मार्च  2007

                           

izd`fr vkSj lkfgR; dks lefiZr

होम
माह का विचार
सम्पादकीय
कविता
कहानी
लेख
व्यंग्य
पुस्तक समीक्षा
बचपन
साहित्यिक हलचल
सम्पर्क सूत्र
और बहुत कुछ...
 


 

  साहित्यिक हलचल  

                          

     जयपुर की सुपरिचित संस्था दिगंतर ने राजस्थान विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग के साथ मिलकर 24 फरवरी 2007 को पिंक सिटी प्रेस क्लब के सभागार में 'धर्म, नैतिकता और शिक्षा' विषय पर सुप्रसिद्ध कथाकार, चिंतक और हंस के सम्पादक राजेंद्र यादव का व्याख्यान आयोजित किया. स्वाभाविक ही है कि इस व्याख्यान ने हलचल और कुलबुलाहट उत्पन्न की. राजेंद्र जी बेबाक तरह से अपनी बात कहते हैं, भले ही किसी को कितना भी बुरा क्यों न लगे. इस व्याख्यान में भी वे सदा की तरह बेबाक और बिन्दास थे. उन्होंने सबसे पहले तो धर्म और नैतिकता को व्याख्यायित किया. राजेंद्र जी के अनुसार जहां मनुष्य और ईश्वर के सम्बंधों का मामला होता है वहां धर्म, और जहां मनुष्य-मनुष्य के बीच सम्बंधों का मामला होता है वहां नैतिकता होती है. धर्म के प्रति अपनी वितृष्णा को ज़रा भी छिपाये बगैर राजेंद्र जी ने कहा कि बहुत लम्बा अर्सा हो गया जब से उन्हें ईश्वर या धर्म की ज़रूरत नहीं पड़ी. और, वे नहीं सोचते कि इसके बगैर भी वे अन्यों से कम अच्छे हैं. धर्म के नाम पर होने वाले कर्मकाण्डों, व्यवसायों और फिज़ूल खर्चियों पर राजेंद्र जी ने जमकर प्रहार किये. उनका कहना था कि यह हमारे धर्मप्राण देश में ही सम्भव है कि करोडों (साधु सन्यासियों) की फौज़ बिना कुछ किये धरे हलवा पूरी जीमती रहती है और करोडों अरबों की लागत से मन्दिर खड़े किए जाते हैं जबकि एक बहुत बड़ी जन संख्या को दो वक़्त की सूखी रोटी भी नसीब नहीं होती. राजेंद्र जी की आपत्ति इस बात को भी लेकर थी कि धर्म कुल मिलाकर वैयक्तिक 'मुक्ति' का वादा करता है. उनके व्याख्यान में अनेकानेक सन्दर्भ आते रहे. जब उनक व्याख्यान समाप्त हुआ, स्वाभाविक था कि लोगों में प्रश्न पूछने और प्रतिक्रियाएं व्यक्त करने की बेताबी थी. ज़्यादातर प्रश्न और प्रतिक्रियाएं इसलिए थे कि लोग अपनी बद्धमूल धारणाओं को छोड़ना नहीं चाहते.  'आप कह रहे हैं वह ठीक है, लेकिन फिर भी..' अब ऐसे प्रश्नों पर कोई क्या कह सकता है! फिर भी राजेंद्र जी ने हर प्रश्न का उत्तर दिया. 

  व्याख्यान की अध्यक्षता विदुषी डॉ प्रतिभा जैन ने की. उन्होंने विषय के तीन आयामों से तीसरे आयाम जिस पर राजेंद्र जी ने अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया था, पर अपनी बात केंद्रित की. वैसे उन्हें धर्म से भी उस  हद तक परहेज़ नहीं था जिस हद तक राजेंद्र जी को था. 

व्याख्यान के प्रारम्भ में दिगंतर के रोहित धनकर ने आधार वक्तव्य दिया. 

संचालन विश्वम्भर ने किया. 

व्याख्यान में जयपुर के लेखकों बुद्धिजीवियों की शानदार उपस्थिति थी. 

इस व्याख्यान को सुनते हुए यह लगा कि अगर देश के हर शहर में हर शिक्षण संस्था साल में कम से एक विचारोत्तेजक व्याख्यान का आयोजन करे तो कितना अच्छा रहे. उल्लेखनीय है कि दिगंतर निकट अतीत में ही अनिल सद्गोपाल और डॉ दयकृष्ण के व्याख्यान आयोजित कर चुकी है.  ®

राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान, जयपुर ने अपना एकादश सम्मान समारोह हाल ही में जयपुर में आयोजित किया. संस्थान ने अपना प्रतिष्ठित वाग्मणि सम्मान सुपरिचित कथाकार चंद्रकांता को,कर्मश्री सम्मान जोधपुर की सामाजिक कार्यकर्ता सुशीला बोहरा को तथा स्व0 सावित्री परमार पुरस्कार जयपुर की लेखिका सुषमा शर्मा को प्रदान किया. कार्यक्रम की अध्यक्षता राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एन के जैन ने की और विशिष्ठ अतिथि का दायित्व वहन किया डॉ दमयंती गुप्ता ने. इस अवसर पर सम्मानित लेखिका चंद्रकांता के उपन्यास अपने-अपने कोणार्क पर एक विचार गोष्ठी भी अयोजित की गई. इसमें उपन्यास पर डॉ जयश्री और राज चतुर्वेदी ने अपने पत्र पढ़े. सत्र की मुख्य अतिथि प्रो. पवन सुराणा थीं और विशिष्ठ अतिथि प्रो. प्रतिभा जैन. 

इसी अवसर पर महिला लेखन-बाज़ारवाद के सिद्धांत विषय पर  एक साहित्यिक सत्र भी आयोजित किया गया. इसमें डॉ रेखा मिश्र  और धनवंती दाधीच ने पत्र पढ़े.

 

        top

                             प्रबंध सम्पादक : अंजली सहाय सम्पादक : डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल