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17जून,2007 :विश्व
मरूस्थल नियंत्रण दिवस
रोकना होगा बढ़ता मरूस्थलीकरण
प्रत्येक वर्ष 17 जून पूरे विश्व में
''विश्व मरूस्थल नियंत्रण दिवस''
के रूप में मनाया जाता है। इसकी शुरूआत वर्ष 1994
में पैरिस में आयोजित एक सम्मेलन के समय हुई थी। इसके पीछे मूल भावना यही है
कि अधिक से अधिक संख्या में समाज के सभी वर्गो - स्त्री
पुरूष व बच्चों आदि - को मरूस्थलीकरण की समस्या के प्रति
जागरूक बनाया जावे व उन्हें अवगत कराया जावे कि इस समस्या का समाधान जन
- सहभागिता एवं प्रत्येक स्तर पर सहयोग के बिना संभव नहीं
है। वर्ष 2007 का थीम ''मरूस्थलीकरण
एवं जलवायु परिवर्तन - एक वैश्विक चुनौती''
रखा गया है। यह थीम 21वीं सदी के सबसे
महत्वपूर्ण दो पर्यावरणीय चुनौतियों 1 मरूस्थलीकरण व
जलवायु परिवर्तन 1 के बीच आपसी जुड़ाव को भी ईगित करता
है। जहां एक ओर मरूस्थलीकरण से पर्यावरणीय ह्रास एवं प्राकृतिक संसाधनों का क्षय
होता है वहीं दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन मरूस्थलीकरण प्रव्यिा को तेजी प्रदान करता
है, गरीबी व भुखमरी बढ़ाता है। जलवायु परिवर्तन से पूरे
विश्व एवं समूची मानव जाति पर अत्यन्त प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया
है। वैज्ञानिकों के मतानुसार यदि ग्रीन हाउस गैसों के विसर्जन को रोकने के संबंध
में कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गई तो वर्ष 2100 के अन्त
तक पृथ्वी का तापमान 200c
से 500c तक
बढ़ जावेगा। पृथ्वी के तापमान बढ़ने की यह दर पिछले 10,000
वर्षो में सबसे अधिक है। जो निश्चित रूप से एक चिन्ता का विषय है।
जलवायु परिवर्तन एक प्राकृतिक घटना है एवं पृथ्वी की उत्पनि के समय से ही होती आ
रही है किन्तु मानव गतिविधियों, अनियोजित विकास व
ग्रीनहाउस गैंसों का अत्यधिक विसर्जन आदि के कारण पृथ्वी पहले की तुलना में बहुत
तीव्र दर से गर्म होती जा रही है जिससे विभिन्न ईको सिस्टम,
जल संसाधन, खाद्य संसाधन व मनुष्य के स्वास्थ्य
पर अत्यन्त प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। बाढ़ व अकाल की घटनाओं में वृद्धि हो रही है
हिम खण्ड 1 ग्लेशियर्स 1
पिघल रहे हैं व विभिन्न प्रकार की नई-नई बीमारियां फैल
रही है। यह समस्या वास्तव में गम्भीर है और यह नितान्त आवश्यक हो गया है कि इसके
निराकरण के लिए ठोस उपाय किये जावें। इसके लिए आवश्यक है कि ग्रीनहाउस गैंसों के
विसर्जन में कमी लाई जावे व वनों के संरक्षण एवं विकास पर समुचित ध्यान दिया जावे
क्योंकि वन अकाल की विभीषिका को कम करने एवं मरूस्थलीकरण को रोकने में एक
महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
आज मरूस्थलीकरण एक विश्व व्यापी समस्या है ,
क्योंकि इसके प्राकृतिक और मानवीय दोनों ही पहलू हैं। मरूस्थलीकरण के विरूद्व की गई
लड़ाई गरीबी दूर करने में सहायक है। इसमें हम सभी अपने -अपने
स्तर पर शामिल हो सकते हैं। विशेष रूप से युवा वर्ग जो प्रकृति और पर्यावरण से
संबंधित प्रश्नों की प्रति स्वाभाविक रूचि रखते हैं, वे
इस सामूहिक लड़ाई में सबसे आगे रहने वाले योद्धा हो सकते हैं। ऐसे विद्यार्थियों एवं
युवा वर्ग को पर्यावरणीय समस्याओं को बेहतर ढंग से समझने एवं उनके सम्भावित समाधान
खोजने के लिए प्रेरित करने में हमारी शिक्षा प्रणाली द्वारा टिका। विकास की विचार
धारा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
मरूस्थलीकरण रोकने हेतु संयुक्त राष्टं संधि के अनुसार मरूस्थलीकरण शुष्क,
अल्प -शुष्क एवं उप-आर्द्र
क्षेत्रों में विभिन्न कारकों, जैसे जलवायु विविधता और
मानवीय गतिविधियों द्वारा, भूमि का अपघटन है। भूमि
अपघटन सभी स्थानों पर होता है लेकिन जब यह शुष्क भूमि में होता है तब इसे
मरूस्थलीकरण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। मरूस्थलीकरण एक गतिशील प्रव्यिा
है जो शुष्क एवं क्षयशील पारिस्थितिकी तंत्रों में देखी जा सकती है। यह स्थलीय
क्षेत्रों 1।परी मिट्टी की परत,
भूमि, भू - जल
स्त्रोतों एवं सतही जल बहाव1, पशुओं,
वनस्पतियों, मानव बस्तियों,
एवं सुविधाओं 1जैसे खेतों और बांधों1
को प्रभावित करती है।
वर्तमान में मरूस्थलीकरण केवल विकासशील देशों की चिन्ता का विषय नहीं है बल्कि
विकसित देश भी इससे प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि भूमि
के कृषि के लिए अनउपयुक्त होने के कारण लोग अपनी भूमि छोड़कर दूसरे देशों में
विशेषकर विकसित देशों में प्रवास कर जाते हैं। इससे राहत कार्यो एवं मानवीय सहायता
पर काफी बड़ी धनराशि खर्च करनी पड़ती है। कुल मिलकार विश्व के
110 से अधिक देश शुष्क भूमि मरूस्थलीकरण के सम्भावित खतरे से ग्रसित है।
मरूस्थलीकरण से प्रभावित सबसे अधिक शुष्क भूमि 1 74%
1 उत्तरी अमेरीका में है।
'' विशाल भारतीय मरूस्थल '' जिसे
'' थार मरूस्थल '' भी
कहा जाता है, विश्व के सात मरूस्थलों में से एक है तथा
सम्भवत: सबसे अधिक जनघनत्व वाला एवं मनोहारी मरूस्थल
है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार इसकी औसत जनसंख्या
घनत्व 161 व्यक्ति वर्ग किलोमीटर है अधिकतम जनसंख्या
घनत्व 323 व्यक्ति वर्ग किलोमीटर झुंझुंनू जिले में एवं
न्यूनतम जनसंख्या घनत्व 13 व्यक्तिवर्ग किलोमीटर
जैसलमेर जिले में है। अरावली पर्वतमाला राज्य को दो असमान भागों मेें विभाजित करती
है। यद्यपि सम्पूर्ण राज्य शुष्क और अर्द्धशुष्क क्षेत्र के अन्तर्गत आता है फिर भी
12 जिलों जैसे - जोधपुर,
जैसलमेर, बाड़मेर,
पाली, जालौर, सीकर,
चुरू, झुंझुंनू,
नागौर, बीकानेर, हनुमानगढ़
और श्रीगंगानगर को सम्मिलित करने वाला अरावली श्रेणी का उत्तर-पश्चिम
भाग वास्तविक रूप में थार मरूस्थल का प्रतिनिधत्व करता है। थार मरूस्थल का कुल
क्षेत्रफल लगभग 318 लाख वर्ग किलोमीटर है ओर ये पंजाब,
हरियाणा, राजस्थान व गुजरात राज्य में फैला हुआ
है। इसका प्रमुख शुष्क एवं बड़ा भाग केवल राजस्थान राज्य में है जिसका कुल क्षेत्रफल
12 जिलों में लगभग 208 लाख
वर्ग किलोमीटर है।
क्यों होता है मरूस्थलीकरण \f2
मरूस्थलीकरण के मुख्य तात्कालिक कारणों में चार मानवीय गतिविधियां प्रमुख हैं
:-
1 अत्यधिक सघन खेती से मृदा की उर्वरता समाप्त होना,
2 अत्यधिक चराई से वनस्पति आवरण, जो
मृदा की अपरदन 1erosion1
से सुरक्षा करता है, का नष्ट होना,
3 वन, जो मृदा को भूमि से बांधे रहते हैं,
का नष्ट होना, तथा
4 अपर्याप्त जल निकासी वाली सिंचाई व्यवस्था से उपजा। भूमि का
लवणीय हो जाना
इसके अतिरिक्त शिक्षा एवं ज्ञान की कमी, विकासशील
देशों की प्रतिकूल व्यापार परिस्थितियां और अन्य सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक कारण
मरूस्थलीकरण के प्रभावों को बढ़ाते हैं।
मरूस्थलीकरण के पर्यावरणीय प्रभाव
यदि मरूस्थलीकरण की प्रव्यिा से पर्यावरण पर पड़ने वाले अनेकानेक प्रत्यक्ष
अप्रत्यक्ष प्रभावों को देखें तो अनेक ज्वंलत समस्याऐं उभर कर सामने आती हैं। यथा
:-
1 मृदा क्षरण : मृदा हमारी घरती का
मूल्यवान आवरण है। इसके निर्माण की प्रव्यिा अत्यन्त धीमी है परन्तु यह अत्यधिक
तीव्रता से नष्ट हो सकती है। मृदा के एक इंच के निर्माण में कई शताब्दियां लग सकती
है परन्तु यदि इसका दुरूपयोग किया गया तो केवल कुछ ही .ऋतुओं
में इसका क्षरण हो सकता है। वर्तमान में पृथ्वी से मृदा तेजी से लुप्त होती जा रही
है। फलत: भूमि के ।पजा।पन का भी ह्रास हो रहा हैं।
2 जल संकट : मरूस्थल में जल एक
अत्यन्त दुर्लभ संसाधन है एवं यह अपनी अनुपस्थिति से अपना एहसास कराता है। शुष्क
क्षेत्रों में भूमि क्षरण का सीधा प्रभाव जल चक्र पर होता है। यदि वर्षा कम होती है
तो सूखे के कारण सतह में पानी का पुन: भरण नहीं होता है
जिससे कुए तालाब सूख जाते हैं, पौधे और पशु मर जाते हैं
एवं मनुष्य को जीवित रहने के लिए दूसरे अनुकूल क्षेत्रों में जाना पड़ता है। दूसरी
तरफ जब अत्यधिक वर्षा होती है तो बाढ़ के कारण हजारों मनुष्य एवं पशुओं की मृत्यु हो
जाती है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां पेड़-पौधे
नहीं या कम होते हैं। मूसलाधार वर्षा के बहाव के कारण मृदा वर्षा के बहाव के साथ बह
जाती है और वर्षा के रूकने बाद सतह पर कठोर परत रह जाती है जिसमें से जल नीचे की
भूमि तक नहीं पहुंच पाता है।
3 जैव विविधता की हानि : सूखे,
लवणता या अत्यधिक दोहन के कारण होने वाले भूमि क्षरण का,
वनस्पतियों के स्वास्थ्य अथवा पुनर्जनन की क्षमता पर तत्कालिक प्रभाव पड़ता
है। जो जीव प्रजातियां, इन वनस्पतियों पर निर्भर करती
