मई 2007

                           

प्रकृति और साहित्य को समर्पित

 
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 लेख  मातृ दिवस
 बाजार में मातृ शक्ति   प्रेमचंद गांधी

   

मई का दूसरा रविवार अमरीका और यूरोपीय देशों में मातृ दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में उदारीकरण की नीतियों के चलते बहुराष्टंीय कम्पनियों और उनके उत्पादों के साथ-साथ फ्रेंडशिप और वेलेन्टाइन-डे की तरह फादर्स और मदर्स -डे भी चले आए हैं। इन एक दिवसीय त्यौंहारों का पश्चिम की उपभोक्ता संस्कृति में जरूर महत्व है किन्तु हमारी संस्कृति में यह अपनी जगह बनाते जा रहे हैं, यह विचारणीय ही नहीं चिंता की भी बात है। वस्तुत: संस्कृतियों के अन्तर्सम्बन्ध प्राचीनकाल से ही धर्म और व्यापार के संम्बन्धों के अनुसार बनते-बिगड़ते रहे हैं। इसलिए मदर्स-डे या मातृदिवस की समालोचना धर्म और व्यापार के अन्तर्सम्बन्धों के आधार पर ही की जानी चाहिए। भारतीय उपभोक्ता जगत में जो नित्य बदलने वाली बाजार-संस्कृति हावी होती जा रही है उसमें पश्चिम के रस्मी त्यौहार विभिन्न अवसरों पर अपने उत्पाद-व्यवसाय के महज विक्रय-संवर्द्धन के लिए हैं, यह बात ध्यान में रखनी चाहिए। इन त्यौंहारों का संबंध पारस्परिक आदर-सत्कार ओर प्रेम भाव की बजाय उपहारों के आदान-प्रदान और पार्टीबाजी से कहीं ज्यादा है।

मातृ शक्ति को नमन करना मानव सभ्यता की आदि परम्परा है। दरअसल इसके पीछे श्रद्धा से अधिक जीव विज्ञानी तथ्य रहे हैं। मनुष्य ने जब पहली बार स्त्री को शिशु को जन्म देते देखा था तभी उसके मन में यह घटना चमत्कार की तरह घटी थी। उसी समय से पुरूष ने स्त्री को प्रजनन के इस चमत्कारी गुण को पूजना शुरू किया था। महान दार्शनिक डॉ देवी प्रसाद चघेपाध्याय ने 'लोकायत' में मातृ -पूजा के विभिन्न संस्कारों की ठोस भौतिकवादी व्याख्या करते हुए सिद्ध किया है कि भारतीय संस्कृति में मातृ शक्ति की पूजा मनुष्य की आदिम प्रवृनियों का सुगढ़ संस्करण है। उन्होंने लिखा है कि प्राचीनकाल में रजस्वला होने के बाद सभी स्त्रियां मांग में सिंदूर भरा करती थीं। यह उनके रजस्वला यानी संततिवर्द्धक होने का प्रतीक था। मनुष्य ने सतत निरीक्षण से यह तथ्य जाना कि रजस्वला होने के बाद ही स्त्री में वह चमत्कारी शक्ति आती है जो वंशवृद्धि करती है। इस प्रजनन शक्ति के रहस्य को मनुष्य ने कालांतर में कृषि से भी जोड़ दिया। चघेपाध्याय के अनुसार आदिमानव खेत में बीज डालने ओर बरसात होने से पहले लाल मिट्टी बिखेर देता था। मान्यता वहीं कि अब धरती भी रजस्वला हो गई है ओर यह अच्छी उपज देगी। आज हमारे खेतों में जो लाल सिंदूर पुते देवता होते हैं वे इसी आदि परम्परा के अवशेष हैं। इस प्रकार मातृशक्ति की आदि परम्परा है।

मानव सभ्यता आज जिस मुकाम पर है वह उसका वर्तमान शिखर है। किंतु पारिवारिक सम्बन्धों का यह जटिल स्वरूप प्रारम्भ में ऐसा नहीं था। लिखित साहित्य के व्यवस्थित इतिहास में सबसे पहले जर्मनी के बाखोफेन ने सन् 1861 में 'मदर राइट्स पुस्तक से सिद्ध किया कि आदिकाल में परिवार व्यवस्था स्त्री केंद्रित थी और उसमें पुरूष ने बलपूर्वक बदलाव कर आज की पितृसनत्मक व्यवस्था का सूत्रपात किया। बाखोफेन ने प्राचीन यूनानी और एशियाई ग्रंथो के विशद् अध्ययन से प्रमाणित किया कि प्राचीन काल में स्वच्छन्द यौन सम्बन्ध होते थे। बाखोफेन के तुरन्त बाद 1861 में अंग्रेज वकील मैक्लेनन ने माता के जरिये वंश चलने की परम्परा का रहस्योद्घाटन किया। इसके पश्चात् अमेरिकी नृवंश वैज्ञानिक और आदिम समाज के इतिहासकार लुइस हेनर मॉर्गन ने अनेक जनजातिय कबीलों के विस्तृत अध्ययन से प्रमाणित किया कि एक समय था जब स्वच्छंद यौन संबंध थे। मानव जाति में उपज और पशु के रूप में सम्पनि का सृजन हुआ तो उनराधिकार के सवाल पर परिवार का उदय हुआ। चूंकि स्वच्छंद यौन संबंधों के कारण पिता के मामले में अनिश्चितता थी इसलिए माता के आधार पर परिवार बने। गौत्र व्यवस्था का सूत्रपात हुआ और एक माँ की सभी संतानें इस गोत्र से पहचानी जाने लगीं। सामाजिक विकास के अगले व्म में एक मां की सन्तानों में यौन संबंध निषिद्ध कर दिए गए। धीरे-धीरे यह व्यवस्था सामाजिक -पारिवारिक संबंधों की एक जटिल श्रृंखला के रूप में विकसित होती गई।

परिवार के इस संक्षिप्त इतिहास से हम सहज ही जान सकते हैं कि मातृ-पूजा और परिवार संस्था जिस बिंदु पर आकर एक होते हैं वह मातृ सनात्मक व्यवस्था है ओर उस व्यवस्था में चूंकि स्त्री के पास ही सारी शक्तियां केन्द्रित थीं, इसलिए पुरूष को माता के रूप में उसका उचित सम्मान करना अनिवार्य था। यही आदिम व्यवस्था कालांतर में नैतिक बंधन के रूप में बदल गई और आज की मातृशक्ति का पुरातन स्वरूप सामने आया। ध्यान देने की बात है है कि नैतिकता जैसे गुणावगुण मानव सभ्यता के विभिन्न चरणों में बदलते रहते हैं। प्राचीन काल का स्वच्छंद यौन सम्बन्ध आज अनैतिक है और जो आज नैतिक है, कल अनैतिक हो सकता है। जैसे इस्लाम में सगे-संबंधी और दूध के संबंधों के अलावा किसी से भी विवाह किया जा सकता है जबकि हिन्दुओं की विभिन्न जातियों में एक से लेकर पांच गोत्र टाले जाते हैं। लेकिन सभी संस्कृतियों में एक बात समान है कि वहां माता को सामाजिक तौर पर उच्च स्थान दिया गया है जो मातृसनात्मक व्यवस्था का अंतिम अवशेष है।

पश्चिमी और भारतीय संस्कृति में सबसे बड़ा भेद  स्त्री क़ी छवि के कारण है। हमारे यहां जो निरंकुश ब्राहम्णवादी व्यवस्था पनपी, उसने स्त्री का बुरी तरह दमन किया। आबादी का आधा भाग उपेक्षित रहा, जिसने सामाजिक विकास में बाधा उत्पन्न की। पश्चिम में चूंकि ऐसी कोई निरंकुश व्यवस्था नहीं थी, वहां स्त्रियां पुरूषों के साथ मिलकर काम करती रहीं। यद्यपि दोनों ही व्यवस्थाओं में में स्त्री उपेक्षिता थी, लेकिन पश्चिम में भारतीय उपमहाद्धीप जैसे कठोर प्रतिबन्ध स्त्री पर नहीं थे। पढ़ने, लिखने, काम करने और खेलेने की आजादी पश्चिमी की तरह हमारे यहां की स्त्रियों को भी होती तो शायद आज हम एक बेहतर आधुनिक समाज में जी रहे होते। पश्चिमी और भारतीय धर्मो में भी स्त्री को तिरस्कार से ही देखा गया। परम्परागत रूप में वर्जिन मेरी और देवी-महादेवी की अवधारणा अवश्य विद्यमान रहीं किंन्तु व्यवहार में स्त्री सदैव ही निन्दनीय अबला बनी रही। पश्चिम आज जिस उपभोक्ता संस्कृति के प्रभाव में जोर शोर से मदर्स- डे मना रहा है वहां अश्लीलता का बाजार भी खूब फल-फूल रहा है जिसमें अनैतिक सम्बन्धों की भी ब्रिकी होती है। पिता-पुत्री और मां-बेटे का यौन संबंध यूरो- अमरीकी अश्लील वेबसाइटों और प्रकाशन जगत में सर्वाधिक मुनाफा देने वाला व्यवसाय है। हर चैट रूम में आपको डैड, मॉम, ब्रो और सिस नामधारी यूजर मिल जाएंगे, यहां तक कि ऐसे संबंधों के स्वतंत्र चैट रूम भी । यह है पश्चिम का उपभोक्ता समाज, जो मदर्स डे मना रहा है। भारतीयों को खुश होने की जरूरत नहीं यहां भी अपने ही माता-पिता, भाई -बजन से मारपीट, गाली-गलौच, हत्या और यौन संबंध रखने वाले श्रद्धालु भारतीय बहुतायत में पाये जाते हैं। दरअसल पूरी दुनिया में सारे पारिवारिक और सामाजिक संबंध बदलती विश्व व्यवस्था में आर्थिक आधार पर सिमटते जा रहे हैं, इसलिए आप किसी भी संबंध का दिवस मनाएं, उनके भीतर की वह सहजता और रागात्मकता नहीं रहती, जो सभ्यता के इस शिखर पर होनी चाहिए थी। क्या यह मानव सभ्यता के अपकर्ष का संकेत है या फिर बाजारवादी-मुनाफावादी-स्वार्थी -लालची संस्कृति के उत्कर्ष का ? और ऐसे में मक्सिम गोर्की की वह प्यारी क्रांतिकारी मां याद आती है जो अपने बेटे के महान उद्देश्य के लिए खुद भी मैदान में कूद पड़ती है।

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                             प्रबंध सम्पादक : अंजली सहाय सम्पादक : डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल