतारा हो वे सभी ठीक कर लें,
http://www.indradhanushindia.org
ही खोलें। वहां
इंद्रधनुष से एस गायब हो गया था।
दूसरा अगर आगे से कभी ऐसे किसी प्रोग्राम में
जाएं तो प्लीज अपना मोबाइल साइलेंट मोड में रख लें,
बेवजह कार्यक्रम में व्यवधान
न
डालें।
सभी नेटीजन्स को हार्दिक बधाई
इसी आशा के साथ की हमारा परिवार
बडा हो रहा है
Posted by
राजीव जैन
at
3:28 PM
5
comments:
अनिल
रघुराज
said...
अच्छा सिलसिला है। उम्मीद है कारवां बढ़ता जाएगा,
और बड़ा होता जाएगा।
October 7, 2007 8:14 PM
संजय बेंगाणी
said...
लोग आते रहेंगे,
कारवाँ बनता रहेगा. भविष्य सुनहरा है.
खबर पहूँचे के लिए
साधूवाद. फोटो-सोटो होती तो बात और जम जाती :)
October 7, 2007 9:52 PM
संजय बेंगाणी
said...
लोग आते रहेंगे,
कारवाँ बनता रहेगा. भविष्य सुनहरा है.
खबर पहूँचाने के
लिए साधूवाद. फोटो-सोटो होती तो बात और जम जाती :)
October 7, 2007 9:52 PM
Durgaprasad said...
राजीव जी को धन्यवाद कि उन्होंने हमारे इस प्रयास को इतनी महत्ता दी. निश्चय ही
इससे हमारा उत्साह बढा है.
आपने दोनों बातें बहुत बढिया कही हैं. स्क्रीन पर
गलती कार्यक्रम के बीच ही सुधार दी गई थी. मोबाइल बन्द रखे ही जाने चाहिये.
एक
बार फिर से धन्यवाद.
दुर्गाप्रसाद अग्रवाल. सम्पादक इन्द्रधनुष इण्डिया
October 7, 2007 10:20 PM
Sanjeet Tripathi said...
खबर के लिए शुक्रिया,
फोटो की कमी खली!!!
October 8, 2007 12:50 AM
आज पहली बार पत्रिका देखी है। बधाई!
वहाँ प्रतिक्रिया देने का यत्न किया किन्तु निम्न पृष्ठ का
प्रतिक्रिया लिंक बार -बार निष्फल हो रहा है। सो इस प्रकार से भेज रही हूँ।
हजारी प्रसाद द्विवेदीजी वाले शिरीष विषयक आलेख में कालिदास के
उद्धृत श्लोक के प्रूफ़ में किंचित परिवर्तन आवश्यक है। वह यों है
कृतं न कर्णार्पितबन्धनं सखे
सद्भाव सहित
~कविता वाचक्नवी
aapko bata hi nahin sakati. vastavmein
apani bhasha mein lekh kavitayen etcetc padane ka eak alag hi anad hai please
mujhey yeh link bhej ker aappne bahut upkaar kiya hai,apki aseem kripa ke liye
shukeriya
shashi 29,acersfield road
hyde
sk14 4hb vaid.shashi@gmail.com
विविध रंगों की छटा बिखेरने वाले इन्द्रधनुष इए विविध रंग देखे आप दोनों का प्रयास
गुणवत्ता में भी हिन्दी वेब को नई ऊँचाइयाँ देगा ।
'हिमांशु'
'NISHANT KAMBOJ <nishant@hansindia.com>
हज़रतपुर जि0फ़िरोज़ाबाद
(उ प्र)\283103
मोबाइल
09319805777
इन्द्रधनुष इण्डिया की पहली वर्षगांठ पर मेरी समस्त मंगलकामनाएं स्वीकार करें. आशा
है आपका समारोह अपनी पूरी गरिमा के साथ सम्पन्न हो गया होगा. आता तो बहुत–सी
जानकारियां प्राप्त हो जातीं.
हरदर्शन सहगल, सम्वाद, 5-ई-9, डुप्लैक्स, बीकानेर.
प्रिय दुर्गाप्रसाद जी,
आज एक चिट्ठे से पता चला कि इंद्रधनुष की पहली सालगिरह कल थी.
बहुत बहुत बधाईयाँ.
ये सफर कभी खत्म न हो और नए पड़ाव मिलते रहें.
आपका,
रवि Ravishankar
Shrivastava <raviratlami@gmail.com>
इन्द्रधनुष
पत्रिका का
एक वर्ष सफलता पूर्वक पूरा करने पर बधाई.
इसी वर्ष
मई माह में जयपुर आया था था
,तब
हमारे उभयमित्र
डा. यश गोयल ने
प्रेस क्लब
में आपसे भेंट करायी थी. पत्रिका
सफलता के नये आयाम छू रही है.
पुन: बधाई
एवम शुभकामनायें
अरविन्द
चतुर्वेदी
http://bhaarateeyam.blogspot.com
आपका यह
अभिनव प्रयोग चिरायु हो. अनंत शुभकामनाएं आपके प्रयास सफल
हों,
यही कामना
है.
एस पी
महेन्द्र, जयपुर
Jivan.thelife@gmail.com
नमस्ते.
इन्द्रधनुष के पहले जन्म दिन पर बहुत बहुत बधाइयां. जब सारी दुनिया साहित्य और
मानविकी से दूर जा रही है, ऐसे में इलेक्ट्रोनिक मैगज़ीन, वह भी हिन्दी में, एक साल
पूरा करके आगे कम-से-कम दस सालों तक चलने का भरोसा जताती हो तो इसके पिलर्स को सलाम
करने के लिए खुद-ब-खुद हाथ जुड जाते हैं. मैं एक आलेख पर काम कर रहा हूं. जल्दी ही
आपको भेजूंगा.
यशवंत गहलोत,
मुम्बई <yashwantgahlot@gmail.com>
बधाई
महेन्द्र सिंह लालस, जोधपुर
बधाई और शुभकामना
आनन्द कुमार गर्ग – सुषमा गर्ग, बीकानेर
आदरणीय
अग्रवाल जी,
आपके
निमंत्रण के लिए धन्यवाद. इन्द्रधनुष इण्डिया के एक वर्ष पूरा कर लेने पर मेरी
बधाई. मैं उस दिन अजमेर में रहऊंगा, इसलिए आपके आयोजन में उपस्थित नहीं रह
पाऊंगा. मेरी शुभकामनाएं आपके साथ सदा हैं.
डॉ संजीव भानावत,
जयपुर
प्रिय भाई,
मुझे प्रेमचन्द
गान्धी का एस एम एस भी मिला था. लेकिन दुर्भाग्य से मुझे जयपुर आने में कुछ समय
लगेगा और 7 तारीख को मुझे काम के सिलसिले में यहीं रुकना होगा. क्षमा चाहता हूं.
15 तारीख के बाद जब भी जयपुर आया, आपसे अवश्य मुलाक़ात होगी.
शुभकामनाओं सहित
आपका
जितेन्द्र भाटिया
Doctorsaheb Pranam
Our Heartiest
Congrats to you for your unceasing efforts in bringing about the website
monthly publication of Indradhanush India which has now successfully
completed its one Year!
Over the period It
has acquired a Grace and has maintained its High Profile all throughout the
year.
We always await
eagely for the next issue to arrive!.
To offer my comments
I may say that," Indradhanush India", is A unique website magazine which
is Comprehensive to cater for everyone's taste and for all ages ;and yet very
Concise and not voluminous or bulky"
Sir,once again I wish
you all success!
I
feel pity for those who have no access to computers or to Cyber cafe, because
they are really missing something worth reading
arvind
bhave
आदरणीय दुर्गा
प्रसाद जी
सादर नमस्कार
आपका मेल पढा
राजस्थान
पत्रिका में आपका लेख पहले देख चुका था बेहद अच्छा लगा साहित्य के एक नए रचना
संसार से आपने परिचित कराया है लेख आपने काफी मेहनत और समय देकर लिखा है इसके लिए
बधाई’
कभी कभी ऐसे लेखों में उनकी रचनाओं का जिक्र हो तो और भी अच्छा हो’
हरियश राय
आपकी सतरंगी पत्रिका इंद्रधनुष के एक वर्ष पूरा होने पर
हार्दिक बधाई
रविवार
को आयोजित संगोष्ठी में आपके अनुभवों और आमंत्रित वक्ताओं के
विचारों से रूबरू
हुआ। आशा है वेब पत्रकारिता को जयपुर में आगे बढ़ाने
में यह संगोष्ठी उपयोगी
होगी।
मोहन मंगलम
manglammk@gmail.com
बधाई और शुभकामनाएं. इन्द्रधनुष
शताब्दी पूरी करे और अपने पाठकों को विचारोत्तेजक सामग्री से आह्लादित करता रहे.
लक्ष्मण व्यास,,आकाशवाणी,
चित्तौडगढ
laxman62@indiatimes.com
आदरणीय श्री अग्रवाल जी
आपके निमन्त्रण के लिए बहुत बहुत धन्यवाद और हार्दिक बधाई भी - हिंदी मे वेब
पत्रकारिता का विस्तार तेज़ी से
हो रहा है, राजस्थान से भले ही इंद्रधनुष अकेली वेब पत्रिका हो किंतु मध्यप्रदेश
से अनेक है. वैश्विक स्तर की सूची भी
तैयार होने पर आपको प्रेषित करूँगा ही. इस विषय प र चर्चा रखने के लिए भी स्वागत
. चर्चा के महत्वपूर्ण निष्कर्षो से
भी सूचित कीजिएगा -
हिंदी की वेब पत्रकारिता को विकसित करने के साथ ही यह भी आवश्यक है की हम आई टी
संवाद मे हिंदी का ज़्यादा से ज़्यादा प्रयोग करे -साधन तो बहुत से उपलब्ध है .
आशा है आप हिंदी मे मेल भेजने की शुरुआत करेंगे.
इस कार्य मे किसी सहयोग की आवश्यकता हो तो लिखे -
कृपया बताए की अपने सिस्टम मे आप मेरा मेल हिंदी मे पढ़ पा रहे या नही ?
सादर
- ज़वाहर कर्नावट
Congragulations and all the best for a bright and continuous future of
INDRADHANU
SH
may Indradhanush spread its beauty and charm everywhere
Long ago, people believed that indradhanush were magic. Some people
believed that a
indradhanush was a bridge that appeared in the sky when the
gods wanted to leave heaven and come to earth. Some believed that if you
find the end of the indradhanush where
it touches the earth you will find a pot of gold. A
indradhanush is caused by sunlight of
inspiration shining on raindrops of works of art To see a
indradhanush, you must have the sun of
divine inspiration behind you and rain of thoughts falling in front of you.
Sunlight like thoughts looks white, but it is really made up of many colors.
When thoughts enters a work of art, it divides into various color spectrums.
The indradhanush reflects these colors, like a mirror. Many rays of
sunlight, breaking up into their colors and reflecting off many drops of
falling rain, make a shimmering, curved, colored
indradhanush
May Indradhanush be the bridge, the path to
the pot of gold, a shimmering sunlight, a mirror to society and the world
Good Luck to INDRADHANUSH and of course to you all rains and raindrops
आपको ढ़ेरों बधाईयाँ, लगातार आगे बढ़ते रहें, यही कामना है ।
भेजें संदेश
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