जून 2007

                           

प्रकृति और साहित्य को समर्पित

 
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 लेख  
 हमें जीने दोराम भरोसे  प्रणय कुमार गर्ग,

 एल एल. एम. 

 

   चाट मसालों, बिस्कुट, मक्खन आदि की पैकिंग पर छोटे अक्षरों में किसी जगह छुपी आवश्यक जानकारियां मसलन मैन्यूफ़ैक्चरिंग, एक्स्पायरी, बेस्ट बिफ़ोर,और मूल्य देखे बगैर ही उन्हें खा लें तो जान खतरे में नहीं पडती, लेकिन जब यही सब कुछ दवाओं के साथ भी तो जान पर बन आना स्वाभाविक है। 

अक्सर बैच नम्बर, एक्स्पायरी, कीमत आदि दवाओं की स्ट्रिप पर कोने में, दो गोलियों/कैप्सूल पर छपी होती है। इन दो का अगर पहले उपयोग कर लें तो शेष आठ के बारे में कुछ भी जान पाना असम्भव है।किसी अनहोनी-अप्रिय घटना जैसे ड्रग रिएक्शन, साइद इफ़ेक्ट आदि के लिए इन प्र कोई सबूत नहीं बचता। यानि, इण्डियन एवीडेंस एक्ट 1872 की धारा 62 के तहत साक्ष्य जुटा पाना नामुमकिन

जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के सह आचार्य डॉ आर एस डूंगावत के निर्देशन में शोधरत इन पंक्तियों के लेखक प्रणय कुमार गर्ग, एडवोकेट रामेश्वर हेडाऊ और राजस्थान ज्यूडिशियल सर्विस की आकांक्षी सुश्री अंशुमा ने दवाओं के 1057 नमूनों का विस्तृत अध्ययन किया।57 केमिस्टों से एकत्र किए गए रेण्डम सेम्पल्स में चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए। 91 प्रतिशत दवाओं में बैच नम्बर, उत्पादन और मियाद तिथि तथा मूल्य स्ट्रिप के आकार के अनुपात में इतना छोटा पाया गया कि उसे पढ पाना लगभग असम्भव था। voveron, Becozyme,Stugil उन 5 प्रतिशत दवाओं में थीं जिन्हें इस बात का अपवाद कहा जा सकता है।शेष 4 प्रतिशत पर अंकन संतोषप्रद था।

नीचे दी गई तालिका में उक्त 91 प्रतिशत दवाओं में से कुछ का विवरण दिया जा रहा है।अफ़सोस की बात यह कि दवा की स्ट्रिप चाहे 10 की हो, 20 की या 25 की, समस्या एक सी है।

S.No.

Medicine Name

Company Name

Mfg.Date     

Exp.Date

Pack

Price

Batch No.

1. Nice Dr. Reddy’s Lab Jan ‘07 Dec ‘09 10 32.00

V70030

2. Crocin Glaxo Smith Kline Oct ‘05 Sep ‘08 15 12.95 R5336
3.   Diclogesic Torrent Aug ‘06 Aug ‘06 10 25.70 2066051
4. Statix-10 Biocon Dec ‘05 Jan ‘10 15 45.00 BFO50150

5.

Cifran Ranbaxy Feb ‘07 Jan ‘10 10 96.60 9001206
6. Ciplox Cipla Nov ‘06 Oct ‘19 10 85.73 D61965
7. Lipril Lupin Feb ‘07 Jan ‘10 15 71.48 A7004WB
8. Calpol Glaxo Smith Kline Oct ‘06 Sep ‘09 10 10.50 EN 134
9.

Glyciphage

Franco Jan ‘07 Dec ‘09 20 20.55 7010
10. Autrin Wyeth Nov ‘06 Apr ‘08 30 43.54 AV 373

 

 

 

 




 

 

 इस अध्ययन से यह बात भी उजागर होती है कि मात्र कानूनी प्रावधानों की खानापूर्ति कर स्वास्थ्य को पूरी तरह व्यावसायिक, बल्कि मुनाफ़ा कमाने का धन्धा समझने वाली भारतीय दवा कम्पनियां अपने ही उपभोक्ता के भले के लिए, उसे जागरूक बनाने के लिये कुछ भी करना ज़रूरी नहीं मानती। वे चाहें तो यह बता सकती हैं कि बुखार कम करने वाली क्रोसिन/कालपोल (पैरासिटामोल) और अनेक एण्टीबायोटिक्स और कोलेस्ट्रॉल घटाने वाली दवाएं जैसे एटोरस्टोटिन अगर  खट्टे फ़लों या नीबू पानी के साथ लेंगे तो ये नुकसानदायक सिद्ध हो सकती हैं। दवा कम्पनियां यह सारा दायित्व डॉक्टर का बता कर पल्ला झटक लेती हैं। डॉक्टर के पास हर मरीज़ के लिए इतना समय कहां होता है? हर मरीज़ को ये सारी जानकारियां याद हों, यह भी स्वाभाविक नहीं। हमें लगता है कि यह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 संशोधन 2002 एवम नियम 2004 की धारा 2 के द्वारा प्रदत्त अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है।

इसी तरह सेलकल सेलिक्रिट नाम ध्वनि साम्य के कारण भ्रम पैदा कर्ते हैं।ड़रग्स एवम कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 सेक्शन 17 के तहत सक्षम अधिकारी को भ्रम पैदा करने वाले नाम, पैकेजिंग, बाह्य आवरण आदि के लिए उत्तरदायी बताया गया है। अब ट्रेड मार्क कार्यलय में अनुसंधान रिपोर्ट दवा कम्पनियां तो प्रस्तुत करने से रहीं। यह सारी जांच पडताल ड्रग ऑथोरिटी के भरोसे है, और उसका तंत्र इतना कमज़ोर है कि अन्धेर नगरी चौपट राजा वाली बात याद आती है। 

डॉ डूंगावत का मानना है कि एडवर्टाइजिंग स्टेण्डर्ड काउन्सिल ऑफ़ इण्डिया को खुद अपनी तरफ़ से पहल करके दवाओं के लिए एक मानक बाह्य आवरण तैयार करना चाहिये ताकि सब कुछ राम भरोसे चलतता रहे , कुछ लगाम तो दवा कम्पनियों पर भी लगे।

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बी-11, अग्रवाल कॉलोनी,

रातानाडा, जोधपुर

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                             प्रबंध सम्पादक : अंजली सहाय सम्पादक : डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल