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सम्पादकीय !

हम कितने
शिष्ट हैं?
योरोप के
15,000 होटल वालों पर किए गए एक सर्वे से यह तथ्य उजागर हुआ है कि शिष्टाचार के
मामले में भारतीय पर्यटक दुनिया के सबसे खराब पर्यटकों में दूसरे नम्बर पर आते
हैं। यहीं यह भी बता दें कि पहला स्थान फ़्रांस के पर्यटकों को मिला है ।
फ़्रांस के
लोगों के बारे में हम ज़्यादा नहीं जानते सिवा इसके कि फ़्रांस वाले अपनी
सुसंस्कृतता पर बहुत गर्व करते हैं। इतना अधिक कि दूसरे उन्हें संस्कृत लगते
ही नहीं। वैसे तो यह साम्य भी बहुत दिलचस्प है कि संस्कृति वगैरह को लेकर एक
तबका हमारे यहां भी बहुत संवेदनशील है। ‘सारे
जहां से अच्छा’ वाला भाव
हमारे यहां भी बहुत पाया जाता है। अतीत को लेकर भी बहुत कुछ कहा जाता है। हम
यहां उस बहस और विस्तार में जाना नहीं चाहेंगे। हमारा तो कहना इतना ही है कि जो
कुछ योरोप के इन पर्यटन व्यवसाइयों ने बताया है, अगर हम अपने देश में अपने
लोगों का व्यवहार देखें, तो उससे असहमत होना मुश्किल है। जिन लोगों में राष्ट्र
गौरव का भाव कूट-कूट कर भरा है, उनकी बात ज़रा अलग है। यहां मैं साफ़ कर दूं कि
यह बात मैं व्यंग्य में कह रहा हूं। राष्ट्र के प्रति गर्व का भाव हो, सम्मान
का भाव हो, उस पर अभिमान हो, यह न केवल स्वाभाविक है, वांछित भी। लेकिन एक हद
तक ही। हद यह कि जो अच्छा है उसे अच्छा कहा-माना जाए, और जो उससे इतर है, उसे
भी स्वीकार किया जाए। अगर हम उस तरफ़ से आंखों मूंद लेंगे तो नुकसान हमारा ही
होगा।
तो, बात थी
शिष्टाचार की।
शिष्टाचार
आखिर है क्या? बहुत सरल तरह से कहा जाए तो यह कि जैसा व्यवहार आप चाहते हैं कि
दूसरे आपके साथ करें, वैसा व्यवहार करना शिष्टाचार है। महाभारत में भी ऐसा ही
कुछ कहा गया है। अगर इस सीधी सरल कसौटी पर हम अपने देश वासियों को परखना चाहें
तो क्या पाते हैं? परम्परा की, पुरातन की बात न करें। सीधे वर्तमान की बात
करें। क्या आपको नहीं लगता कि हमारी सारी अपेक्षाएं दूसरों से होती हैं, अपने
व्यवहार से हम कभी उन अपेक्षाओं पर खरा उतरने की ज़रा भी कोशिश करते नहीं दीखते।
अपने घर का कचरा हम पडोसी के घर के आगे डालने में ज़रा भी नहीं झिझकते।
सार्वजनिक स्थानों पर गन्दगी करते हमें कोई शर्म नहीं आती। नदी हो या मन्दिर,
गन्दगी फ़ैलाने के मामले में हम किसी को नहीं बख्शते। आप अच्छी से अच्छी इमारत
को देख लीजिए, हमारी पान की पीक वहां मिल जाएगी। पर्यटन स्थलों को विरूपित करना
हमारा राष्ट्रीय शगल है। चाहे भजन-कीर्तन हो, शादी ब्याह हो, रास्ते रोकने में,
तेज़ आवाज़ में लाउड स्पीकर बजाने में या ऐसे ही अनगिनत कामों में हमें दूसरों की
असुविधा का ज़रा भी खयाल नहीं आता। सडक पर हम अगर पैदल हैं तो यह मानते हैं कि
पूरी सडक हमारी और केवल हमारी है, और अगर वाहन पर हैं तो फ़िर हमारा अन्दाज़ यह
होता है कि ये पैदल लोग इस सडक पर क्यों हैं! स्पीड लिमिट का उल्लंघन, मनचाही
और गलत ओवरटेकिंग, लेन व्यवस्था की ऐसी की तैसी, मनचाही जगह पार्किंग, रात को
हाई बीम रखना – सूची अनंत
हो सकती है। क्या हम दूसरों से भी यही चाहते हैं?
अगर आप कहीं
क्यू में खडे हैं तो ज़रा औरों का व्यवहार देखिए! उन्हें तो जैसे आप नज़र ही नहीं
आते हैं। वे सीधे ही खिडकी पर पहुंचेंगे। अगर आप रोकेंगे-टोकेंगे तो आपको खा
जाने वाली नज़रों से देखेंगे, या जल्दी का या छोटे काम का बहाना बनायेंगे। जल्दी
क्या उन्हीं को है? जो क्यू में लगे हैं वे तो शायद पूरी तरह फ़ालतू हैं। क्यू
में तो इसलिए खडे हैं कि थोडा समय कट जाएगा! स्कूटर पर, मोटर साइकिल पर या
चौपाये वाहन पर मोबाइल पर बात कर अपनी और दूसरों की ज़िन्दगी से खिलवाड करने
वालों को ढूंढने की ज़रूरत नहीं, हर कहीं मिल जाएंगे। मोबाइल तो जैसे अशिष्ट
व्यवहार का सबसे अधिक प्रचलित उपकरण बन कर उभरा है। आप सिनेमा में हो, थिएटर
में हों, किसी सभा-गोष्ठी में हों, यहां तक कि पूजा या श्मशान में ही क्यों न
हो, मोबाइल हर जगह बदमज़गी करता मिल जाएगा। मैं ऐसे अनेक कार्यक्रमों में
उपस्थित रहा हूं जहां कलाकार ने बहुत विनम्रता से एकाधिक बार यह अनुरोध किया है
प्रेक्षक कृपया अपने मोबाइल या तो बन्द कर दें या उन्हें साइलेण्ट/वाइब्रेटिंग
मोड पर कर लें। स्वाभाविक भी है। कार्यक्रम के बीच मोबाइल घनघनाने से न केवल
दर्शकों-श्रोताओं के लिए रसभंग की स्थिति उत्पन्न होती है, खुद कलाकार की
एकाग्रता भी भंग होती है। जो कलाकार पूरे मनोयोग से, पूरी शिद्दत से अपना संवाद
बोल रहा है, अपना अभिनय कर रहा है, उसकी दिक्कत और झुंझलाहट समझी जा सकती है।
लेकिन भला हम क्यों सुनने लगे। कलाकार ने पैसे लिए हैं, वह अपना काम करे। क्यों
हमें तंग कर रहा है! अनेक बार यह हुआ है कि कलाकार ने अपना कार्यक्रम बीच में
रोककर मोबाइल बंद करने का आग्रह किया है, लेकिन बेशर्मों पर कोई असर कैसे हो
सकता है? अदालतों और विधान सभाओं तक में मोबाइल व्यवधान पैदा करते हैं।
जुर्माने होते हैं, लेकिन हम हैं कि न सुधरने की कसम खाये बैठे रहते हैं।
किसी नियम
या व्यवस्था को मानने में हमारी हेठी होती है। जो जितना बडा है उतना ही वह खुद
को नियमों से ऊपर मानता है। पिछले दिनों एक केन्द्रीय मंत्री का मामला खूब उछला
था जिन्हें हवाई अड्डे पर सुरक्षा चैकिंग करवाना नागवार गुज़रा था। तथ्य यह था
कि वे चैकिंग मुक्त लोगों की सूची में नहीं आते। लेकिन अपनी ही सरकार की बनाई
व्यवस्था को ठेंगा दिखाते उन्हें ज़रा भी संकोच नहीं हुआ।
अभी मेरे
प्रान्त राजस्थान में एक जाति विशेष के लोगों ने अपनी मांगों के समर्थन में
आन्दोलन किया।इस आन्दोलन को राजस्थान के निकटवर्ती राज्यों तक में फ़ैलाया गया।
आंदोलनकर्ताओं की मांग के औचित्य-अनौचित्य पर मैं कोई टिप्पणी नहीं कर रहा।
लेकिन जिस तरह पूरे एक सप्ताह तक सारे जन-जीवन को ठप्प किया गया, राष्ट्रीय
सम्पत्ति को क्षति पहुंचाई गई, बेगुनाहों का खून बहाया गया –
उसे आप किस शिष्ट व्यवहार में गिनेंगे? मन्त्री तक को यह कहने में कोई
हिचकिचाहट नहीं हुई कि अगर ऐसा न हुआ तो ‘कुछ
भी हो सकता है’। और हमने
देख भी लिया कि इस कुछ भी का अर्थ क्या है! मेरे लिए यह समझ पाना मुश्किल ही
नहीं असम्भव है कि कोई भी शिष्ट व्यक्ति ऐसा व्यवहार कैसे कर सकता है जैसा हमने
पिछले दिनों देखा। लोग सरिये-डण्डे- पत्थर लेकर चलती ट्रेन के शीशे तोड रहे हैं
– यह दृश्य हम सबने देखा
है। मन्त्रियों को गुण्डों-लफ़ंगों की तरह बर्ताव करते हम सबने देखा है। क्या
यही शिष्टता है? अगर कोई वाकई शिष्ट है तो अपनी तमाम असहमति में भी वह आखिर
क्या कर सकता है?किस हद तक जा सकता है? जो कुछ हम अपने चारों ओर देखते हैं वह
तो कल्पनातीत है।
और यही सब
हम देश से बाहर जाकर भी करते हैं। तभी हमारे बर्ताव को लेकर अनेक लतीफ़े भी बनते
हैं। बहुत सारे लतीफ़े हम खुद भी बनाते हैं, क्योंकि हमसे अधिक हमें और कौन जान
सकता है?
हमारा अतीत
बहुत महान था। ठीक है। लेकिन उसकी दुहाई कब तक हमारा साथ देगी? और क्या हमें
अतीत की आड में अपने वर्तमान को पूरी तरह छिपा लेना चाहिए? वर्तमान और भविष्य
सुधरे यह हमारी चिन्ता का विषय होना चाहिये या नहीं? और केवल चिन्ता का ही
क्यों, प्रयत्न का क्यों नहीं?
आप भी सोचें
और अपने विचारों को इस पत्रिका के माध्यम से या जो भी आपको ठीक लगे उस माध्यम
से औरों तक पहुंचाइये। शायद इसी तरह कुछ बदले।
-डॉ
दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
सम्पादक
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