जून 2007

                           

प्रकृति और साहित्य को समर्पित

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 कविता  

     तीन कविताएं

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना-

 भूख

जब भी  

भूख से लड़ने

कोई खड़ा हो जाता है

सुन्दर दीखने लगता है।

झपटता बाज़,

फन उठाए साँप,

दौ पैरों पर खड़ी

काँटों से नन्हीं पनियाँ खाती बकरी,

दबे पॉव झाड़ियों में चलता चीता,

डाल पर उल्टा लटक

फल कुतरता तोता,

या इन सबकी जगह

आदमी होता।

जब भी

भूख से लड़ने

कोई खड़ा हो जाता है

सुन्दर दीखने लगता है।    

  2 

  

मुझे चूमो

और फूल बना दो                            

मुझे चूमो

और फल बना दो

मुझे चूमो

और बीज बना दो

मुझे चूमो

और वृक्ष बना दो

फिर मेरी छांह में बैठ, रोम-रोम जुड़ाओ।

मुझे चूमो

हिमगिरि बना दो

मुझे चूमो

उद्गम सरोवर बना दो

मुझे चूमो

नदी बना दो

मुझे चूमो

सागर बना दो

फिर मेरे तट पर धूप में निर्वसन नहाओ।

मुझे चूमो

शीतल पवन बना दो

मुझे चूमो

दमकता सूर्य बना दो

फिर मेरे अनन्त नील को

इन्द्रधनुष-सा लपेट कर मुझे में विलय हो जाओ।        

 

   3

आश्रय

सारी जिंदगी

मैं सिर छिपाने की जगह

ढूंढ़ता रहा,

और अन्त में

अपनी हथेलियों से

बेहतर जगह दूसरी नहीं मिली।

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 दो कविताएं

   रवीन्द्रनाथ त्यागी   

 

अपने इन दुखों को

बेकार मत जाने दो,

चेहरे के चिराग से

आंसुओं के पतंगों को

यूं ही न उड़ जाने दो,

ये सागर की लहरें हैं

इनमें ज्वार आया है

इन्हें यूं ही न बह जाने दो।

दु:ख तुम्हें यतन करने से मिले हैं

वर्षो के तप और प्रतीक्षा से मिले हैं

इन्हें यूं ही न खो जाने दो

आओ, इन दुखों से धरती बो दें

इन्हें चारों ओर घर-घर-बिखरा दें

जिससे गानों की फसल उगे

लाल-लाल रंगीन भरे-पूरे गाने

तुम्हारे ह्रदय के रक्त से सने।

 

 2

मुसकानों के नेपकिन बिछा

वे एक-दूसरे को ही खाने लगे

चुपचाप

फ्लाश, भाद्रपदी हवाएं और वर्षा

उन्होंने कुछ नहीं देखा:

उन्होंने सिर्फ उनहें आंका

जिनके खा जाने के बाद

उनका भय और बढ़ना था

समुद्र की मेज पर

शाम के बावर्ची ने

सूरज का मुर्गा कर दिया हलाल

और वे सब अफसर, दलाल और वकील

उन लोगों से गले मिलने लगे

जिन्हें निगलना अभी बाकी था

फ्लाश, भाद्रपदी हवाएं और वर्षा

उन्होंने कुछ नहीं देखा।

1नौ1

प्यार,घुड़कियां, फाइलें और हजामत

कान्वेन्ट के लिए तैयार होना बच्चों का

बढ़ते दाम,र् ईष्या, सुख-दुख और भय

ऋतु का हिंडोला और चन्द्रमा का जाल

पहाड़ों पर डाक बंगले में चाय का कप

चेकबुक, प्रोविडेट फंड,

कविता और सेकिंड शो

देह की भूख, शाम की उदासी

और कभी-कभी एक चेहरे की याद

रेल की पटरियों की तरह

अपने ही नीचे दबी

पाप और पुण्य से विरक्त

हम सबसे उदासीन

गुजरता जा रहा है चालाक वक्त

हमारे ही माध्यम से

हम सबसे ।पर

वह फिर कभी नहीं लौटेगा

कभी नहीं।

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     कविताएं    हरीश करमचंदाणी
 

 

प्रेम

 

अभी चुका नहीं है

बेहद प्रचलित यह शब्द।

प्रेम

अर्थ की गरिमा और पवित्रता के

साथ खडा  है तन कर

मैं चाहता हूं टांक दूं उसे

तुम्हारे जूडे में फ़ूल की तरह

उसकी पंखुडियों में खिल रही हैं इच्छाएं

रही है लगाव की महक

यकीनन चिडिया चहकना

और हवा बहना नहीं छोडेंगी

बिना जाने भी

प्रेम की परिभाषा

 

 

रैन बसेरा

दिन भर के थके पांवों

ठिठुरती देह और दहकती पेट की आग के

साथ

जब मैंने प्रवेश किया

रैन बसेरा चिढा रहा था मेरा मुंह

यह रही तुम्हारी दरी

यह रहा तुम्हारा कम्बल

यह रहा तुम्हारा आज का कोना

बिछाओ लेटो और सो जाओ

हां, जबकि उनकी साजिश थी

मैं भी सो जाऊं

भूख ने मुझे जगाए रखा।

 

सीढी

 

वे करते रहे इस्तेमाल

उसे

और चढते गए ऊपर

सफ़लता के शिखरों तक

--तुम हो वहीं, ठहरी, स्थिर

उकसाया गया उसे

--उन्हें नीचे मैं ही तो लाऊंगी

अविचलित थी सीढी ।

 

--9/913, मालवीय नगर, जयपुर-302017

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       तीन गज़लें

 

 सलीम खां फ़रीद

1

उसने यों इन्कार किया है

केवल क़ौल क़रार किया है

 

खाली थैला ले घर लौटे

हमने भी बाज़ार किया है

 

चिडियों ने मिल-जुलकर फ़िर से

बाजों को सरदार किया है

 

उजियारे थे राजभवन में

अंधों ने दरबार किया है

 

घर भरने वाले लोगों ने

मुल्क मेरा मिस्मार किया है

 

खुद से आगे सोच पाते

सबने यों विस्तार किया है

 

2

सूरज बनकर आने वाले

निकले दिये बुझाने वाले

 

पानी, लहर और पुलिन भी

मछली को तडपाने वाले

 

हम गूंगों से अच्छे हैं ये

बच्चे शोर मचाने वाले

 

आज तलक हैं याद, सफ़र में

हंसकर हाथ मिलाने वाले

 

दोराहे पर छोड गए हैं

सबको राह दिखाने वाले

 

आया है बदलाव यही बस

बदले सिर्फ़ ज़माने वाले

 

3

खूब जलाई दियासलाई

फ़िर भी सच पर आंच आई

 

उस धरती पर जंग छिडी है

जिसको तज निकले रघुराई

 

जीना है तो करते रहना

संग समय के हाथा पाई

 

कैसा है उजियारा जिसमेम

कुछ भी देता नहीं दिखाई

 

कितनी कितनी नीचे गिरती

ऊंचे लोगों की ऊंचाई

 

चुप्प लगा कर बैठाहल्ला

बढ-चढ कर बोली तन्हाई

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हसामपुर-382718

ज़िला सीकर (राजस्थान)

बतौना (मोबाइल) - 09413070032

 

 

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                             प्रबंध सम्पादक : अंजली सहाय सम्पादक : डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल