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डॉ. विश्वंभर व्यास
ब्लॉग ! बोलने सुनने में अजीब सा लगने
वाला यह शब्द लोकप्रियता की कसौटी पर इस कदर खरा उतरा कि वेबस्टर
डिक्शनरी में जगह बनाने में कामयाब हो गया। इस डिक्शनरी में जगह
पाने के लिए अक्सर किसी शब्द को दो दशकों तक मशक्कत करनी पडती
है। मगर इसी तासीर देखिए कि मुश्किल से चार -पांच साल की उम्र
में ही जगह पा ली। सन् 2005 में ' टाइम पत्रिका के आवरण पृष्ठ पर
'पीपुल्स- मीडिया' के रूप में विराजमान रहा तो 'फर्ॉच्युन पत्रिका
ने इस साल जिन दस तकनीकी टे्रंडों पर निगाह रखने की बात कहीं ,
ब्लॉग उनमें शीर्ष स्थान पर प्रतिष्ठित रहा। '
ब्लॉग' वेब और लॉग- दो शब्दों
से बना रूप है, जो बोलने में सुविधा के कारण ब्लॉग बन गया।
नाथद्वारा के ' नाद्वारा' में परिणत हो जाने की तरह । रीयल टाईम
डायरियाँ है ये ... वेब रोजनामचा कह लीजिए या इन्स्टैंट मेसेज ,
कुछ भी। अब तो यत्र तत्रसर्वत्र ब्लॉग, ब्लॉगर , ब्लॉग स्फीयर का
ही बोल-बाला है। बल्ले बल्ले है इनकी। इस कदर कि यदि मीडिया-
मर्मज्ञ मार्शल मकलुहान भी आज जिन्दा होते तो उन्हें भी अपने 'मीडिया
इस द मैसेज ' जुमले में तब्दीली कर मीडिया इज द इन्स्टैंट मैसेज'
कर देना पड़ता।
सच पूछा जाय तो ब्लॉगरों ने परंपरागत धारणाओं
को ही तोड़ दिया है। अभी कल तक '' हैम रेडियों '' की बात किया
करते थे अब फिर 'मौहल्ला हैम' अभियान की बात होने लगी है। पर
ब्लॉग ब्लॉग है। त्वरित संचार के लिहाज से इसका कोई सानी नही। इस
दृष्टि से इसे सर्वाधिक ताकवर औज़ार कहा जा सकता है। नि:सन्देह
ब्लॉग एक सशक्त पत्रकारिता के रूप में उभर चुका है , जो पत्रकारों
को वह क्षेत्र उपलब्ध कराता है जो अन्य मीडिया से संभव नहीं।
परम्परागत मीडिया डाल- डाल है, तो पात-पात है यह।
जाफना से तटीय क्षेत्र पर लुढ़की पड़ी नीली नाव
की तस्वीर के साथ फ्रेड रॉबर्ट की रिपोर्टिग को भला कौन भुला सकता
है ? तो चेन्नई की नन्द किशोर की ैनानउंतण्बवउफोटो
सहित कमेन्ट्री ने लाखो - लाख लोगों के जेहन में जगह बना ली।
ब्लॉग्ज की बेतहाशा बढ़ती ताकत के मद्देनज़र यह
सवाल उभर कर आ रहा है कि क्या ब्लॉग्ज कालान्तर में मुख्य धारा
के मीडिया को स्थानापन्न कर देगा ? कौन नहीं जानता कि ये तर्क
कितने बेतुके और बेहूदे है। ऐसे ही तर्क कभी टेलीविजन के उभार के
दिनों में प्रिंट मीडिया के संदर्भ में दिए जाते रहे थे। ठवपदह.
ठवपदहण्ब्वउ की जॉर्डिन का यह कहना दमदार है कि '' यह सवाल ठीक
वैसा ही है जैसे यह पूछना कि क्या किसानों का बाजार रेस्त्रां का
स्थान ले लेगा
? एक समृध्द
कच्चे माल की जगह है,जबकि दूसरा एक अलग ही मंच की प्रक्रिया का
प्रतिनिधित्व करता है। ''
फिर भी बेजोड हैं ब्लॉग। कुछ विशेषताएॅ ऐसी
हैं जो यही प्रदान कर सकता है। स्थान,समय संबंधी लचीलापन लिये होता
है यह। जबकि किसी अखबार अथवा पत्रिका में किसी आलेख की सीमा होती
है। ब्लॉग आलेख में ''हायपर-लिंक'' का समावेश कर सकता है।
स्वाभाविक है कि पाठक को गहराई में जाने का अवसर प्राप्त होता
है। एक प्रिंट -पत्रकार आपको यात्रा के बारे में बता सकता है जबकि
ब्लॉगर आपको यात्रा का सहभागी बनाकर चलता है।तात्कालिकता ,
तत्क्षणता अथवा '' फौरी'' फितरत लिए होता है यह। चट मंगनी, पट
ब्याह! लिखी नहीं कि पोस्ट की। जहां नाना ब्लॉग्ज उससे जुडते है।
ऐसी आजादी ओर कहॉ ? टेलीविजन रिपोर्टरों तक को नहीं। ब्लॉगर अपनी
अभिव्यक्ति में निजी ''टोन'' अपनाने का विकल्प लिए होता है।
स्वभाव से स्व्यंभू होता है ..... सायबर संसार का स्वयंभू सैलानी
! ब्लॉग्ज की सबसे बड़ी खासियत उनके अन्त: सक्रिय होने की है। एक
आलेख में प्रिंट -पत्रकार पाठको से रूबरू होता है। जबकि ब्लॉग पर
की पोस्ट बहस का शुरूआती बिन्दु होता है। टिप्पणियाँ - सक्षम होते
हैं ये। जहाँ आप लिख सकते है।, पढ़ सकते हैं , देख सकते हैं, सुन
सकते हैं। इनका यह बहुआयामी रूप इन्हें अपरिहार्य बना देता है।
साफ्टवेयर सम्राट माईक्रोसोफ्ट ने इसकी ताकत
का अंदाज लगा ऐलान किया कि वह ब्लॉग
- विश्व पर कब्जा जमारे की सोच
रहा है। इसी के मद्देनजर माइक्रोसॉफ्ट के डैछ . ैचंबमे ने वेब पते
की पहचान के साथ 10 मेगाबाइट्स स्पेस की पेशकष की है जहाँ ब्लॉगर
बेधड़क अपने विचारों को लिखित अथवा साउण्ड फायलों को पोस्ट कर सकता
है। मायक्रोसोफ्ट अकेला नहीं है ऐसी पेशकश करने वाला , लेकिन इसने
ब्लॉग- सृजन की सारी प्रक्रिया को सरल बना हजारों -हजार सामान्य
इन्टनेट उपयोक्ताओं के लिए ब्लॉगरस्फीयर के नये क्षितिज खोल दिए
है। कहीं भी, कोई भी, कभी भी बन सकता है
ब्लॉगी ! आप, मैं, वह , हर कोई, सब कोई। लेकिन इसके लिए चाहिए
कम्प्यूटर। और वह भी इन्टरनेट कनैक्टैड़ फिर मोडम , टेलीफोंन,
सॉफ्टवेयर, तो चाहिए ही चाहिए। एक बार यह आधारभूत ढंाचा साकार
हुआ कि फिर तो कहना ही क्या। करिए अपने ब्लॉग्ज चस्पा , पहुंचिए
पलक झपकते ही लाखों-लाख नेटिजनों के पास। न कोई सम्पादको के नाज़
-नखरे उठाने का झंझट, न कोई शब्द
सीमा का लफड़ा।सम्प्रेषण्ा का इससे अधिक बेहतरीन तरीका भला और क्या
हो सकता है ? कई लघु-लघु ब्लॉग तो नाविक के तीर की तरह हैं। ''
देखन में छोटे लगे, घाव करे गंभीर।'' मारिये तीर आप भी। '' लग
जाये तो तीर, नहीं तो तुक्का ही सही।
पिछले इराक युध्द के दौरान ब्लोगों ने कमाल
कर दिखाया। ऐसा कि उसे 'आइकन' के रूप में देखा जाने लगा।
एशिया के इस हिस्से में सुनामी विभीषिका के ''ब्रेकिग न्यूज'' का
श्रेय भी ब्लॉगरों के नाम जाता है। मेनस्ट्रीम मीडिया बाद में
हरकत में आया। भारत पाकिस्तान की बीच ''सौहार्द्र स्थापित करने
में भारतीय ब्लॉगियों की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता।
अमरीकी ब्लॉग परिदृश्य अपनी अलग अहमियत लिये है। राष्ट्रपतीय
चुनाव में ब्लोगों ने अच्छे अच्दे शूरवीरों की नाक में दम कर दिया।
किसी तरह '' राथेरगेट'' में ब्लॉगरों ने डेन राथेर को इस्तीफा
देने के लिए मजबूर कर अपनी फतह का एलान किया , किसी से छिपा नहीं
है। तो प्रसिध्द लॉक निर्माता कम्पनी '' क्रिप्टोनाइट '' की साख
को ब्लॉगरों की बौदार ने देखते-देखते किस तरह मटियामेट कर दिया ,
अपने आप में एक दिलचस्प किस्सा है। 10 दिन में दस मिलियन डॉलर के
नुकसान का वज्राघात कोई कम नहीं होता।
निश्चय ही ब्लॉगस्फीयर के नेपथ्य में मची
मारामारी का मंजर भी ध्यान आकर्षित किए बिना नहीं रह सकता। मसलन
भूमिगत डेमोक्रेटो के ब्लॉग का यहां तक कह देना कि सुनामी कांड
अमरीकी सरकार की देन थी। इस ब्लॉग ने ऑनलाइन बहस को जन्म दे दिया।
बहस में हिस्सा लेते एक ब्लॉग की दलील थी '' आप जानते है हमने बेचारी इस
धरती पर लाखो-लाख बम गिराए .... हमने उसे ''फ्रेक्चर्ड'' कर दिया।
जो कुछ उसके साथ हुआ, उसी का बदला लिया उसने। रूढ़िवादी ब्लॉग भी
डेमोक्रेटीय तर्क की खिल्ली उडाने से नहीं चूके। एक ने यहाँ तक
कह दिया '' सुमात्रा'' श्रीलंका के क्षेत्र सुनामी की चपेट में
इसलिए आए क्योंकि आतंकवादियों के अभयारण्य रहे हैं ये। किसी ने
समुद्र में किए गए एटमी धमकों के सिर इसका ठीकरा फोड़ा। इधर कम्बोडिया के पूर्व शासक सिंहानुक ने अपने
ब्लॉग में विचित्र सी बात कह सबकों चौंका दिया कि '' एक ज्योतिषी ने उन्हें पहले
ही कह दिया कि तबाही होने वाली है। कम्बोडिया को कोई नुकसान नहीं
होगा। बशर्ते कि इसके शमन के लिए उपयुक्त अनुष्ठान किये जाए। ...
मैने देश को बचाने के लिए हजारों डॉलर अनुष्ठान में खर्च किए।''
बेशक ब्लॉग के अपने जोखिम भी हैं। कईयो को तो इसके कारण अपने पदों
से हाथ तक धोना पड़ गया। जैसे अमरिकी एयरलाईन्स की फ्लाइट
असिस्टैंट को ही लें। '' वाशिंग्टोनियन'' ब्लॉग पर अपने यौन
अनुभवों का ब्योरा पेश कर रही थी। कम्पनी को उसकी हकत नागवार
गुजरी। बेचारी को नौकरी से हाथ धोना पडा। यह बात दीगर है कि बाद
में '' प्लेबॉय'' पत्रिका के मुख पृष्ठ की शोभ बढाने का गौरव उसे
प्राप्त हुआ। वैसे अभी ब्लॉगस्फयर अपनी शैशवावस्था में है
फिर भी यह मीडिया के लिए चुनौती पेश कर रहा है और विज्ञापन, मार्केटिंग और जन सम्पर्क में
लगे लोगों के जॉब सम्बन्धी तौर तरीकों में तब्दीली ला रहा है।
ब्लॉग सर्च इंजन व परिगणना कम्पनी '' टैक्नोक्रेट'' के मुताबिक
हर रोज कोई 23,000/- नये ब्लॉग्ज सृजित किए जा रहे हैं, हर तीन
सैकण्ड में एक! पावर और ऑपिनियन के जनतांत्रीकरण का कैसा अद्भुत
नज़ारा है यह । सायबरस्पेस की इस महाक्रान्ति में हम कब शरीक
होंगे, कह नहीं सकते। '' पी सी''
नामधारी वित्तामंत्री '' पीसी '' के प्रति कब मेहरबान होंगे, पता
नहीं। केन्द्रीय आईटी मंत्री महाशय मारन का यह कहना दिल को सकून
पहुंचाता है कि वह पीसीज की कीमतें कम करने के प्रति बेहद
संवेदनशील है। पर मन है कि मानता नहीं , रहरह कर '' ब्लॉगम् शरणम्
गच्छामि , सायबर शरणम् गच्छामि, नेटम् शरणम् गच्छामि'' की रट
लगाए जा रहा है।
-
डॉ. विश्वंभर व्यास
पुरानी पानी की टंकी के पास 23,
नीमच खेड़ा, देवाली, उदयपुर (राज.)
ठाकुर का कुआं और दलित
मुंशी प्रेमचंद ने 'ठाकुर का कुआं' कहानी 1932 में
लिखी थी। कहानी दलित उत्पीड़न की एक बड़ी लकीर खींचती है। लकीर, जो
आज तक नहीं खींची जा सकी है। 'कफन' 'सद्गति' की भांति 'ठाकुर का
कुआं' कहानी भी ब्राह्मणवादी व्यवस्था और सामंवादी अहम् को
स्थापित करती है।
आलोचक वीरेंद्र मोहन ने
'ठाकुर का कुआं' पर टिप्पणी की
है : '
प्रेमचंद ने सवर्ण और दलित समाज
के संबंधों को, खान -पान और छुआ-छूत के संबंधों को, अंतर्विरोधों
के साथ प्रस्तुत किया है और उच्च वर्ण की विकृतियों का ही बखान
वस्तु के अस्तित्व के धरातल पर व्यक्त किया है। अछूत होने के
कारण गंगी ठाकुर का कुआं का पानी नहीं ले पाती है। उसे पीटा जाता
है। (वीरेन्द्र जी 'ठाकुर का कुआं' कहानी में तो गंगी के पिटने
का वर्णन नही है।) और गंगी के बीमार पति जोखू का वही सड़ार पानी
नसीब होता है। '' (
प्रेमचंद की कहानियों में दलित
समाज, पृष्ठ-84 प्रेमचंद विशेषांक, वर्तमान साहित्य ) दरअसल 'ठाकुर का कुआं' कहानी का मर्म
वह नहीं है , जो वीरेंद्र मोहन की 'उपर्युक्त टिप्पणी में
परिलक्षित हुआ है। कहानी प्रारंभ होती है : ''जोखू ने लोटा मुंह से लगाया तो
पानी में बदबू आई। गंगी से बोला, यह कैसा पानी है
, मारे बास के पिया नहीं जाता। गंगी
ने लोटा नाक से लगाया तो सचमुच बदबू थी। जरूर कोई जानवर कुएं में
गिर कर मर गया है। मगर दूसरा पानी आवे कहां से ?'' (ठाकुर का कुआं
)
यहां से कहानी का विकास व्यावहारिकता और
स्वाभाविक सच से छिटक कर निराधार की ओर चला जाता है। तथ्यात्मक
अनुभव के अभाव में कथानक की रीढ़ चटक जाती है। कहानी में त्रासद
सक्रिय है
, विद्रूप हावी है, त्रासद और
विद्रूप का मनावेग कहानी का जरूर करता है, लाकन कहाना क ताात्वक
विवेचन की कसौटी पर नहीं ठहरती। पति जोखू और पत्नी गंगी को मालूम
है कि जो पानी कुएं से लाया गया है, वह जानवर पड़ जाने के कारण
सड़ांध मारता है। पानी पेय नहीं रहा। पिया तो जोखू की बिमारी और
बढ़ेगी। बावजूद , प्रेमचंद बू मारते उस पानी को सुरक्षित रखवा देते
है। और अंत में उसे दलित जोखू को पिलाते हैं।
छाछ पर तैरता मक्खन सतह से असंपृक्त रहता है।
गांवों के जातीय भूगोल से प्रेमचंद का अपरिचित होने का एक बड़ा
कारण यह भी रहा कि वह जनम- जात अमीर थे और ताल्ललुकेदार
जैसे उनके रसूखात थे। उनकी पैतृक जमीन थी, तिमंजिला हवेली थी।
हवेली के चारों ओर चारदीवारी थी।हवेली के परिसर में कुआं था। कुएं
में कभी जानवर पड़ा हो ऐसा संभव नहीं है। जानवर गिरने से सड़े जल को बड़ा ही हेय, अशुभ और त्याज्य माना जाता
था। पता लगते ही धातु के बर्तनों को रेत या राख से खूब मांजा जाता
था तथा मिट्टी के पात्रों को पानी समेत दूर फेंक दिया जाता था।
कहानी में इस जमीनी सच का निर्वाह नहीं कर किसी काल्पनिक असत्य
का स्थापित किया गया है। ऐसे असत्य लोकरीत और मानवीय संवेदनाओं
को धक्का पहुंचाते हैं।
आदमी चाहे कितना लाचार, बेचारा और असहाय हो,उसे मरना
कबूल , यह मालूम पड़ने पर कि कुंए में गिर कर जानवर मर गया है वह
मृत जानवर की बदबू वाला पानी नहीं पिएगा। यह मनावैज्ञानिक भी है
और मानवधर्म भी है। यहां कहानी का विकास मंचित नाटक की सज्जा की
भांति होता है। अभिनीत नाटक में काम आने वाली एक -एक चीज सलीके
से रखी जाती है, नाटक खेलते काम आएगी।पाठक यहीं आश्वस्त हो जाता
है कि जब लेखक ने गंदे सड़े पानी को रखवा दिया है , तो पात्र को
जरूर पिलवाया जाएगा। पाठक की यह आश्वस्ति कथा की रोचकता और गठन
दोनों ह्रांस करती है। नि: संदेह गांवों में जात- विरादरी
के पृथक -पृथक कुएं हुआ करते थे। यह जाति भेद और अस्पृश्यता का
उत्स था। धर्म ने पानी तक की जात बना डाली थी।सवर्णो के कुएं अलग।
दलितों के कुएं अलग। बड़ी जात के कुओं के घेर ऊंचे और पक्के , नीची
जात के कुओं के घेर नीचे और कच्चे। बिन घेर के इन कुओं में किसी
आवारा जानवर का गिर जाना आम बात हुआ करती थी।
इतना होते हुए भी लोक परंपरा का महत्वपूर्ण
आयाम यह था कि जब किसी जाति के कुएं में जानवर गिर कर सड़ने लगता
और पानी 'बू
' उठता तो उस पानी को बाहर निकालने
का कार्य अविलंब प्रारींा कर दिया जाता था। हवा के बाद जल ही तो
जीवनदायी है। लोक मानस में इसे बड़ा पुण्य का कार्य माना जाता था।
जानवर और उसे सड़े पानी को कुएं से बाहर निकालने की खातिर लाव -
चड़स-जगत आदि की जुगत में गांव की निम्न - उच्च जातियों एक दूसरी
की मदद करती थी।यह रीत आज भी जारी है।
''गंगी कुएं पर पानी लेने पहुंची।
कुप्पी की धुंधली रोशनी कुएं पर आ रही थी। गंगी जगत की आड़ में
बैठी मौके का इंताजर करने लगी। ''
कुएं पर किसी के आने की आहट हुई।
गंगी की छाती धक्-धक् करने लगी। कहीं देख ले तो गजब हो जाए। ''
कुएं पर दो स्त्रियां पानी भरने
आई थीं। इनमें बातें हो रही थीं। खाना खाने चले और हुकुम हुआ।
ताजा पानी भर लाओ। घड़े के लिए पैसे नहीं हैं। ''
हम लोगों को आराम से बैठे देख
कर जैसे मरदो को जलन होने लगती है। '' ( ठाकुर का कुआं ) जातिभेद और छुआछूत के उस दौर में ग्राम्य
जीवन की परंपरा यह थी कि बड़ी जाति के कुएं पर छोटी जाति का आदमी
नहीं चढ़ सकता था। वह कुएं के घेर के नीचे खड़ा रह कर पानी भरने आते
किसी आगंतुक का इंतजार करता। माना छुआछूत की ऊंचाइयां आसमान छुए
थीं , परंतु दया और सहानुभूति का
पेड़ हराभरा था। कुएं पर जब दो स्त्रियां पानी भरेन आ गई तो
गंगी की समस्या का स्वत: ही निदान हो गया। गंगी की छाती
को धक् -धक् नहीं, निश्चित ही फूल कर कुप्पा हो जाना चाहिए था।
कहानी का अंत मानवीय मूल्यों की किरचें कर देता है : ''घड़े के पानी में गोता लगाया,
बहुत ही आहिस्ता। जरा भी आवाज न हुई। गंगी ने दो चार हाथ जल्दी
मारे। घड़ा कुएं के मुंह तक आ पहुंचा। कोई बड़ा पहलवान भी इतनी तेजी
से उसे नहीं खींच सकता था।'गंगी झुकी कि घड़े को पकड़ कर जगत
पर रखे कि एकाएक ठाकुर का दरवाजा खुल गया। शेर का मुंह भी इससे
भयानक न हो। ''गंगी के हाथ से रस्सी छूटी गई।
रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और क्षण भर पानी में
हलकोर की आवाजें सुनाई देती रहीं। ''ठाकुर कोन है कौन है, पुकारते
हुए कुएं की तरफ आ रहे थे और गंगी जगत से कूद कर भागी जा रही थी।
'' ठाकुर की ''कौन है, कौन है '' में अहंकार
उपेक्षा और तिस्कार की त्रिवेणी है। यहां सवर्णो का अहम ही उद्यत
और उद्दीतप्त होता है। दलित गंगी को तो चोर प्रकृति ही प्रकट हुई
है। यहां ठाकुर की कौन है , कौन है, कहानी की नायक है, गूंगी
खलनायिका का पार्ट अदा करती है। ठाकुर की कौन है
, कौन है के भय से गंगी का घड़ा
रस्सी छोड़ कर भाग छूटना इतिहास के एक अध्याय की देहरी पर दस्तक
देता है।
अम्बेडकर ने 20 मार्च,1927 को पानी दिलाने
के लिए मुहिम प्रारंभ की थी। महाड़ के चवदार तालाब से दलितो को
पानी लेने का अधिकार नहीं था , जब कि उस तालाब से मुस्लिम, ईसाई,
पारसी पानी लेने को स्वतंत्र थे।
दलितों को भी सार्वजनिक तालाब
से पानी लेने का मानवीय हक है, '' अम्बेडकर ने बंबई हाईकोर्ट में
दावा पेश किया। बंबई हाई कोर्ट ने 17 मार्च, 1936 को अपना यह
ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि अछूत भी इंसान हैं , अत: उनको चवदार
तालाब से पानी लेने का कानूनन हक है। अम्बेडकर चवदार तालाब से दलितों को पानी
दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। प्रेमचंद सन् 32 में जब कि पानी पाने की
कानूनी लड़ाई के लिए कट्टरपंथ्यिों और अम्बेडकर के बीच चल रहे
मुकदमें की पेशियां पड़ रही थीं प्रेचंद ' ठाकुर का कुआं' जैसी
दलिीत चेतना विरोधी महानी मांड कर अम्बेडकर के आंदोलन को भोथरा
कर रहे थे। कहानी दलित वर्ग को हतोत्साहित और सामंती प्रवृति को
प्रोत्साहित करती है कि अछूतों का सवर्णे का पानी नहीं छूना
चाहिए।
कहानी में दलितों की आशा और आकांक्ष दोनों का
मर्दन होता है। सहानुभूति और अनुभूति दोनों नदारद हैं
, नियोजित विद्रूप है तथ क्रूरता
और कटुता के कांटे खड़े हैं। इसके साथ ही प्रेमचंद की कलम तथ्य और
जमीनी सत्य से शनै शनै ऐसे दूर होती चली जाती है।
कहानी की अंतिमपंक्ति है :''घर पहुंच कर गंगी न देखा कि जोखू
लौटा मुंह से लगाये वही मैला गंदा पानी पी रहा था।'' ( ठाकुर का
कुआं) पाठक लेखक की मंशा पहले ही जान गया था ....।जब दलित जोखू को वही मैला गंदा पानी पिलाना
था
, तो उसकी पत्नी गंगी का '
ठाकुर कुआं' तक भेज का जलील क्यों कराया ?
यह बात गांव की माटी का मूलभूत सत्य न हो कर
कथाकार की दलित जोखू का मैला गंदा पानी पिलाने की जिद्दभर है
, यहां जातिवाद और शोषण मूलक
व्यवस्था का प्रतिपादन बड़ी चालाकी पूर्ण ढंग से हुआ है , जिससे
पढ़े-लिखे को भी भ्रंम हो सकता है कि कहानी में दलित पाठ है।
जोखू का सड़ाध मारता पानी पीने की मजबूरी
त्रासद निर्धनता या दलित्व से उत्पन्न मजबूरी नहीं है
, यह लेख की मानसिक सीमा है।
जोखू का अपना परिवार है , उसकी अपनी जात- बिरादरी है, दलित होने
के बावजूद भी वह गांव- बस्ती की ईकाई है। गांवों में आज भी जहां
छाछ मांगी मिल जाती है, वहां पानी के लिए इतना कहर! कहानी में आई
यह अस्वाभाविकता 'ग्रामलोक ' में व्याप्त दीन, दया, धर्म को
अमर्यादित करती है।
मुंशी प्रेमचंद ने दलितों पर लिख। दलित पात्र
उनके सृजन की आधार शिला रहे। इतना होने के बावजूद भी उन्होंने
दलितों के लिए कुछ ासनहीं लिखा। उनकी रूचि दलित पात्रों को
दुश्चरित्र
,बदजात, जरायामपेशा और लोलुप
दिखाने भर रही या फिर उन्होंने दलित जोखू की तरह गंदगी और गरीब
को एक आंका। उनका सृजन स्वभूत पारितोष या व्यवस्थ का पोषण है।
मानसरोवर की आठों खंडों से गुजर जाइये किसी कहानी का नायक दलित
शूद्र नहीं मिलेगा। दलितो पर लिखी उनकी हर कहानी नायक - नायिका
विहीन है। आश्चर्य इस बात का है कि प्रमचंद के ऐसे सृजन को लेकर
हिंदी का समूचा आलोचना जगत पिछले 70 वर्ष से आंखे मूंदे रहा या
इसे शास्त्रौक्त मान कर अपनी मूक सहमतियां प्रदान करता रहा। 'कफन
' सद्गति;, 'ठाकुर का कुआं' ' दूध का दाम', 'सौभाग्य के कौड़े', 'मंत्र
-2 ', 'मंदिर' आदि दलित कथनकों की कहानियों के कारण ही वह
लोकप्रिय बनाये गये।
रत्न कुमार सांभरिया
सी -137 महेश नगर
जयपुर
- 302015
फोन
- 2502035
ऐसा आता है अवनी पर बसन्त
कमलेश माथुर
प्रकृति ने की है निश्चित ऋतुएं जो क्रमानुसार धरती पर उतरकर अपना
अहसास दिलाती हैं। धरा का कोई प्राणी इन ऋतुओं से अछूता नहीं रहता। इन ऋतुओं में
बसन्त का अपना अंदाज अलग-अनूठा
है। इस ऋतु में हर मन मागंधऔर बयार बसन्ती होती है इसलिये इस मौसम को अवनी-अंबर
के श्रृंगार का मौसम कहा जाता है। चप्पे
-चप्पे पर
प्रकृति की रंगबिरंगी कसीदाकारी,
धरा पर खिले
-महके
पुष्प-परागी
के बदन से झरती भीनी मस्त सुगन्ध ,
इन्द्रधनुषी पुष्पों पर मंडराते भ्रमरों की गुंजन,
कोयल की कूक ,
खेतों में लहलहाती पीली सरसों और गेंहू की बालियां जैसे सजी हो
नई नवेली दुल्हन प्रकृति की सेज पर। इसलिये हमारे यहां
' बसन्त'
केवल उत्सव ही नहीं,
अपितु
'महोत्सव'
के रूप में मनाया जाता है। माघ की शुक्ल पंचमी को बसन्ती पंचमी
कहा जाता है। बसन्त बहुत पुराना पर्व है। यजुर्वेद में इन्द्र
,
वरूण और ब्रह्म आदि देवों की पूजा का उल्लेख मिलता है। उड़ीसा और
बिहार में बसन्त पंचमी को
'सिरापंचमी'
कहा जाता है ,
वैश्य इस पर्व को जोर-शोर
से मनाते हैं। वे इसे भूमि पूजन पर्व कहते हैं क्योंकि भूमि उत्पादन
की जननी है। बंगाल में तो तो बासन्ती पर्व पर अति उत्साह
,
उमंग और उल्लासपूर्वक पूजा की जाती है वहां इसे माँ सरस्वती का
जन्म दिवस कहते हैं। यह बागेश्वरी दिवस भी कहलाता है। बच्चों के
शिक्षा क्रम का प्रथम अक्षर पूजन कराया जाता है
,
वाद्य यन्त्रों की पूजा की जाती है दक्षिण भारत
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बसन्त जब दुनियां के चप्पे-चप्पे
को उल्लासित करता, बौराया सा बाग-बगियों
में आवारगी करता इठलाता फिरता है तब इसकी मादकता में चटकती कलियां स्नेहवश,
प्रेमासक्त होकर इसे 'बसन्ता'
कहने लगती है।
कहा जाता है हमारे यहां बसन्तोत्सव को पर्व के रूप में मनाने का
सिलसिला मौर्यकाल से शुरू हुआ तथ गुप्त काल में यह पर्व लोकप्रियता के चरम शिखर पर
जा पहुंचा। भारत ही नहीं बसन्त जापान में भी प्रतिष्ठित है। जापानी बच्चे वहां इन
दिनों जो भी पोशाक पहनते हैं
, उन पर रंगबिरंगे फूल छपे होते
हैं। इंग्लैण्ड में बसन्त को ढूंढ निकालना भी दुलर्भ नहीं। प्राय
: बड़ी-बड़ी दुकानें इन्द्रधनुषी
फूलों से सजी- धजी मिलती है। इन दिनों
वहां गुलाबी सर्दी बसन्त का सौन्दर्य बढ़ाती है।
रोचक बात यह है कि बसन्त को लेकर भिन्न
-भिन्न लोक कथाएं प्रचलित है।
साहित्य का तो समृद्ध भण्डार है -
बसन्त। बसन्तागमन के संदर्भ में प्रय:
एक यूनानी लोक कथा कही -सुनी
जाती है। यूनान में अनाज और कृषि की देवी 'डेमेटर'
की खूबसूरत बेटी 'पेरेसफोन'
जब बसन्त ऋतु में पृथ्वी के राजा प्लेटो के बाग में फूल तोड़ने उतरी तब प्लेटो
की नजर उस पर पड़ी। वह उसे देखते ही उस पर मोहित हो गया। महल में ले जाकर उसने उससे
विवाह रचा लिया। इधर जब मॉ डेमेटर पेरेसफोन की तलाश में पृथ्वी पर उतरी
, चप्पा-चप्पा
छानने पर भी उसे अपनी बेटी कहीं नहीं मिली तो तो वह निराश होकर रोने लगी। सूर्य
देवता ने जब उसे रोते देखा तो दया करके उसे बेटी पेरेसफोन का सही पता बता दिया।
सुनते ही डेमेटर ने अभिशाप दे डाला कि जब तक उसे उसकी बेटी नहीं मिल जाती पृथ्वी पर
अनाज का एक भी दाना नहीं निकले। किसानों ने बहुत मेहनत कर बीज बोए
, खाद-पानी
भी देते रहे लेकिन सचमुच एक भी दाने से अंकुर नहीं फूटा। भूख के मारे पृथ्वी पर
त्राहि त्राहि मच गई। अकाल के डर से चिन्तित देवताओं के राजा जियस ने दोनों के बीच
समझौता कराने का निश्चय किया। जियस ने डेमेटर से आग्रह किया कि वह अपना अभिशाप वापस
ले लें और पृथ्वी पर लगाया गया कड़ा प्रतिबन्ध हटा ले
, परन्तु डेमेटर टस से मस नहीं हुई।
अड़ी रही कि जब तक उसे उसकी बेटी वापस नहीं मिल जाती वह अपना प्रतिबन्ध नहीं हटायेगी
, पृथ्वी हमेशा के लिये बांझ ही रहेगी। उधर प्लेटो पेरेसफोन के प्यार में ऐसा
डूबा कि उससे एक पल भी विलग होना नहीं चाहता था। अंत में जियस ने अपनी चतुराई और
सूझबूझ से एक समझौता करवाया कि पेरेसफोन छ:
माह तक प्लेटो के पास रहेगी और बाकी के छ
: महिने अपनी मां के पास बितायेगी।
यह समझौता दोनों को पसन्द आया जो आज तक भी चल रहा है। इस प्रकार जब भी पेरेसफोन अपने
प्रेमी प्लेटो के पास जाती है तब पृथ्वी उदास दिखाई देने लगती है
, मानो प्रकृति बुढ़िया गई हो। वृक्षों
की हरियाली न जाने कहां गुम हो जाती है। पृथ्वी पर पीले और सूखे पत्तों के अम्बार
में तब ना जाने कहां गुम हो जाता है बसन्त ,
और जब पेरेसफोन अपनी मॉ के पास वापस लौटती है तो पृथ्वी फिर से हरी-
भरी हो उठती है, ऐसे आता है अवनी पर
बसन्त।
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