दिंसबर 2007

    

          

प्रकृति और साहित्य को समर्पित

     
होम
माह का विचार
सम्पादकीय
कविता
कहानी
लेख
व्यंग्य
पुस्तक समीक्षा
बचपन
साहित्यिक हलचल
सम्पर्क सूत्र

     

और बहुत कुछ...

     

 हम लोग

 


 

  सम्पादकीय !       

 

        

अभिव्यक्ति पर खतरे

 

पिछले दिनों बांगला लेखिका तसलीमा नसरीन के साथ जो कुछ घटा उसने एक बार फिर से यह सोचने को विवश कर दिया कि आखिर हम कैसे समय और समाज में जी रहे हैं? पिछले लगभग पन्द्रह वर्षों से कट्टरपंथियों के निशाने पर होने की वजह से दर-दर भटक रही तसलीमा भारत में रह रही थीं. कट्टर पंथियों की नाराज़गी की शुरुआत उनके उपन्यास लज्जा से हुई थी जिसमें उन्होंने 6 दिसम्बर के बाद बांगला देश में अल्प संख्यकों पर हुए अत्याचारों का बेबाक अंकन किया था. इसके बाद भी उनके लेखन को लेकर कुछ विवाद होते रहे, पर वे पश्चिमी बंगाल में रहती रहीं. अभी एक छोटे-से विरोध प्रदर्शन के बाद पश्चिमी बंगाल सरकार ने उन्हें राजस्थान की तरफ धकेल दिया, राजस्थान ने दिल्ली की तरफ... और एक लेखिका एक सभ्य कहे जाने वाले समाज में, मुहावरे की भाषा में कहें तो, दर दर की ठोकरें खाती रही. राजनेता बयान देता रहे, पाले बदलते रहे – जो कि उनके स्वभाव का अविभाज्य अंग है, और संवेदनशील लोग दुखी होते रहे. अब भी हैं.

तसलीमा का अपराध(?) क्या था? उन्होंने लोगों की, लोगों के एक वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई. अब ये धार्मिक भावनाएं कुछ ऐसी अमूर्त चीज़ है कि मानो ठेस खाने को तैयार ही रहती है. कोई तस्वीर बनाए, गाना गाए, फिल्म बनाए, भाषण दे, किताब लिखे, किसी न किसी की धार्मिक भावना आहत हो ही जाती है. यहां तक कि अगर भगवान को केक खिला दिया जाए, उन्हें जींस पहना दी जाए तो भी ऐसा हो जाता है. धार्मिक भावनाओं के आहत होने का यह मसला सारी समझ और तर्क से परे होता है. तर्क की तो बात करना ही फिज़ूल है, क्योंकि जवाब में फौरन आस्था का नाम ले लिया जाएगा. अब यह समझना कठिन है कि आस्था और अन्ध विश्वास के बीच कोई अंतर है भी या नहीं. या कि दोनों एक ही बना दिए गए हैं.

चलिए, तसलीमा ने ‘द्विखण्डिता’ में कुछ लिखा. कुछ लोगों को वह बुरा लगा. वे उसका जवाब लिख कर दे सकते थे. वे यह भी लिख सकते थे कि तसलीमा का लिखा न पढा जाए. वे तसलीमा के लेखन के विरुद्ध अपनी अभिव्यक्ति का कोई भी प्रजातांत्रिक प्रयोग कर सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार पर यह दबाव बनाया कि वह उन्हें प्रदेश में न रहने दे. इससे पहले भी इस तरह के लोग हैदराबाद में तसलीमा पर बाकायदा हमला कर चुके थे. पश्चिम बंगाल सरकार ने जैसा सुलूक तसलीमा के साथ किया, उसका समर्थन कोई भी नहीं कर सकता. लेकिन दिलचस्प बात इसके बाद हुई. तसलीमा को राजस्थान भेजा गया और राजस्थान सरकार ने तुरत फुरत उन्हें दिल्ली की तरफ धकेल दिया. इसके बाद तसलीम के पक्ष में बयान जारी करते हुए राजस्थान सरकार को ज़रा भी हिचक महसूस नहीं हुई. इतना ही नहीं, गुजरात के मुख्य मंत्री ने उनसे भी दो क़दम आगे बढकर तसलीमा को गुजरात आने का न्यौता दे डाला. यानि इस सारे घटनाक्रम ने दो परस्पर विरोधी विचारधारा वाले राजनीतिक दलों को बेनक़ाब कर डाला. एक तरफ अपने आप को धर्म निरपेक्ष और अभिव्यक्ति की स्वाधीनता का पक्षधर कहने मानने वाले वामपंथी दल जिन्हें अपने शासित प्रदेश से तसलीमा को निर्वासित करते ज़रा भी लज्जा का अनुभव नहीं हुआ, तो दूसरी तरफ वे दक्षिणपंथी लोग  जिन्होंने अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के साथ सर्वाधिक दुराचरण किए हैं, उन्हें तसलीमा को पुचकारने-दुलारने में कोई संकोच नहीं हुआ. कहना अनावश्यक है कि वामपंथ को अगर अल्पसंख्यकों के वोटों की चिंता सता रही थी तो दक्षिणपंथी लोग वामपंथ को शर्मिन्दा करने का और इसी के साथ एक मुस्लिम कट्टरपंथ का विरोध करने वाली लेखिका को सर पर उठाने के मौके का फायदा उठा रहे थे. यह कहना तो मुश्किल है कि इस सारे घटनाक्रम में किसको कितना फायदा हुआ है? क्या पश्चिम बंगाल की वामपंथ सरकार को इस कदम के कारण मुसलमानों के कुछ ज़्यादा वोट मिल जायेंगे? या जनता यह मान लेगी कि भाजपा और संघ परिवार ने अब अभिव्यक्ति की आज़ादी के मामले में अपना रुख बदल डाला है! हमारे देश की जनता जितनी समझदार और परिपक्व होती जा रही है, उसको देखते हुए दोनों ही बातों की सम्भावना कम ही नज़र आती है. 

लेकिन इतना अवश्य है कि इस सब में बेचारी तसलीमा की खासी फजीहत हुई है. और असल में यह फजीहत तसलीमा की नहीं, विचार की, विचार की आज़ादी की, अभिव्यक्ति की आज़ादी की है. तसलीमा ने एक बयान जारी कर विवादित अंशों को वापस ले लिया है. जिस भयंकर मानसिक दबाव के चलते उनको ऐसा करना पडा होगा, उसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है. हमारे विदेश मंत्री ने जो बयान दिया था, उसमें भी यह प्रच्छन्न संकेत था. एक बार तो पटाक्षेप हो गया है.

लेकिन यह दु:स्वप्न का अंत नहीं है. बल्कि इस तरह का पटाक्षेप ऐसे जडमति और अपनी बात को अंतिम मानने और दूसरों की तनिक भी परवाह न करने वाले और दूसरों के लिए सुई भर भी ज़मीन न छोडने वाले लोगों के हौंसले बुलन्द करने वाला भी हो सकता है. हमारे लिए चिंता का विषय भी यही है. और इसीलिए हम तो ज़ोर देकर यह कहना चाहेंगे कि अब समय आ गया है कि हम अपनी नहीं एक दूसरे की अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए कृत संक्ल्प हों. मैं आपकी बात से कितना भी असहमत क्यों न होऊं, यह प्रयत्न करूं कि आप निश्चिंत होकर अपनी बात कह सकें, और ऐसा ही आप भी करें. वाल्टेयर ने ऐसा ही कुछ कहा था. और ऐसा ही होना चाहिए आने वाले भारत और आने वाले विश्व में. हमारे आदरणीय पाठक क्या सोचते हैं?

 

--दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

 

  

top           

                                         प्रबंध सम्पादक   अंजली सहाय सम्पादक  डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल