जुलाई 2007 

                      

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  पुस्तक समीक्षा  

 अपने पर हंसते संस्मरण – सरल विशारद

स्मृतियों के सच को संस्मरण कहते हैं। यह व्यक्ति सापेक्ष होते हैं। उम्र के एक पडाव पर स्मृतियां ही साथ निभाती हैं। इसमें मधुरता  भी होती है और कडवाहट भी।अक्सर मधुरता के व्यामोह में अपने श्रेष्ठ अनुभव को संस्मरण के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। यहां ईमानदारी अक्सर संशय के घेरे में रहती है। लेकिन जो लेखक स्वयं पर हंस सकता है, अपने आत्मीय संबन्धों का हास-परिहास कर सकता है, वह संस्मरणों के सत्य को भी काल्पनिक किन्तु वास्तविक घटनाओं  की तरह प्रस्तुत कर एक व्यंग्य  रच देता है। ‘झूलता हुआ ग्यारह दिसम्बर’ के व्यंग्य ऐसे ही हैं। कथाकार हरदर्शन सहगल अपनी कथ्य शैली  से संस्मरणों के सत्य को भी व्यंग्य कथा में ढाल देते हैं जिसे पढ़ते हुए हंसी आ ही जाती है। अपने अनुभवों पर हंसने वाले ऐसे संस्मरण कदाचित हिन्दी में दुर्लभ हैं। दुर्लभताओं की इस शृंखला  में सबसे पहले है ‘झूलता हुआ ग्यारह दिसम्बर’ जिसमें लेखक अपनी नादानियों पर नाज़  करता और पत्नी से डांट खाकर गौरवान्वित होता है –तुम्हें तो हर वक़्त मज़ाक ही सूझता है। क्या इसी दिन के लिए शादी की थी।“  हर वक़्त मज़ाक करने, अपनी मज़ाक उडाने और दूसरों का मज़ाक बनाने वाले अनेक संस्मरण इस संग्रह में हैं, जिनमें मुख्य हैं सिंकी मास्साब, दो कलाकार, सा रे गा मा उर्फ़ से.रा. यात्री, खुराफ़ात। 

हरदर्शन सहगल  संस्मरणों के सत्य के सहारे स्थितियों परिस्थितियों एवं व्यक्तियों पर खूब व्यंग्य कर हंसते हैं जैसे मैंने अखबार खरीदा या घुंघराले बाल तथा रेलवे का वकील।  चाहे अखबार खरीदने की ललक हो या बाल घुंघराले करने का शौक़, लेखक अपनी तमाम मूर्खताओं पर ठहाके लगा कर हंसता-हंसाता है। यद्यपि यह संस्मरण नहीं है, बल्कि हंसने- हंसाने  का एक व्यंग्य लेख है, जिसका नायक लेखक स्वयम है और वह अपने साथ घटित घटनाओं को याद कर मज़ा लेता है।इसमें सत्य है भी और नहीं भी। 

कथाकार हरदर्शन सहगल अपनी ना कुछ बातों को भी खूब हवा देते हैं।समाज में या खुद के जीवन में घटित घटना को ऐसे चमकदार ढंग से पेश करते हैं कि हंसी फ़ूट पडती है या कभी-कभी गुस्सा भी जाता है, जैसेहवा देने वालेसंस्मरण में आता है। यह कोई यादगार वाकया नहीं है, पर सहगल साहब ने नी कहकर इसे यादगार बनाने की खूब कला दिखाई है। बहुसंख्यक अल्पसंख्यक की गुत्थंगूथ को खूब हवा दी है और बात का बतंगड बना कर रख दिया है। इसे कहते हैं स्मृति का विस्तारण! यही हाल ‘शोक में शौक़’ आलेख का है। शोक सभाओं पर करारा व्यंग्य है। 

हरदर्शन सहगल एक गम्भीर कथाकार हैं और गम्भीर लेखक जब हास-परिहास पर तुल आता है तो स्वयं के साथ अपने पाठकों को हंसी के झूले में झुलाता ही रहता है। तमाम तरह की तुकी-बेतुकी यादों को एक सिलसिलेवार कथानक के माध्यम से ऐसे प्रस्तुत करता है  गोया सत्य कथा हो! ‘झूलता हुआ ग्यारह दिसम्बर’ ऐसी सत्य कथाओं का खज़ाना है जो संस्मरण की स्वीकृत विधा के अनुकूल नहीं होकर एक नई राह – हास्य व्यंग्य संस्मरण गाथा की राह चलता है। यह प्रशंसनीय है। हिन्दी का पाठक ऐसी हास्य सत्य कथाओं से ज़रूर लाभान्वित होगा। नए प्रयोग के लिए लेखक को साधुवाद एवं सुरुचिपूर्ण मुद्रण-प्रकाशन के लिए प्रकाशक को बधाई। 

सम्पर्क सूत्र:

हमालों की बारी बाहर, बीकानेर

समीक्षित पुस्तक :

झूलता हुआ ग्यारह दिसम्बर (हास्य सम्स्मरण संग्रह )

लेखक : हरदर्शन सहगल

प्रकाशक : कलासन प्रकाशन, मॉडर्न मार्केट, बीकानेर

प्रथम सम्स्करण 2007।

 

समीक्षा

 

सुरीले संगीत का दौर

बिनाका गीतमाला का सुरीला सफ़र उन दिनों की यादें ताज़ा कर डालने वाली किताब है जब फ़िल्मी गीत सुरीले हुआ करते थे और उनकी उम्र भी खासी लम्बी हुआ करती थी। एक गीत आता और दो-दो तीन-तीन साल तक लोकप्रियता के शिखर पर जमा रहता। आज की तरह नहीं कि आज गीत बजने लगा और परसों किसी को याद ही नहीं। उस बीते ज़माने में फ़िल्मी गीतों की लोकप्रियता की सबसे बडी कसौटी हुआ करती थी बिनाका गीतमाला। यह रेडियो का काउण्ट डाउन शो था, लेकिन आज की पीढी न इसका महत्व समझ सकती है और न इसकी लोकप्रियता का अनुमान लगा सकती है। यह कार्यक्रम इतना अधिक लोकप्रिय था कि लोग पूरे सप्ताह इसका इन्तज़ार करते, हर गीत के चढाव उतार का ध्यान रखते, सूचियां बनाते और उन पर चर्चा-बहस करते।

इस कार्यक्रम ने अपने चाहने वालों की तो मानो एक सेना ही खडी कर ली थी।

 

ऐसे ही एक चाहने वाले हैं श्री अनिल भार्गव। श्री भार्गव वैसे तो प्राणी शास्त्र के प्राध्यापक ( अब एक कॉलेज के प्राचार्य) हैं लेकिन उन्हें बिनाक गीतमाला ने कुछ इस तरह अपने प्रेमपाश में बांधा कि जैसे उसी के होकर रह गए। लोग प्रेम में ताज महल बनाने की बात करते हैं, अनिल भार्गव ने बिनाका गीतमाला के प्रेम में बिनाका गीतमाला का सुरीला सफ़र’ के रूप में वाकई एक ताजमहल रच दिया है। इस किताब में 1952 से 1994 तक जब तक कि यह कार्यक्रम चला, वर्षवार कार्यक्रम का विश्लेषण किया गया है। हर साल के शेएर्ष गीतों की सूची दी गई है और उनका सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। गीतों का विश्लेषण करते हुए उनके बारे में पूरी पूरी जानकारी दी गई है। कार्यक्रम तो 1994 में खत्म हो गया, लेकिन अनिल भार्गव ने अपनी किताब को उस वर्ष के ब्यौरे के साथ ही खत्म नहीं कर दिया है। उन्होंने ‘शुरुआत एक नए सफ़र की’ के अन्तर्गत 1994 से 2006 तक के लोकप्रिय गीतों का भी उसी तरह से विश्लेषण कर किताब को अद्यतन बनाया है। इतना ही नहीं, बिनाका गीतमाला की शैली के अन्य कर्यक्रमों की जानकारी देना भी वे नहीं भूले हैं।

बिनाका गीतमाला की कोई भी चर्चा इसके प्रस्तोता अमीन सयानी के उल्लेख के बगैर अधूरी है। अनिल भार्गव ने इस किताब में अमीन सयानी को भी भरपूर महत्व देकर अपने विषय के साथ पूरा न्याय किया है अमीन सयानी का परिचय, उनके साथ अन्तरन्ग बातचीत, मनोहर महाजन का उन पर लेख – ये सब चीज़ें इस किताब को बेहद उपयोगी बनाने में पूरी तरह कामयाब हैं।

किताब का एक उजला पक्ष है इसके चित्र। हर वर्ष के लोकप्रिय गीत के चित्र के साथ-साथ सभी महत्वपूर्ण गीतकारों, संगीतकारों, गायक-गायिकाओं आदि के चित्रों नि किताब को एक नितान्त प्रामाणिक सन्दर्भ ग्रंथ बना दिया है।

जितने मन से यह किताब लिखी गई है, उतने ही मन से वांगमय प्रकाशन ने इसे प्रकाशित भी किया है। हर लेख के अन्त में किसी न किसी वाद्य यंत्र का चित्र प्रकाशक की सुरुचिपूर्ण सूझ बूझ का एक उदाहरण है।

 

समीक्षा : डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

 

चर्चित पुस्तक :

बिनाका गीतमाला का सुरीला सफ़र

लेखक : अनिल भार्गव

वांगमय प्रकाशन, ई-776/7, लाल कोठी योजना, जयपुर-302015

पृष्ट 288, सजिल्द, प्रकाशन – 2007

मूल्य : 1200/-

 

विशेष : प्रकाशक ने इन्द्रधनुष इण्डिया के पाथकों के लिए यह पुस्तक 800/- के रियायती मूल्य पर उपलब्ध कराने का वादा किया है। पाठक सीधे प्रकाशक को अपना क्रयादेश भेज सकते हैं।

 

 

पत्रिकाओं के नए अंक

                  

दोआबा : ज़ाबिर हुसैन के सम्पादन में निकलने वाली इस अनूठी पत्रिका का जनवरी 2007 अंक हाल ही में आया है। पत्रिका का स्वास्थ्य सबसे पहले चकित और आह्लादित करता है। 800 पृष्ठों की यह पत्रिका केवल अपने कलेवर के कारण ही नहीं, सामग्री के कारण भी महत्वपूर्ण है। डायरी, संस्मरण, कविता, कहानी और नाटक – इतनी सारी विधाएं। रमेश चन्द्र शाह, विजेन्द्र, खगेन्द्र ठाकुर, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, विष्णु चन्द्र शर्मा, मधुकर सिंह, रॉबिन शॉ पुष्प, हृदयेश,  प्रेमकुमार मणि, निर्मला पुतुल, ॠतुराज, अनिल गंगल, क़मर मेवाडी, हेमंत कुकरेती, पवन करण, अम्बिका दत्त,सूर्यबाला, राजकमल चौधरी, राजी सेठ, अभिमन्यु अनन्त, ग़्यान प्रकाश विवेक, भारत भारद्वाज, हेतु भारद्वाज, नासिरा शर्मा, मिथिलेश्वर _ इतने सारे सुपरिचित और अनेक अपेक्षाकृत कम परिचित किन्तु सम्भावनापूर्ण लेखकों का कृतित्व एक साथ : मानो कोई शाही दावत हो। 150 रुपये में इतनी सामग्री लूट सके तो लूट!

सम्बोधन : क़मर मेवाडी के सुलझे हुए सम्पादन वाली इस पत्रिका के अप्रैल – जून 2007 अंक में कमलेश्वर को स्वयंप्रकाश ने बहुत मर्मस्पर्शी श्रद्धांजलि दी है। कथाकार हेतु भरद्वाज से रमेश रावत की बातचीत कैइ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाती है। प्रेमचन्द के रंगभूमि पर डॉ श्री भगवान्सिंह का लेख, स्वामी वाहिद काज़मी के बारे में सैन्नी अशेष का संस्मरण, और हरीश करमचन्दाणी की कविता के कारण अंक संग्रहणीय बन गया है।

 

 

 

 

      कृति ओर :  लोक चेतना की साहित्यिक पत्रिका कृति ओर अपनी तरह की अनूठी और नितान्त गंभीर पत्रिका है। इसका 44 वाम अप्रेल-जून 2007 अंक हाल ही में आया है।सदाकी भांति विजेन्द्र का सम्पादकीय विचारोत्तेजक है। कवि सवाई सिंह शेखावत पर कृष्ण कल्पित ने बहुत आत्मीयता से लिखा है। ज्ञान रंजन और कैलश मनहर के वक्तव्य चीज़ों को नई तरह से समझने के लिए प्रेरित करते हैं। अजय मिश्र की कविताएं उम्दा हैं।

 

सिंधी साहित्य सुरभि : सिन्धी की उत्कृष्ट रचनाशीलता से हिन्दी पाठक को परिचित कराने के उद्देश्य से प्रकाशित इस पत्रिका के अप्रेल 2007 अंक का आवरण पृष्ट सबसे पहले ध्यान खींचता है। सिंध के अलौकिक सूफ़ी गायक अल्लण फ़क़ीर का चित्र प्रभावशाली है। सम्पादक लक्ष्मण भंभाणी ने सुपरिचित रंगकर्मी श्रेएचंद माखीजा का अच्छा परिचय दिया है। इस अंक की पांचों ही कहानियां उत्कृष्ट हैं। हरि हिमवाणी का उपन्यास अंश, विक्रम सहाणी का नाटक, और कीरत बाबाणी, अर्जन हासिद तथ हरिकांत जेठवाणी की कविताएं बेहतर हैं।

 

 

 

अनौपचारिका : समकालीन शिक्षा चिंतन की इस पत्रिका का जून 2007 अंक पने मार्मिक सम्पादकीय ‘ कहो तरुवर तमाल’ के साथ ही बलराज साहनी के व्याख्यान के लिए भी सम्भाल कर रखा जाना चाहिये। यह सम्पादकीय दृष्टि का ही कमाल है कि पाठकों को बलराज साहनी का यह बेहद महत्वपूर्ण दीक्षांत भाषण पढने को मिला है। इससे पहले यह पत्रिका वात्स्यायन जी का  दीक्षांत भाषण छाप चुकी है। पाथ्य पुस्तकों की अपरिहार्यता पर अपूर्वानंद का लेख विचारोत्तेजक है।

पत्रिकाएं:

·         दोआबा, सम्पादक ज़ाबिर हुसैन   वर्ष 1 अंक 1

247, एम आई जी, लोहिया नगर, पटना-800 020

·         सम्बोधन, सम्पादक क़मर मेवाडी   वर्ष 41, अंक 3।

चांदपोल, कांकरोली-313324

द्विवार्षिक – 100/- यह अंक 15/-

·         कृति ओर : सम्पादक – विजेन्द्र

सी-133, वैशाली नगर, जयपुर-302 021

वार्षिक : 50/- एक प्रति-15/-

·         सिंधी साहित्य सुरभि

चेटीचण्ड विशेषांक, अप्रेल 2007

द्विवार्षिक 100/- एक अंक 20/-

सुहिणी पब्लिकेशन, पी ओ बॉक्स न 9, शास्त्री नगर, जयपुर- 3020216

·         अनौपचारिका : सम्पादक रमेश थानवी

वार्षिक 150/- यह अंक 15/-

राजस्थान प्रौढ शिक्षण समिति, 7-ए, झालाना डूंगरी संस्थान क्षेत्र, जयपुर - 302004

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                             प्रबंध सम्पादक : अंजली सहाय सम्पादक : डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल