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व्यंग्य
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मारक है उनका अन्दाजे बया! |
डॉ0 मनोहर प्रभाकर |
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सदियों
पहले से लिक्खाड़ लोग शब्द की महिमा का बखान करते रहे हैं। सीति काव्यों से लेकर
भाषाशास्त्र के ग्रंथों तक में हजारों पन्ने इसी सेरंगे पड़े हैं। पारम्परिक पण्डितों
ने शब्द को ब्रंह्म की संज्ञा दी, तो प्रगतिशील मार्क्सवादी आलोचकों ने इसे सामाजिक
बदलाव का शस्त्र घोषित किया। शब्द-लाघव
ने रघ्घू जी राघव बन गए, तो छुट्टन लाल सीएल क़े नाम से सरनाम हो गए। नेता हो या
अभिनेता, मुख्यमंत्री दरबार हो या कोई छोटा-बड़ा
अखबार - सभी के जरिए शब्दों का जादू अपना असर दिखाता है। शब्दों की सतपकवानी के
स्वाद अदलते-बदलते
रहते हैं। अफसर की अपने मातहत को फटकार, निठल्ले पति को कल प्रिय पत्नी की भुजंगी
फुफकार और गुरूघंटाल मंत्री से किसी नादान ब्यूरोक्रेट की तकरार में शब्दों का
आस्वाद साक्षात् विष-पान होता है, तो मतदाता से उम्मीदवार का संवाद, प्रेमिका से
प्रेमी की प्यार भरी फरियाद और कवि सम्मेलन में 'अहो रूपम् अहो ध्वनि' की दाद का
स्वाद कुछ और ही होता है। कहने के मायने ये कि शब्द का आयुध कभी वरदान होता है, तो
कभी अभिशाप।
अब आप हमको ही लीजिए, कुछ शब्द जो कभी
हमें अपने लेडी स्टेनो की वाणी से मधुर और मादक लगते थे, अब उम्र के छठे दशक में
पूरे मारक और संहारक लगने लगे हैं। हमारे कार्यालय की रिसेप्शनिस्ट मिस नगमा जब कभी
हमें गुडमॉर्निंग के साथ अपने टिपिकल साउथ इण्डिन अन्दाज में इतना सा पूछ लेती थी -
सर आप कइसा हैं तो हमारा मन आनन्द से उल्लसित हो उठता था, पर अब जब हम साठ के
पार जा पहुंचे हैं, तो किसी सभा-सम्मेलन,
शादी-ब्याह
या राजभवन की पन्द्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी की पार्टी में जब कोई युवा अफसर हमें
द्वितीय श्रेणी के नागरिक की निगाह से देखता हुआ हमारी कुशल-क्षेम
इन शब्दों में पूछता है 'सर स्वास्थ्य कैसा है', तो हम उनर तो पूरे हौसले के साथ यही
देते हैं - 'एक्सीलैंट ! एक्सीलैंट', पर भीतर से हमारे मन पर जो बीतती है, उसे शब्दों
में बयान करना मुश्किल है। लगता है, जैसे किसी ने हमारे कानों में गरमागरम तेल उडेल
दिया हो। हम मन ही मन उसे कोसते हुए कहते हैं -मक्कार कहीं का ! हमारे स्वास्थ्य
की इसे चिन्ता है और इसे देखो चालीस पर ही हाथ-पैर सियाराम-सियाराम
कर रहे हैं।
स्वास्थ्य की चिन्ता जताने वाले ऐसे
वाक्यांशों को तो हम अपने मन को समझाते हुए अंग्रेजी के शिष्टाचार का हिस्सा मान
लेते हैं और उसका तर्जुमा 'हाउ डू यू डू' करके तसल्ली कर लेते हैं, पर सबसे ज्यादा
कोफ्त हमें जिस शब्द से होती है, वह है - अंकल। ऐसा नहीं है कि अंकल शब्द हमेशा ही
हमें आहत करता रहा हो। दो दशक पहले तक जब हमारे तरूण मित्रों की मिठबोली पत्निया!
याने हमारी भाभिया! अपने लाडलों का गुणगान करते हुए कहती थीं - घ्बेटे, अंकल को यह
पोयम तो सुनाओ, टिं्वकल-टिं्वकल
लिटल स्टारघ् तो हम बोरियत को भोगते हुए भी इस सम्मान सूचक शब्द का स्वाद गाहे-बगाहे
चखते रहते थे। पर आजकल आलम यह है कि रिक्शेवाले से लेकर बस कण्डक्टर तक और हमारे
लाडले के घरेलू नौकर नाहरसिंह थापा तक, सब हमें अंकल कह कर ही सम्बोधित करने लगे
हैं। और तो और जब हम अपने मकान के लॉन पर सर्दी में थोड़ी धूप खाने और गर्मी की शामों
में पसीने से राहत पाने को टॉपलैस पोजीशन में बैठे होते हों तो घर के बाहर से रास्ता
पूछने वाले अजनबी तक हमें अंकल कहकर ही सम्बोधित करने लगे हैं। कुछ सालों पहले तक
ऐसे लोग हमें अमूमन साहब कहकर सम्बोधित करते थे, फिर धीरे-धीरे
साहब से भाई साहब हुए और अब तो अंकल का नामोच्चार ही संज्ञा, विशेषण और सम्बोधन की
त्रयी को अपने में समेटे है। मित्रों और परिचितों के युवा और किशोर बेटे-बेटिया!
हमें अंकल कहें, वहा! तक तो हमें कोई ऐतराज नहीं, पर जब से हर रस्ते चलता ऐरा-गैरा
हमें अंकलजी कहने लगा है, हमें उसका यह सम्बोधन सर्प दंश से कम प्रतीत नहीं होता।
हमने पूरे तैतीस साल तक सरकारी
मुलाजमत की है। छोटे-मोटे ओहदों पर रहने
के कारण लोग हमें साहब कहकर भी पुकारते रहे हैं, पर बुरा
हो इन अंग्रेजी पत्रकारों का, जिन्होंने बड़े बड़े आला
अफसरों के लिए भी निहायत हिकारत भरे एडजेक्टिव्ज इजाद कर लिए हैं मसलन कैबिनेट
सेक्रेटरी तक को वे 'निज बाबू'
और डीज़ी पुलिस को 'टॉप कॉप'
याने 'सिरमौर सिपाही'
कहने तक से बाज नहीं आते। ऐसे में हमारे जैसे ठेके पर काम करने वाले
रिटायर्ड एम्पलॉयी को कोई और विशेषण, कॉम्पलीमैंट या
साधुवाद तो क्या मिल सकता है ? पर हा!,
यदा -कदा
जब हमारे बच्चों के हम उम्र कोई सरकारी मुलाजिम मिल जाते हैं,
तो बस उनके मु!ह से बरबस ये चन्द शब्द जरूर निकल
पड़ते हैं - अंकल, इस उम्र
में इतना हार्ड वर्क, गजब करते हैं,
आप।घ् कहना न होगा कि उनके ये वाक्यांश हमारे बुढ़ापे का बखिया उधेड़ रहे
हैं। मन में तो आता है इन शैतानों से कहें कि तुम्हें जीवन सदी की आखिरी सीढ़िया!
चढ़ते ज्योति बसु, नरसिंह राव और सीताराम केसरी
नजर नहीं आते, जो
इस उम्र में भी केन्द्र की सना सुन्दरी के लिए चुनाव स्वयंवर में उत्पात मचाने से
नहीं चूकते। अरे हमारी उम्र के राजनीति - रसिया धनिकलाल
जी ने क्या तीस वर्षीया तरूणी से ब्याह रचाकर अपने को धन्य नहीं किया। और रविशंकरजी
की उम्र भी
तुम्हारी नजर में नहीं आई, जब उन्होंने उनहत्तर पार करके
चौंतीस वर्षीया चारूशीला सुकन्या से ब्याह रचाया। कैसे बताए!
अपनी मर्मान्तक पीड़ा को कि इन बदमाश बछेरों को अपनी
गुजर-बसर करने के लिए की जा रही हमारे जैसे
साधारण साठोनरी की चाकरी भी नहीं सुहाती और बार-बार
हमें याद दिलाते रहते हैं - 'इस उम्र में इतना हार्ड
वर्क।' सच कहें तो ये लोग हमें नागनाथ से कम नजर नहीं
आते।
उम्र का अहसास कराने वाले इन
शब्दों और वाक्याशों में एक विशेषण और ऐसा है,
जो हमें ऐसा खलता है जैसे फिल्म की नायिका को खलनायक। यह
शब्द है 'वरिष्ठ'। हालांकि
हमारे हम उम्र ऐसे मूर्खों की कमी नहीं है, जो इस
शब्द को अलंकरण की तरह स्वयं ही इस्तेमाल करते हैं। मसलन वरिष्ठ पत्रकार,
वरिष्ठ साहित्यकार, वरिष्ठ समाजसेवी आदि। पर
हमें तो अपने लिए इस शब्द के प्रयोग से ही कोफ्त होती है। क्योंकि हम जानते हैं
कि यह हमारे कर्म-क्षेत्र में
हमारे दीर्घ अनुभव का एकनॉलेजमैन्ट नहीं,
बल्कि सरासर लैम्पूनिंग याने भप् उड़ाना है। ऐसे दुष्टों और मित्र रूप में
हमारे शत्रुओं की एक साजिश को हमने उस समय नाकाम कर दिया था,
जब उन्होंने अपनी आत्मीयता का ढोंग रचते हुए हमारे षष्टि-पूर्ति
समारोह के आयोजन का प्रस्ताव किया था। हमने उनसे पीछा छुड़ाने के लिए हमारे पुराने
पुस्तकालयाध्यक्ष कार्तिकेय शर्मा की सहायता से एक ज्योतिषीजी को पूरे एक हजार एक
रूपए भेंट कर अपनी दूसरी जन्म-पत्री बनवाई
जिसमें हमारी जन्म तारीख ठीक तीन साल पहले की लिखी थी। किसी
तरह उन धूर्तों को समझाया कि घ्भैया, रिटायरमेंट क्या
होता है, वह तीन साल पहले हो गया सो हो गया पर दादाजी
की बनवाई हुई जन्म-पत्री झूठी थोड़े ही है।
इसलिए अभी कुछ साल और सब्र करो।घ् भला हो कार्तिकेय जी का,
जिन्होंने उस आड़े वक्त पर हमारी मदद की और हमारे बुढ़ापे की सार्वजनिक घोषणा
के उस जलसे से बचाकर हमें कृतार्थ किया। हमें संस्कृत का एक श्लोक सहसा याद हो आया,
जिसमें कहा गया है - उत्सव में,
व्यसन में, राज-द्वार
संकट पड़ने पर और शोक के समय श्मशान में जो साथ रहता है,
वही सच्चा
बान्धव है।
ऊपर से आदरसूचक किन्तु भीतर से
प्राणभेदक इन शब्दों की श्रृंखला में हमें दो शब्दों का पुण्य स्मरण और हो रहा
है। ये शब्द हैं प्रणाम् और चरणस्पर्श। आज से कुछ वर्षों पहले तक जो लोग हमें
गुडमॉर्निंग और नमस्कार कहकर अभिवादन करते थे,
अब यकायक प्रणाम करने लगे हैं। प्रणाम् वैसे कुछ बुरा
शब्द नहीं है। पुरानी पीढ़ी के छात्र जब अपने अध्यापकों को प्रणाम् करते थे,
तो आशीर्वचनों से उनकी झोली भर जाती थी। पर अब यहा!
तो नमस्ते भी हो जाए तो समझ लो जीवन धन्य हो गया,
नहीं तो बस थोड़ी अदा के साथ अपनी मु!डी
को नीचे झुका लेना ही सम्मान अभिव्यक्ति के एवरेस्ट पर चढ़ लेना है। पर हमारी आत्मा
तो प्रणाम् के
उच्चारण् मात्र से घायल पक्षी की तरह कराह उठती है।
हमें इसमें इज्जत का इजहार नहीं,
अपनी बुजुर्गी पर प्रहार नजर आता है। कुछ ऐसी ही प्रतीति
होती है हमें चरणस्पर्श से। जो तथा कथित संस्कारी हमारा
चरणस्पर्श करने की अनुकम्पा करते हैं, उनकी संख्या तो
अधिक नहीं है, पर ऐसे नाटकीय नर-नारियों
की कमी नहीं जो टेलीफोन पर हमें
चरणस्पर्श के साथ अपने संभाषण का श्री गणेश करते हैं। इनसे भी बड़े छलिया हैं वे,
जो अपने कृपा-पत्रों में भी
'चरणस्पर्श' से ही अपने
ट्रांसफर या
प्रमोशन की सिफारिश की गुजारिश की शुरूआत करते हैं। अब कोई भला आदमी हमें यह
समझाए कि डाक के जरिए भी कहीं चरणस्पर्श हो सकता है ?
लेकिन क्या किया जाए ? उनका अपना अन्दाजे बया!
है। भगवान बचाए हमें ऐसे श्रद्धालुओं से, जो
हमें उम्र के इस मोड़ पर भी अपने शब्द-शरों
से बींधते रहते हैं। तथास्तु।
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अबकी विश्व हिंदी
सम्मेलन न्यूयॉर्क में हो रहा है। राष्ट्रभाषा बनाने के बाद हर दो साल पर हिंदी
का यह श्राद्ध कर्म होता है और ज़्यादातर विदेशों में ही होता है। अपने देश में
करें तो जनता मारेगी कि ज़िन्दा भाषा का श्राद्ध कर रहे हो! एक जानकार ने बताया कि
न्यूयॉर्क में यह सम्मेलन इसलिये हो रहा है ताकि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की
भाषा बनाने के लिये दबाव पड सके। इस हिसाब से अगला सम्मेलन चन्द्रमा पर करना
चाहिये, इससे हिंदी अपने आप पूरे ब्रह्माण्ड की भाषा मान ली जायेगी।
न्यूयॉर्क
शानदार शहर है, अमेरिका में है, वहां जाने का हर हिन्दुस्तानी का मन करता है।
सरकारी पैसे पर जाने को मिले तो पहले जा चुके विद्वान बताते हैं कि वहां खाने और
रात को पीने का उम्दा प्रबन्ध रहता है। हिंदी के कस्बाई लेखक वहां जाकर ग्लोबल हो
जाते हैं, अंग्रेज़ी बोलने लगते हैं। अपने मुल्क में भले ही हिंदी के लेखक हैं,
रुक-रुक कर बोलते हैं, और डा्ढी भी रखते हैं इसलिये लोग उन्हें आलोचक कहते हैं।
जाने की तैयारी में हैं, एक दिन न्यूयॉर्क का तापमान पूछ रहे थे। उन्होंने रट
लिया था कि हिंदी सारी दुनिया में फ़ैली है, इसलिये उनका यह देखने जाना ज़रूरी है।
कई कवि, कवयित्रियां, लेखक, पत्रकार न्यूयॉर्क जाना चाहते हैं पर अफ़सोस वे नहीं
जा सकेंगे। हिंदी के हवाई जहाज की सीटें पहले ही भरी हुई हैं। इन सीटों पर
विश्वविद्यालयों के प्रोफ़ेसर, हिंदी संस्थानों के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष,अकादमियों के
सरकारी कृपा पात्र अध्यक्ष, बडे प्रकाशक, हिंदी में कविता लिख लेने वाले बडे अफ़सर
और ऐसे ही लोग अपना रुमाल रख चुके हैं। लेखक को इनमें से कोई खडे-खडे ले जाने को
भी तैयार नहीं है। मैंने एक प्रोफ़ेसर से पूछा, आप वहां जाकर क्या करेंगे? वह बोला
–
देखूंगा कि वहां के प्रोफ़ेसर भी कुंजी लिखते हैं या नहीं?अकादमी अध्यक्ष बोला-
भाई हम तो जायेंगे, मुख्यमन्त्री ने मेरा नाम एप्रूव कर दिया है। फ़ाइलों पर
अंग्रेज़ी में नोट लिखकर गंजा हो चुका अफ़सर बोला- हम वहां से लौटकर सरकार को
रिपोर्ट देंगे कि ऑफ़िशियल लैंग्वेज कैसे सक्सेस्फ़ुली इम्प्लीमेण्ट की जाए!
जहाज भर रहा
है।जिनके टिकट पक्के हैं वे आश्वस्त हैं, जिनके वेटिंग में हैं वे उसे पक्का
करवाने में लगे हैं। सबको हिंदी से प्यार है। ये सब हिंदी के शुभ चिंतक हैं,
चाहते हैं वह दुनिया भर में फ़ैले। उनके बच्चे हिंदी नहीं पढते, वे खुद हर वक़्त इस
दर्द के साथ जीते हैं कि अन्ग्रेज़ी नहीं बोल पाते। लेकिन मामला न्यूयॉर्क का है।
मेरे कस्बे के
सरकारी स्कूल के बाबू लाल मास्टर जी को कबीर कण्ठस्थ था, रामचरित मानस की
सप्रसंग व्याख्या करते थे। वे अंग्रेज़ी के भी बी ए थे लेकिन धोती कुर्ता पहनते
थे, व्याकरण की गलती पर तुरन्त मुर्गा बना देते थे। उन्हें हिंदी के भविष्य की
कोई चिंता नहीं थी। उन्होंने हज़ारों लडकों की हिंदी सुधरवाई। वे कभी हिंदी
संस्थान के सदस्य नहीं रहे। वे कभी हवाई जहाज़ में नहीं बैठे। उन्होंने कभी नक्शे
में न्यूयॉर्क नहीं देखा। गरीब मास्टर थे इस ग्लोबल भाषा के। प्रोफ़ेसर साहब ने
सुना तो बोले –
हम न्यूयॉर्क में बाबूलाल मास्टर जी को ज़रूर श्रद्धांजलि देंगे।
सम्पर्क :
anuragvajpeyi@gmail.com
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