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कश्मीर के राही को ज्ञानपीठ
[कश्मीरी
कवि रहमान राही को इस वर्ष का प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा की गई
है. हमने कश्मीरी-हिन्दी
के सुपरिचित विद्वान
डॉ शिब्बन कृष्ण रैणा
से अनुरोध किया कि वे हमारे पाठकों को रहमान राही से परिचित कराएं.
इंद्रधनुष इण्डिया रहमान राही को बधाई देते हुए डॉ रैणा का यह आलेख प्रस्तुत कर
रहा है .]

रहमान राही कश्मीरी भाषा के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कवियों और समालोचकों में शुमार
किये जाते हैं. उन्होंने अपने सृजन से कश्मीरी भाषा और साहित्य को अत्यधिक प्रभावित
और समृद्ध किया है. 6
मई 1925
को जन्मे रहमान राही का मूल नाम अब्दुल रहमान है. वे बचपन में ही अनाथ हो गए
थे.
उनका लालन-पालन उनके मामा ने किया. राही की प्रारम्भिक शिक्षा श्रीनगर और जम्मू में
हुई.
मैट्रिक तथा एफ. ए. उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय लाहोर से किया. स्नातक उपाधि
इन्होंने प्राप्त की पूर्वी पंजाब विश्वविद्यालय,
सोलन (शिमला) से.
राही ने 1948
में कुछ वक़्त के लिए सार्वजनिक निर्माण विभाग में काम किया. सत्तारूढ़ नेशनल
कॉंफ्रेंस के आधिकारिक मुखपत्र उर्दू दैनिक खिदमत के सम्पादकीय विभाग में भी
आपने कुछ समय काम किया. इसी समय ये प्रगतिशील
लेखक संघ से भी जुड़े और कालांतर में, ठीक
उस वक़्त जब इन्होंने पत्रकारिता छोड़ी,
ये प्र.ले.सं. के महासचिव चुने गए. प्र.ले.सं. के मुख पत्र क्वांग पोश के
कुछ अंकों का इन्होंने सम्पादन भी किया. इसके बाद अंतत: राही कश्मीर की अघोषित
कम्युनिस्ट पार्टी की सांस्कृतिक शाखा से जुड़े. आपने 1952
में फारसी में और 1962
में अंग्रेजी में एम.ए. किया. राही 1953
से 1955
तक उर्दू दैनिक आजकल (दिल्ली) के सम्पादक मण्डल में भी रहे. 1964
में कश्मीर विश्वविद्यालय के फारसी अध्ययन संस्थान से जुड़ने से पहले आपने कई
कॉलेजों में पढ़ाया. 1975
में ये इसी विश्वविद्यालय में कश्मीरी विभाग के सीनियर फैलो बने और फिर वि.वि. ने
इन्हें अपना पहला प्रोफेसर एमेरिटस भी बनाया. 1985
में राही सक्रिय अकादमिक सेवा से रिटायर हुए.
रहमान राही पर लल्लद्य और अन्य कश्मीरी रहस्यवादी कवियों का गहरा असर है. सम्मानित
कश्मीरी कवि और इनके वरिष्ठ समकालीन दीनानाथ नादिम का भी इन पर गहरा प्रभाव है.
राही की कहकहां-ए-ज़हरफिशां और फैसला जैसी कविताएं प्रगतिशील आलोचकों
द्वारा भी सराही गई हैं. 1952
में इन्होंने कश्मीरी को अपने सृजन की भाषा के रूप में अंगीकार किया. अब तक राही के
पांच काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं,
जिनमें पहला है सनावेनी साज़ (1952)
और अब तक का अंतिम है सियाह रुदा ज़ारेन मंज़
(1997).
इनकी कश्मीरी कविताओं के संग्रह नौरोज़े-सबा(1958)
ने इन्हें बहुत मान दिलाया. इस पर तो इन्हें 1961
का साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी मिला.
राही ने आलोचना क्षेत्र में भी ख्याति अर्जित की है. उनके आलोचनात्मक लेखों के
संग्रह काहवट
(1980)
पर उन्हें राज्य संस्कृति अकादमी का श्रेष्ठ आलोचक सम्मान दिया गया. शार शिनासी
(1982)
और कश्मीरी शायरी ता वाज़्नुक सूरते हाल (2000)
उनकी अन्य आलोचनात्मक पुस्तकें हैं.
राही ने अंग्रेज़ी से कश्मीरी में अनुवाद भी किए हैं. इनमें प्रमुख हैं डॉ फॉस्टस और
बाबा फरीद के अनुवाद. अन्य अनेक सम्मानों के अतिरिक्त इन्हें पद्मश्री से भी नवाज़ा
जा चुका है. राही साहित्य अकादेमी के फैलो भी रहे हैं.
प्रतिक्रिया
*

बातचीत
चन्द लमहे कथाकार चन्द्रकांता के साथ...
चन्द्रकान्ता का नाम हिन्दी पाठकों के लिए अपरिचित नहीं है. अब तक उनके सात उपन्यास
और ग्यारह कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. पाठकों के बेपनाह प्यार के साथ ही
उन्हें अनेक पुरस्कार और सम्मान भी मिले हैं जिनमें प्रमुख है के. के. बिडला
फ़ाउण्डेशन का व्यास सम्मान. चन्द्रकान्ता जी को राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान
जयपुर ने अपने एकादश सम्मान समारोह में ‘वाग्मणि सम्मान’ से नवाज़ा. इसी अवसर पर
चन्द्रकान्ता जी ने हमसे बात करने के लिए भी कुछ समय निकाला.
समकालीन महिला लेखन पर अपने विचार देते हुए उन्होंने कहा कि आज का महिला लेखन मात्र
घर-परिवार, पति-पत्नी, नाते-रिश्तेदारों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक वृहत्तर
परिवेश में राष्ट्रीय समस्याओं को, सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक स्थितियों को खंगाल
कर अपनी सार्थकता सिद्ध कर रहा है. स्वाभाविक ही है कि महिला लेखकों ने अपनी दृष्टि
को विस्तार दिया है. इसके उदाहरण कृष्णा सोबती से लेकर नई लेखिका महुआ माझी तक में
देखे जा सकते हैं. चित्रा मुद्गल अगर 'एक
ज़मीन अपनी'
में स्त्री समस्याओं का विश्लेषण करती हैं तो वे ही 'आवां'
में लेबर यूनियन के अंत:बाह्य परिवेश में सेंध भी लगाती हैं,मृदुला
गर्ग 'कठगुलाब'
लिखती हैं तो 'अनित्य'
जैसा राष्ट्रीय समस्याओं पर चिंता दर्शाता उपन्यास भी रचती हैं. नासिरा शर्मा
'ठीकरे
की मंगनी'
लिखती हैं तो 'ज़िन्दा
मुहावरे'
भी उसी शिद्दत से लिखती हैं. उदाहरण तो अनेक हैं.
बाज़ारवाद के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह तो सर्वविदित है कि भूमण्डलीकरण के जिस दौर
में हम जी रहे हैं उसका संचालन बाज़ार से ही हो रहा है. विकसित राष्ट्र विकासशील
देशों को अपनी मण्डी बनाने के लिए विश्वग्राम की अवधारणा का प्रयोग कर रहे हैं.
बाज़ार और उपभोक्तावाद आज हमारे हर सम्बंध में प्रवेश कर चुका है. रिश्ते-नाते सभी
अर्थ की तुला पर तुलने लगे हैं. एक अंधी दौड़ है जिसमें मानवीय मूल्यों को कुचला जा
रहा है. बूढ़े-अशक्त मां बाप को ओल्ड एज होम में डाल कर समझ लिया जा रहा है कि अपना
कर्तव्य पूरा हो गया. वस्तुत्त: भूमण्डलीकरण ने हमारे मूल्यों को ही नहीं,
हमारी स्थानीयता,
संस्कारिता और पारम्परिक गरिमा को भी नुकसान पहुंचाया है. फास्ट फूड,
फास्ट लाइफ,
फास्ट म्यूज़िक जीवन के सच बन गए हैं. रेडियो,
टी वी,
इण्टरनेट ने जहां सूचना के नए द्वार खोले हैं वहीं सम्वाद-हीनता को भी फैलाया है.
ऐसे में चन्द्रकांता जी का कहना है कि एक मात्र आशा की किरण साहित्य है. वह मनुष्य
में सम्वेदना को बचाने की भूमिका अदा कर सकता है और कर रहा है. हिन्दी में तो
महिलाओं ने भी अपने लेखन से नए मानदण्डों का सृजन किया है. कश्मीर से कन्याकुमारी
तक की लेखिकाएं मनुष्य का शोषण करने वाली व्यवस्था के प्रतिपक्ष में खड़ी हैं. वे
गलत का सशक्त विरोध करते हुए विशेषकर स्त्री की स्वतंत्रता, उसके सम्मान और
अधिकारों के लिए अपनी कलम को हथियार की तरह प्रयुक्त कर रही हैं.
प्रस्तुति :
अंजली सहाय
आज पृथ्वी दिवस है.......
हमारी पृथ्वी 4
अरब 60
करोड साल पुरानी है. कोई दो लाख साल पहले मानव इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ. लगभग एक
लाख साल पहले कृषि की शुरुआत और अफ्रीका से मानव के बाहर निकलने के साथ पृथ्वी पर
प्रहारों का सिलसिला शुरू हुआ. औद्योगिक विकास,
भौतिक समृद्धि और अधिकाधिक सुविधाओं की अंधी दौड ने पृथ्वी का अतार्किक,
क्रूर और निर्मम दोहन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.
पृथ्वी का तेज़ी से बदलता मिज़ाज यह बार-बार बता रहा है कि इसके अस्तित्व पर भयानक
संकट के बदल मण्डरा रहे हैं. यूरोप में जहां सामान्यत: तापमान 22-23
डिग्री से ऊपर नहीं जाता था,
आज वहां 30-35
डिग्री तापमान साधारण बात है. भारत की तमाम नदियां बुरी तरह प्रदूषित हैं. जंगल
कटते जा रहे हैं. मनुष्य ने अपने स्वार्थ के चलते अन्य विविध प्राणियों,
जीवधारियों और पड़ पौधों-वनस्पतियों के लिए अस्तित्व का गहरा संकट खड़ा कर दिया है.
समझने की बात यह है उनका संकट पलट कर हम पर वार करेगा. तब हम भी नहीं बचेंगे.
आवश्यकता इस बात की है कि हम खतरे की आहटों को अनसुना न करें. अपने स्वार्थ पर लगाम
लगायें,
विवेक को धकिया कर पीछे न करें. तभी यह पृथ्वी बची रह सकेगी.
23
अप्रेल को विश्व पुस्तक दिवस है
कहा जाता है कि पुस्तकें
मनुष्य की सर्वाधिक विश्वसनीय मित्र होती हैं. जिन्होंने पुस्तकों से ज़रा भी नाता
रख है वे इस कथन की पुष्टि करने में कतई संकोच नहीं कर सकते. पुस्तकें आपकी मित्र,
गुरु और मार्ग दर्शक सब कुछ होती हैं,
और बदले में वे आपसे कभी कुछ भी नहीं मांगती. ऐस निस्वार्थ साथ और कोई हो ही नहीं
सकता.
पिछले कुछ बरसों में किताबों के रंग रूप आकार प्रकार में भारी बदलाव आये हैं. जो
परम्परा प्रेमी हैं उन्होंने प्राय: इन बदलावों पर नाक-भौं सिकोड़ी हैं,
लेकिन सभी जानते हैं कि परिवर्तनों को रोका नहीं ज सकता. यह भी कि हर परिवर्तन बुरा
ही नहीं होता. परिवर्तन अंतत: समय की मांग की देन होते हैं. इसलिए स्वीकार करना
चाहिये कि किताबों के अस्तित्व में जो बदलाव आये हैं उन्हें आना ही था.
िकताब
का शोक गीत
अजदक
कहीं नहीं गई हैं यहीं हैं किताबें. तखत के पैताने,
टांड के जगर-मगर के बीच,
खिलौनों के बाजू,
अलमारी के खानों में,
घडी के पीछे,
अखबारों के नीचे
कितनी
सारी तो किताबें. बस पन्नों के बीच की महक
बदल गई है,
जिल्दों का रंग कुछ
फ़ीका पड गया है.
याद नहीं कब चूमी गई थीं आखिरी बार
मगर यही हैं. उम्र
गुज़ारती,
धीमे-धीमे पियराती हुई,
सासें गिनतीं,
अपने समूचेपने में.पॉलिथीन की हरी
थैली में लिये दयाशंकर धीमे दरवाज़ा खोल
कमरे में
दाखिल होते. करीने से बाहर करते अमर्त्य सेन,
फिर
पवन कुमार वर्मा. बडे भाई
कृपाशंकर मुंह बनाकर गोली
फेंकते अब यह सब नौटंकी पढोगे?
वह हनीफ़ कुरैशी
और
नायपॉल के मुरीद थे. कृपा अपने दया के लिए दुनिया
देखने की नई खिडकियां खोलना
चाहते थे. चीन,
अरब
व
जापान की नई हलचलों की रोशनी में उसे नहलाना
चाहते थे.
मो यान और मुराकामी दिखलाना चाहते थे.
मगर संस्कारी दया भाई के दबदबे से अलग
अपना
ज्ञान मांजना चाहता था. विवेकानंद पहचानना चाहता था. दिमाग
में भारत की
एक मुकम्मल तस्वीर बनाना चाहता था. कभी-कभी भाई
से छिपाकर रजनीश भी पढता.
कृपाशंकर होशियार थे. दूर से गलत
किताबें सूंघ लेते. फिर दयाशंकर और रजनीश दोनों
का जीना
हराम हो जाता. मगर यह सब तब की बात है जब संगीत सीखनेवाली
बंगालिन
सहपाठिन ने दयाशंकर के प्रेम को ठुकरा दिया था,
कृपा ने
लोकसभा की एक संगीन-सी
नौकरी से खुद को बचा लिया था. उसके
उपरांत आलोडन व आरोहण का काल रहा. एक गहरी
आत्म-समीक्षा
के बाद कृपा ने खबरिया चैनल की एक चौदह घंटे की नौकरी
थाम ली
थी. रील्के व नेरुदा भूलकर बोकारो ईस्पात नगर
की एक सुधड कन्या की गृहस्थी
बांध ली थी. और अब फुरसत में
किताबें नहीं नींद की सोचते. दयाशंकर दो वर्षों से
हॉलैंड में हैं. नींद का
रोना उन्हें भी है. फुरसत में अब वह किताबें नहीं अपना
ओरकुट समाज
व
ई-मेल संभालते हैं. अपनी रसोई,
बाथरुम व खिडकी के आगे सजे
बर्फ़
की तस्वीरों से भौजाई व भाई को उपकृत करते हैं.
किताबों पर कभी कृपाशंकर को
जो चैनल पर कार्यक्रम
करने को कहा गया तो शायद सूझेगा नहीं उन्हें करना क्या
है.
कतई याद नहीं आयेगी उन्हें एडम स्मिथ का वैल्थ
ऑव द नेशंस और
अमिय
बागची का आर्थिक इतिहास. चेज़रे पवेज़े
की कवितायें और स्तांधाल की सामाजिक
समीक्षा. शायद अदबदाकर
कृपा डैरलिंपल की लास्ट मुग़ल व सुकेतु मेहता की
मैक्सिमम सिटी की
मोटाईयों का सहारा लें. जॉनी डेप व मीरा नायर के हल्लों के
कोरस में
अपने दर्शकों को सूचित करें ग्रेगरी डेविड रॉबर्ट्स का शांताराम
कैसे
हमारे समय का ज़रुरी दस्तावेज़ है. भाई,
नौकरी और बाज़ार का मामला
है.
वर्ना तो तौबा कीजिये कि इतने भारी पोथे पढे जायेंगे. पंद्रह-बीस वर्षों
पहले
वे शैतान और सिरफिरे लोग हुआ करते होंगे जो प्रगति प्रकाशनों
के बोझा
उपन्यासों के भाग एक,
भाग दो निपटाने का समय
व
सहुलियत रखते थे. हुज़ूर,
मोबाईल
का बिल भरने और सीए की सीटिंग के
लिये तो यहां मोहलत नहीं निकलती,
आप खामखा
मांदेलस्ताम और तुर्गेनेव
का झमेला दे रहे हैं. यार,
रहने दीजिये जहां पडी हैं,
अच्छी हैं,
जिंदा हैं.
सभ्यता का ज़रुरी खाद हैं किताबें और हमारे मन में उनकी
बडी इज्ज़त है.
कहीं तो गई नहीं हैं किताबें. यहीं-यहीं तो हैं
किताबें
कुछ पीलापन ही तो चढा है,
ऐसा क्या खाक़ गजब हुआ है. थोडा पीला
तो
यह पूरा का पूरा मुल्क हुआ है.
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