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अपने इन दुखों को
बेकार मत जाने दो,
चेहरे के चिराग से
आंसुओं के पतंगों को
यूं ही न उड़ जाने दो,
ये सागर की लहरें हैं
इनमें ज्वार आया है
इन्हें यूं ही न बह जाने दो।
दु:ख
तुम्हें यतन करने से मिले हैं
वर्षो के तप और प्रतीक्षा से मिले हैं
इन्हें यूं ही न खो जाने दो
आओ,
इन दुखों से धरती बो दें
इन्हें चारों ओर घर-घर-बिखरा
दें
जिससे गानों की फसल उगे
लाल-लाल रंगीन
भरे-पूरे गाने
तुम्हारे ह्रदय के रक्त से सने।
2
मुसकानों के नेपकिन बिछा
वे एक-दूसरे
को ही खाने लगे
चुपचाप
फ्लाश,
भाद्रपदी हवाएं और वर्षा
उन्होंने कुछ नहीं देखा:
उन्होंने सिर्फ उनहें आंका
जिनके खा जाने के बाद
उनका भय और बढ़ना था
समुद्र की मेज पर
शाम के बावर्ची ने
सूरज का मुर्गा कर दिया हलाल
और वे सब अफसर,
दलाल और वकील
उन लोगों से गले मिलने लगे
जिन्हें निगलना अभी बाकी था
फ्लाश,
भाद्रपदी हवाएं और वर्षा
उन्होंने कुछ नहीं देखा।
1 नौ1
प्यार,घुड़कियां,
फाइलें और हजामत
कान्वेन्ट के लिए तैयार होना बच्चों का
बढ़ते दाम,र्
ईष्या, सुख-दुख और भय
ऋतु का हिंडोला और चन्द्रमा का जाल
पहाड़ों पर डाक बंगले में चाय का कप
चेकबुक,
प्रोविडेट फंड,
कविता और सेकिंड शो
देह की भूख,
शाम की उदासी
और कभी-कभी
एक चेहरे की याद
रेल की पटरियों की तरह
अपने ही नीचे दबी
पाप और पुण्य से विरक्त
हम सबसे उदासीन
गुजरता जा रहा है चालाक वक्त
हमारे ही माध्यम से
हम सबसे ।पर
वह फिर कभी नहीं लौटेगा
कभी नहीं।
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प्रतिक्रिया
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प्रेम
अभी
चुका
नहीं
है
बेहद
प्रचलित
यह
शब्द।
प्रेम
अर्थ
की
गरिमा
और
पवित्रता
के
साथ
खडा
है
तन
कर
मैं
चाहता
हूं
टांक
दूं
उसे
तुम्हारे
जूडे
में
फ़ूल
की
तरह
उसकी
पंखुडियों
में
खिल
रही
हैं
इच्छाएं
आ
रही
है
लगाव
की
महक
यकीनन
चिडिया
चहकना
और
हवा
बहना
नहीं
छोडेंगी
बिना
जाने
भी
प्रेम
की
परिभाषा
रैन बसेरा
दिन भर के थके
पांवों
ठिठुरती देह और
दहकती पेट की आग के
साथ
जब मैंने प्रवेश
किया
रैन बसेरा चिढा
रहा था मेरा मुंह
यह रही तुम्हारी
दरी
यह रहा तुम्हारा
कम्बल
यह रहा तुम्हारा
आज का कोना
बिछाओ लेटो और सो
जाओ
हां,
जबकि उनकी साजिश थी
मैं भी सो जाऊं
भूख ने मुझे जगाए
रखा।
सीढी
वे करते रहे
इस्तेमाल
उसे
और चढते गए ऊपर
सफ़लता के शिखरों
तक
--तुम हो
वहीं, ठहरी, स्थिर
उकसाया गया उसे
--उन्हें
नीचे मैं ही तो लाऊंगी
अविचलित थी सीढी ।
--9/913,
मालवीय नगर, जयपुर-302017
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प्रतिक्रिया
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1
उसने
यों
इन्कार
किया
है
केवल
क़ौल
क़रार
किया
है
खाली
थैला
ले
घर
लौटे
हमने
भी
बाज़ार
किया
है
चिडियों
ने
मिल-जुलकर
फ़िर
से
बाजों
को
सरदार
किया
है
उजियारे
थे
राजभवन
में
अंधों
ने
दरबार
किया
है
घर
भरने
वाले
लोगों
ने
मुल्क
मेरा
मिस्मार
किया
है
खुद
से
आगे
सोच
न
पाते
सबने
यों
विस्तार
किया
है
2
सूरज
बनकर
आने
वाले
निकले
दिये
बुझाने
वाले
पानी,
लहर
और
पुलिन
भी
मछली
को
तडपाने
वाले
हम
गूंगों
से
अच्छे
हैं
ये
बच्चे
शोर
मचाने
वाले
आज
तलक
हैं
याद,
सफ़र
में
हंसकर
हाथ
मिलाने
वाले
दोराहे
पर
छोड
गए
हैं
सबको
राह
दिखाने
वाले
आया
है
बदलाव
यही
बस
बदले
सिर्फ़
ज़माने
वाले
3
खूब
जलाई
दियासलाई
फ़िर
भी
सच
पर
आंच
न
आई
उस
धरती
पर
जंग
छिडी
है
जिसको
तज
निकले
रघुराई
जीना
है
तो
करते
रहना
संग
समय
के
हाथा
पाई
कैसा
है
उजियारा
जिसमेम
कुछ
भी
देता
नहीं
दिखाई
कितनी
कितनी
नीचे
गिरती
ऊंचे
लोगों
की
ऊंचाई
चुप्प
लगा
कर
बैठा
‘हल्ला’
बढ-चढ
कर
बोली
तन्हाई
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प्रतिक्रिया
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हसामपुर-382718
ज़िला
सीकर
(राजस्थान)
बतौना
(मोबाइल)
- 09413070032
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