|
इन्सान की हर शक्ल पर जो मुहर मज़हब की लगी है
दरअसल हर आदमी के साथ ये धोखा धड़ी है
मैं नहीं कहता महज़, इतिहास भी कहता रहा है
आदमी की लाश पर ही नींव मज़हब की पड़ी है
आज भी पूजा घरों में ख़ूब अस्लाह मिल रहा है
और उस पर भी सियासी चाल की भारी ठगी है
मन्दिरों में मस्ज़िदों में नफ़रतों की भीड़ देखी
हम कहाँ छुप जाएं जाकर वो जगह अब कौन सी है
वो जिसे चाकू लगा है दुश्मनी उससे नहीं थी
कत्ल होता है सड़क पर धर्म की कारीगरी है
◄ ► प्रतिक्रिया
*▲
topक़िसिम
वो अगर सोता हुआ उठ जाएगा
आदमी से ख़ुद ख़ुदा थर्राएगा
गैर ज़िम्मेदार रहबर है वो अब
एक ही झटके में नीचे आएगा
रिन्द जब मस्जिद में बैठे पीएंगे
नासिहा तब देखता रह जाएगा
दूरियॉ ज्यादा बढ़ी तो एक दिन
दरअसल भूचाल आ ही जाएगा
एक कुर्सी के लिए ईमान को
बेचने वाला बहुत पछताएगा
जो यूँ ही हालात बिगड़े जाएंगे
जंग का ऐलान हो ही जाएगा
◄ ► प्रतिक्रिया
* ▲
topक़िसिम
मैं नहीं होता तो फिर ये रब कहॉ होता
और धरती पर कहीं मज़हब कहॉ होता
पेड़ पत्ते और दरिया, पर्वतों का भी
जानते है लोग कुछ मज़हब नहीं होता
खून का दरिया बहाता है सदा मज़हब
तू ख़ुदा से पूछ तो वो तब कहॉ होता
तू न होता यार तो फिर ज़िन्दगी क्या थी
गम ख़ुशी या वलवला ये सब कहॉ होता
भक्त क्यों इन्सानियत को मारता रहता
आदमी का ख़ून जाने कब कहॉ होता
◄ ► प्रतिक्रिया
*▲
topक़िसिम
उदास
इस तरह तो मत होना उदास
कि मैं पस्त हो जाऊं
और सोच ही न सकूं
कुछ भी अच्छा और आशा से भरा
इस तरह
तो मत होना उदास
कि हंस
ही न सकें इस बार
जिस बात
पर दुहरे हुए थे
हंसी के
मारे पिछली बार
मत होना
मत होना
मत होना उदास
कि उदासी बहुत
बुरी होती है
उसके चेहरे पर तो
बहुत
जिसने दुख से लडी
हो लडाई हंसते हंसते
पिता बोले थे
पिता बोले थे सदा
सच बोलना
मैं झूठ कभी नहीं
बोला...
पिता बोले थे
हमेशा ईमानदार रहना
मैंने बेईमानी
नहीं की कभी कोई...
पिता बोले थे
हमेशा न्याय के संग साथ रहना
मैंने अन्याय का
दामन कभी नहीं थामा....
पिता बोले थे सदा
सुखी सम्पन्न रहना
पिता की हर बात
मानना क्या सम्भव भी है?
--
9/913,
मालवीय नगर, जयपुर
harishkaramchandani@yahoo.com
▲
topक़ि
◄ ► प्रतिक्रिया
*सिम
क
|
धोनी की बल्लेबाज़ी और मैं
|
वेणु गोपाल
|
मौके का
पूरा-पूरा फायदा
उठा रहा है महेन्द्र धोनी।
हरेक को
मिलना चाहिए मौका
ताकि कर सके वह
प्रदर्शन मन-मुताबिक
लेकिन
जिन्दगी
नहीं होती कभी
ऐसी मेहरबान
यहॉ तो
मौका न मिले
तो भी
मिल जाए अगर
तो ज़रूर ही
खेलना पड़ता है
धुँआधार!
उठानी पड़ती है
जोखिमें।
जीना पड़ता है
खतरनाक ढंग से।
जानते हुए
कि सेंचुरी भी बन सकती है
और आउट भी होना पड़ सकता है
जीरो पर
औवर चाहे जितने हों बाकी
मुझे तो
हर गेंद को पीटना है
नहीं पता
कि अगले मैच के लिए
चुना जाऊॅगा मैं
या
ड्राप कर देंगे
वे।
फिलहाल
यह मैच तो
खेल ही रहा हूं मै
इतना तो है पक्का।
और
लो!
यह लगाया मैंने
एक और छक्का!
◙◙◙
◄ ► प्रतिक्रिया
*▲
topक़िसिम
|