दिंसबर   2007

   

    

                           

प्रकृति और साहित्य को समर्पित

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 हम लोग

 


 

 कविता  

       तीन  गज़ल

 सुरेन्द्र श्लेष

   

इन्सान की हर शक्ल पर जो मुहर मज़हब की लगी है

दरअसल हर आदमी के साथ ये धोखा धड़ी है

 

मैं नहीं कहता महज़, इतिहास भी कहता रहा है

आदमी की लाश पर ही नींव मज़हब की पड़ी है

 

आज भी पूजा घरों में ख़ूब अस्लाह मिल रहा है

और उस  पर भी सियासी चाल की भारी ठगी है

 

मन्दिरों में मस्ज़िदों में नफ़रतों की भीड़ देखी

हम कहाँ छुप जाएं जाकर वो जगह अब कौन सी है

 

वो जिसे चाकू लगा है दुश्मनी उससे नहीं थी

कत्ल होता है सड़क पर धर्म की कारीगरी है

 

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वो अगर सोता हुआ उठ जाएगा

आदमी से ख़ुद ख़ुदा थर्राएगा

 

गैर ज़िम्मेदार रहबर है वो अब

एक ही झटके में नीचे आएगा

 

रिन्द जब मस्जिद में बैठे पीएंगे

नासिहा तब देखता रह जाएगा

 

दूरियॉ ज्यादा बढ़ी तो एक दिन

दरअसल भूचाल आ ही जाएगा

 

एक कुर्सी के लिए ईमान को

बेचने वाला बहुत पछताएगा

 

जो यूँ ही हालात बिगड़े जाएंगे

जंग का ऐलान हो ही जाएगा

 

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मैं नहीं होता तो फिर ये रब कहॉ होता

और धरती पर कहीं मज़हब कहॉ होता

 

पेड़ पत्ते और दरिया, पर्वतों का भी

जानते है लोग कुछ मज़हब नहीं होता

 

खून का दरिया बहाता है सदा मज़हब

तू ख़ुदा से पूछ तो वो तब कहॉ होता

 

तू न होता यार तो फिर ज़िन्दगी क्या थी

गम ख़ुशी या वलवला ये सब कहॉ होता

 

भक्त क्यों इन्सानियत को मारता रहता

आदमी का ख़ून जाने कब कहॉ होता

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  दो कविताएं : हरीश करमचंदाणी  

 उदास

इस तरह तो मत होना उदास

कि मैं पस्त हो जाऊं

और सोच ही न सकूं

कुछ भी अच्छा और आशा से भरा

 

          इस तरह तो मत होना उदास

          कि हंस ही न सकें इस बार

          जिस बात पर दुहरे हुए थे

          हंसी के मारे पिछली बार

 

मत होना

मत होना

मत होना उदास

कि उदासी बहुत बुरी होती है

उसके चेहरे पर तो बहुत

जिसने दुख से लडी हो लडाई हंसते हंसते

 

पिता बोले थ

पिता बोले थे सदा सच बोलना

मैं झूठ कभी नहीं बोला...

पिता बोले थे हमेशा ईमानदार रहना

मैंने बेईमानी नहीं की कभी कोई... 

पिता बोले थे हमेशा न्याय के संग साथ रहना

मैंने अन्याय का दामन कभी नहीं थामा....

पिता बोले थे सदा सुखी सम्पन्न रहना

पिता की हर बात मानना क्या सम्भव भी है?

-- 9/913, मालवीय नगर, जयपुर

harishkaramchandani@yahoo.com

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 धोनी की बल्लेबाज़ी और मैं  वेणु गोपाल

 

मौके का

पूरा-पूरा फायदा

उठा रहा है महेन्द्र धोनी। 

हरेक को

मिलना चाहिए मौका

ताकि कर सके वह

प्रदर्शन मन-मुताबिक 

लेकिन

जिन्दगी

नहीं होती कभी

ऐसी मेहरबान

यहॉ तो

मौका न मिले

तो भी

मिल जाए अगर

तो ज़रूर ही

खेलना पड़ता है

धुँआधार!

उठानी पड़ती है

जोखिमें। 

जीना पड़ता है

खतरनाक ढंग से।

जानते हुए

कि सेंचुरी भी बन सकती है

और आउट भी होना पड़ सकता है

जीरो पर

औवर चाहे जितने हों बाकी

मुझे तो

हर गेंद को पीटना है 

नहीं पता

कि अगले मैच के लिए

चुना जाऊॅगा मैं

या

ड्राप कर देंगे

वे।

फिलहाल

यह मैच तो

खेल ही रहा हूं मै

इतना तो है पक्का।

और

लो!

यह लगाया मैंने

एक और छक्का!

◙◙◙

 

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     सचमुच        सुनीता जैन 

                 

जब से वह प्रेम से जुड़ी है

तब से कांच पे खड़ी है। 

न चले बनता है न बिन चले ही । 

यदि आपने किया है प्रेम किसी से

तो कृपया उसको इतना बतला दें

कि वह क्या करे -- 

कांच को बचा ले किरच-किरच होने से

या बचा ले पैर अपने ?

जब से वह प्रेम से जुड़ी है

सचमुच, सचमुच डरी है!

 

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        ममत्व        डॉ. महेंद्र भटनागर

न दुर्लभ हैं
न हैं अनमोल
मिलते ही नहीं
इहलोक में, परलोक में
आँसू .... अनूठे प्यार के,
आत्मा के
अपार-अगाध अति-विस्तार के!
हृदय के घन-गहनतम तीर्थ से
इनकी उमड़ती है घटा,
और फिर ....
जिस क्षण
उभरती चेहरे पर
सत्त्व भावों की छटा -
हो उठते सजल
दोनों नयन के कोर,
पोंछ लेता अंचरा का छोर!

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topक़िसिम के गीत

बेचता हूं।

                                         प्रबंध सम्पादक  अंजली सहाय सम्पादक  डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल