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मैंने bacapna ko saamaana kao
ApnaI smaRit ko kaoTr maoM Dala idyaa hO
talaa lagaa kr samaya ka
caabaI kao sa^MBaala ilayaa hO
bacapna ko Gar Aa^Mgana kI
hvaaAaoM maoM ibaKrI iklakairyaaooM
gaulaabaI irStaoM kI ibaKrI baataoM
dIvaaraoM pr T^gaI
baujau-gaaoM kI
tsvaIraoM kao ,
satrMgaI baIto idnaaoM kao
ibaKrI yaadaoM ko maaOsama kao
bacapna kI QaurI ko caaraoM Aaor
ca@kr kaTto maa^M baabaUjaI
Baa[- Baavaja AaOr ]phar sao imalao
AlhD maIzo idnaaoM kao
AmaUlya pustk saa sahoja ilayaa hO
AaOr sa^Micat kr jaIvana kaoSa maoM
[nd`qanauYaI satarMgaI caUnaD maoM
baa^MQa idyaa hO
Aba yah paoTlaI maorI Qarooaohr hO
ijasao M maOM iksaI sao baa^MT nahI
saktI
kBaI BaI bacapna kI caIjaaoM kao
kbaaD kI caIjaaoM kI trh
Ca^MT nahIM saktI @yaaoMik
yah pMUjaI hO
maOro ivaSvaasa kI
kRit hO Eama kI
jaha^ saoooM maOMo
AarmBa kr saktI hU^
yaa~a mana kI
gaulaabaI bacapna kI
e 2 isaivala laa[nsa
jayapur 6
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सम्मान वृद्धजन का कमलेश
माथुर
सम्मान नहीं है ये केवल रिश्तों का
सम्मान है ये उस जिजीविषा का
जिसने पहुंचाया इन्हें शिखर तक
अनाम अतीत से जुडे संघर्षो में
हारे नहीं ये सरोकार के सिपाही
ये जीत ही उनका यह सम्मान है।
सत्कार है उन सामाजिक सरोकारों का
सम्मानित हो जाने से इनके
हो जाते स्वत:
सम्मानित संस्थान-समाज
इतिहास नया रचने को
नई पीढी में ढल जाने को
आतुर है अभी इन्तजार
हारे नहीं हैं वे
जिन्दगी का हर लम्हा जिया है शान से
दिमाग से नहीं जिये
दिल से जीत का जश्न मनाते हैं
देता है ढेरो दुआएं दिल इनका
उठते आशीषों के हाथ हर बार
देते हैं पहचान संदेश के सम्मान को
जीवन संध्या में मिली ऊर्जा और उजास को
धरोहर बनी 'आज'
समाज की इस रीत को
आओ,
जीवन का अंग बनाएं
जीवन संध्या के 'शेष'
दिनों में
नमन करें इनकी मंजिल को
संस्कारित-संस्कृति
से इन्हें सजाए
सिर्फ सुविधाओं का विधान नहीं
इन्हें मन की छुअन चाहिये
संबंधों के संदर्भो का ज्ञान नहीं
मन मंदिर में मूर्तरूप चाहिये
सम्मान नहीं ये केवल रिश्तों का
सत्कार है सामाजिक सरोकारों का
सम्मान है ये उस जिजीविषा का
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