दिंसबर  2007

       

       

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   राजस्थानी कहानी

 आसान नहीं है रास्ता

    नंद भारद्वाज

 

एक समय था जब दीपंकर के लौटकर घर में आते ही पार्वती के मन की सारी रंगत बदल जाती थी। वह मगन-मन अपने हाथ के सारे काम इतनी फुरती से निपटाती, मानो काम निवड़ते ही तुरत कहीं बाहर सैर को जाना हो। उस दिन शाम की चाय वह उसी के साथ पीना पसंद करती थी। उस वक्त की चाय का तो सामान ही जैसे अलग होता था। तपेली चूल्हे पर चढ़ाने के बाद चाय को स्वादिष्ट बनाने के लिए वह डिब्बों में दालचीनी या लोंग-इलायची-कालीमिर्च ढूंढ़ती रहती। इस बीच अगर वह कुछ पूछ लेता तो अव्वल तो उसका ध्यान ही नहीं जाता कि उसने कोई बात पूछी है और उसे उसका जवाब देना है, लेकिन आज तो वह शुरू से ही थोड़ी सतर्क थी। पास में बैठते ही जब दीपंकर ने दो दिनाें से चलते विवाद की बात पूछ ली तो उसके बदले हुए स्वर को ताड़ते हुए वह समझ गई कि किसी ने उस तक बात पहुंचा दी है। उसने अपने स्वर को थोड़ा नर्म और हल्का-फुल्का रखते हुए उल्टे उसी से पूछ लिया, ''आपको गांव में आते ही यह बधाई किसने दे दी कि मैं किसी अनचाहे विवाद में उलझ गई हूं?''

     ''बधाई की इसमें क्या बात है, हुई बात तो लोगों के कानों तक पहुंचेगी ही। गांव में आज हर किसी के मुंह से यही सुनने को मिल रहा है कि तू इमली के मसले को लेकर पंचायत पहुंच गई और पिछले दो दिनों से सब जगह इसी की चर्चा हो रही है। तू क्यों ऐसे किस्सों में पड़ती रहती है। अखिया तो यों ही बेलगाम आदमी है!''

    पार्वती को पहली बार पति के स्वर में कुछ कड़वापन लगा। बोली, ''बेलगाम है तो उसका मतलब यह तो नहीं है कि वह अपने मन में आए जैसा व्यवहार करेगा। कोई अगर आंखों के सामने अनीति की बात करता हो तो क्या हमारा फर्ज नहीं बनता कि उसे रोकने की कोशिश करें!'' उसने पति की ओर चाय का कप बढ़ाते हुए सार रूप में अपना पक्ष समझाने की कोशिश की।

    ''लेकिन तू क्यों हर वक्त दूसरों के बीच पड़ती रहती है? उछल कर मुसीबत का फंदा अपने गले में डाल लेना कहां की समझदारी है? गांव में दूसरे लोग नहीं बसते क्या? अपन ही रह गये सबकी मुश्किलें सुलझाने वाले?'' दीपंकर के सवाल में एक तीखा उलाहना तो था ही, इस बात की नाराजगीं भी थी कि वह नाहक उसकी परेशानी बढ़ाती जा रही है।

    ''बीच में पड़ने की इसमें क्या बात है, अपन भी इसी बस्ती में रहते हैं, किसी उजाड़ या सुनसान में तो नहीं बसते और जो बात गलत है, उसे तो रोकना ही पड़ता है। इनसानों के बीच रहने के कुछ कायदे तो सभी जानते ही होंगे!'' वह अपनी बात पर अब भी कायम थी।

    ''क्यों भोली बातें करती है, पारो! गांव में हरेक इंसान का जीने का अपना ढंग है। सबका अपना व्यवहार है। सभी के अपने घर-परिवार हैं, अपने सगे-संबंधी हैं। अगर न्याय-अन्याय की बात होगी, तो गांव की पंचायत बैठी है। अब तो गांव में पुलिस चौकी भी कायम हो गई है। बात ज्यादा बिगड़ेगी, तो वह सम्हाल लेगी। अपन किसकी कितनी मदद कर सकते हैं?'' दीपंकर ने चाय का कप होठों से लगाने से पहले अपनी बात का निचोड़ जैसे पत्नी को समझा दिया और फिर चुप होकर चाय पीता रहा।

     पति का यह स्वर नया था। वह अपनी ओर से कुछ स्पष्ट करना चाह रही थी, लेकिन दीपंकर का सख्त पड़ता चेहरा और आगे बात करने की अनिच्छा देखकर उसने चुप रहना ही बेहतर समझा। तभी पास में सोई उनकी दो बरस री बच्ची नीतू जाग गई और वह कुनमुनाते हुए बिस्तर पर उठकर बैठ गई। बल्ब की पीली रोशनी में बाप-बेटी की नजरें मिलीं, तो वह झट बिछौने से उतर कर पिता की गोद में आ गयी। दीपंकर भी अपना स्वर बदलकर उससे प्यार से बोलने-बतियाने लगा। उसने रैपर में लिपटी एक गोली जेब से निकाळ कर उसके हाथ में पकड़ा दी। वह भी खुश-खुश पिता से बातों में लगी रही।

    पार्वती अपनी चिन्ता में डूबी बाप-बेटी की बातें सुनती रही और चाय पीती रही। उसे आज शाम से ही दीपंकर के लौटने की प्रतीक्षा थी। वह अपने गांव से दस कोस दूर कस्बे के स्कूल में पढ़ाता था।

    यों उनका अपना गांव भी हलके के बड़े गांवों में गिना जाता है। चार हजार घरों की बस्ती है और उसमें ज्यादातर मकान पक्के। कई सेठ-साहूकारों की पुरानी हवेलियां हैं, जिनके मालिक ज्यादातर परदेस में ही रहते हैं, लेकिन उनके परिवार के बड़े-बूढ़े और औरतें-बच्चे यहीं रहते हैं। गांव में अच्छा-खासा बाजार है, जहां जरूरत की सारी चीजें मिलती हैं। शहर जाने वाली सड़क पर कुछ नये उद्योग और कारखाने भी खुल गये हैं।

    रेल्वे स्टेशन तो आजादी मिलने से बहुत पहले कायम हो गया था, पिछले कुछ वर्षों में चारों ओर से आने-जाने वाली बसों की सुविधा भी अच्छी हो गई है। बस-अड्डे के पास इतनी भीड़ रहती है कि वहां से अपना वाहन निकालने में खासी सावधानी रखनी पड़ती है। सड़क के दोनों ओर खोंमचों और रेहड़ीवालों की कतार लगी रहती है। पिछले बरसों में गांव में बिजली-पानी-डाक-फोन के साथ लड़के-लड़कियों के बारहवीं तक के दो अलग स्कूल खुल गये हैं और एक अस्पताल भी बन गया है। दीपंकर चाहता है कि उसकी पोस्टिंग यहीं के स्कूल में हो जाए, लेकिन यह करवा लेना आसान नहीं है।

    गांव में कुछ ऐसी स्वयंसेवी संस्थाएं भी उग आई हैं, जो क्षेत्र के माली हालात की खबर लेने के साथ ही जरूतमंद लोगों को, खासतौर से औरतों को शिक्षा देने और हाथ का हुनर सिखाने का काम भी करती हैं। पार्वती साल भर से ऐसी ही एक संस्था 'जीवनजोत' में काम कर रही है।

    दीपंकर नौकरी लगने के एकाध साल तक तो घरवालों के साथ ही रहा, लेकिन बाद में उसके और मां-बाप के बीच बात को लेकर इस बात पर तकरार होने लगी कि उसकी कमाई को घर में कैसे बरतना जाये। तकरार बढ़ने लगी, तो उसने घर से अलग रहने का मानस बना लिया। साल भर पहले घर के खुले अहाते में ही उसने अपने परिवार के लिए एक नया घर बनाकर अलग रहना शुरू कर दिया था। घर अभी छोटा ही है, लेकिन उन तीन की जरूरत के हिसाब से पर्याप्त है।