है उन्हें अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरे क्षेत्रों में जाना पड़ता है अन्यथा उनका
अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा। इस क्षय का महत्व इस कारण है क्योंकि शुष्क भूमि
के पेड़ पौधे एवं जीव जन्तु ऐसे पर्यावरण में रहने के अनुकूल होते हैं। इसके
अतिरिक्त ये प्रजातियां ही लोगों के लिए महत्वपूर्ण संसाधन है। इनके लुप्त होने से
विश्व के सर्वाधिक भंगुर पर्यावरण में रहने वाले लोगों को गरीबी और खाद्य असुरक्षा
का खतरा बढ़ जायेगा।
रीबी बढाता है मरूस्थलीकरण :
मरूस्थलीकरण के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक
दुष्प्रभाव भी गहरे होते है। गरीबी के कारण लोग अपने बचे खुचे प्राकृतिक संसाधनों
का अत्यधिक दोहन करते हैं जिससे भूमि के खराब होने का दुष्चक्र बढ़ता जाता है। अत:
गरीबी मरूस्थलीकरण का कारण एवं परिणाम दोनों ही है।
सूखा एवं भूमि की उर्वरता कम होने से ग्रामीण जनसंख्या को पलायन के लिए मजबूर
होना पड़ता है। इस पलायन से शहरी पर्यावरण में तो समस्याएं आती ही हैं साथ ही उन
ग्रामीण क्षेत्रों में भी, जो सूखे से अप्रभावित हैं,
नये लोगों के आने से समस्याएं उत्पन्न हो जाती है। ऐसे क्षेत्रों में जीवन
की परिस्थितियां शुरू में बेहतर होती है परन्तु अन्त में काफी कठिन हो जाती है।
सामाजिक स्थिरता एवं सांस्कृतिक पहचान भी खतरे में पड़ जाती है और कभी-कभी
इनकी गैर कानूनी एंव मलिन बस्तियां, जातीय या धार्मिक
झगड़ों का कारण भी बन जाती है।
समाधान के प्रयास एवं पहल
मरूस्थलीकरण एक अत्यन्त विकराल एंव जटिल पर्यावरणीय समस्या है। जिसका समाधान
आसान नहीं हैं। फिर भी इस समस्या के समाधान के लिए अन्तर्राष्टंीय एवं राष्टंीय
स्तर पर काफी प्रयास किये जा रहे है।
अन्तर्राष्टंीय समुदाय की भूमिका
मरूस्थलीकरण के विरूद्ध संघर्ष की दिशा में सबसे पहला ठोस प्रयास वर्ष
1968-1974 में साहेल के सबसे बड़े अकाल एवं सूखे के बाद
किया गया जिसमें दो लाख व्यक्तियों एवं करोड़ों पशुओं की मृत्यु हुई थी।
20वीं सदी के अन्त में इस संबंध में कई महत्वपूर्ण
अन्तर्राष्टंीय सम्मेलन आयोजित हुए। जिनका उल्लेख करना सामयिक होगा।
1 स्टॉकहोम सम्मेलन 1स्वीडन1
1972
यह प्रथम अंतर्राष्टंीय सम्मेलन था जिसमें मानव के भविष्य से संबंधित पर्यावरणीय
मुद्दों को सम्बोधित किया गया था। इस सम्मेलन के दौरान अंतर्राष्टंीय समुदाय ने इस
बात को स्वीकारा कि वर्तमान में जिन पर्यावरण्ाीय समस्याओं का हम सामना कर रहे है
उनका मूल कारण जनसंख्या वृद्धि एवं अनियोजित विकास है। यह मनुष्य की जिम्मेदारी है
कि वह अपनी प्राकृतिक धरोहर को लम्बे समय तक सुरक्षित रखे। नवीनीकृत न हो सकने वाले
स्त्रोतों का उपयोग, जैव विविधता संरक्षण की चुनौतियां
एवं जनसंख्या पर नियंत्रण आदि के लिए सबको मिल कर कार्य योजना बनानी होगी।
