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अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में लोगों को अपने अधिकारों का ज्ञान न
हो तो कोई बात नहीं, लेकिन उन्हें अपने कर्तव्यों का
ज्ञान अवश्य होना चाहिये। हर एक कर्तव्य के साथ उसकी तौल का अधिकार जुड़ा हुआ होता ही
है, और सच्चे अधिकार तो वे ही हैं जो अपने कर्तव्यों का
योग्य पालन करके प्राप्त किये गये हों। इसलिए नागरिकता के अधिकार सिर्फ उन्हीं को
मिल सकते हैं, जो जिस राज्य में वे रहते हों उसकी सेवा
करते हों। और सिर्फ वे ही इन अधिकारों के साथ पूरा न्याय कर सकते हैं। हर एक आदमी को
झूठ बोलने और गुंडागिरी करने का अधिकार है, किन्तु इस
अधिकार का प्रयोग उस आदमी और समाज, दोनों के लिए
हानिकारी है। लेकिन जो व्यक्ति सत्य और अहिंसा का पालन करता है,
उसे प्रतिष्ठा मिलती है और इस प्रतिष्ठा के फलस्वरूप उसे अधिकार मिल जाते
हैं। और जिन लोगों को अधिकार अपने कर्तव्यों के पालन के फलस्वरूप मिलते हैं,
वे उनका उपयोग समाज की सेवा के लिए ही करते हैं,
अपने लिए कभी नहीं। किसी राष्ट्रीय समाज के स्वराज्य का अर्थ उस समाज के विभिन्न
व्यक्तियों के स्वराज्य (अर्थात् आत्म-शासन)का योग ही है। और ऐसा स्वराज्य व्यक्तियों के द्वारा
नागरिकों के रूप में अपने कर्तव्य के पालन से ही आता है। उसमें कोई अपने अधिकारों
की बात नहीं सोचता। जब उनकी आवश्यकता होती है तब वे उन्हें अपने आप मिल जाते हैं और
इसलिए मिलते हैं कि वे अपने कर्तव्य का सम्पादन ज्यादा अच्छी तरह कर सकें।
अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में कोई किसी का शत्रु नहीं होता,
सारी जनता की भलाई का सामान्य उद्देश्य सिद्ध करने में हरएक अपना अभीष्ट योग
देता है, सब लिख-पढ़ सकते
हैं और उनका ज्ञान दिन-दिन बढ़ता रहता है। बीमारी और रोग
कम-से -कम हो जायं,
ऐसी व्यवस्था की जाती है। कोई कंगाल नहीं होता और मजदूरी करना चाहने वाले को
काम अवश्य मिल जाता है। ऐसी शासन-व्यवस्था में जुआं,
शराबखोरी और दुराचार को या वर्ग-विद्वेष को कोई
स्थान नहीं होता। अमीर लोग अपने धन का उपयोग बुद्धिपूर्वक उपयोगी कार्यो में करेंगे;
अपनी शान-शौकत बढ़ाने में या शारीरिक सुखों की
वृद्धि में उसका अपव्यय नहीं करेंगे। उसमें ऐसा नहीं हो सकता,
होना नहीं चाहिये, कि चंद अमीर तो रत्न-जटित
महलों में रहें और लाखों-करोड़ों ऐसी मनहूस झौंपड़ियों
में, जिनमें हवा और प्रकाश का प्रवेश न हो। अहिंसक
स्वराज्य में न्यायपूर्ण अधिकारों का किसी के भी द्वारा कोई अतिक्रमण नहीं हो सकता
और इसी तरह किसी को कोई अन्यायपूर्ण अधिकार नहीं हो सकते। सुसंघटित राज्य में किसी
के न्यारूय अधिकार का किसी दूसरे के द्वारा अन्याय-पूर्वक
छीना जाना असंभव होना चाहिये और कभी ऐसा हो जाय तो अपहर्ता को अपदस्थ करने के लिए
हिंसा का आश्रय लेने की जरूरत नहीं होनी चाहिये।
हमें जीने दो : जोखिम भरोसे
प्रणय कुमार गर्ग
अंतर्राष्ट्रीय दवा कम्पनियों द्वारा
गुमनाम मरीज़ों को गुमराह किये जाने से नाराज़ एक अमरीकी कोर्ट फिर हरकत में आई है.
वरजीनिया राज्य के एबिनगॉन में जेम्स जोनूस ने 21 जुलाई 2007 के फैसले में परडियु
फार्मा एल पी को ऑक्सिकॉंटिन (OxyContin)
नामक दर्द निवारक दवा से अत्यंत हानिकारक मादक साइड इफेक्ट्स छिपाने का दोषी करार
दिया. कोर्ट ने नशीले पदार्थों जैसे खतरों से आगाह किये बिना दवा के बेचान के
विरुद्ध 634 मिलियन अमरीकी डॉलर (करीब 2600 करोड रुपये) का आर्थिक दण्ड दिया. यहाँ
पाया गया था कि इस दवा से पिछले पांच सालोँ में पांच गुना मरीज़ मौत के घाट उतरे थे.
यहाँ गौरतलब है कि विश्व स्तरीय जर्नल
‘हैल्थ अफेयर्स’ के अप्रेल 2007 के अंक में प्रकाशित सुहा कोहेन और पीटर न्यूमेन के
शोध पत्र में कहा गया है कि अक्सर कम और घातक दुष्परिणामों को तो ज़रूररत से ज़्यादा
महत्व दिया जाता है, लेकिन आम तौर पर होने वाले नुकसानों की अनदेखी कर दी जाती है.
इस शोध पत्र में एस्प्रिन(Disprin),
नेटालीजूमेब(Tysabri)और
दर्द निवारक रॉफिकॉक्सिब(Vioxx)
दवाओं के भयानक साइड इफेक्टस के बारे में बताया गया है. एस्प्रिन से जहां 10
व्यक्ति प्रति लाख मौत के घाट उतर जाते हैं वहीं लाखों अन्य मरीज़ गेस्ट्राइटिस, पेट
दर्द, अल्सर आदि के शिकार हो जाते हैँ. यही कारण है कि
Tysabri को तीन साल की बिक्री
के बाद और
Vioxx को दिल से सम्बन्धित
घातक दुष्परिणामों की वजह से दो साल पहले प्रतिबन्धित कर दिया गया था.इसी तरह न्यू
इंगलैण्ड जर्नल ऑफ मेडिसिन के ताज़ा अंक में प्रकाशित चौंकाने वाले तथ्यों के उजागर
होने के बाद ग्लैक्सो स्मिथक्लिन की एण्टी डायबेटिक दवा एवेण्डिआ(Avandia)
की बिक्री बन्द कर दी गई. अध्ययन से दवा के गम्भीर हृदय विषयक दुष्परिणाम ज्ञात हुए
थे. गत वर्ष जो अन्य दवाएं प्रतिबन्धित हुईं उनमे ब्रिटल मेयर्स स्क्विब की
एण्टीबॉयोटिक टीक्विन(Teaquin),
नोवारटिस की जेलनॉर्म(Zelnorm),
इलीलिलि की पारकिंसंस के लिए
काम मेँ आने वाली परमेक्स(Permax)
शामिल हैं. अगर पिछले दशक पर नज़र डालें तो 26 दवाओं को उनके प्राणघातक साइड इफेक्टस
के कारण आर्थिक दण्ड सहित प्रतिबन्ध भुगतना पडा. प्रतिबन्धित दवाओं ने पिछले 3
वर्षों में करीब तीस हज़ार करोड रुपये का कारोबार कर गैर वाज़िब मुनाफा कमाया.
अब ज़रा अपने देश के हालात पर गौर
कीजिए. ड्रग कण्ट्रोलर ऑफ इण्डिया (DCGI)
के कमज़ोर-लाचार-लचर तंत्र के
चलते रोज़मर्रा प्रयुक्त होने वाली 11 ऐसी दवाइयों का विपणन खुले आम जारी है जिन्हें
विश्व के अन्यान्य देशों में खतरनाक माना जाता है. निमिस्यूलाइड, वेल्डीकाक्सि और
आइबूप्रोफेन जैसी दर्द निवारक दवाएं और सिज़ाप्राइड, फ्यूराजोलिडोन, फिनाइल
प्रोपेनोलामीन आदि उत्तरी अमरीका और यूरोप आदि में प्रतिबन्धित हैं. भारत में इनका
उत्पादन, विपणन और प्रयोग-प्रचलन बिना किसी रोक-टोक के जारी है.
यह ज़रूरी हो गया है कि सूचना के
अधिकार के तहत इन दवाओं पर प्रतिबन्ध न लगाये जाने के कारण पूछे जाएं या किसी जन
हित याचिका के द्वारा इन पर रोक लगाने का मुद्दा उठाया जाए. इसी के साथ यह भी
आवश्यक है कि दवा कम्पनियों पर सम्पूर्ण दायित्व (Absolute
and Vicareous Liability) का
कानून लागू कर मरीज़ों के दीर्घकालीन हितों की रक्षा की दिशा में आगे बढा जाए. दवा
उद्योग पर निगरानी रखने के लिए उच्च अधिकार प्राप्त अधिकरण की स्थापना करवाने की
दिशा में भी प्रयत्न ज़रूरी हैं.
भारत और दुनिया के अन्य देशों की यह
तस्वीर कई सवाल उठाती है.
जब दुनिया में सर्वोत्तम और कठोरतम
मानक स्थापित करने के लिए ख्यात संस्था यू एस फूड एण्ड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (US
FDA) की कार्य प्रणाली तक शक,
शंका और शिथिलता के आरोपों से घिरी नज़र आ रही है और दवा कम्पनियों के बढते प्रभाव
और उनकी आर्थिक ताकत के प्रदर्शन से निष्पक्ष जांच तक की सम्भावनाएं धूमिल होने लगी
हैं तो भारत के उदार व शिथिल परिदृश्य की तो सहज ही कल्पना की जा सकती है. आशंका यह
भी है कि सर्वत्र यह खेल आपसी साठ-गांठ के बल पर चल रहा है वरना कोई वजह नहीं है कि
तमाम क्लिनिकल ट्रायल्स, शोध और अनुसंधान(R
& D), गुणावगुण की रिपोर्ट्स,
विस्तृत और गहन डाटा बेस, आधुनिकतम और सुसज्जित रसायनशालाओं और योग्यतम डॉक्टरों के
अद्यतन और गहनतम ज्ञान के बावज़ूद बेगुनाह, भोले-भाले, निर्दोष मरीज़ इन दवाओं के
घातक दुष्परिणामों के शिकार होते रहें. नित नये प्रतिबन्ध लगते हैं, भारी हर्जाने
दिये जाते हैं लेकिन तस्वीर बदलती नहीं.
आखिर कब तक चलता रहेगा यह खूनी खेल?
सम्पर्क :
बी-11, अग्रवाल कॉलोनी, रातानाडा, जोधपुर.
[प्रणय गर्ग के इस तरह के लेख हमारे
पाठक पहले भी पढते रहे हैं. प्रणय जाने माने कंज़्यूमर एक्टिविस्ट हैं. आजीविका के
लिए वे एक जानी-मानी कम्पनी के मेडिकल रिप्रेज़ेण्टेटिव हैं.]
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