    पार्वती को न घरवालों के साथ रहने में कोई एतराज है और न अलग रहने का कोई अतिरिक्त उत्साह। वह अलग रहते हुए भी अपने सास-ससुर और परिवार के दूसरे लोगों की जरूरतों का पूरा खयाल रखती है। उसका अधिकांश समय परिवार के साथ ही बीतता है। छोटी ननद जमना तो दिन-रात उसी के साथ रहती है। जिस दिन दीपंकर घर में होता है, जमना मां की तरफ चली जाती है।

    दीपंकर महीने में तीन-चार बार घर जरूर आ जाता है। हर शनिवार को शाम तक वह अपने गांव लौट आता है और सोमवार को सवेरे जल्दी रवाना हो जाता है। पिछले दो बरस से यही उसका रुटीन बन गया है।

    पिछले दो दिनों से पार्वती खुद अपने मन की आकुलता और चिन्ता में भीतर ही भीतर उलझती जा रही थी। दस बरस पहले अपने पीहर में भी गांव की औरतों और सहेलियों के बीच किसी को न्याय दिलाने के लिए वह उसी तरह अथक जूझती थी। यश की लालसा न उसे उस तब थी, न आज है।

    एक बार उसे अपने साथ पढ़ने वाली एक असहाय सहेली का बचाव करना था, जिसे उसका लालची पिता ब्याह के बहाने एक अधेड़ को सौंप देना चाहता था। पार्वती ने अपनी सहेलियों के साथ इसका पुरजोर विरोध किया था। इस बार वह अपनी देख-रेख में काम करने वाली एक लिहाजू गृहस्थिन इमली  के उत्पीड़न को कम कराने का प्रयास कर रही थी।

    दीपंकर को अपनी शादी के बाद जब पार्वती के स्वभाव की जानकारी हुई थी, तो ऊपरी मन से तो उसने सराहना ही की थी, लेकिन भीतर से कहीं थोड़ा चिंतित और सतर्क भी हो गया था।

 

'जीवनजोत' में काम करने वाली इमली अपने पति अखिया की ज्यादतियां और जुल्म के कारण इमली शुरू से ही दुख पाती आ रही थी। अखिया एक झगड़ालू किस्म का आदमी था। कमाई के नाम पर कारखानों में थोड़ी-बहुत खुली मजदूरी कर लेता था, जो कभी उसकी जरूरतों के हिसाब से पूरी नहीं पड़ती थी। घर का खर्चा इमली के बूते पर ही चलता था। अपनी मर्दानगी दिखाने या दारू के लिए पैसे ऐंठने के लिए वह उसके साथ मार-पीट तो पिछले एक अरसे से करता ही आ रहा था, लेकिन दो रात पहले तो उसने हद ही पार कर दी। उसकी मार से इमली की आंख के पास घाव हो गया, दो जगह से होंठ कट गये और पीठ पर रस्सी की मार से धारियां-सी उभर आईं। चार बरस की बच्ची जब मां को बचाने बीच में पड़ी, तो विवेकहीन बाप ने बच्ची को इतने जोर से धक्का दिया कि वह जाकर दीवार से टकरायी। बच्ची के सिर पर चोट का निशान उभर आया और हाथों की चमड़ी छिल गई।

   इस सारे झमेले के पीछे असली वजह क्या थी, इसकी जानकारी किसी को नहीं थी और इमली भी कुछ बताने को तैयार नहीं थी। बेरहम पति ने जब बच्ची के साथ ऐसा ओछा बर्ताव किया, तो उसे पहली बार पति पर बेतहाशा गुस्सा आया। वह हिम्मत करके उसका सामना करने को तैयार हो गयी। शराब पीने के बाद अखिया में यों भी ज्यादा दम नहीं रहता था, सो इमली ने उसे जल्दी ही नियंत्रित कर लिया। लेकिन जब वह चोट खायी बच्ची को सम्हालने दौड़ी, तो अखिया ने रस्सी के दो-एक चाबुक और उसकी पीठ पर उतार दिये। इमली ने तुरंत पलटते हुए झटका देकर रस्सी उसके हाथ से छीन ली और उसी को घुमाते हुए वह दुबारा सामना करने को तैयार हो गयी। गुस्से में रस्सी का एक चाबुक तो उसने अखिया के पुट्ठे पर लगा ही दिया। चाबुक इतना कसकर मारा गया था कि उसका नशा काफूर हो गया। इमली और भी दो-चार वार करती, लेकिन उसकी ननद और सास ने बीच में पड़ कर अखिया को बचा लिया।

     इमली के साथ हुए इस जुल्म को पार्वती पंचायत में ले गयी और वहां जब बात बनती न दिखी, तो उसने इमली को पुलिस कार्रवाई की सलाह दी। इस मामले में इमली का मजबूत रहना जरूरी था, लेकिन यहीं आकर सारा मामला कमजोर पड़ गया था। पति से इतनी बुरी मार खाने के उपरांत भी वह बात को इतनी दूर ले जाने के पक्ष में नहीं थी।

     'जीवनजोत' की मालकिन गंगाबाई ने जब इमली की सास और उसकी ननद को बात करने के लिए बुलाया, तो उन्होंने उस घटना को अपना घरेलू मामला कहकर टाल देना चाहा। लेकिन बात जब पुलिस में जाती सुनी, तो दोनों नर्म पड़ गयीं और गंगाबाई और पार्वती से गुजारिश करने लगीं कि वे बात को इतना आगे न बढ़ायें। उन्होंने गंगाबाई और पार्वती की यह शर्त मंजूर कर ली कि अखिया अपनी गलती के लिए पंचायत में माफी मांग लेगा। सास और ननद ने आगे के लिए भरोसा भी दिलाया कि वे इमली के साथ ऐसा अन्याय फिर नहीं होने देंगी। इस घटना के बाद पार्वती अपने ससुराल में भी सभी के बीच चर्चित हो गई थी।

वती औरतों के साथ होने वाले दुरव्यवहार अपने आसपास इतनी बार देख चुकी थी कि उसके निशान उसके कोमल हृदय पर अब भी अंकित थे। इसलिए जहां तक बन पड़ता, ऐसी ज्यादतियों का वह खुलकर विरोध करती। लोग उसकी सराहना तो करते, पर उसके साथ चलने का साहस कम ही जुटा पाते।

     दस बरस पहले जब वह ऐसी अनपेक्षित घटनाओं और अनीतियों के विरोध में अपनी साथिनों को इकट्ठा करके आवाज उठाती तो उसकी स्कूल और गांव की पंचायत में उसे जागरूक और हिम्मतवाली लड़की का दर्जा दिया जाता था। लेकिन उसके घर वालों में से किसी ने यह बात समझने की कोशिश नहीं की कि वह जिस अन्याय और अनीति के विरोध में साथ देने की बात करती है, उसमें उनकी भी कोई भूमिका बनती है या नहीं। उन्होंने तो उसकी बारहवीं की पढ़ाई पूरी होते ही जल्दी से शादी कर देने में ही अपनी भलाई समझी।

     बड़े भाई भंवर और दामोदर से छोटी सरला उससे फकत ढाई बरस ही बड़ी थी और शादी की उम्र तक आते-आते तो वे दोनों बराबर-सी ही दिखने लगी थीं। स्कूल की दूसरी गतिविधियों में बढ़ती रुची को देखते हुए पिताजी ने दोनों बहनों की सगाई साथ ही कर दी थी और वे दोनों को एक ही सावे पर ब्याह देना चाहते थे। लेकिन पार्वती को जब यह पता चला कि उसका होने वाला पति निपट भोला है तो उसने शादी करने से साफ इनकार कर दिया। पिताजी को भी जब इस बात की जानकारी मिली तो उन्होंने तुरन्त हक्की-नक्की लेकर वह सगाई हाथों-हाथ छुड़वा दी। इससे लड़के वाले काफी नाराज हुए। उन्होंने बिरादरी की पंचायत बिठाने की धमकी भी दी। लेकिन जब लोगों ने उन्हें लड़के की वास्तविक दशा और पार्वती के स्वभाव की बात समझायी, तो वे समझ गये कि इसमें विवाद करना व्यर्थ है।

    दूसरे बेटे-बेटियों की शादी के बाद पंडित परमानंद एकबारगी खाली हाथ-से हो गये थे, लेकिन पार्वती की चढ़ती उम्र ने उन्हें निश्चिन्त होकर बैठने का मौका कम ही दिया। ऐसे घरों में जब बेटी जवान हो जाती है, तो मां-बाप को और कुछ काम दिखायी भी नहीं देता। सरला का विवाह हो जाने के बाद तो जैसे उनकी नींद ही उड़ गयी थी। लड़की बड़ी हुई जा रही थी और घर की कमजोर दशा में बराबरी का कोई सलोना लड़का सगाई के लिए तैयार कर लेना आसान काम नहीं था।

    दूसरे भाई-बहनों की बनिस्पत पार्वती की परवरिश में एक बुनियादी फर्क यह भी रहा कि थोड़ी-सी समझ पकड़ते ही वह अपने आप स्कूल जाने लगी थी और पढ़ना-लिखना सीख गयी थी, जबकि बड़े भाई-बहनों का जोर खेती और घरेलू काम पर ही रहा था। दामोदर ने जरूर कुछ दिन चक्कर काटे थे, लेकिन पांचवां दर्जा पास करने तक उसने भी स्कूल जाना बंद कर दिया था। सरला स्कूल जाने लायक हुई, तब तक मां-बाप लड़कियों को लड़कों के साथ भेजना प्राय: कम ही पसंद करते थे, लेकिन शिक्षित और संपन्न लोगों में लड़कियों को पढ़ाने का चाव बढ़ता जा रहा था। यह देखकर पिताजी ने सरला को भी स्कूल भेजना शुरू कर दिया। लेकिन उसके मन में मास्टरजी का ऐसा डर बैठा कि उसने दो-चार महीने स्कूल की ओर रुख ही नहीं किया, तब एक बहनजी ने बहला-फुसलाकर उसका स्कूल जाना फिर से शुरू कराया। लेकिन आठवां दर्जा पार करने तक उसका जी स्कूल से इतना भर गया कि वह आगे नहीं पढ़ी।

    दामोदर भाई की शादी होते ही बड़े भाई भंवर घर से अलग हो गये थे। उन्होंने कुछ बरस पहले दूसरे बड़े कस्बे में अपना अलग धंधा खोल लिया था, जिसकी वजह से ज्यादातर उनको वहीं रहना पड़ता था। दामोदर की शादी होते ही उन्हें एक बहाना मिल गया कि अब घर के काम और मां-बाप की सेवा करने के लिए नयी बहू आ गयी है, तो अपने बीवी-बच्चों को आराम से साथ ले जा सकते हैं। यह उन्होंने पहले से ही तय कर रखा था और यही किया। दामोदर की पत्नी कुछ गरीब घर से आई थी और मां-बाप को दामोदर की ससुराल वालों से शुरू से ही कुछ शिकायतें रह गई थी, सो नयी बहू के प्रति उनका व्यवहार अच्छा नहीं था। पार्वती को अपने मां-बाप की यह बात कभी अच्छी नहीं लगी।

    पार्वती के पिताजी गांव में पंडिताई का काम करते थे। एक बार वे गांव की पंचायत में वे वार्ड पंच भी चुन लिये गये। चाहते तो सरपंच भी बन सकते थे, लेकिन उन्हें वार्ड पंच बने रहने में ही अधिक लाभ दिखा। वे अपने घर में राशन की दुकान चलाते थे। पास वाले शहर और अपने गांव के बीच वे दुकान का सामान लाने-ले-जाने के काम में अमूमन भागते फिरते। गांव से घी, अनाज, ऊन, चारा या जलाने की लकड़ियों का लङ्ढा भरवा कर शहर पहुंचा देते और कुछ खर्चे लायक पैसे कमा-बचा लेते। राशन की चीनी, गेहूं और किरासन तेल की गैर-वाजिब बिक्री से भी लुक-छिप कर कुछ ऊपर की कमाई अवश्य कर लेते। इस काम में उन्हें कई तरह से झूठ-सांच करनपड़ते। इसी वजह से पार्वती को अपने पिता का यह काम कभी पसंद नहीं आया। एक तो इस काम में उन्हें बेमतलब की परेशानियां उठानी पड़ती और फिर गांव वाले पीठ-पीछे उनकी बुराइयां करते।

    पिताजी की इसी बाहरी आव-जाव में एक दिन उसे पता चला कि वे उसकी सगाई के सिलसिले में फिर कहीं बाहर गये हैं। वह खुद मां-बाप की इस चिन्ता और परेशानी से चिन्ता में रहती थी। मां-बाप की चिन्ता को देखते हुए वह यह भी चाहती थी कि उन्हें जल्दी ही इस काम में कामयाबी मिल जाये। उसे तो देर-सबेर किसी का घर संभालना ही है।      

    इस बार की यात्रा से जब पिताजी वापस आये, तो घर में पांव रखते ही उन्होंने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ फेर दिया, जो वे अमूमन कम ही किया करते थे। वह समझ गई कि जरूर उन्हें कुछ कामयाबी मिल गई है। वह पिताजी के हाथ का थैला लेकर घर के भीतर चली गई थी। मां को रसोई में बैठे देखकर पिताजी ने आंगन में प्रवेश करते ही घोषणा कर दी कि वे पार्वती की सगाई पक्की कर आये हैं। उन्होंने मां के आगे समधीजी के घर-बार और होने वाले दामाद के खूब बखान किये। मां और भाभी सुनकर बहुत खुश हुईं। सबकी खुशी में वह भी खुश थी।    नयी दुल्हन के रूप में जब वह पहली बार इस घर में आयी, तो उसके हृदय में हर्ष और उछाह के साथ एक अनचीन्हा डर भी था कि इस अनजान घर में उसकी ज़िन्दगी कैसी होगी। वे लोग कैसे होंगे, जिनके बीच उसे रहना और जीना है?

    पहली पहचान तो उस अनजान जीवनसाथी से ही करनी थी, जिसके साथ उसे नये जीवन की शुरूआत करनी थी। दीपंकर के बारे में उसने विवाह से पहले इतना तो जरूर जान लिया था कि वह एक पढ़ा-लिखा युवक है। स्वभाव से लिहाजू और कम बोलने वाला। इस थोड़ी-सी जानकारी से यह उम्मीद अवश्य बंध गई थी कि वह कठिनाई में उसका साथ निभायेगा। लेकिन घर के बारे में उसने जो कुछ सुना उससे वह चिन्ता में पड़ गयी थी। वह अपने आप को इस योग्य अवश्य बना लेना चाहती थी कि किसी अनपेक्षित स्थिति का सामना करते समय उसका कलेजा कच्चा न पड़े।

    शादी के बाद जब वह ससुराल पहुंची तो उसे नये घर में ज्यादा नया तो कुछ भी नहीं लगा, सिवा इसके कि यह पीहर वाले घर से कुछ बड़ा और खुला-खुला दिखता था। घर में तीन कमरे, रसोई और एक बैठक थी, जो पक्की ईंटों से बनी हुई थी। कमरों से जुड़ा शौचालय और नहानघर था। बीच का आंगन और उसके पश्चिमी ओर दो ओसारे कच्चे बने हुए थे, मगर वे भी लिपे-पुते और नये छाजन से छाये हुए सुंदर और साबुत थे।

    नयी दुल्हन की अगवानी में वे सारे रीत-कायदे नियम से निभाये गये, जो ऐसे मौके पर जरूरी माने जाते हैं। लेकिन जाने क्यों उसे लगता रहा कि इसमें रस्म-अदायगी का भाव अधिक था, घर-परिवार के लोगों के मन का उछाह कहीं नजर नहीं आ रहा। थोड़ी-बहुत हंसी-ठिठोली और खुशी यदि थी, तो वह गांव की हमउम्र लड़कियों और दूसरी औरतों के कारण ही दिख रही थी, जो अपने घर में चाहे जैसे रहती हों, यहां उन्मुक्त थीं। खुद दीपंकर भी इस सारे झमेले से जल्दी छूटने की फिराक में था। सारी रस्में पूरी होने के बाद आखिर वह रात भी आयी, जिसकी हर नये जोड़े को प्रतीक्षा हुआ करती है।

    सुहागरात के बहाने जब उनकी पहली मुलाकात हुई, तो वे एक-दूजे को देह और मन से सहेजने को इतने उतावले और आवेश में थे कि शुरूआत में तो किसी के पास कहने के लिए जैसे कोई साबुत शब्द बचा ही नहीं था। हथलेवे के पहले स्पर्श में ही उन्होंने उमगकर एक-दूसरे को अपने मन का आपा सौंप दिया था। दीपंकर ने फ़ेरों के समय उसका हाथ अपने हाथ में लेते समय हल्के-से दबाया, तो उसने भी वैसे ही दबाव से उत्तर दिया था।

    दीपंकर के ग्रेजुएशन का यह आखिरी बरस था और अपनी पढ़ाई के कारण अमूमन वह शहर में ही रहता था। लेकिन अभी परीक्षा हो जाने के कारण उसे वापस शहर जाने की कोई जल्दी नहीं थी। अपनी पढ़ाई के साथ पिछले एक बरस से वह जिस प्राईवेट फर्म में काम कर रहा था, वहां से भी उसने महीने भर की छूट ले रखी थी। शादी के बाद नयी दुल्हन के साथ रहने के उछाह में वह कुछ दिन और गांव में ही रुक गया था।

   हफ्ते भर में पार्वती सास-ससुर, जेठ-जेठानी, दोनों ननदों और देवर को काफी-कुछ जान गई थी। ससुर गिरजाशंकर यों तो अपने जमाने में गांव में अच्छे असर वाले ज्योतिषी-पंडित माने जाते थे, लेकिन बदलते वक्त के साथ अब उनका वह असर खासा कम हो गया था। घर में परिवार के लोग उनकी परवाह कम ही करते थे, जिससे वे भी उखड़े हुए-से रहते थे। बाप-बेटों और भाइयों में भी आपस में कम बनती थी। आये दिन छोटी-छोटी बात पर तकरार हो जाती। घर की खेती और यजमानी संभालने की ज्यादातर जिम्मेदारी बड़े बेटे रघुनाथराम पर ही रहती थी, इस वजह से उनमें एक खास तरह की अधिकार-भावना आ गयी थी। उनकी घरवाली की अपनी परेशानियां थीं। वह अपनी उलझनों में इतनी डूबी रहती थी कि किसी से सीधे मुंह बात करना ही संभव नहीं हो पाता था। वे दोनों अपनी मर्जी के आगे मां-बाप या छोटे भाइयों की इच्छा या राय-मशविरे को कम ही महत्व देते थे। छोटा देवर लाखन जरूर कुछ सीधे स्वभाव का था और वह हफ्ते भर में ही नयी भाभी से काफी घुल-मिल गया था।

    पार्वती को यह जानकर काफी आश्चर्य हुआ कि उसके पति के व्यवहार में एक अजीब अबोलापन जमा रहता है। यदि उसे कोई बुलाये नहीं, तो भले घंटों उसके पास बैठे रहो, वह अपनी ओर से चला कर बात शायद ही करे। सुहाग की पहली रात भी तकरीबन इसी तरह के अबोलेपन में बीत जाती, अगर वह खुद ही उससे बात करना शुरू न करती। वह अपना बचपन का घर छोड़कर इस नये घर में आयी थी और दीपंकर से उसकी यह पहली मुलाकात थी, सो वह तो शुरू में क्या बोलती! इंतजार करती रही कि वही उसे कुछ पूछेगा, और फिर वह धीरे-धीरे अपना मन खोलकर उसके सामने रख देगी। मन में कितनी ही बातें थीं, जो वह करना चाहती थी और अपना आपा उसे सौंपना चाहती थी। लेकिन उसे तो कुछ जानने-पूछने की जैसे कोई इच्छा ही नहीं थी। आखिर उसी ने गले की गांठ खोली और उनके बीच कुछ जरूरी जानकारियों का आदान-प्रदान संभव हो पाया।

    यों मानवी-देह की आपसदारी का अपना एक प्राकृतिक व्यवहार और व्याकरण होता है, जो दो अनजान लोगों के बीच लगाव तो पैदा करता ही है, उनके निजी आचरण और रिश्तों की मर्यादा भी बांधता है। उसकी अपनी ही भाषा होती है, जो अकेलेपन और अंधेरे में पसरती-पनपती है। देह की इस भाषा से दो लोगों के बीच जो नेह का रिश्ता कायम होता है, वही एक तरह से उनके राग-रंग और जीवन को आधार देता है। पार्वती अपनी उम्र के बीसवें बरस में देह की इस भाषा का कुछ अर्थ अवश्य जान गई थी, जिसका संकेत उसने हथलेवे के पहले स्पर्श में ही दीपंकर को दे दिया था। वही भाषा आखिर उनके मन की झिझक को खोलने में काम आयी।

    पार्वती पति के इस अबोलेपन को भेदना चाहती थी और अपने कोमल स्वभाव की भीतरी मिठास उसे सौंपना चाहती थी। अपनी मोहिनी छवि और कोमल स्पर्श से वह दीपंकर को कुछ पल किसी निराले ही मनोलाक में ले जाती, जिसका उसे पहले से कुछ अनुमान न होता। इससे दीपंकर का मन कुछ हल्का हो जाता और वह दो-चार बात अपनी ओर से भी जोड़ता, लेकिन अमूमन बोलते-बोलते किसी वजह से यदि उसकी बात अधबीच में ही छूट जाती, तो फिर उसे सिरे पहुंचाना कम ही संभव हो पाता। इसका यह अर्थ नहीं था कि वह पार्वती को कम चाहता था। प्यार करने का उसका अपना ढंग था और यह बात पार्वती धीरे-धीरे समझने लगी थी।

दो-तीन बार ससुराल आने-जाने के बाद नयी दुल्हन वाला लिहाज अब धुंधला पड़ने लगा था। दीपंकर भी महीने भर गांव में रहकर वापस शहर लौट गया था। उसकी कॉलेज की पढ़ाई तो एक तरह से पूरी हो चुकी थी, लेकिन अभी किसी स्थाई नौकरी की गुंजाइश नहीं बनी थी। उसने कई जगह आवेदन भेज रखे थे। बीक़ॉम में अच्छे नंबरों से पास हो जाने के कारण उसने बीएड क़े लिए भी आवेदन कर दिया था, लेकिन अभी उसका नतीजा आना बाकी था। पार्ट टाइम काम से इतनी आमदानी तो हो ही जाती थी कि वह अपने बूते पर शहर में बना रहता। किसी अच्छी नौकरी के लिए भी उसकी भाग-दौड़ जारी थी, लेकिन नौकरियों का तो जैसे टोटा ही पड़ गया था। किसी महकमे में एकाध जगह खाली होने की जानकारी होते ही सैकड़ों लोग अर्जियां और सिफारशें लेकर पहुंच जाते।घरवाले तो नहीं चाहते थे, फिर भी उसने किसी तरह बीक़ॉम क़र ली थी। वह आगे भी पढ़ना चाहता था, लेकिन घरवालों का दबाव बढ़ता जा रहा था कि उसे अब कोई ऐसा काम ढूंढ़ लेना चाहिए, जिससे वह अपनी कमाई का कुछ हिस्सा घर में भी दे सके। शहर में बहुत कोशिश करने के बाद भी जब कोई दूसरा काम नहीं मिला, तो वह उसी प्राईवेट फर्म में लगा रहा। यों वह फर्म ढाई हजार की तनख्वाह पर उसे पूरे समय रखने को तैयार थी, लेकिन वह अभी पूरे समय के लिए बंधने को तैयार नहीं था। 

    चौथे महीने जब पार्वती अपने ससुराल से वापस पीहर आयी, तब तक दीपंकर का बीएड में दाखिला हो गया था और वह जोधपुर आ गया था। यह खबर उसने खुद पार्वती को एक पत्र के जरिये दी थी। शादी के बाद उसके पति के हाथ का यह पहला पत्र था, जो उसने इतने प्यार से उसे लिखा था। पत्र में उसने यह जानकारी भी दी कि उसे एक कोचिंग संस्थान में शाम के वक्त कुछ काम भी मिल गया है, जिससे उसकी पढ़ाई के खर्चे का भी बंदोबस्त हो जायेगा।

    पार्वती को उस पर गर्व हुआ कि वह कठिनाई में अपने लिए कुछ उपयुक्त काम अवश्य ढूंढ़ लेता है। वह खुद चाहती थी कि जब तक दीपंकर की पढ़ाई जारी रहती है, वह भी अपने पीहर या ससुराल में किसी ऐसे काम से जुड़ जाये, जिससे कठिन समय में वे एक-दूसरे की मदद कर सकें। पार्वती ने अपनी स्कूल के प्रिंसीपल कौशिकजी से जब इस बारे में बात की तो उन्होंने उसे भरोसा दिलाया कि वे एक गैर-सरकारी स्कूल के मालिक से उसकी नौकरी के लिए बात करेंगे। संयोग से महीने भर में ही उसे काम मिल गया। उसने दीपंकर को पत्र लिखकर यह जानकारी भेज दी कि वह भी अभी पीहर के एक गैर-सरकारी स्कूल में पढ़ाने के काम में लग गयी है, सो फिलहाल उसे यहीं ठहरना होगा। दीपंकर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी कि उसे यह खबर कैसी लगी 

दोनों की जिन्दगी के ये दो बरस तो संयोग और वियोग की मन-रलियों में यों बीत गये जैसे दुनिया में और कुछ हुआ ही न हो। वह बीच में कई दिन पति के साथ जोधपुर भी रह आयी थी। दीपंकर किराये का एक कमरा लेकर रहता था। यहीं उसने दीपंकर के आगे यह इच्छा जाहिर की कि वह पत्राचार कोर्स के जरिए बीए क़रना चाहती है, लेकिन उसे आश्चर्य हुआ कि दीपंकर ने इस विषय में कोई उत्साह नहीं दिखाया। पार्वती ने खुद पत्राचार केन्द्र जाकर कोर्स की पूरी जानकारी ली, दाखिले की प्रक्रिया को समझा और लगे-हाथ फार्म भी भर दिया। असल में दीपंकर को अब पार्वती का और आगे पढ़ना अनावश्यक-सा लग रहा था। लेकिन अपनी अनिच्छा के बावजूउसे रोकने का प्रयत्न उसने नहीं किया।

     पार्वती हफ्ते भर जोधपुर में रहकर अपने पीहर लौट आयी। अपनी आगे की पढ़ाई शुरू हो जाने के कारण उसके मन में एक नया आत्मविश्वास पैदा हो गया था। वह सारे काम छोड़कर अपनी पढ़ाई में जुट गयी। स्कूल में बच्चों को पढ़ाने का काम वह अब भी जारी रखे हुए थी। बाकी वक्त में वह अपना कोर्स पूरा करने में लगी रहती। वह अपनी धुन की पक्की थी। शायद इसी वजह से बीए क़े पहले वर्ष की परीक्षा पास करने में उसे कोई मुश्किल नहीं हुई। अलबत्ता दीपंकर के मन में उसकी पढ़ाई को लेकर कोई खास उत्साह नहीं था। वह अपनी बीएड पूरी करने के डेढ़ साल बाद तक उसी कोचिंग संस्थान में पढ़ाता रहा और डेढ़ वर्ष बाद अध्यापक के रूप में जब उसकी नियमित नौकरी लग गयी, तो वह पार्वती को साथ गांव ले जाने के लिए अपनी ससुराल आ पहुंचा।

     ससुराल आने से पहले उसने पार्वती को पत्र लिखकर सारी जानकारी अग्रिम रूप से दे दी थी कि उसे अपने गांव से दस कोस दूर एक बड़े कस्बे की हाई स्कूल में अध्यापक की नौकरी मिल गयी है और उसने वहां जाकर डयूटी भी संभाळ ली है। अब घर-परिवार की बाकी जिम्मेदारियां पूरी करने में उसे अपनी पत्नी का सहयोग चाहिए, जिसके लिए पार्वती को साथ ले जाना जरूरी हो गया है।

     इधर पार्वती अपने पीहर के स्कूल में तो पढ़ा ही रही थी, उसकी बीए क़ी पढ़ाई का भी यह अन्तिम वर्ष था। इच्छा तो उसकी यही थी कि वह पीहर में ही रहकर यह कार्य पूरा कर ले, लेकिन दीपंकर अब उसके वहां रुकने के पक्ष में नहीं था। उसने पार्वती को साफ लिख दिया था कि अब उसे अपने सारे काम समेटकर उसके साथ गांव चल देना है। पार्वती के पास पति का निर्णय मान लेने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था। उसने मन न होते हुए भी ससुराल जाने की तैयारी कर ली और जब दीपंकर उसे लेने आया, तो दूसरे ही दिन वह उसके साथ अपने पीहर से विदा हो गयी।  

   गांव में कुछ वर्ष पहले एक समाजसेवी महिला गंगाबाई ने अपने घर में ही गांव की जरूरतमंद औरतों के लिए एक संस्था शुरू की थी 'जीवनजोत', जिसमें दिन में तो गांव की गरीब औरतों को कताई-बुनाई, कसीदाकारी, सिलाई और घर-गृहस्थी के अलग-अलग काम सिखाये जाते थे और शाम के वक्त प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र चलता था। गंगाबाई खुद वर्षों शिक्षा विभाग में अध्यापिका रह चुकी थीं। अपने सेवाकाल के आखिरी चार वर्ष उसी गांव के बालिका विद्यालय में प्रधानाध्यापिका रहने के बाद उन्होंने अपने बड़े-से घर को एक स्वयंसेवी संस्था के रूप में तब्दील कर दिया था। उन्हें इस काम में कई दूसरे समाजसेवियों और साहूकारों से अच्छी मदद भी मिल गई थी। वे अपनी जवानी के दिनों में पन्द्रह वर्षों का सुहाग-सुख भोगने के बाद विधवा हो गई थीं। उन्होंने अपनी दोनों बेटियों - विमला और सरस्वती - को पढ़ा-लिखाकर यथासमय उनके विवाह भी कर दिये थे। उनकी दोनों बेटियां अपनी-अपनी ससुराल में सुख-चैन से रहती थीं। मां की इच्छा को देखते हुए बड़ी बेटी विमला उनके काम में हाथ बंटाने लगी थी। मगर वह सोचती थी कि मां के अनुभव और इस पुश्तैनी घर को कुछ दूसरे उपयोग में लिया जा सकता है। उसे लगा कि इससे यश और कमाई दोनों मिल सकते हैं - यश मां रख ले और कमाई उसके हिस्से में चली आये।

   गंगाबाई अपनी नौकरी के प्रारंभिक दिनों से ही गांव की गरीब और जरूरतमंद औरतों के प्रति गहरी हमदर्दी रखती थीं और यथासंभव उनकी मदद भी करती थीं। उन्होंने अपनी सेवा-निवृत्ति से पहले ही सोच लिया था कि वे इस घर को और खुद को समाजसेवा के काम में सौंप देंगी। अपने इस काम में उन्होंने गांव की कई पढ़ी-लिखी औरतों और कारीगरों से मदद ली थी और उसकी एवज में संस्था की तरफ से उन्हें मेहनताना भी दिया था, जबकि गंगाबाई के कहने पर तो लोग यों ही अपनी खुशी से काम करने को तैयार हो जाते। इमली को तो उन्होंने शुरू से ही उसकी गरीबी और घर की कमजोर हालत देखते हुए संस्था में साफ-सफाई और दूसरे छोटे-मोटे कामों के लिए नौकरी पर रख लिया था।

    पार्वती संस्था शुरू होने के दो बरस बाद उससे जुड़ी थी। पिछले दो-एक वर्षों से 'जीवनजोत' को सरकार की ओर से कई नयी योजनाओं के तहत अच्छी-भली मदद भी मिलने लगी थी। संस्था में आने वाली औरतों की संख्या और काम भी दिनो-दिन बढ़ता जा रहा था। इसीलिए गंगाबाई को एक ऐसी पढ़ी-लिखी और सच्ची लगन वाली औरत की जरूरत थी, जो यह सारा काम संभालने के लिए तैयार हो। उन्हें जब पार्वती के बारे में यह जानकारी मिली कि वह बीए पास है और उसका पति दीपंकर भी अध्यापन का कार्य करता है तो एक दिन, जब दीपंकर घर में ही था, उन्होंने दोनों को बुलाया और पार्वती को संस्था में लेने का प्रस्ताव उनके सामने रख दिया। पार्वती तो कोई काम करना चाहती ही थी, दीपंकर ने भी उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इसके पीछे दीपंकर की सोच यही थी कि इससे पार्वती को घर बैठे कुछ काम मिल जायेगा और घर की आमदनी में भी इजाफा होगा, जबकि पार्वती इसी बात से उत्साहित थी कि कुछ बेहतर काम कर पाएगी और ऐसी संस्था से जुड़ना उसके अपने लिए एक नये अनुभव भी होगा।

    'जीवनजोत' संस्था का बढ़ा हुआ काम संभालना गंगाबाई के लिए कठिन होता जा रहा था। वे स्वयं इतने विस्तार के पक्ष में थीं भी नहीं, लेकिन उनकी बेटी विमला बराबर उन्हें उकसाती रहती कि इस काम में जितनी बढ़ोत्तरी होगी उतनी ही गांव की जरूरतमंद औरतों को मदद मिलेगी और उसकी मां को भी इसका यश मिलेगा। वे संस्था के हिसाब-किताब पर पूरी नजर रखती थीं और इस काम में अपने पति से भी मदद लेती थी। बेटी होने के नाते संस्था में उसका पूरा दखल रहता था।

    पार्वती जब गंगाबाई के बुलावे पर काम करने के लिए आयी, तो शुरू में उसे संस्था का हिसाब- किताब कम ही समझ में आता था। संस्था के संचालन में गंगाबाई के परिवार के लोगाें से, खासकर उनकी बेटियों से बातचीत करने का अवसर उसे कम ही मिलता था। लेकिन काम करते हुए इन आठ-दस महीनों में वह बहुत-सी बातें जान-समझ गयी थीं। गंगाबाई तो अपनी सारी जिम्मेदारी पार्वती को सौंपकर जैसे निश्चिंत हो गई थी। पार्वती को यह समझने में ज्यादा देर नहीं लगी कि संस्था के विषय में गंगाबाई और विमला की सोच में रात-दिन का फर्क है। विमला के लिए संस्था का विकास एक कारोबारी फायदे का काम था, जबकि गंगाबाई इसे पूरी ईमानदारी और लगन से समाजसेवा समझकर किये जा रही थीं।

    छोटी बेटी सरस्वती से पार्वती की मुलाकात एक बार ही हुई थी और उसने पार्वती को प्रभावित किया था। वह मां के लिए चिन्तित रहती थी और उनके काम को महत्वपूर्ण मानती थी। पार्वती को यह बात भी अच्छी लगती थी कि संस्था में काम करनेवाली औरतों के साथ और स्वयं उसके साथ भी गंगाबाई कभी मालकिन का-सा व्यवहार नहीं करती थीं। वे खुद स्कूल में हैड-मिस्ट्रेस रह चुकी थीं, सो प्रबंध और सरकारी कामकाज के सारे कायदे वे जानती थीं। लेकिन अपने ज्ञान और अनुभव का उपयोग वे संस्था और गांव की औरतों की भलाई में ही करती थीं। शाम के वक्त रोजाना कोई तीस-पैंतीस के औरतें लिखने-पढ़ने के लिए इकट्ठी हो जातीं। औरतों को पढ़ाने-सिखाने का यह काम गंगाबाई स्वयं ही संभालती थीं, जबकि दिन में संस्था के दूसरे काम ज्यादातर पार्वती के जिम्मे रहते थे।

 

कोई संस्था यदि सरकार की योजनाओं और बाहरी संगठनों से मदद लेती है, तो उसके लिए साफ-सुथरा हिसाब-किताब भी रखना लाजिमी होता है। गंगाबाई ने इसी मकसद से पार्वती जैसी पढ़ी-लिखी महिला को संस्था के काम से जोड़ा था कि साल में एक बार उसकी लेखा-परीक्षा भी हो जाये, जिससे आगे अनुदान वगैरह लेने में कोई अड़चन न आए।

    पार्वती ने जब साल भर का हिसाब-किताब मिलाया तो पाया कि लगभग पौने दो लाख की रकम विमलाबाई के हस्ते बैंक खाते से तीन-चार टुकडों में निकाली गई है, लेकिन उसका कोई वाजिब हिसाब संस्था के खर्चों में नहीं मिल रहा है। उसने वह रकम विमला के नाम लिख दी और यह बात गंगाबाई को भी बता दी।

    अगली बार जब विमला मां के पास आयी, तो उन्होंने उससे इस बारे में चर्चा की। विमला हिसाब तो क्या देती, उल्टे मां पर ही नाराज होने लगी कि उन्होंने संस्था में गरीब औरतों के नाम पर फालतू के खर्चे बढ़ा रखे हैं। पार्वती पर आया गुस्सा उतारते हुए उसने कहा कि पार्वती को भी इतनी बड़ी तनख्वाह देकर रखने की क्या जरूरत है, जबकि संस्था का हिसाब-किताब तो वह अपने पति के साथ बिना किसी तनख्वाह के अच्छी तरह से बनाती ही आयी है। लेखा-परीक्षा के लिए कोई संस्था अपना असली हिसाब कभी नहीं बताती। यों अगर असली हिसाब बनने लगा, तो संस्था थोड़े ही दिन चल पायेगी और आखिर घाटा खाकर बंद ही करनी पड़ेगी।

    ''तो तेरी सोच यह है कि मैं यह संस्था अपनी कमाई में बढ़ोत्तरी करने के लिए चला रही हूं?'' गंगाबाई ने अपनी नाराजगी का भाव मन में दबाते हुए विमला से पूछ लिया।

    ''सवाल कमाई का नहीं है, मां! यदि संस्था के खाते में आये बरस पूंजी की बढ़ोत्तरी नहीं होगी, तो संस्था चलेगी किस बूते पर? और उसके काम में इजाफा कैसे होगा? जिस पार्वती पर तू सबसे ज्यादा भरोसा किये बैठी है, वह तो खुद एक राजनीति करनेवाले पंच की बेटी है, जो अपने स्वार्थ के लिए कभी भी हमें धोखा दे सकती है!'' विमला ने संस्था की हितैषी बनते हुए मां को समझाने की कोशिश की।

     ''काम में बढ़ोत्तरी तो गांव के लोगों और औरतों से जुड़ने पर ही होगी, विमला! संस्था के खाते में बहुत-सारी पूंजी बढ़ जाने से अच्छे काम का क्या संबंध है? ठीक है, बचत और जरूरत के साधन पास हों, तो काम में आसानी रहती है, लेकिन यह संस्था मैंने बहुत-सारी बचत या कमाई करने के उद्देश्य से तो कत्तई नहीं खोली। अगर कोई इसी नजरिये से संस्था को देखता है, तो उसे जल्दी ही कोई दूसरा आसान रास्ता देख लेना चाहिए। रही पार्वती की बात, तो उसके बारे में ऐसा कुछ सोचना ही व्यर्थ है। पार्वती की जरूरत संस्था को है। वह पढ़ी-लिखी और नेक औरत है, उसे काम की क्या कमी है? वह तो खुद अपने पीहर में अध्यापक रह चुकी है।'' गंगाबाई ने बेटी को दो-टूक उत्तर देकर अपनी बात समेट ली। वह जान गई थी कि विमला यह बहस फकत अपनी गलती की ओर से ध्यान हटाने के लिए कर रही है। जो गलती वह कर चुकी है, वह उसे कबूल नहीं करेगी और संस्था का यह नुकसान उसे अपने निजी खाते से पूरा करना होगा। इसके लिए गंगाबाई ने पहले से ही मन बना लिया था।  

    गंगाबाई को बेटी के रुझान और नीयत को समझने में ज्यादा देर नहीं लगी। वे संस्था के न्यास की अध्यक्ष थीं और उनकी दोनों बेटियां उसकी मानद सदस्य। छोटी बेटी सरस्वती इस मामले में कम ही रुची लेती थीं। उसका पति राज्य-सरकार में अच्छे ओहदे पर था और वह स्वयं कॉलेज में पढ़ाती थी। वह तो मां को भी अपने साथ ही ले जाना चाहती थी, लेकिन जब उसने देखा कि मां की इच्छा गांव में ही रहकर इस संस्था के माध्यम से कुछ काम करने की है, तो उसने बाधा बनना उचित नहीं समझा। गांव के कई संभ्रान्त लोग भी संस्था के सदस्य बन गये थे और वे गंगाबाई का बहुत आदर करते थे। वे संस्था के काम में कभी दखल नहीं देते थे, पर जब कभी बैठक होती, तो वे गंगाबाई के बुलावे पर अवश्य पहुंच जाते थे।

   विमला को इस बात से बहुत तकलीफ हुई कि मां उसके बजाय पार्वती पर ज्यादा भरोसा करने लगी हैं। उसने यह बात जान ली थी कि संस्था पर यदि अपना कब्जा कायम रखना है, तो पार्वती को संस्था से अलग करना जरूरी है और यदि मां उसे हटाने को तैयार नहीं होती हैं, तो ऐसे हालात पैदा करने जरूरी हैं, जिनसे दुखी होकर पार्वती खुद ही संस्था से अलग होने पर मजबूर हो जाये।

   इसी काम के लिए वह इमली और उसके पति अखिया को इस्तेमाल करना चाहती थी। उसने पार्वती के खिलाफ यह प्रचार किया कि वह बहुत चालाक औरत है और संस्था पर अपना कब्जा करना चाहती है, इसलिए संस्था में काम करने वालों को उससे बहुत सावधान रहना चाहिए। उसने इमली और अखिया को पैसों का लालच दिया और अपनी एक योजना समझायी कि वे इस संस्था की कुछ रकम गायब करवाकर उसका इल्जाम पार्वती पर लगवा दें। उसने अखिया को इस बात के लिए भी उकसाया कि वह पार्वती को डराने के कुछ दूसरे तरीके भी तजवीज कर ले, जिनसे परेशान होकर वह खुद ही संस्था के काम से अलग हट जाये।

शाम को बस-अड्डे पर लोगों से जब दीपंकर को 'जीवनजोत' की इमली के साथ उसके पति के झगड़े और इमली के पक्ष में पार्वती की भूमिका की बात बतायी, तो उसमें अखिया की इधर-उधर कही ये बातें भी जोड़ दीं कि अखिया पार्वती और दीपंकर पर बहुत खार खाये बैठा है।

    दीपंकर के मन में डर-सा बैठ गया। अखिया बदमाश है। न जाने कब किसको क्या हानि पहुंचा दे। ऐसे बेलगाम लोगों के लड़ाई-झगड़ों से तो दूर ही रहना भला।

    दीपंकर हमेशा आसान और सुविधाजनक रास्ते पर चलने का हिमायती था। लोगों ने उसे अखिया से सचेत रहने की सलाह दी, तो वह भारी चिन्ता में पड़ गया। उसकी यह चिंता घर पहुंचते-पहुंचते इस असंतोष में बदल गयी कि पार्वती ऐसे व्यर्थ के झगड़ों में पड़ती ही क्यों है। इसी असंतोष और उधेड़बुन में वह घर में इस निर्णय के साथ दाखिल हुआ था कि वह पार्वती को ऐसी झगड़े वाली संस्था में काम नहीं करने देगा।

    पार्वती यों तो रविवार को संस्था कम ही जाती थी, और गंगाबाई ने भी आने-जाने के मामले में उसे पूरी छूट दे रखी थी, लेकिन पति की कड़वी सलाह के मुताबिक वह उस दिन रविवार होने के बावजूद गयी। भारी मन से ही सही, वह यह सोचकर गई थी कि अब 'जीवनजोत' से वह अलग हो जायेगी। जब पति को ही उसका घर से बाहर काम करना अच्छा न लगे, तो किसी और की संतुष्टि से क्या फायदा। उसने गंगाबाई के सामने संस्था से अलग होने की अर्जी रख दी।

    इमली को जब इस बात की भनक पडी, तो वह दौड़कर पार्वती के कमरे में आयी और उसके सामने खड़ी हो गयी। उसके चेहरे पर चोट और चिन्ता के निशान अभी तक वैसे ही दिख रहे थे। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह पार्वती को असली बात कैसे बताये। लेकिन वह जानती थी कि यदि उसने इसी घड़ी असली बात नहीं बतायी, तो पार्वती संस्था से निश्चय ही अलग हो जायेगी और उसका यों अलग हो जाना विमलाबाई का जीत जाना ही माना जायेगा। विमला यही तो चाहती है कि पार्वती किसी तरह संस्था से अलग हो जाये। फिर तो वह अपने ढंग से मां को बिलमा लेगी। लेकिन विमला का यों जीत जाना तो अनर्थ के समान होगा। तब तो इमली ने अपने पति से जो मार खायी, वह भी अकारथ हो जायेगी।

    ''बोलो, इमली, क्या बात है? चोटें ठीक हुईं? कुछ आराम आया?''

    ''आराम  काहे का आना है, बीबीजी! यह तो उमर भर का रोना है। पर आपने यह क्या सोच लिया है?'' उसने डरते-डरते बात शुरू की।

    ''क्यों, इसमें क्या नयी बात है? जब संस्था को और तुम्हें मेरी दी हुई सलाह पसंद ही नहीं आती, तो फिर यहां समय गंवाने से क्या फायदा?''

    ''फायदा तो न आपको है और न ही संस्था को। फायदा जिनको होना है, वे तो यही चाहते हैं कि आप संस्था से अलग हो जायें, तो उन्हें मनमर्जी करने की पूरी छूट मिल जाये। माताजी उन्हें कितने दिन रोक सकेंगी? एक आपसे थोड़ी उम्मीद थी, पर आप तो खुद ही आंख मूंदकर अंधेरा करने के लिए तैयार बैठी हैं। लगता है, मेरा मार खाना भी अकारथ ही गया।'' 

    पार्वती को लगा कि इमली कोई और बात कहना चाह रही है। खुलकर बात कहने का आग्रह करने पर उसने बताया कि विमला बहनजी किस तरह पार्वती पर झूठा इल्जाम लगवा कर उसे संस्था से अलग करवाना चाहती थीं। अगर पार्वती ऐसे मौके पर संस्था से अलग हो गयी, तो निश्चय ही गांव की जरूतमंद औरतों के हित में चलती यह संस्था अधबीच में ही अपने मकसद से भटक जायेगी। एक अच्छे काम पर से लोगों का भरोसा सदा के लिए उठ जायेगा।

    इमली की बात सुनकर पार्वती को जैसे विश्वास ही नहीं हुआ। बोली, ''क्या बात करती हो, इमली! बहनजी को भला यह सब करने की क्या जरूरत है? वे तो संस्था की मालकिन हैं! मुझसे अगर कोई नाराजगी है, तो वे सीधे भी कह सकती हैं!''

    ''अब यह तो मैं क्या जानूं, बीबीजी, पर वे इसी झमेले में तो मेरी मदद चाहती थीं और जब मैंने उनका साथ देने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने मेरे धणी के हाथों मेरी यह दुर्गत कराई वह तो यों ही उल्टी खोपड़ी का है पर मैंने विमला बहनजी की दाल नहीं गलने दी। अब अगर आप संस्था से अलग हट जायेंगी, तो वे तो यों ही जीत जायेंगी। इसलिए मेरा तो कहना यही है कि आप संस्था को इस तरह बर्बाद न होने दें आप इतनी पढ़ी-लिखी हैं, मैं आपको क्या समझा सकती हूं!''

     इमली अपनी बात पूरी कर ही रही थी, तभी बाहर कोई आहट हुई और वह बात को वहीं समेटकर चुपचाप कमरे से बाहर चली गयी। पार्वती उसकी बात सुनकर गहरे सोच में पड़ गई थी। वह अपनी कुरसी छोड़कर गंगाबाई से वापस मिलने का मानस बना ही रही थी कि तभी वे उसकी अर्जी हाथ में लिये कमरे में दाखिल हुईं और बोलीं -''पार्वती बेटा, यह जीवनजोत मैं अपने गुजारे के लिए या विमला की महत्वाकांक्षा के लिए नहीं चला रही हूं, यह बात तू अच्छी तरह जानती है। मैं भी अच्छी तरह जानती हूं कि इन हालात में इस संस्था का भविष्य क्या होगा, पर इतना जरूर चाहती हूं कि मेरे जीते-जी इसकी ऐसी दुर्गति न हो। संस्था ठीक चलती रही तो मेरा बुढ़ापा थोड़ा चैन से कट जायेगा। इसलिए अभी यह अर्जी तू अपने पास ही रख। इस पर ठंडे दिमाग से विचार करके मुझे बता देना! मेरे लिए सरस्वती और तुझमें कोई फर्क नहीं है।''

    इतना कहकर उन्होंने अर्जी पार्वती को थमा दी। पार्वती कुछ पल अपनी अर्जी की ओर देखती रही। फिर उसने गंगाबाई के सामने ही उसके टुकड़े करके मेज के नीचे रखी टोकरी में डाल दी। एक अदृश्य उजास और आत्मवि6वास उसने अपने भीतर फिर से भरता हुआ महसूस किया और यह जानते हुए भी कि आगे का रास्ता आसान नहीं है, वह वापस कुर्सी संभाल कर अपने काम में लग गयी। उसे वापस अपनी जगह संभालते देखकर गंगाबाई मन में गहरे संतोष का भाव लिये धीरे-धीरे कमरे से बाहर निकल गयीं।

--nandbhardwaj@gmail.com

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  काकी की सौगंध   

  मेजर रतन जांगिड़

 

द्वितीय विश्व युद्ध चरम सीमा पर था। धुरी राष्ट्रों के सामने मित्र राष्ट्र पूरी तरह जूझ रहे थे। इस वक्त उत्तरी अफ्रीका के रेतीले मैदान में तोबर्क के पास एक तरफ जम्रन व इटालियन सैनिक थे तो दूसरी तरफ ब्रिटिश सैनिकों के साथ आस्टे्रलिया, न्यूजीलैंड तथा हिन्दुस्तानी सैनिक थे।

हिन्दुस्तान की राजपूत रेजीमेंट अपने पूरे पराक्रम के साथ ब्रिटिश सेना का साथ दे रही थी। राजपूत रेजीमेंट का सिपाही बलदेव सिंह भी ब्रिटिश सैनिकों के साथ आगे बढ़ रहा था भयंकर गोलाबारी जारी थी। ऊपर से हवाई हमलों का पूरा शोर था। बलदेव सिंह ने अपना सर इधर-उधर घुमाया। शायद ऐसा करके वह थोड़ा आराम करना चाहता था। वह जानता था कि लड़ाई में कोई आराम नहीं है और उसे तो बंदूक से गोलियों की बौछार ही करनी है।  

अचनाक उसकी नजर दूर बायीं तरफ के एक मैदान की तरफ पड़ी। उसे देखकर वह कुछ क्षण तक ठिठका और फिर ध्यान से उसी तरफ देखने लगा। उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने अपने कंधे पर राइफल को एक तरफ किया। आंखों को एक हाथ से मला। पसीने को भी पौंछा और फिर उस तरफ देखने लगा। हां,एक लड़का मैदान की तरफ ही आ रहा है। साथ में कुछ भेडें भी थीं और वह हाथ की एक लकड़ी से उन्हें हांक रहा था।

बलदेव सिंह ने तुरन्त अपने बंकर के साथी रणवीर की तरफ देखा और बोला, ''रणवीर, वो देखे तो सामने एक लड़का आ रहा है। होगा कोई सात-आठ साल का।''

''तुझे क्या करना है। बंदूक उठा और सामने देख।''

रणवीर ने झुंझलाते हुए कहा लेकिन बलदेव सिंह ने एक बार फिर रणवीर की तरफ देखा ओर कहने लगा,

''वो छोटा बच्चा है, उसे नहीं मालूम होगा कि यहां पर लड़ाई जारी है।''

''बलदेव, बातों में मत उलझो। देखो सामने से बार-बार गोलियों की बौछारें हो रही हैं।''

''मालूम है, लेकिन वह बच्चा तो मैदान के बीचों बीच आ रहा है।'' 

''आने दो, उसकी किस्मत में शायद इतनी ही उम्र लिखी होगी।''

''लेकिन रणवीर, वह बच्चा मर जायेगा। देखो तो उसकी भेड़ें भी गोलियों की आवाज सुनकर बीच मैदान की तरफ ही आ रही हैं।''

''बलदेव, जज्बाती मत बनो। सामने जर्मन एवं इटालियन टैंक हमारी ही तरफ बढ़ रहे हैं। वे कभी भी हमें अपना निशाना बना सकते हैं।''

''हम क्या जर्मनों एवं इटालियनों से कमजोर हैं। तुम खुद ही देखो न, हमारी रेजीमेंट ने कितनी बहादुरी दिखायी है। क्या हम पिछले आठ दिनों से कभी चैन से बैठ पाये हैं।''

''तभी तो कहता हूं कि अपनी रेजीमेंट की शान रखो और बंदूक का ट्रिगर दबाओं।''

''नहीं रणवीर, उधर देखो वह बच्चा भी अब भेड़ों के पीछे ही भाग रहा है।''

''बलदेव, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि तुम इतने पागल क्यों हो रहे हो। क्यों दीवाने हो उस बच्चे के लिए, जिसे तुम जानते भी नहीं।''''रणवीर, चाहे जो भी हो, मैं उस बच्चे को जरूर बचाऊॅगा।''

''क्यों अपनी जान जोखिम में डाल रहे हो।''

''रणवीर, इसे तुम नहीं समझोगे।''

बलदेव की इतनी बात सुनते ही रणवीर ने भी अपनी बंदूक को कंधे से नीचे कर लिया। दोनों एक ही बंकर में थे और इसी बंकर से ही वे दुश्मन का सामन कर रहे थे। रणवीर ने हल्की सी श्वांस छोड़ी और बलदेव की तरफ मुखतिब होकर पूछने लगा,

''बलदेव, तुम क्या समझाना चाहते हो। क्या कोई बात है।''

''हां, रणवीर मुझे काकी की बात बार-बार याद आ रही है।''

 ''क्या बात है काकी की।''

''काकी ने सौगंध दी थी।''

 ''कैसी सौगंध।''

''सुनो बताता हूं।'' यह कहकर बलदेव आगे बोलने लगा,

''रणवीर, तुम जानते हो मेरे मां-बाप नहीं है। मुझे मेरी काकी ने ही पाला है। जानते हो एक बार गांव में दो गुटों में झगड़ा हो गया था। इस झगड़े में कई नौजवान मारे गये थे। अचानक मैं भी घर से बाहर निकल गया था। तुम्हें विश्वास नहीं होगा कि अगर एक फौजी ने मुझे बचाया नहीं होता तो मैं आज यहां नहीं होता।''

''फौजी ने तुझे बचाया। कौन था वह।''

''वह फौजी नौजवान भी दूसरे गुट का था।''

''यह जानते हुए भी कि तुम विपक्षी गुट के बच्चे हो, उसने तुम्हें बचाया।''

''हां रणवीर, मै। गांव के बीच से ज्योंही गुजरा तो देखा सामने वहीं बांका नौजवान मेरी तरफ बढ़ रहा है। शायद उसे आभास हो गया था कि मैं जिंदा वापस न जा पाऊंगा।''

''बलदेव, जल्दी बंदूक उठाओ, सामने से इतालवी टैंक आते दिखायी दे रहे हैं।'' कहते हुए रणवीर ने बलदेव को आगाह किया।

'' आने दो। उस रोज भी यही हुआ। उस फौजी ने देखा कि कुछ लोग मेरी तरफ बढ़ रहे हैं तािे तुरन्त पूरी फुर्ती से वह मेरी तरफ झपटा और मुझे पकड़ कर बांहों में उठा लिया।

लेकिन तब तक एक भाला उसकी कमर में लग चुका था। अगर वह मुझे न उठाता तो उसी भाले का मैं शिकार हो जाता।''

''बलदेव, ऐसा लगता है, टैंक हमारे सामने आ रहे हैं। अब तुम सब कुछ भूलकर मोर्चा संभालो और गोली चलाओं।''