2 नैरोबी सम्मेलन 1केन्या1
1977
यह मरूस्थलीकरण पर पहला सम्मेलन था, जिसमें
1968-1974 में साहेल में पडे सूखे एवं अकाल-जिससे
आर्थिक एंव पारिस्थितिकी सन्तुलन को खतरा उत्पन्न हो गया था-
के विषय में अन्तर्राष्टंीय समुदायों ने विचार विमर्श किया एवं मरूस्थलीकरण
की समस्याओं का गहराई से विश्लेषण किया। मरूस्थलीकरण रोकने के लिए अन्तर्राष्टंीय
समुदायों के मध्य गतिशीलता बनाये रखने हेतु एक कार्य योजना बनाई गई एवं प्रभावित
देशों को लक्षित कर कुछ सुझाव दिये गये, जिससे वहां
मरूस्थलीकरण के विरूद्ध प्रभावी कार्यवाही की जा सके।
3 रियो - डि -
जेनेरियो सम्मेलन 1ब्राजील1 1992
इस सम्मेलन में विभिन्न देशों एवं अन्तर्राष्टंीय समुदायों ने पर्यावरण संरक्षण
के लिए ऐजेण्डा-21 के रूप में पर्यावरण
एवं टिका। विकास के प्रति वचनबद्धता प्रदर्शित की। रियो सम्मेलन के परिणामस्वरूप दो
अन्तर्राष्टंीय संधियों-जैव विविधता संधि
119921 एवं संयुक्त राष्टं संघ जलवायु परिवर्तन
संधि 119931- उभर कर आई। विकासशील देशों ने
आग्रह किया कि पृथ्वी सम्मेलन में हुए वार्तालाप में मरूस्थलीकरण के मुद्दे को भी
अन्य मुद्दों के समान महत्व दिया जाना चाहिए। वर्ष 1994
में मरूस्थलीकरण को रोकने हेतु संयुक्त राष्टं संघ द्वारा एक संधि और
तैयार की गई। 174 देशों ने उक्त संधि पर हस्ताक्षर किये
हैं जिनमें भारत भी एक है। इस तरह ये तीनों संधियां अन्तर्राष्टंीय सहयोग एवं
एकजुटता का प्रमाण है, जिनका लक्ष्य पर्यावरणीय समस्याओं
का समाधान एवं सामाजिक-आर्थिक विकास है।
मरूस्थलीकरण को रोकने हेतु भारतीय प्रयास
मरू विकास कार्यक्रम 1डीड़ीपी1
मरूस्थलीकरण को रोकने के लिए राष्टंीय स्तर पर भी काफी प्रयास किये जा रहे हैं।
मरू क्षेत्र की कठोर जलवायु और अन्य समस्याओं से सभी परिचित हैं। मरूस्थल की
समस्याओं और इसके प्रसार के खतरे को महसूस करते हुए कृषि राष्टंीय आयोग
119741 ने अपनी अन्तरिम रिपोर्ट में सुझाव दिया कि देश
के मरू क्षेत्र में मुख्यतया वनारोपण एवं पशु सुधार कार्यक्रम को सम्मिलित करते हुए
विकास कार्यक्रम लागू किये जाने चाहिए। कृषि राष्टंीय आयोग की सिफारिशों को
मद्देनज़र राज्य के 11 जिलों 1
अब 12 जिलों 1 में
1977-78 में मरू विकास कार्यक्रम
1डीड़ीपी1 आरम्भ किया गया।
यह शत प्रतिशत केन्द्रीय प्रवर्तित योजना थी। इस योजना के अन्तर्गत वर्ष
1977-78 से 1996-97 तक कुल
2,02,520 हैक्टेयर क्षेत्र में वृक्षारोपण एवं विकास
कार्य करवाये गये तथा 24,888 रोक़िमी सडकों के एवं इंदिरा
गांधी नहर के किनारे वृक्षारोपण करवाया गया जो सम्पूर्ण मरू क्षेत्र का मात्र एक
प्रतिशत ही है।
मरू प्रसार रोक कार्यक्रम 1सीड़ीपी1
वर्ष 1999-2000 में भारत सरकार के ग्रामीण विकास
मंत्रालय द्वारा केन्द्रीय प्रवर्तित योजना के अन्तर्गत राज्य के
10 मरू जिलों जैसे जोधपुर,
जैसलमेर, बाड़मेर, पाली,
जालौर, सीकर, चुरू,
झुंझुनू, नागौर एवं बीकानेर में मरू प्रसार रोक
कार्यक्रम 1सीड़ीपी1 लागू
किया गया। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत केन्द्रीय सरकार 75
प्रतिशत राशि तथा राज्य सरकार द्वारा 25 प्रतिशत राशि
वहन करती है।
मरू प्रसार रोक परियोजना के मुख्य उद्देश्य निम्नानुसार है-
1 भू प्रबंध के उन्नत तरीकों से मरूस्थल प्रसार को रोकना
2 सघन वृक्षारोपण द्वारा हवा की गति को रोकना और इस क्षेत्र में
सृजित संरचनाओं को संरक्षित रखना।
3 स्थानीय नागरिकों के लिए जला। लकड़ी व चारा एवं अन्य घरेलू
आवश्यकताओं की पूर्ति करना।
4 ग़्रामीण नागरिकों के लिए रोजगार उपलब्ध कराना एवं उनकी सामाजिक
एवं आर्थिक स्थिति को सुधारना।
मरू प्रसार रोक योजना के तहत चूंकि सामुदायिक भूमि,
वन भूमि अथवा सरकारी बंजर भूमि पर कार्य करवाया जाता है। अत:
वृक्षारोपण कार्य करवाने से पहले स्थानीय लोगों को विश्वास में लिया जाता है
तथा क्षेत्र में कराई जाने वाली सभी वृक्षारोपण गतिविधियों में लोगों की सहभागिता
सुनिश्चित की जाती है। लगभग 900 वन सुरक्षा एवं प्रबंध
समितियों का गठन किया जा चुका है तथा मरू प्रसार रोकने हेतु वृक्षारोपण एवं वन भूमि
की सुरक्षा, विकास एवं प्रबंधन में उनका पूर्ण सहयोग
प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। मरू प्रसार रोक परियोजना में वर्ष
1999-2000 से अब तक 1,45,443
हैक्यटर में वृक्षारोपण कार्य करवाया जा चुका है। इस प्रकार डीड़ीपी एवं
सीड़ीपी योजना के तहत जो अभी तक वृक्षारोपण कार्य करवाया गया है वो कुल मरूस्थलीय
क्षेत्र का मात्र 15 प्रतिशत है। उक्त तथ्यों को
ध्यान में रखते हुए मरू प्रसार रोक के प्रभावी व्यिान्वयन के लिए वृक्षारोपण कार्यो
को पर्याप्त गति दिये जाने की आवश्यकता है।
मरूस्थलीकरण रोकने हेतु सबसे महत्वपूर्ण भागीदारी-आर्थिक
सहायता देने वाली एजेन्सियों, राष्टंीय सरकारों,
स्थानीय प्रशासन एवं शुष्क क्षेत्रों के मध्य होनी चाहिए। इससे प्रभावशाली
ढंग से निपटने के लिए सभी संबंधित व्यक्तियों की पूर्ण प्रतिबद्धता एवं भागीदारी
आवश्यक है। शुष्क क्षेत्रों के लोग इस संघर्ष में स्वयं ही सबसे उत्तम संसाधन है
क्योंकि किसी अन्य की अपेक्षा वे अपनी भूमि के बारे में बेहतर जानते है। इस संबंध
में उनकी दक्षता अन्य क्षेत्रों के लोगों की तुलना में अधिक होती है। क्योंकि उन्हें
प्रतिकूल परिस्थितियों में रहने का अभ्यास होता है। मरूस्थलीकरण रोकने में प्रत्येक
स्त्री, पुरूष एवं युवा वर्ग के योगदान की आवश्यकता है।
मरूस्थलीकरण की समस्या का समाधान तब तक संभव नहीं है जब तक समाज के सभी स्तरों के
व्यक्ति एकजुट नहीं होते। ********
अति.प्रधान मुख्य वन संरक्षक 1विकास1
राजस्थान, जयपुर
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