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हास्य
इंटरव्यू श्री कृष्ण से
डॉ सुमन मेहरोत्रा

एक महिला भाषण दे रही थी। 'कृष्ण ने बांसुरी बजा बजाकर हमें बहुत
लुभा लिया। हम अपने पति और बच्चों को छोड़कर उनकी बांसुरी की तान पर नाचते रहे। अब
वे हमें नहीं नचा सकते A
मैं अपनी डायरी और पेन लिए कृष्ण कन्हैया के महल के सामने खड़ा
था। क्या आलीशान महल है। मैं देखता ही रह गया। सुदामा बेचारे इसमें कैसे घुसे
होंगे। मैंने दरबान से कष्णजी से भेंट करने की अपनी अभिलाषा व्यक्ति की। उसने अपनी
मूंछो पर तावे दिया और बोला भगवान अभी विश्राम कर रहे हैं फिर आना। मैं भी अपनी
जिद पर अड़ गया। मैंने कहा 'भइया जाओं और कह दो अखबार वाले आए है।' वह पूछने चला।
मैं उसके पीछे-पीछे ही अंदर पहुंच गया। कन्हैया रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान थे।
वाह क्या ठाट है। कहां गोकुल, मथुरा की संकरी गलियां। गलियों में नंगे पांव गईयों
के पीछे पीछे श्री कृष्ण का दौड़ना। कहां यह भव्य सिंहासन। वंचर ढुलाते दास, दरवाजे
पर पहरेदार। तकदीर पलटते देर थोड़ी लगती है। मैं उनके चरणों में प्रणाम करने नीचे
ही बैठ गया।
'कौन हो तुम?' भगवान ने पूछा।'
'भगवान मैं एक पत्रकार हूं। आपका इंटरव्यू लेना चाहता हूं।'
'ओहो पत्रकार हो! पूछो भाई क्या पूछना चाहते हो। पत्रकारों से तो
संभलकर रहना पड़ता है नहीं तो न जाने क्या न्यूज बना दें।'
'भगवान मेरा पहना प्रश्न है कि आज से हजारों वर्ष पूर्व आपने यह
होली का त्योहार प्रारंभ किया था। आपका इस त्योहार को मनाने के पीछे क्या उप्ेश्य
था।'
'अरे तुमने वह गाना नहीं सुना।' मैंने चौकन्नी आंखों से उनकी ओर
देखा ओर सिर हिला दिया।
'खेलेंगे कूदेंगे नाचेंगे गाएंगे और क्या'
नहीं मुरली वाले आप बड़े भारी दार्शनिक हैं। आपके बराबर
दर्शनशास्त्र का पंडित कोई नहीं हुआ अभी तक। केवल इतना सा कारण नहीं हो सकता।'
'तुम ठीक सोचते हो वत्स! यह सद्भावना का त्योहार है। आज के दिन
कोई छोटा-बड़ा, ।ंचा-नीचा, जाति विजाति नहीं होता। देखो न भाभी देवर के गले लग जाती
है। जीजा साली को बाहों में भर लेता है। इस त्योहार की सद्भावना को लोगों ने समझा
और इसका ग्लोबलाइजेशन हो रहा है। विदेशों में होली को कैसे खेला जाए यहां से
रंग-गुलाल, पिचकारियां लेकर टीमें विदेश जा रही है। गोरी-गोरी छोकरियां लहंगा चोली
पहने गोपियां बन रही हैं। चारो ओर प्रेम प्यार का साम्राज्य छा रहा है। यह होली
का त्योहार ही है जो विश्व से आतंकवाद को समाप्त कर सकता है। धन तो व्यय होगा ही
उसकी क्या चिंता करना।
मैंने उनके चरणों में अपना माथा टिका दिया धन्य हो नटवर धन्य हो।
बहुत दूर का पासा फेंका है। मेरा अगला प्रश्न है कि क्या आपको अपने जमाने की होली
में और आज की होली में कोई अंतर दिखाई देता है।'
वे गहरी सांस लेकर बोले- 'हां वत्स! आज वे गोपियां नहीं रहीं जो
हमारे साथ रात रात भर रासलीला करती थीं, होली खेलती थीं। मैं उनके कपड़े चुरा लेता
था। हांडियां फोड़ देता था, वे हंसती रहती थीं। आज गोपियां होली का बहिष्कार कर रही
हैं। यह नारे की आवाजें नहीं सुन रहे हो।'
मैंने ध्यान दिया। सच में आवाजें आ रही थीं। 'हम होली नहीं
खेलेंगे। कृष्ण माफी मांगें। उनकी यह छेड़खानी नहीं चलेगी, नहीं चलेगी।'
'देखों वे अपने भाषण में क्या-क्या बोल रही हैं। मैं तुम्हें
कम्प्यूटर पर दिखाता हूं।'
मैंने देखा एक महिला हाथ उठाकर जोरदार शब्दों में भाषण दे रही
थी।' कृष्ण ने बांसुरी बजा-बजाकर हमें बहुत लुभा लिया। हम अपने पति और बच्चों को
छोड़कर उनकी बांसुरी की तान पर नाचते रहे। अब वे हमें नहीं नचा सकते हैं। हम आजकल
की शिक्षित नारियां उनकी बातों में नहीं आएंगी। आज से होली का त्योहार बंद।
उन्होंने हमारी कीमती साड़ियों पर रंग डालकर उनका सत्यानाश कर दिया है। वे
डंाइक्लीनिंग के पैसे दें।'
मैंने देखा श्रीकृष्ण सिर झुकाए बैठै थे।' भगवान एक बड़ा
व्यक्तिगत प्रश्न पूंछना चाहता हूं।, यह मेरा अंतिम प्रश्न है। आप बहुत दुखी हैं।
मैं आपको ऐसे गोपियों के बहिष्कार में आंसू बहाते हुए नहीं देख सकता।'
मेरी आंखें भी छलछला आई थीं। श्रीकृष्ण ने अपना रूमाल निकालकर
मुझे दिया। मैंने आसूं पौछे और डायरी का अगला पृष्ठ पलटा।
'हे प्रभु सूना है आपके अन्त:पुर में सोलह हजार रानियां थी। मैं
तो एक पत्नी को नहीं सींााल पाता हूं आपने उन सबाके कैसे खुश रखा।'
'अरे यार तुम पत्रकार हो या अखबार बेचने वाले हॉकर। सुनो पास आकर
सुनो बड़ी सीव्ेट बात है। मैंने अपने सोलह हजार क्लोन बनवा लिए थे। हर रानी यही
समझती थी कि मैं सिर्फ उसी के पास हूं। और में राधा महल में अठखेलियां करता रहता
हूं। आई बात समझ में। अब जाओं बरखुदार बहुत हो गया।'
'हां मुरली वाले आपकी सारी लीला समझ में आ गई।'
मैं वहां से चला आया। होली के पहले यह साक्षात्कार अखबार में
छपवाना जो था।
-डॉ सुमन मेहरोत्रा
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