अप्रैल अंक 2007 

                           

प्रकृति और साहित्य को समर्पित

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 कविता  

ऐसे हालात में

 नंद भारद्वाज

 होने को तो कुछ भी हो सकता है-

 आप अच्छे-खासे लौट रहे हों                

 दफ्तर की बोझिल दुनिया से

            बाबू दीनानाथ -

 और बस्ती में दाखिल होते-न-होते

 दीख जाय धू-धूकर जलता आसमान,

 बीमार पिता को दवा िपलाकर

थके-हारे अस्पताल से लौट रहे हों

 चालक पृथ्वीपाल,

 और चौराहे पर घेर लिये जाएं

 आग की लपटों में -

 ऐसी अनजानी-अनहोनी दुनिया में

 कहिये, आप क्या कर लेंगे बाबू अख्तर ईमान-

 आप कर ही क्या सकते हैं

 इन हालात में!

 आते हैं -

 ऐसे अवसर भी आते हैं

 जब करने के नाम पर कुछ नहीं होता

 फिर भी कुछ बेहतर

 और बताने लायक करने की

 इच्छा तो रखता है आखिर आदमी !

 आदमी लॉघ सकता है

 ऊँची अवरोधी दीवारें

 फैलकर बहती नदी की धार

 दीठ के विस्तार तक फैली

 थकाती दूनियाँ

 काटकर आ सकता है

 धर्म,भाषा, जात-पांत के

 उलझे कंटीले जाल-

 और न सही आसान

 मगर एक कल्पना तो है

 जो जागती है

 थके हुए आदमी के

 दरकते ईमान में........

       प्रतिक्रिया    *    

  सहोदर से संवाद        नंद भारद्वाज  

 बड़े भाई

 अक्सर मिलने पर

 अफसोस करते हैं :

 इससे तो अच्छा था

 तू यह न होकर वह होता,

 ऐसे और इस तरह

 सध जाते सारे काम

 फलां की तरह

 चार लोगों में नाम होता,

 खुलवा देते छुटके को

 कोई छोटा-मोटा - सा कारोबार

 अच्छा खाता-कमाता---

 घर के धंघे में

 कितनी बरकत होती है!

 कौन पूछता है

 तेरे इस नेक और हमदर्द होने को

 उल्टे हमीं को लगी रहती है

 तेरे बिसूरते भाग की चिन्ता

 मैंने समझाना चाहा :

 आप बेकार परेशान होते हैं

 बड़े भाई-

 मैं यहाँ होता या वहाँ

 जहाँ भी होता

 ऐसा ही होता,

 कैसे हो पाता

 उन कामयाब लोगों की तरह

 चौकस और दुनियादार

 हर आदमी के होने की

 अपनी तासीर होती है,

 अपने हाथों रचा हुआ संसार

 वे झुॅझलाकर कहते हैं :

 तुझे क्या मालूम

 कैसे रचाया जाता है

 इस हरामी दुनिया में

 अपनी इच्छा का संसार....

 किसे कहते हैं ईमान

 दुनियादारी

 कैसे कैसे बनते हैं

 दुनिया में काबिल लोग ---

 पूछ उन्हीं की होती है

 जिनके पास होती है

 इफरात पूजा,

 खरे पसीने की कमाई

 तो महज एक मुहावरा है

 बीते जमाने का !

 मैं चिन्तित और हैरान हूं-

 कितनी आसानी और

 बिना किसी संकोच के

 नेकी और ईमान से इतनी दूर

 बेरोक

 दुनियादारी के दलदल में

 उतर जाते हैं मेरे सहोदर

 जहां से आगे नहीं दीख पडती

 कोई संवाद की संभावना!

 मैं महज इतना भर पूछ पाता हूँ :

 मेरी तो छोड़ें भाईजान

 अपनी पर गौर करें -

 क्या बनाना चाहेंगे

 अपने छुटके को आखिर आप --

 

 आखिर अपने लाड़ले से

 किस तरह की दुनिया में

 मिलना चाहेंगे लौटकर ?

 

 नन्द भारद्वाज : हिन्दी और राजस्थानी के सुपरिचित वरिष्ठ कवि, विचारक, कथाकार, समीक्षक. अनेक पुस्तकें  प्रकाशित. केंद्रीय साहित्य अकादमी से पुरस्कृत. सम्प्रति केंद्र निदेशक, दूरदर्शन, जयपुर.

इसी अंक में नन्द जी की सद्य प्रकाशित पुस्तक की समीक्षा भी पठनीय.

       प्रतिक्रिया    *      

 

 

   gaulaabaI AlhD bacapna 

    Da^, sarsvatI maaqaur

      

 मैंने bacapna ko saamaana kao

 ApnaI smaRit ko kaoTr maoM Dala idyaa hO

  talaa lagaa kr samaya ka

  caabaI kao sa^MBaala ilayaa hO

  bacapna ko Gar Aa^Mgana kI

  hvaaAaoM maoM ibaKrI iklakairyaaooM

  gaulaabaI irStaoM kI ibaKrI baataoM

  dIvaaraoM pr T^gaI

 baujau-gaaoM kI

  tsvaIraoM kao ,

  satrMgaI baIto idnaaoM kao

  ibaKrI yaadaoM ko maaOsama kao

 bacapna kI QaurI ko caaraoM Aaor

  ca@kr kaTto maa^M  baabaUjaI

 Baa[- Baavaja AaOr ]phar sao imalao

 AlhD maIzo idnaaoM kao

 AmaUlya pustk saa sahoja ilayaa hO

 AaOr sa^Micat kr jaIvana kaoSa maoM

 [nd`qanauYaI satarMgaI caUnaD maoM

 baa^MQa idyaa hO

 Aba yah paoTlaI maorI Qarooaohr hO

 ijasao M maOM iksaI  sao baa^MT nahI saktI

 kBaI BaI bacapna kI caIjaaoM kao

 kbaaD  kI caIjaaoM kI trh

 Ca^MT nahIM saktI @yaaoMik

 yah pMUjaI hO

 maOro ivaSvaasa kI

 kRit hO Eama kI

 jaha^ saoooM maOMo

 AarmBa kr saktI hU^

 yaa~a mana kI

 gaulaabaI bacapna kI

      e 2  isaivala laa[nsa

         jayapur 6 

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   सम्मान वृद्धजन का      कमलेश माथुर 

सम्मान नहीं है ये केवल रिश्तों का

सम्मान है ये उस जिजीविषा का

जिसने पहुंचाया इन्हें शिखर तक

अनाम अतीत से जुडे संघर्षो में

हारे नहीं ये सरोकार के सिपाही

ये जीत ही उनका यह सम्मान है।

सत्कार है उन सामाजिक सरोकारों का

सम्मानित हो जाने से इनके

हो जाते स्वत: सम्मानित संस्थान-समाज

इतिहास नया रचने को

नई पीढी में ढल जाने को

आतुर है अभी इन्तजार

हारे नहीं हैं वे

जिन्दगी का हर लम्हा जिया है शान से

दिमाग से नहीं जिये

दिल से जीत का जश्न मनाते हैं

देता है ढेरो दुआएं दिल इनका

उठते आशीषों के हाथ हर बार

देते हैं पहचान संदेश के सम्मान को

जीवन संध्या में मिली ऊर्जा और उजास को

धरोहर बनी 'आज' समाज की इस रीत को

आओ, जीवन का अंग बनाएं

जीवन संध्या के 'शेष' दिनों में

 नमन करें इनकी मंजिल को

संस्कारित-संस्कृति से इन्हें सजाए

सिर्फ सुविधाओं का विधान नहीं

इन्हें मन की छुअन चाहिये

संबंधों के संदर्भो का ज्ञान नहीं

मन मंदिर में मूर्तरूप चाहिये

सम्मान नहीं ये केवल रिश्तों का

सत्कार है सामाजिक सरोकारों का

सम्मान है ये उस जिजीविषा का 

 

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                             प्रबंध सम्पादक : अंजली सहाय सम्पादक : डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल