फरवरी 2007

                           

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    श्रद्धांजलि   

 

       जाने-माने साहित्यकार और फ़िल्म लेखक कमलेश्वर का शनिवार की रात हृदय गति रुक जाने के कारण निधन हो गया. वे 75 वर्ष के थे. पत्रकार, पटकथा लेखक, समीक्षक, कथाकार...न जाने कितनी ही भूमिकाएँ और सभी में एक ख़ास पहचान, एक मज़बूत पकड़ और ज़मीनी समझ का  लेखन है.   कमलेश्वर की रचनाधर्मिता को किसी एक साँचे में नहीं कसा जा सकता . वो एक कोलाज की तरह ही है. उसमें अलग-अलग रंग हैं. लघुकथाओं पर तो कमलेश्वर का विशेष काम रहा है  'सारिका' का संपादन करते हुए कथा साहित्य को एक विस्तार देना इसकी एक बानगी है.   उनका उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' हो या फिर भारतीय राजनीति का एक चेहरा दिखाती फ़िल्म 'आंधी'   और साथ ही  दूरदर्शन को उन्होंने उस समय दिशा दी  जब भारत में दूसरा और कोई टेलीविज़न चैनल नहीं हुआ करता था. फ़िल्म जगत, दूरदर्शन, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ, समाचार पत्र और ऐसे बहुत सारे क्षेत्रों में अपनी रचनात्मकता का प्रमाण दिया दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर जैसे समाचार पत्रों में संपादक के तौर पर उन्होंने काम किया.  कमलेश्वर के लेखन का परिचय कुछ ऐसा ही है

साहित्य जगत को अपने योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2006 में पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया.

साहित्य अकादमी ने उन्हें उनके उपन्यास, 'कितने पाकिस्तान' के लिए 2003 में अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया था.

 उनके    इस  उपन्यास  को हिन्दी साहित्य के इतिहास में अपनी तरह का पहला सार्थक प्रयोग माना जाता है। इसमें उन्होंने भारत के वर्तमान इतिहास में पाकिस्तान के रूप में देश का विभाजन की घटनाओं को विस्तार देकर इसके माध्यम से देश के     भविष्य को देखने की कोशिश की है।

समकालीन हिन्दी कहानी की व्यापक जन चेतना ओर जीवन मूल्यों की कह लेखनी अब मौन हो गई है जो पाठको से एक जीवंत ओर धड़कता हुआ रिश्ता रखती थी। जिन्दगी के ठोस सरोकारों से जुड़ा उनका लेखन सहज होते हुए भी मूल्यवान था .

 

     प्रस्तुत है कमलेश्वर के चर्चित उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' पर एक टिप्पणी:

  कमलेश्वर  ka mah%vapUNa- ]pnyaasa iktnao paikstana hmaaro samaya pr [ithasa AaOr saMskRit ko maaQyama sao Anaok jaiTla savaalaaoM sao hmaara saaxaa%kar krata hO. hOM. yah ]pnyaasa hmaaro sammauK ek mah%vapUNa- savaala ]zata hO O— Qama- ka [ithasa maoM sa%ta AaOr Apnao vaca-sva ko ilae [stomaala. kmalaoSvar [na savaalaaoM kI th maoM jaanao ka p`yaasa krto hOM.
"yah dovata laaoga AalasaI AaOr Akma-Nya hOM. yao ]pjaIvaI hOM¸ yao manauYya AaOr prma sa<aa ko baIca sqaaipt hao gae hOM , , ,tumharo saaro AacarNa AvaOqa hOM [sailae tuma iksaI vaOQa saByata yaa saMskRit ka inamaa-Na nahIM kr sakto hao , , ,  tumharo pasa kovala vaasanaa hO¸ p`oma nahIM hO. kovala vaOyai>k EaoYzta ka WoYa hO [sailae ima~ta nahIM."

saMskRit ko inamaa-Na maoM sabasao mah%vapUNa- t%va Eama hO¸ Eama ko ibanaa iksaI saMskRit AaOr saByata kI klpnaa nahIM kI jaa saktI . dovata Eama nahIM krto [sailae vao iksaI saMskRit ka inamaa-Na BaI nahIM kr sakto. dovataAaoM³SaasakaoM´ nao Apnao Aist%va AaOr vaca-sva ko ilae yauw ka AivaYka ikyaa laoikna manauYya nao Eama ko saaqa kma- AaOr SaaMit jaOsao mah%vapUNa- jaIvana maUlyaaoM kao Kaoja kr ]nhoM ivakisat ikyaa.
"manauYya nao ijana mahaSai>yaaoM ka AnvaoYaNa ikyaa hO¸ vao Aapko pasa nahIM hOM. ]sanao AivaYkRt kr ilayaa hO— jaIvana¸ kma-¸ Eama¸ p`oma¸ ima~ta¸ AaOr SaaMit jaOsao jaIvana mo mahat%vaaoM kao , , ,[sailae Aba ]sakI Amar%va kI kamanaa Anauicat nahIM hO."

kmalaoSvar [sa ]pnyaasa maoM baar–baar yah ]d\GaaoYaNaa krto hOM ik samaaja ik samaaja maoM jaba–jaba A%yaacaar haoto hOM tba tba manauYya kI caotnaa jaaga`t haotI hO. jaao ek AaËaoSa kao janma dotI hO—
"jaba jaba Anyaaya¸ A%yaacaar AaOr Anaacaar haota hO¸ tba tba manauYya kI caotnaa AaOr Aa%maa kao yah p`layaMkarI JaMJaavaat JakJaaorto hOM. AaOr kalaI AMaiQayaaM calatI hOM , , ,"

ijannaa [ithasa maoM ek Klanaayak kI trh dja- hOM. yah sahI hO ik Baart–paikstana ko ivaBaajana maoM ]nakI jaanao–Anajaanao maoM mah%vapUNa- BaUimaka qaI laooikna ]pnyaasa maoM [sa tqya kao majabaUtI sao ]Baara gayaa hO ik iba`iTSa saama`ajya [sa kukR%ya ko ilae vaastva maoM ijammaodar hOM¸ ijannaa tao ]sako SatrMja kI caala ko maaohro bana gae.

"yahI maaohmmad AlaI ijannaa kI ivaDmbanaa AaOr ~asadI hOÑ  ]nhaoMnao ek baar saava-jainak taOr pr [MiDyaa ka ivaBaajana maaMga ilayaa tao ifr ]naka mana caaho ijatnaa pCtata rho¸ pr vao ]sa maaMga sao pICo nahIM hT sakto , , ,hToMgao tao vao Apnaa naotR%va Kao doMgao. , , ,eDivanaaÑ maOM gavaah hMU , , ,yahI ijannaa ko saaqa huAa hOÑ ]nhaoMnao baD,I iSa_t sao paikstana maaMgaa AaOr jaba tmaama ivaklpaoM kao tlaaSanao AaOr Kairja krnao kI mauiSkla p`iËyaa sao gaujarnao ko baad maOMnao ]nako saamanao paikstana AaOr ivaBaajana ka p`stava rKa tao vao KamaaoSa AaOr ]dasa qao , , ,]nhaoMnao na haM ikyaa¸ na naa ikyaa."[sa ]pnyaasa maoM [ithasa AaOr saMskRit ka gahna prIxaNa ikyaa gayaa hO.
 

  paikstana ka inamaa-Na saamaaijak¸ saaMskRitk AaOr rajanaIitk saBaI dRiYTkaoNaaoM sao ek galat fOsalaa qaa. [ithasa [sa baat ka saaxaI hO ik galat inaNa-ya Anaok ivad`uptaAaoM kao janma dota hO –
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vyaapairk saama`ajya Apnaa Aqa-Saas~ AaOr baajaar hI nahIM laato ApnaI rajanaIit evaM saMskRit BaI laato hOM. KulaI baajaar vyavasqaa Aaiqa-k saama`ajyavaad kI jaIvanaI Sai> hO¸ [nako $p badla sakto hOM. vao p`jaatM~ ka vaoYa QaarNa kr sakto hOM¸ maanavata ko iht maoM Aayaaoga banaa sakto hOM laoikna [nhoM hmaoSaa baajaaraoM kI AavaSyakta hO jaao maunaafa do sakoM. [sa isawant kao palana krnao vaalaI vyavasqaaAaoM ko tIna naama ivaSaoYa $p sao p`isaw hOM – ]pinavaoSavaad¸ saama`ajyavaad AaOr pMUjaIvaad. 

[@kIsavaIM sadI maoM [sako kuC AaOr naama hao sakto hOM. ivakasaSaIla doSaaoM sao yao kccaa maala p`aPt krto hOM AaOr BaarI maunaafo pr ]nhIM doSaaoM kao baoca doto hOM. [nakI baajaar vyavasqaa ivaYamata kI Ka[- kao gahra AaOr caaOD,a kr rhI hO. hmaarI na[- pIZ,I kao ivacaarivahIna banaakr kRi~ma ]llaasa AaOr ]%sava ko rMga maoM rMganao ka p`yaasa kr rhI hO. hmaaro doSa maoM 60 p`itSat AabaadI ko pasa svacC pInao ka panaI nahIM hO vahaM poPsaI AaOr kaokakaolaa ApnaI QaUma macaa rhI hO¸ kraoD,aoM ko laaBa maoM imanarla vaaTr ibak rha hO. Saraba pana kI dukana maoM sasto damaaoM pr ]plabQa kra[- jaa rhI hO. [sa mahMgaa[- ko baIca Saraba idna pr idna sastI hao rhI hO. BaartIya saMskRit kI AaD, maoM ivadoSaI saMskRit ka KulaoAama samaqa-na hao rha hO¸ [sa vyavasqaa kao saMtaoM¸ mahntaoM AaOr Qama- ko zokodaraoM ka pUra samaqa-na p`aPt hO. p`caar maaQyama ek cakacaaOMQa fOlaa rho hOM taik iËyaaklaapaoM pr saunahra pda- Dala sakoM. yah ]pnyaasa ivakasaSaIla doSaaoM maoM GaT rho [na duYcaËaoM evaM YaD\yaM~aoM kao khIM ivastar sao tao khIM saMkotaoM maoM hmaaro saamanao p`stut krta hO.

'iktnao paikstana' ]na ibanduAaoM kao BaI roKaMikt krta hO jaao ekta ko kond` rho hOM.  jaba Qama- baD,a hao jaata hO tao doSa CaoTa hao jaata hO AaOr yahI ivaWoYa ka karNa haota hO.

ivaVa AaOr salamaa kI p`oma khanaI [sa ]pnyaasa maoM Aaid sao AMt tk hO.

[sa ]pnyaasa ka flak bahut ivastRt hO. ivaSva kI paMca hjaar vaYa- puranaI saByataAaoM evaM saMskRityaaoM kao [samaoM samaoTnao ka p`yaasa ikyaa gayaa hO¸  laoikna [sasao ]pnyaasa kI raocakta evaM ]sako ]_oSya pr kao[- p`Baava nahIM pD,ta.

vat-maana Qaaima-k ]nmaad¸ vaOmanasya¸ ivavaokhInata¸ yauw laaolaupta¸ saaro maanava maUlyaaoM kao vyaapar banaanao ka p`yaasa Aaid pr yah ]pnyaasa ek p`Snaica*na hO. maO~I¸ Saaint AaOr sad\Baava ko AaSaa Baro saMdoSa ko saaqa yah ]pnyaasa samaaPt haota hO.

"laoikna tuma vahaM jaakr kraogao @yaaÆ tuma @yaa kr sakto haoÆ maora matlaba hO¸ vahaM jaanao ka maksadÆ"
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"vaRxaÑ"
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 कहानी

 मुझे अपनी सब कहानियां पसंद नहीं हैं, मैं जिन कहानियों को ठीक से लिख सका, वे ही मुझे अच्छी लगती हैं , उन्हीं में से यह 'चप्पल कहानी भी है  इसका कारण यह है कि यह वह बात कहती है जो अभी तक मैं अपनी कहानियों में नहीं कह सका था , या कहूं कि जिस समयगत माहौल और मानसिक भूगोल को मैं इस दृष्टिकोण से पेश नहीं कर पाया था हम बंधी-बंधाई और नपी-तुली शिष्टता के साथ- साथ् अपनी व्यक्तिगत बातों में जीने के आदी हो गये हैं जहां बड़े-से बड़े दु:ख और अन्यायों के प्रति निर्लिप्तता -सी पैदा हो गयी और होती जा रही है    इस निर्लिप्तता के कारण हमारी संवेदना सूखती जा रही है  इस कहानी में मैंने उसी सूखती संवेदना को छूने की कोशिश की है .

    कहानी

चप्पल

कमलेश्वर

 

  कहानी बहुत छोटी सी है मुझे ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीटयूट की सातवीं मंजिल पर जाना था अाईसीयू में गाड़ी पार्क करके चला तो मन बहुत ही दार्शनिक हो उठा था क़ितना दु: ख और कष्ट है इस दुनिया में लगातार एक लड़ाई मृत्यु से चल रही है अौर उस दु:ख और कष्ट एक से हैं दर्द और यातना तो दर्द और यातना ही है - इसमें इंसान और इंसान के बीच भेद नहीं किया जा सकता दुनिया में हर मां के दूध का रंग एक है ख़ून और आंसुओं का रंग भी एक है दूध, खून और आंसुओं का रंग नहीं बदला जा सकता शायद उसी तरह दु :, कष्ट और यातना के रंगों का भी बंटवारा नहीं किया जा सकता ऌस विराट मानवीय दर्शन से मुझे राहत मिली थी मेरे भीतर से सदियां बोलने लगी थीं एक पुरानी सभ्यता का वारिस होने के नाते यह मानसिक सुविधा ज़रूर है कि तुम हर बात , घअना या दुर्घटना का कोई दार्शनिक उत्तर खोज सकते हो समाधान चाहे न मिले, पर एक अमूर्त दार्शनिक उत्तर ज़रूर मिल जाता हैऋ और फिर पुरानी सभ्यताओं की यह खूबी भी है कि उनकी परंपरा से चली आती संतानों को एक आत्मा नाम की अमूर्त शक्ति भी मिल गयी है.

- और सदियों पुरानी सभ्यता मनुष्य के क्षुद्र विकारों का शमन करती रहती है एक दार्शनिक दृष्टि से जीवन की क्षण - भंगुरता का अहसास कराते हुए सारी विषमताओं को समतल करती रहती है .

मुझे अपने उस मित्र की बातें याद आयीं जिसने मुझे संध्या के संगीन ऑपरेशन की बात बतायी थी ओर उसे देख आने की सलाह दी थी उसी ने मुझे आईसीयू में संध्या के केबिन का पता बताया था- आठवें फ्लोर पर ऑपरेशन थिएटर्स हैं और सातवें पर संध्या का आईसी मेजर ऑपेरशन में संध्या की बड़ी आंत काटकर निकाल दी गयी थी और अगले अड़तालीस घंटे क्रिटिकल थेjkLrk bejtsalh okMZ ls tkrk Fkk- ,d csgn nnZ Hkjh ph[k bejtsalh okMZ ls vk jgh Fkh--- og nnZ Hkjh ph[k rks nnZ Hkjh ph[k gh Fkh& dksbZ ?kk;y ejht vlàk rdyhQ+ ls ph[k jgk Fkk- ml ph[k ls vkRek ngy jgh Fkh--- nnZ dh ph[k vkSj ph[k esa D;k varj Fkk! nw/k] [kwu vkSj vkalqvksa ds jaxksa dh rjg ph[k dh rdyhQ+ Hkh rks ,d&lh Fkh- mlesa fo"kerk dgk Fkh \

मेरा वह मित्र जिसने मुझे संध्या को देख आने की फ़र्ज अदायगी के लिए भेजा था,वह भी इलाहाबाद का ही था वह भी उसी सदियों पुरानी सभ्यता का वारिस था ठेठ इलाहाबादी मौज में वह ीाी दार्शनिक की तरह बोला था , ''अपना क्या है ? रिटायर हाने के बाद गंगा किनारे एक झोपड़ी डाल लेंगे अाठ -दस ताड़ के पेड़ लगा लेंगे मछली मारने की एक बंसी दो चार मछलियां तो दोपहर तक हाथ आयेंगी ही रात भर जो ताड़ी टपकेगी उसे फ्रिज में रख लेंगे ''

फ्रिज में ?''

'' और क्या माडर्न साधू की तरह रहेंगे ! मछलियां तलेंगे , खायेंगे और ताड़ी पीयेंगे अौर क्या चाहिए पेंशन मिलती रहेगी अौर माया-मोह क्यों पालें ? पालेंगे तो प्राण अटके रहेंगे ताड़ी और मछली बस, आत्मा ताड़ी पीकर , मछली खाके आराम से महाप्रस्थान को जायेगी न कोई दु:, न कोई कष्ट लेकिन तुम जाके संध्या को देख ज़रूर आना वो क्रिटिकल है 'esjk fe= vius Hkfo"; ds ckjs esa fdruk fuf'par Fkk] ;g ns[kdj eq>s vPNk yxk Fkk-

 यह बात सोच

-सोचकर मुझे अभी तक अच्छा लग रहा था, सिवा उस चीख के जो इमरजेंसी वार्ड से अब तक आ रही थी अौर मुझे सता रही थी ऌसीलिए लिफ्ट के आने में जो देरी लग रही थी वह मुझे खल रही थी.

आखिर लिफ्ट आयी.'सेवन-सात', मैंने कहा और संध्या के बारे में सोचने लगा दो-तीन वार्ड बॉय तीसरी और चौथी मंजिल पर उतर गये .

पांचवीं मंजिल पर लिफ्ट रूकी तो कुछ लोग ऊपर जाने के लिए इंतज़ार कर रहे थे ऌन्हीं लोगों में था वह पांच साल का बच्चा -अस्पताल की धारीदार बहुत बड़ी सी कमीज़ पहने हुए शायद उसका बाप , वह ज़रूर ही उसका बाप होगा, उसे गोद में उठाये हुए था उस बच्चे के पैरों में छोटी -छोटी सनीली हवाई चप्पलें थी, जो गोद में होने के कारण उसके छोटे-छोटे पैरों में उलझी हुई थीं.

अपने पैरों से गिरती हुई चप्पलों को धीरे से उलझाते हुए बच्चा बोला, ''बाबा! चप्पल '' ........

 उसके बाप ने चप्पलें उसके पैरों में ठीक कर दीं वार्ड बॉय व्हील

-चेयर बढ़ाते हुए बोला, '' आ जा, इसमें बैठेगा! '' बच्चा हल्के से हंसा वार्ड बॉय ने उसे कुर्सी में बैठा दिया उसे बैठने में कुछ तकलीफ़ हुई पर वह कुर्सी के हत्थे पर अपने नन्हें -नन्हें हाथ पटकता हुआ भी हंसता रहा दर्द का अहसास तो उसे भी था पर दर्द के कारण का अहसास उसे बिल्कुल नहीं था वह कुर्सी में ऐसे बैठा था जिसे सिंहासन पर बौ हो क़ुर्सी बड़ी थी और वह छोटा वार्ड बॉय ने कुर्सी को पुश किया वह लिफ्ट में आ गया उसके साथ ही उसका बाप भी उसका बाप उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरता रहा .

 लिफ्ट सात पर रूकी, पर मैं नहीं निकला,दो- एक लोग निकल गये, लिफ्ट आठ पर रूका यहीं ऑपरेशन थिएटर थे दरवाज़ा खुला तो एक नर्स जिसके हाथ में सब पर्चे थे, उसे देखते हुए बोली, '' आ गया तू ! ''

उस बच्चे ने धीरे से मुस्कराते हुए नर्स से जैसे कहा - हां ! उसकी आंखें नर्स से शर्मा रही थीं और उनमें बचपन की बड़ी मासूम दूधिया चमक थी , व्हील-वेयर एक झटके के साथ लिफ्ट से बाहर गयी नर्स ने उसका कंधा हल्के से थपकाया ..........

''बाबा! च्पपल,''

वह तभी बोला, ''मेरी चप्पल'' .......

 उसकी एक चप्पल लिफ्ट के पास गिर गयी थी उसके बाप ने वह चप्पल भी उसे पहना दी उसने दोनों मैरों की उंगलियों को सिकोड़ा और अपनी चप्पलें पैरों में कस लीं.

लिफ्ट बंद हुआ और नीचे उतर गया.

वार्ड बॉय बच्चे की कुर्सी को पुश करता हुआ ऑपरेशन थिएटर वाले बरामदे में मुडऋ गया नर्स उसके साथ ही चली गयी उसका बाप धीरे-धरे उन्हीं के पीछे चला गया .

  तब मुझे याद आया कि मुझे तो सातवीं मंज़िल पर जाना था संध्या वहीं थी मैं सीढ़ियों से एक मंज़िल उतर आया संध्या के डॉक्टर पति ने मुझे पहचाना और आगे बढ़कर मुझसे हाथ मिलाया हाथ की पकडऋ में मायूसी और लाचारी थी क़ुछ पल खामोशी रही फ़िर मैंने कहा , ''मैं कल ही वापस आया तभी पता चला यह एकाएक कैसे हो गया ?''

 ''नहीं, एकाएक नहीं, ब्लीडिंग तो पहले भी हुई थी पर तब कंट्रोल कर ली गयी थी पंद्रह दिनों बाद फिर होने लगी एक्सेसिच ब्लीडिंग चार घंटे ऑपरेशन में लगे एंड यू नो, वी डॉक्टर्स आर वर्स्ट पेशेंट्स! '' वो संध्या के बारे में भी कह रहे थे संध्या भी डॉक्टर थी .

''यस! आप तो सब समझ रहे होंगे संध्या को भी एक -एक बात का अंदाज़ हो रहा होगा ! '' मैंने कहा .

''लेकिन वो बहुत करेजसली बिहेव कर रही है ! '' संध्या के डॉक्टर पति ने कहा , ''बोल तो सकती नहीं पल्स भी गर्दन के पास मिली अार्टीफ़िशियल रेस्परेशन पर है एक तरह से देखिए तो उसका सारा शरीर आराम कर रहा है और सब कुछ आर्टीफ़िशिल मदद से ही चल रहा है , '' संध्या के डाक्टर पति ज्यादातर बातें मुझे मेंडिकल टर्म्स में ही बताते रहे और मैं उन्हें समझने की कोशिश करता रहा बीच -बीच मैं इधर-उधर की बातें भी करता रहा .

''संध्या का ीााई भी आज सुबह पहुंच गया क़िसी तरह उसे जापान होते हुए टिकट मिल गया !'' उन्होंने बताया .

''यह बहुत अच्छा हुआ '' मैंने कहा .

''आप देखना चाहेंगे ?''

''हां, अगर पॉसिबिल हो तो '' ..........

''आइए देख तो सकते हैं भीतर जाने की इजाज़त नहीं है वैसे तो सब डॉक्टर फ्रेंड्स ही हैं, पर '' .........

''

नहीं-नहीं, वो ठीक भी है ''...........

''वो बोल भी नहीं सकती वैसे आज कांशस है क़ुछ कहना होता है तो लिख के बता देती है उन्होंने कहा और एक केबिन के सामने पहुंचकर इशारा किया .

मैंने शीशे की दीवार से संध्या को देखा वह पहचान में ही नहीं आयी दो डॉक्टर और नर्स उसे अटैंड भी कर रहे थे अौर फिर इतनी नलियां और मशीनें थीं कि उनके बीच संध्या को पहचानना मुश्किल भी था.

 संध्या होश में थी ड़ॉक्टर को देख रही थी ड़ॉक्टर उसका एक हाथ सहलाते हुए उसे कुछ बता रहा था मैंने संध्या को इस हाल में देखा तो मन उदास हो गया वह कितनी लाचार थी बीमारी और समय के सामने आदमी लाचार होता है क़ुछ कर नहीं पाता मैंने मन ही मन संध्या के लिए प्रार्थना की , किससे की यह नहीं मालूम -ऐसी जगहों पर आकर भगवान पर ध्यान जाता भी है और किसी के शुभ के लिए उसके अस्तित्व को स्वीकार कर लेने में अपना कुछ नहीं जाता -सिवा प्रार्थना के कुछ शब्दों के .

   हम आई सीयू से हटकर फिर बरामदे में आ गये वहां बैठने के लिए कोई जगह नहीं थी बरामदे बैठने के लिए बनाये भी नहीं गये थे संध्या या डॉक्टर की बहन नीचे चाद बिछाये बैठी थी ड़ॉक्टर के कुछ दोस्त एक गुच्छे में खड़े थे

अभी तो, बाद में, एक ऑपरेशन और होगा '' संध्या के डॉक्टर पति ने बताया, '' तब छोटी आंत को सिस्टम से जोड़ा जायेगा ख़ैर पहले वो स्टेबलाइज़ करे, फिर रिकवरी का सवाल है उसके बाद मैं सोचता हूं - उसे अमेरिका ले जाऊंगा !''

 ''यह ठीक रहेगा!''

 इसके बाद हम फिर इधर-उधर की बातें करते रहे मैं संध्या की संगीन हालत से उनका ध्यान भी हटाना चाहता था ऌसके सिवा मैं और कर भी क्या सकता था , और डॉक्टर के सामने यों खामोश खड़े रहना अच्छा भी नहीं लग रहा था, यह जताते हुए कि अस्पताल वालों से छुपाकर मैं सिगरेट पीना चाहता हूं - मैं खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया बाहर लू चल रही थी नीचे धरातल पर कुछ लोग आ-जा रहे थे वे ऊपर से बहुत लाचार और बेचारे लग रहे थे और मेरे मन से सबके शुभ के लिए सद्भावना की नदियां फूट रही थीं एेसे में तुम सोचो - लगता है मनुष्य ने मनुष्य के साथ तो सघन और उदात्त संबंध बना लिए हैं, पर ईश्वर के साथ वह ऐसा नहीं कर पाया है मनुष्य अपने ईश्वर के दु :-सुख में शामिल नहीं हो सकता र्ऌश्वर से उसका सबंध सिर्फ दाता और पाता का है वहदेता है और मनुष्य पाता है क़ितना इकतरफा रिश्ता है यह अौर फिर अगर तुम यह भी मान लो कि ईश्वर ही मनुष्य को बनाता तो ईश्वर की क्षमता पर विश्वास घटने लगता है - सृष्टि के आदि से वह मनुष्य को बनाता आ रहा है परंतु असंख्य प्राणियों को बनाने के बावजूद वह आज तक एक सहज संपूर्ण और मुकमिल मनुष्य नहीं बना पाया क़ुछ कमी कहीं तो ईश्वर की व्यवस्था में भी है हो सकता है उनका आदि -कलाकार कुंभकार उन्हें मिट्टी सप्लाई करने में कुछ घपला कर रहा हो ऌस रहस्य का पता कौन लगायेगा? रहस्य ही रहस्य को जन्म देता है शायद इसीलिए मनुष्य ने ईश्वर को रहस्य ही रहने दिया ज़ो सत्ता या शक्ति विश्वास के निकष पर खरी न उतरे , उसे रहस्य बना देना ही बेहतर है अौर किया भी क्या जा सकता ...........

 लू के एक थपेड़े ने मेरा मुंह झुलसा दियाड़ॉक्टर अपने चिंताग्रस्त शुभचिंतकों के गुच्छे में खड़े थे- और सबके चेहरे कुछ ज्यादा सतर्क थे .

''ब्लडप्रेशर गिर रहा है ''

 आईसीयू में डॉक्टरों और नर्सो की आमदरफ्त से लग रहा था कि कोई कठिन परिस्थिति सामने है क़ुछ देर बाद पता चला कि नीडिल कुछ ढीली हो गयी थी उसे ठीक कर दिया गया है और ब्लडप्रेशर ठीक से रिकॉर्ड हो रहा है सबने राहत की सांस ली मौत से लड़ना कोई मामूली काम नहीं है ईश्वर ने तो मौत पैदा की ही है , पर मौत तो मनुष्य भी पैदा करता है एक तरफ जीवन के लिए लड़ता है ओर दूसरी तरफ मौत भी बांटता है- यह द्वंद्व ही तो जीवन है यह द्वंद्व और द्वैत ही जीवित रहने की शर्त है और अद्वैत या समानता तक पहुंचने का साधन और आदर्श भी आध्यात्मिक अद्वैत जब भौतिकता की सतह पर आता है और मनुष्य के प्रश्न सुलझाता है तभी तो वह समवेत समानता का दर्शन कहलाता है .........

सिगरेट से मुंह कड़वा हो गया था लू वैसे ही थपेड़े मार रही थी सीमेंट के पलस्तर का दहकता-चिलचिलाता तालाब सामने फैला था - कोई एक आदमी जलते नंगे पैरों से उसे पार कर रहा था .

मैंने पलटते हुए लिफ्ट की तरफ देख ड़ॉक्टर मेरा आशय समझ गये थे, लेकिन तभी राजनीतिज्ञ- से उनके कोई दोस्त आ गये थेशुरू की पूछताछ के बाद वे लगभग भाषण-सा देने लगे, ''अब तो अग्नि मिसाइल के बाद भारत दुनिया का सबसे शक्तिशाली तीसरा देश हो गया है और आने वाले दस वर्षो में हमें अब कोई शक्ति -महाशक्ति बनने से नहीं रोक सकती ऌंग्लैंड और फ्रांस की पूरी जनसंख्या से ज्यादा बड़ा है आज भारत का मध्यवर्ग अपनी संपन्न्ता में भारतीय मध्यवर्ग जैसी शक्ति और संपन्नता उन देशों के मध्यवर्ग के पास भी नहीं है '' ........

तभी एक चिंताग्रस्त नर्स तेज़ी से गुजर गयी और सन्नाटा छा गया चिंता के भारी क्षण जब कुछ हल्के हुए तो मैंने फिर लिफ्ट की तरफ देखा ड़ॉक्टर साहब समझ गये,'' आपको ढाई -तीन घंटे हो गये क्या-क्या काम छोड़ के आये होंगे अौर वे लिफ्ट की ओर बढ़े लिफ्ट आयी , पर वह ऊपर जा रही थीड़ॉक्टर साहब को मेरी खातिर रूकना न पड़े, इसलिए मैं लिफ्टमैं घुस गया .

 लिफ्ट आठ पर पहुंचा वहां ज्यादा लोग नहीं थे पर एक स्टै्रचर था और दो

-तीन लोग स्टै्रचर भीतर आया उसी के साथ लोग भी स्टैचर पर चादर में लिपटा बच्चा पड़ा हुआ था वह बेहोश था वह आपरेशन के बाद लौट रहा था उसके गालों और गर्दन के रेशमी रोएं पसीने से भीगे हुए थे माथे पर बाल भी पसीने के कारण चिपके हुए थे .

 उसका बाप एक हाथ में ग्लूकोज की बोतल पकड़े हुए था ग्लूकोज की नली की सुई उसकी थकी और दूधभरी बांह की धमनी में लगी हुयी थी उसका बाप लगातार उसे देख रहा था वह शायद पसीने से माथे पर चिपके उसके बालों को हटाना चाहता था , इसलिए उसने दूसरा हाथ ऊपंर किया, पर उस हाथ में बच्चे की चप्पलें उसकी उंगलियों में उलझी हुई थीं वह छोटी -छोटी नीली हवाई चप्पलें ..........

   मैंने बच्चे को देख फ़िर उसके निरीह बाप को.

   मरे मुंह से अनायास निकल हो गया ''इसका''...

 ''इसकी टांग काटी गयी है'' वार्ड बॉय ने बाप की मुश्किल हल कर दी.

''ओह! कुछ हो गया था?'' मैंने जैसे उसके बाप से ही पूछावे मुझे देखकर चुप रह गये उसके ओठ कुछ बुदबुदाकर थम गये लेकिन वह भी चुप नहीं रह सका एक पल बाद ही बोला, '' जांघ की हड्डी टूट गयी थी''.........

''चोट लगी थी ?''

  ''नहीं सड़क पार कर रहा था एक गाड़ी ने मार दिया,'' वह बोला और मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे टक्कर मारने वाली गाड़ी फिर वह वीतराग होकर अपने बेटे को देखने लगा .

  पांचवीं मंज़िल पर लिफ्ट रूकी बच्चों का वार्ड इसी मंजिल पर था लिफ्ट में आने वाले कई लोग थे वे सब स्टै्रचर निकाले जाने के इंतज़ार में बेसब्री से रूके हुए थे.

,........ वार्ड बॉय ने झटका देकर स्टै्रचर निकाला तो बच्चा बोरे की तरह हिल उठा, अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया, '' धीरे से '' .....

''ये तो बेहोश है  इसे क्या पता ?'' स्टै्रचर को बाहर पुश करते हुए वार्ड बॉय ने कहा .

 उस बच्चे का बाप खुले दरवाजे से टकराता हुआ बाहर निकला तो एक नर्स ने उसके हाथ की ग्लूकोज की बोतल पकड़ ली.

 लिफ्ट के बाहर पहुंचते ही उसके बाप ने उसकी दोनों नीली हवाई चप्पलें वहीं कोने में फेंक दीं फ़िर कुछ सोचकर कि शायद उसका बेटा होश में आते ही चप्पलें मांगेगा, उसने पहले एक चप्पल उठाई......... फ़िर दूसरी भी उठा ली और स्टै्रचर के पीछे-पीछे वार्ड की तरफ जाने लगा .

  मुझे नहीं मालूम कि उसका बेटा जब होश में आयेगा तो क्या मांगेगा- चप्पल मांगेगा या चप्पलों को देखकर अपना पैर मांगेगा ...........

  बेसब्री से इंतज़ार करते लोग लिफ्ट में आ गयेथे लिफ्टमैन ने बटन दबाया दरवाज़ा बंद हुआ वह लोहे का बंद कमरा नीचे उतरने लगा ....

 

 

 

         मुझे तुमसे मोहब्बत है दीवानगी की हद तक..
         उर्फ एक अनूठी प्रेम गाथा सारस की !
  
 प्रेम इंसान की ही फितरत नहीं है. पशु-पक्षी भी इससे अछूते नहीं हैं. इस वैलेण्टाइन दिवस पर हम अपने पाठकों को एक मासूम पक्षी की अनूठी प्रेम-गाथा से परिचित करा रहे हैं. यह पक्षी है सारस - क्रेन. इसे सरहंस, नीलांगन, रक्त मस्तक और मणि तारक आदि नामों से भी जाना जाता है. उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे अपना राज्य पक्षी घोषित कर रखा है. आकार में यह पक्षी काफी बड़ा होता है. लगभग डेढ़ मीटर की ऊंचाई वाले इस पक्षी की टांगें लम्बी, पंख सलेटी रंग के तथा सिर और पांव लाल रंग के होते हैं. यह पक्षी बहुत ऊंचाई पर लम्बी-लम्बी उडानें भरता है.

     सारस क्रेन जीवन में केवल एक बार जोड़ा बनाता है और आजीवन साथ निभाता है. इनकी प्रणय लीला निराली होती है. नर सारस मादा सारस को रिझाने के लिए अपने पंख फैला कर तथा गर्दन झुका कर नृत्य करता है. अगर मादा सारस उसे पसन्द कर लेती है तो जोड़ी बन जाती है. जीवन क्रम चलने लगता है. प्रजनन (इनका प्रजनन समय जुलाई से दिसम्बर तक होता है) के बाद ये अपने अण्डे को भी बारी-बारी से सेते हैं. महत्व की बात ये है कि ये पक्षी जीवन में केवल एक बार जोड़ी बनाते हैं और आजीवन साथ निभाते हैं. अगर दुर्भाग्यवश इनमें से कोई एक बिछड़ जाता है तो दूसरा उसकी याद में खाना-पीना छोड़ कर अपनी जीवन लीला खत्म कर डालता है.

  सारस खेत खलिहान , मैदानों और पानी के आस-पास रहना पसन्द करता है. इसका प्रिय भोजन मछली, घोंघा, मेंढक, कीचड़ में पाये जाने वाले छोटे-छोटे जीव और अनाज, बीज और मुलायम घास है. इसकी औसत उम्र 60-70 साल होती है.

                      लेख व छाया: अंजली सहाय

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                             प्रबंध सम्पादक : अंजली सहाय सम्पादक : डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल